उत्तरदिनचर्या – श्लोक – १२

श्री:
श्रीमते शठकोपाय नमः
श्रीमते रामानुजाय नमः
श्रीमद्वरवर मुनये नमः

परिचय

श्लोक ११                                                                                                             श्लोक १३

श्लोक १२

इति स्तुति निबन्धेन सूचितस्व्मनीषितान्
भृत्यान प्रेमार्द्रया दृश्ट्या सिञ्चन्तं सिन्तयामि तं  //१२//

शब्दश: अर्थ :

इति                         : जैसे अब तक इसे ६ छन्द में विस्तारपूर्वक किया गया है
स्तुति निबन्धेन        : स्तोत्र का मूलग्रंथ –
सूचितस्व्मनीषितान्  : स्वयं को लाभ पसन्द आना
भृत्यान                    : कोइल अन्नान जैसे शिष्य जो खरीद या बेच या ठीक रख सकते है
प्रेमार्द्रया                   : नेत्र जो प्रेम और कृपा से भरी हो
दृश्ट्या                     : आँखों कि दृष्टि
सिञ्चन्तं तं              : जो श्रीवरवर मुनि स्वामीजी
सिन्तयामि               : हमेशा मेरे ख़यालो और ध्यान में है

अर्थ

अब तक हम श्रीवरवर मुनि स्वामीजी के स्तोत्र का आनन्द लिया जिसे दिनचर्या कहते है। इसके पश्चात श्री एरुम्बियप्पा आचार्य को स्तोत्र सुनाकर आनन्द प्रदान करते है। इति = ऐसा। यानि पिछले ६ पदों के अनुसार। अगले ४ पद “त्वम् मे बन्धु”(७) से “याया वृत्ति”(१०) उनके द्वारा रचित वरवर मुनि सटकम में भी प्रगट होता है। “उन्मीलपद्म”(७) और “अपगता गत मानै” उन ४ पदो के जैसे है और इसलिए उन्हें उनकी हीं रचनाये ऐसा मान सकते है। इन ६ पदों में “दिव्यं तदपादा युग्मम दिसतु”(६), “तवपदयुगम देहि(९), “अंग्री द्वयं पस्यन पस्यन(८)”, इन ३ पदों में वें श्रीवरवर मुनि स्वामीजी से उनके चरण कमल उनके मस्तक पर रखने कि और उसे इन चरणों कि अब से पुजा करने कि प्रार्थना करते है । इस पद में प्रार्थना स्वाभाविक है और इसलिये यह ६ पद ६ अष्ट दिग्गजों द्वारा कोइल अण्णन, वानमामलै जीयर, एरुम्बियप्पा, तिरुवेंकटा रामानुज जीयर, परवस्तु पट्टर्पीरण जीयर, प्रतिवादी भयंकर अण्णा, आप्पिल्लै और अप्पुल्लार को छोड़ कर भी गाया जा सकता था।

जबकि कोइल कांतादै श्रीवरवर मुनु स्वामीजी के चरण पकड़ने के लिये प्रसिद्ध है और वानमामलै जीयर श्रीवरवरमुनि स्वामीजी के चरण के लकीर है और इसलिये वें हमेशा उनके चरण कमलों कि हीं पुजा करने में रुचि रखते थे। यह अन्नवप्पैएंगर स्वामीजी कि व्याख्या है। अब हम यह अंतिम निर्णय करते कि एक पद उनके द्वारा गाया गया और बाक़ी पाँच उनका ढेर सारा प्रेम  और सम्मान के कारण उनके शिष्य द्वारा ।

हिंदी अनुवाद – केशव रान्दाद रामानुजदास

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