पूर्वदिनचर्या – श्लोक – ९

श्री:
श्रीमते शठकोपाय नमः
श्रीमते रामानुजाय नमः
श्रीमद्वरवर मुनये नमः

परिचय

श्लोक  ८                                                                                                                           श्लोक  १०

श्लोक  ९

मन्त्ररत्नानुसन्धान सन्ततस्पूरिताधरम् ।
तदर्थतत्वनिध्यान सन्नध्दपुल कोद्गमम् ॥ ९ ॥

मन्त्ररत्नानुसन्धान सन्ततस्पूरिताधरम्  – सदैव ओष्ठो द्वारा द्वयानुसन्धान करते रहते है,
जो की मंत्रों का मुकुटमणि है ।
तदर्थतत्वनिध्यान सन्नध्दपुल कोद्गमम् द्वय मंत्र का अर्थानुसन्धान करते हुये सदैव ध्यान करते रहते है ।

इस श्लोक में स्वामीजी के ओष्ठो की सुन्दरता का वर्णन कर रहे है । द्वय मंत्र का वैभव मूल मंत्र से भी बढ़कर है । मूल मंत्र को मंत्र राज कहते है और द्वय मंत्र को मंत्र रत्न कहते है । मंत्र रत्न मंत्रों में सर्वोच्च है याने मुकुटमणि की तरह है ।

पराशर मुनी बताते है की मंत्रों में यह मंत्र सर्वोच्च है । रहस्य में यह सर्वोच्च रहस्य है । यह मंत्र जल्दी ही हम लोगों को संसार सागर से पार करा देगा । मूलमंत्र में जो शंका उत्पन्न होती है उसका समाधान यहा हो जाता है । सभी पापों को नाश करके , समृद्धि और कल्याण की झलक भी लाता है । इसलिये इसे मंत्र रत्न कहा जाता है । अनुसन्धान याने धीरे – धीरे उच्चारण करना । वरवरमुनी स्वामीजी सदैव द्वयानुसन्धान करते रहते है जिससे उनके ओष्ठ धीरे – धीरे कंपित होते हुये दिखाई देते है । पराशरमुनी कहते है शरीर छूटने पर्यन्त द्वयानुसन्धान करते रहना चाहीये । मंत्र का उच्चारण धीरे – धीरे किया जाता है , क्योंकी शास्त्र में कहा गया है की मंत्र किसीको सुनाई नहीं देना चाहीये । वरवरमुनी स्वामीजी इस शास्त्र की मर्यादा का ख्याल रखते है ।

मंत्र अनुसन्धान करनेवाले अधिकारी को मंत्र का अर्थ जानना आवश्यक है, वरवरमुनी स्वामीजी मंत्र के अर्थ का अनुसन्धान करते हुये मंत्र का जप करते थे । द्वय का अर्थ है अम्माजी समेत भगवान की शरण ग्रहण करना । श्रीस्वामीजी के पुरुषकार के कारण और श्रीभगवान के वात्सल्य आदि गुणों द्वारा भगवान के दिव्य मंगल विग्रह और श्रीचरणों के पवित्र संयोजन का गठन होता है । भगवान के शरणागत उपर बताये गये सत्य को बिना रुकावट के मनन करेगें वे सदैव आनन्द में रहेगें । वरवरमुनी स्वामीजी ने इसका अनुभव किया है ।

द्वयानुसन्धान करना याने प्रपत्ति करना और प्रपत्ति एक ही बार की जाती है दोहराने की जरूरत नहीं है । इस संसार से मुक्त होने के लिये प्रपत्ति एक ही बार की जाती है , परन्तु कालक्षेप करने के लिये दोहराया जा सकता है । इसलिये वरवरमुनी स्वामीजी निरन्तर अनुसन्धान करते रहते है ।

“तदर्थ तत्व निध्यानम् ” को अलग तरह से अर्थ लगाया जाता है । पेरियावाचन पील्लै कहते है , भगवान विष्णु प्रमुख है, जो भक्तों के द्वारा कैंकर्य को स्वीकार करते है । उनका दिव्य मंगल विग्रह अनेक विशेष गुणों से युक्त है , श्रीशठकोप स्वामीजी भगवान के श्रीचरणों के रूप में है और श्रीरामानुज स्वामीजी श्रीशठकोप स्वामीजी के श्रीचरणों के रूप में विराजमान है । गुरु शब्द केवल श्रीरामानुज स्वामीजी को संबोधित करता है ओर किसीको नहीं । इस उपर के व्याख्यानुसार द्वय मंत्र में चरण शब्द श्रीरामानुज स्वामीजी को संबोधित करता है, यही “तदर्थ तत्व” का अर्थ है । इस विशेषार्थ से मालूम होता है कि भगवान के श्रीचरण श्रीमन्नारायण के नहीं बल्की श्री रामानुज स्वामीजी के है , जो कि श्री द्वय मंत्र का विशेषार्थ है ।

श्रीवरवरमुनी स्वामीजी श्री रामानुज स्वामीजी के भक्त रहे और उनके श्रीचरणों का सदैव स्मरण करते रहते थे । द्वय मंत्र के पीछले अर्थ के मुक़ाबले अभी बताया हुआ अर्थ अत्यन्त विशेष है । १२ वें श्लोक में देवराज गुरुजी कहते है कि श्रीवरवरमुनी स्वामीजी को द्वयानुसन्धान करते हुये दर्शन करना चाहता हूँ ।

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