Monthly Archives: September 2016

उत्तरदिनचर्या – श्लोक – २

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श्री:
श्रीमते शठकोपाय नमः
श्रीमते रामानुजाय नमः
श्रीमद्वरवर मुनये नमः

परिचय

श्लोक १                                                                                                                                 श्लोक ३

श्लोक 

अथ गोष्ठिम्  गरिष्ठानाम् अधिष्ठाय सुमे धसाम् |
वाक्यालङ्क्रुति वाक्यानि व्याख्यातारम  नमामि म्  ||

शब्दश: अर्थ

अथ                                : यतिराज विंशति को रचने के पश्चात
गरिष्ठानाम्                    : एक जो अपनी रचनायें तैयार करने मे और आचार्य के दर्जे को संभालने के लिए सक्षम है
सुमेध्साम्                       : वास्तव में बुद्धिमान और धार्मिक
गोष्ठिम्                         : सभा
अधिष्ठाय                      : यह प्राप्त करना
वाक्यलङ्क्रुति वाक्यानि   : श्रीवचन भूषण के वाक्यों में
व्याख्यातारम                 : समझता हूँ
तम                               : उन श्रीवरवर मुनि स्वामीजी कि
नमामि                          : आराधना करता हूँ

व्याख्या

ग्रन्थ कि रचना के लिए अब तक स्वाध्याय विस्तृत तरिके से किया गया इसलिये अब वें आचार्य के महान कार्य की व्याख्या को समझाने के लिए दूसरे स्वाध्याय को पहिले के जैसे विस्तृत कर रहे है। करिश्थ = अध्यंतम कुरवक करिश्थ = श्रेष्ठ आचार्य।“सुमेधस:” उनके लिये पदवी है। अर्थो को एक ही बार सुनकर पहचानना, सिखे हुए विचारों को याद करने को मेधा कहते है। सुमेधस: जिसके पार अत्युतम मेधा है। इधर सुमेधा कौन है? कोइल कांतादै अन्नन, वानमामलाई जीयर और अन्य अष्ठ दिग्गज। श्रीवरवर मुनि स्वामीजी जो अब तक योगा में स्वयं श्रीरामानुज स्वामीजी कि पूजा करते थे अब सब कुछ त्याग कर शिष्यों के साथ बैठकर श्रीवचन भूषण दिव्य शास्त्र को समझा रहे है। श्री देवराज स्वामीजी कहते है मैं ऐसे संत कि पूजा करत हूँ। श्रीवचन भूषण = एक आभूषण जो मणि और हीरा से बना है वह है रत्न भूषण। श्रीपिल्लै लोकाचार्य द्वारा रचित जिसमे उनके स्वयं के थोड़े ही शब्द है परन्तु दूसरे आचार्य की उच्च शब्द रचना है जो पाठक को प्रकाश दिखाता है वह है श्रीवचन भूषण। क्योंकि यह ग्रन्थ बहुत व्यवस्थित है उसके विषय सूची और शैली में श्रीवरवर मुनि स्वामीजी उसे बहुत सम्मानित तरिके से समझाते है उसके अर्थ को समझे जैसे बनाते है। वह जिनका अर्थ मालूम न था ऐसे शब्दों और पंक्तियों को तोड़कर समझाते है, ताकि वह विषय आसानी से समझ सके और जहाँ शंका हो वहाँ प्रश्न उठाकर उसका उत्तर दे सके। सुमेधस: करिश्था…..ऐसा कहकर श्रीवरवरमुनि स्वामीजी जो बड़े ज्ञानि जैसे कोइल अन्नन को भी जानना मुश्किल हैं ऐसे श्रीवचन भूषण के कठिन विचार समझाते है और यह कार्य का विचार बहुत गहरा है और श्रीवरवरमुनि स्वामीजी कि मेधा हमें उसे पालन करने में आसान करती है।

क्योंकि श्रीवचन भूषण में वेद, स्मृति, इतिहास, पुराण, दिव्य प्रबन्ध आदि का सारा सार है इस एक ग्रन्थ को समझाना बाकी सब पुराने ग्रन्थ को समझाने के बराबर है और इसलिये श्रीवरवर मुनि स्वामीजी ने इस अनोखी ग्रन्थ को समझाते हुए स्वाध्याय का हीं पालन किया।

हिंदी अनुवाद – केशव रान्दाद रामानुजदास

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उत्तरदिनचर्या – श्लोक – १

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श्रीमते शठकोपाय नमः
श्रीमते रामानुजाय नमः
श्रीमद्वरवर मुनये नमः

परिचय                                                                                                                                   श्लोक २

श्लोक १

इति यति कुल धुर्य मेध मानै श्रुति मधुरैउदितै प्रहर्षयन्तं |
वरवर मुनिमेव चिन्ययन्ति मतिरियमेति निरत्ययम प्रसादं ||

शब्दार्थ:

इति                  : “श्रीमाधवांघ्रि” से “विज्ञापनम” तक व्यक्त किये अनुसार
मेध मानै           : नित्य अधिक विकसित होना
श्रुति मधुरै         : सुनने के लिये सुहावना
उदितै                : अभिव्यक्ति
यतिकुल धुर्य     : सन्यासियों में श्रेष्ठ श्रीरामानुज स्वामीजी
प्रहर्शयन्तम      : उनको सुखद करने के समय
वरवर मुनिमेव  : श्रीवरवर मुनि स्वामीजी मे स्थिर करते समय
मतिरियमेति    : मेरा मन चित
निरत्ययम       : स्थायी रूप से
प्रसादम यति    : स्पष्टता प्राप्त करता है

व्याख्या

श्री देवराज स्वामीजी (श्री एरुम्बियप्पा) दिलासा दिये और आनंदित हुए कि उनका मन प्राप्त हो और जो न प्राप्त हो ऐसे विषयों में अभी तक कष्ट में डुबा हुआ था वह अब केवल श्री वरवर मुनि स्वामीजी के बारें में हीं सोचता है जिन्होंने श्रीरामानुज स्वामीजी में खुशी से गोता लगाया और श्री यतिराज विंशति भेंट दि और उनके अशांति से मुक्त हुए और शांति प्राप्त कि। “वरवरमुनि एव” वर्णन करके वह यह कहते हैं यह खुशी उन्हें यतिराज के बारें में विचार करके नहीं बल्कि श्री वरवरमुनि स्वामीजी के बारें में सोचकर हुई है जिन्होंने श्रीयतिराज को अपने स्तोत्र सुनाकर आनंदित किया। भगवान या भागवतों या आचार्यों के विचारों से उपर उठकर श्री वरवरमुनि स्वामीजी जो आचार्य के प्रति भक्ति रखते है की जो श्रेष्ठ और स्थिर है उनके बारे मे सोचकर मानसिक स्पष्टता प्राप्त कर सकते है। हालाकि यह पद्य छोटा हैं केवल २० पदों के साथ यह संपूर्णता “मेध मानै” शब्द से दर्शाया गया है जो अधिक जैसे लगता है परन्तु श्रीरामानुज स्वामीजी के कृपा से जो यह श्रीवरवर मुनि स्वामीजी के हरेक पद को हजार पध्य के समान समझते है।

महात्मा जन हमारा छोटे चीज के लिये भी उनके प्रति प्यार बहुत बड़ा और अमूल्य समझते है।  “प्रहर्शयन्तम” शब्द में हर्ष प्रगट होता है, “हर्ष” शब्द के पिछे “प्र” लगाया गया है जो श्रीरामानुज स्वामीजी का श्रीवरवर मुनि स्वामीजी के प्रति प्रसन्नता को दर्शाता हैं। श्रीरामानुज स्वामीजी की  प्रसन्नता श्रीवरवर मुनि स्वामीजी के प्रति केवल श्रद्धा है और श्रीवरवर मुनि स्वामीजी अपने आचार्य के प्रसन्नता से कोई सांसारिक लाभ लेनेका सोच भी नहीं सकते। श्रीवरवरमुनि स्वामीजी “चिन्ययन्ति” शब्द से हमेशा श्रीरामानुज स्वामीजी के बारें में विचार करते है और अनूठे रूप से चिन्ययन्ति जो गोपी है उनके साथ तुलना करते है जो हमेशा भगवान श्रीकृष्ण या श्रीशठकोप स्वामीजी के बारें में सोचती रहती है ज्यो की उनके भगवान के प्रति अगाध प्रेम के कारण दीर्घ चिन्ययन्ति से जाना जाता है । यहाँ शब्दों को तीन भागों में बाँटा गया है… स्रुति मधुरै उदितै। यह स्रुतिमधुरै और उदितै ऐसा भी बाँटा जा सकता हैं जब की रुदीतै का अर्थ रोना है। “अल्पापी मे” छन्द से श्रीवरवर मुनि स्वामीजी ज्यादातर अपनी अज्ञानता, निष्ठा में कमी के बारे में बात कर रहे है और “हा हंत हंत” कहकर रोते है अपना दर्द समझाते है और जैसे रोना हमेशा स्वदीप्तिमान कि तरफ ले जाता है हम “रुदितै” शब्द का इस्तेमाल कर सकते है। मोक्ष के लिये रोना सुनकर श्रीरामानुज स्वामीजी प्रसन्न होंगे यह कहना क्या अवश्यक है? इसलिये श्रीवरवर मुनि स्वामीजी “रुदितै” शब्द का उपयोग करते है। श्रीवरवर मुनि स्वामीजी संस्कृत में जो कहे है उसे यतिराज विंशति और तमिल में आर्ति प्रबन्ध कहते है।

हिंदी अनुवाद – केशव रान्दाद रामानुजदास

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uththara dhinacharyA – conclusion

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Concluding section

The word Dinacharya, though refers to the daily practices, observances etc, by import refers to the Supreme Lord who is the subject matter of such offerings, and Sri Manavala Mamunikal. A devotee is to recite these stanzas with total devotion. The result of such devotional observance is the perennial world for him which is beyond the Mahat, beyond the so called super worlds praised in texts, and that is Sri Vaikuntha. Prapnoti prakarshena aapnoti=he gets it surely, and firmly. The ultimate idea is he attains the supreme position of service to the Acharya with great pleasure and privilege, as the Lord grants him the position that is there for the three types of beings, viz, nitya, mukta and baddha.

Lakshmi Tantra says, “Those who observe these bhagavad aaraadhana five times a day as a direct way for obtaining salvation, one after another at appropriate times in all their capabilities attain paramapada soon after  they complete hundred years of life”.

Shandilya Smriti says. “Those who give up all other means for liberation and abide by this five fold aaraadhana, leaving karma/gnana/bhakti methods, attain Salvation” . Yet, as Bharadwaja and other elders have stated accepting the Lord as the readily available means (siddhopaya) when a prapanna observes the way with abigamana, upaadaana, ijyaa, swaadhyaaya, dhyaana(remembering the things for bhagavad aaraadhana=abhigamana;gathering the things for aaraadhana=upaadaana;bhagavad aaraadhana=ijyaa; reading great texts=swaadhyaaya; meditating on the Lord=yoga) he does all these five activities not as Upaayam/means but as phala, the result. All the five have to be treated not as means but the end as the very activities put him in a state of exquisite bliss affirming he shall spend his time happily in this state. These five timed observances are for the happiness of the Lord and so they result in his exaltation.

Thus ends the explanations for the Sri Varavaramuni Dinacharya of Sri Devaraja Guru, based on the Samskrit commentary by Sri Tirumazhisai Annavappaiyangar, done in Tamizh by Tirumalai ananthaanpillai Krishnamaacharya dasa.

Conclusion

Sri Varavaramuni Dinacharya has three parts…..Poorva Dinacharya, Mamuni’s Yatiraja Vimsati and Uttara Dinacharya. For the two Dinacharyas only Annavappaiengar’s Samskrit commentary is available in print.. For Yatiraja Vimsati, however, all the three commentaries by Annavappaiengar swami in Samskrit and the manipravala commentaries by Pillai Lokam Jeeyar swami and Suddha sattvam Doddaacharya swami as well as the samskrit commentary are in print. I have omitted the two manipravaala commentaries and based my explanations on the Samskrit text of sri Annavappa iyengar swami, even there leaving some great details for fear of length. All errors, omissions due to my ignorance and carelessness should please be pardoned. This is my request to the educated erudite elite.

Translation by vangIpuram sadagOpa rAmAnuja dAsan

Source: http://divyaprabandham.koyil.org/index.php/2016/09/உத்தர-திநசர்யை-முடிவுர/

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uththara dhinacharyA – 14

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Dinacharyaam imaam divyaam Ramya Jaamaatru Yogina: |
Bhaktyaa nityamanudhyaayan praapnoti paramam padam ||

Word to word meaning

imaam -this text from “Patertyu paschime yaame”(Poorva dinacharya 14) to “Sayaanam samsmaraami tam”
Divyaam Ramyajaamatru Yogina: Dinacharyaam -detailing the daily divine auspicious routines of Sri Ramyajaamaatru Yogi swami
Nityam -everyday (day and night) -when a person recites with devotion
PraapnotiParamam padam-attains that supreme Abode of Sri Vaikuntha beyond which there is none to reach.

Purport

Finally he concludes by stating the gain of reciting this Dinacharya grantha. We already saw that upto  stanza 13 in Poorva Dinacharya is Prologue, Upodhgaatam. From stanza 14 there upto 13 in Uttara Dinacharya is only the Varavara Muni Dinacharya. We can take “Divyaam” to mean the great practices mentioned in Sastras like Paancharaatra or the the activities in the Sri Vaikuntha which are unlike those of this world five times a day(pancha kaalika anushthaana). These practices Anushthaanaas are too difficult to and tough for routine and were in full swing during Krta yuga at the hands of Paramaikaantis, and get reduced slowly by Treta Dwaapara yugas and become almost extinct in Kali yuga as stated in Bharadwaaja Parisishta. Men who have multifarious desires and worship multiple demigods in Kali can’t and won’t follow these edicts. They chase cheap things with passion and only a few shall seize the Lord and so the other religionists will try to covet them also.

Translation by vangIpuram sadagOpa rAmAnuja dAsan

Source: http://divyaprabandham.koyil.org/index.php/2016/09/உத்தர-திநசர்யை-14/

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uththara dhinacharyA – 13

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atha: brthyaan anugnaapya krtvaa cheta: subhaasraye |
sayaneeyam parishkrtya sayaanam samsmaraami tam ||

Word to word meaning

atha: – as stated earlier after two jaamaas in the night subsequent to personal teachings to disciples,
brthyaan -the disciples
anuugnaapya -having been seen off
subhaasraye -keeping the eye and mind captivating auspicious form of the Lord  
cheta: krtvaa -in the mind meditating on it
sayaneeyam -on the bed
parishkrtya -decorating it by lying on it
sayaanam -sleeps
tham -that Swami Manavaala Mahamuni
samsmaraami – is in my deep meditation

Purport

By “krtvaa cheta subhaasraye” the meditation on the Supreme Lord in the night was mentioned. Maamunikal leaves the venerable seat for Bhagavad dhyana as indicated by “tatha: kanaka paryanke” and after looking benevelontly at the disciples who were in the devotional chorus he goes to the bed to sleep with deep meditation on the Lord. Erumbiyappa meditates on this Mahamuni who being the incarnation of Adisesha shall have his physique naturally expanded twice in slumber and this graceful sight is a feast for Appa without any obstacle while the Acharya rests. For Mahamuni the focus of meditation is the auspicious form of the Lord while for Appa it is the graceful appearance of the Acharya.We can presume Mahamuni meditates on the Lord for the pleasure of Sri Ramanuja while Appa does so for the pleasure of Sri Rama who made Mamuni to compel Appa to worship Him. Sri Rama’s such a command to Appa is mentioned in Yatindrapravana Prabhavam and also Appa’s own Varavaramuni Satakam.

Translation by vangIpuram sadagOpa rAmAnuja dAsan

Source: http://divyaprabandham.koyil.org/index.php/2016/09/உத்தர-திநசர்யை-13/

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शरणागति गद्य- चूर्णिका 1

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श्री: श्रीमते शठकोपाय नमः श्रीमते रामानुजाय नमः श्रीमद्वरवरमुनये नमः

शरणागति गद्य

<<< परिचय खंड

namperumal-nachiar_serthi2

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अवतारिका (भूमिका)

इस चूर्णिका को द्वयमंत्र के वर्णन के रूप में जाना जाता है। यह सर्वविदित है कि एकमात्र भगवान श्रीमन्नारायण ही सभी फल प्रदान करने वाले हैं, (“सकल फलप्रदो ही विष्णु” – विष्णु धर्म), तब सर्वप्रथम पिराट्टी (श्रीमहालक्ष्मीजी) के श्रीचरणों में शरणागति क्यों? जिस प्रकार बहुत वर्षों से बिछड़ा हुआ पुत्र घर लौटकर सर्वप्रथम माता के पास जाता है और उनसे भेंट करने के पश्चाद ही पिता से भेंट करता है, उसी प्रकार श्रीरामानुज स्वामीजी अनुभव करते हैं कि उन्हें पहले श्री जी के समक्ष जाकर अपनी व्यथा सुनानी चाहिए। और श्रीजी “सुहृदम् सर्वभूतानाम” (वह जो सभी प्राणियों के कल्याण के विषय में सोचती है- भगवत गीता ) भी है। उनके दोनों नेत्रों में, “चन्द्र” है (अर्थात वे केवल करुणापूर्ण/ दयालु है) यद्यपि भगवान के एक नेत्र में तेज/ ताप (“सूर्य”) और दुसरे में स्नेह/ करुणा (“चन्द्र”) है। श्रीरामानुज स्वामीजी विचार करते हैं कि भगवान नारायण के समक्ष जाने पर उनके पिछले कर्मों की ओर देखकर यदि भगवान उनकी ओर क्रोध से देखेंगे तब क्या? इसलिए वे विचार करते हैं कि सर्वप्रथम श्रीमहालक्ष्मीजी के चरण कमलों में शरणागत होना ही उपयुक्त और सुरक्षित है। श्रीमहालक्ष्मीजी की कृपा और आशीष से ही, उनमें भगवान श्रीमन्नारायण से स्वयं को क्षमा करने की प्रार्थना करने का साहस प्राप्त होगा।

चूर्णिका

ॐ भगवाननारायणाभीमतानुरुप स्वरुपरुपगुणविभवैश्वर्य शीलाद्यनवधिकातिशय असंख्येय कल्याण गुणगणां, पद्मवनालयं, भगवतीम्, श्रियं देवीम्, नित्यानपायिनीम, निरवद्याम्, देवदेवदिव्यमहिषिम्, अखिल जगन्मातरम् अस्मन्मातरम् अशरण्य शरण्याम्,अनन्य शरण: शरणमहं प्रपध्ये ।

शब्दार्थ

भगवान – जिनमें आवश्यक छः गुण निहित है (ज्ञान, बल, ऐश्वर्य, वीर्य, शक्ति, तेजस, जिन्हें आगे विस्तार में समझाया जायेगा)

नारायण – सभी प्राणी, चेतन और अचेतन दोनों के लिए आश्रय/ निवास

अभिमत – भगवान श्रीमन्नारायण को प्रिय

अनुरूप – भगवान श्रीमन्नारायण के समान ही रूप सौंदर्य

स्वरुप – प्राकृतिक विशेषताएं (जिन्हें बाद में समझाया गया है)

रूप – सौंदर्य

गुण – बहुत से विशिष्ट लक्षण

विभव – अकल्पनीय संपत्ति से युक्त

ऐश्वर्य – प्राणियों को नियंत्रित करने या निर्देशित करने का सामर्थ्य

शील – ऐसे गुण जिनके धारक अपने अनुयायियों के दोषों को नहीं देखते

आदि – और भी बहुत से गुणों से पूर्ण

अनवधिका – कभी कम न होने वाला/ अक्षय

अतिशय – अद्भुत

असंख्य – अगणित, जिनकी गिनती न की जा सके

कल्याण गुण गणं – अत्यंत दिव्य कल्याण गुणों की सेना से युक्त

पद्म वनालयाम – पद्म/ कमलों के वन का आसन, विराजने हेतु

भगवतीम् – भगवान के विषय में बताये गए, सभी 6 गुणों को धारण करनेवाली (अर्थात ज्ञान, बल, ऐश्वर्य, वीर्य, शक्ति, तेज)

श्रियं – “श्री” (श्रीमहालक्ष्मीजी, आगे समझाया गया है)

देवीम् – दैदीप्यमान शक्ति से युक्त

नित्यानपायिनीम् – भगवान श्रीमन्नारायण से एक क्षण भी पृथक न होने वाली

निरवद्याम् – बिना किसी दोष के, इन गुणों को धारण करने वाली, स्वयं की प्रतिष्ठा के लिए नहीं, अपितु प्राणियों के कल्याण के लिए

देवदेव दिव्य महिषिम् – सभी देवों के स्वामी, भगवान नारायण की महारानी

अखिल जगन मातरम् – जगत के सभी प्राणियों की माता

अस्मन मातरम् – मेरी भी माता (विशेष गुण)

अशरण्य शरण्य: – जिनका और कोई आश्रय नहीं है, उनके लिए आश्रय

शरणं अहं प्रपद्ये – ऐसे ही दास आपके चरणों में आश्रय लेता है

विस्तृत व्याख्यान

भगवान नारायण– भगवान का अर्थ है वह जिनमें बिना किसी दोष के सभी विशिष्ट गुण निहित है। उन असंख्य गुणों में से, 6 महत्वपूर्ण गुणों को प्रदर्शित किया गया है – ज्ञान, बल, ऐश्वर्य, वीर्य/ वीरता, शक्ति, तेज/ कांति। भगवान श्रीमन्नारायण तीन मुख्य भूमिकाएं निभाते हैं – सृष्टि-कर्ता, रक्षक और संहारक। इन तीनों भूमिकाओं में, दो-दो गुण अत्यधिक महत्वपूर्ण है। संहारक की भूमिका में, उन्हें ज्ञान और बल की आवश्यकता होती है। ज्ञान की आवश्यकता यह सुनिश्चित करने के लिए है कि जब भी आत्मा पृथ्वी पर रहने वाली अपनी देह छोड़े तब वह अपने सभी कर्म और सूक्ष्म भूत (पञ्च इन्द्रियाँ) अपने साथ ले जाये और यह सुनिश्चित करने के लिए कि आत्माओं और उनके कर्मों में आपस में कोई उलझन न हो। प्रलय के समय समस्त सृष्टि को पुनः वापस लेने के लिए बल की आवश्यकता है (ब्रह्मा के एक दिन के अंत में सम्पूर्ण संहार)।

सृष्टि-कर्ता की भूमिका में, उन्हें ऐश्वर्य (नियंत्रण) और वीर्य (शक्ति) की आवश्यकता है –यहाँ ऐश्वर्य का बोध संपत्ति से नहीं है, अपितु मुख्यतः आत्मा की यात्रा में उसे नियुक्त, निर्देशित और संचालन करने की क्षमता से है। वीरता – भगवान द्वारा सृष्टि रचना के पश्चाद भी दुर्बल नहीं होने के सामर्थ्य को दर्शाता है। इतने विशाल परिश्रम के पश्चाद भी वे स्वेद से प्रभावित नहीं होते। यही वीरता है।

रक्षक की भूमिका में, उन्हें शक्ति और तेजस की आवश्यकता है – शक्ति, अपने भक्तों की शत्रुओं से रक्षा करने हेतु और तेज (कांति) यह सुनिश्चित करने के लिए कि भक्तों की रक्षा करते हुए, कोई भी शत्रु उनके समीप आकर उन्हें नुक्सान नहीं पहुंचाए।

“नारायण”, संबोधन सभी चेतन और अचेतन प्राणियों के आश्रय रूप में उनकी भूमिका को दर्शाता है। भगवान शब्द का उल्लेख कुछ अन्य लोगों को सम्मान प्रदान करने के लिए भी किया जाता है (उदाहरण के लिए व्यास भगवान, नारद भगवान आदी), परंतु “नारायण” शब्द सिर्फ उस परमात्मा को संबोधित करता है, दोनों ही रूपों से – शब्द के नैसर्गिक अर्थ के अनुसार और शब्द के अक्षरों के संयोजन के अर्थानुसार भी। नारा: शब्द का संदर्भ सभी चेतन (पशुओं, पौधे, मनुष्यों आदि की बहुत सी प्रजातियों से) प्राणियों के समूह से है और अयन अर्थात आश्रय। जब दोनों शब्दों की संधि की जाती है तब पाणिनि व्याकरण के अनुसार, संधि को “नारायण” अभिव्यक्त किया जाता है, जो सिर्फ श्रीमन्नारायण को ही संबोधित करता है। इस प्रकार शब्द “भगवान नारायण”, श्रेष्ठ गुणों को धारण करने वाले और लीला विभूति (संसार) और नित्य विभूति (श्रीवैकुंठ), दोनों विभूतियों के स्वामी के लिए संबोधित किया गया है।

इस संबंध में यह प्रश्न उत्पन्न हो सकता है कि श्रीजी के चरणों में शरणागति निवेदन करते हुए, श्रीरामानुज स्वामीजी ने भगवान नारायण के विषय में चर्चा क्यों की? जिस प्रकार खेत की सिंचाई के लिए जल की और झील के लिए बाँध की आवश्यकता होती है, उसी प्रकार श्रीजी के अनंत दिव्य गुणों और उनकी दिव्य संपत्ति का वर्णन भी आवश्यक है। जिस प्रकार भगवान नारायण के लिए “श्रीमन” संबोधन किया जाता है, उसी प्रकार श्रीमहालक्ष्मीजी के लिए “विष्णु-पत्नी” संबोधन किया जाता है। श्रीजी के महात्म्य को समझने के लिए, हमें श्रीमन्नारायण के प्रभुत्व को जानना आवश्यक है।

अभिमत अनुरूप – श्रीलक्ष्मीजी सदा भगवान की प्रिया है और उनका सौंदर्य सदा ही भगवान के सौंदर्य के अनुरूप है। अपने सामान्य जीवन में हम उन दंपत्तिओं को देखते हैं, जहाँ दोनों ही सुंदर हो या दोनों ही सदगुणी हो। मात्र दिव्य दंपत्ति में ही हमें दोनों प्रकार के गुण दोनों में देखने को मिलते हैं, अर्थात अभिमत और अनुरूप। दोनों को परस्पर एक दुसरे में क्या प्रिय है और दोनों में परस्पर क्या अनुरूप, इसे आगे समझाया गया है।

स्वरुप रूप गुण विभव ऐश्वर्य शीलादी – अर्थात, श्रीजी का स्वरुप भगवान को प्रिय है और भगवान का स्वरुप श्रीजी को प्रिय है। ऐसा ही उनके सभी गुण विशेषताओं के साथ है। जब रावण सीताजी को श्रीराम का विक्षत शीश दिखाता है और उसी प्रकार जब इंद्रजीत सीताजी का विक्षत शीश श्रीराम को दिखाता है, सर्वप्रथम वे दोनों अचंभित होते हैं परंतु वे जानते थे की यह सत्य नहीं है। यह उस स्वरुप के कारण है, जो उन दोनों को एक दुसरे से प्रिय है। रूप के संदर्भ में भी, वे दोनों एक दूसरे के लिए उपयुक्त है। उनका दिव्य रूप सौंदर्य एक दूसरे को पूर्ण करता है।

यहाँ गुण का संदर्भ दिव्य विग्रह के सौन्दर्य से है– सौंदर्य (दिव्य विग्रह/ तिरुमेनी के संदर्भ में सुंदरता, लावण्य (रूप के सभी तत्वों में सुंदरता)) आदि गुण। इन गुणों के द्वारा श्रीजी भगवान से हमारी ओर दयादृष्टि करने और हमारे अपराधों को क्षमा करने की सिफारिश करती है और इसलिए उनके यह गुण भगवान को बहुत प्रिय है।

विभव अर्थात संपत्ति। यदि श्रीजी वचन हैं, तो भगवान उस वचन का अर्थ हैं। वे दोनों अवियोज्य है। वह सब जो पौरुष है, उस पर भगवान की मोहर है और वह सभी जो स्त्री-लिंग है उन पर श्रीजी की मोहर है। श्रीजी की संपत्ति भगवान को अति प्रिय है और वह संपत्ति उस प्रकार नहीं है जैसी भगवान धारण करते है (पुष्प की माला, चन्दन का लेप, तोता आदि)।

ऐश्वर्य – प्राणियों को नियंत्रित करने या निर्देशित करने का सामर्थ्य। वे तीन प्रकार के चेतनों, जैसे बद्धात्मा (हमारे समान), मुक्तात्मा (जो मोक्ष प्राप्त कर श्रीवैकुंठ में कैंकर्य कर रहे हैं) और नित्यात्मा (जो नित्य अनंत से श्रीवैकुंठ में हैं और हमारे समान संसार में जन्म नहीं लेते) को नियंत्रित करती है, बद्धात्मा को उनके कर्मों के माध्यम से और स्वरुपानुरूप (शेषभूत और पारतंत्रिय के द्वारा, मुक्तात्मा और नित्यात्मा को) नियंत्रित करती है। वे भगवान श्रीमन्नारायण को भी अपने प्रेम और स्नेह के द्वारा उनके पालक/ रक्षक स्वरुप का स्मरण कराती है और यह सुनिश्चित करती है कि वे बद्धात्मा द्वारा शरणागति करने पर उन्हें मोक्ष प्रदान करे। भगवान उनकी इस भूमिका को देखकर बहुत प्रसन्न होते हैं, क्यूंकि उत्तम पुरुष के विषय में ऐसा कहा गया है कि उत्तम पुरुष अपनी पत्नी के विचारों का सम्मान करते हैं। ऐश्वर्य के विषय में बताई गयी सभी विशेषताएं अन्य गुणों जैसे ज्ञान, बल, वीर्य, शक्ति और तेज के लिए भी उपयुक्त है।

शील – ऐसा गुण जिसके धारक अपने अनुयायियों के दोषों को नहीं देखते; उच्च स्तर के चेतन अपने से नीचे वाले प्राणियों के साथ चलते हैं, उन्हें समान जानते हुए; श्रीजी अपने आचरण और व्यवहार से भगवान के सदृश ही है। श्रीराम अवतार में भगवान ने साधारण सामान्य जनों से प्रेम पूर्वक व्यवहार किया जैसे गुह (केवट), सुग्रीव (वानर राज) और विभीषण (एक राक्षस)। उसीप्रकार श्रीजी ने भी सीताजी के अवतार में उन राक्षसनियों से प्रेम पूर्वक व्यवहार किया जिन्होंने राक्षस रावण की बात मनवाने के लिए उनसे दुर्व्यवहार किया। उन्होंने रावण को भी सचेत किया कि जीवित रहने के लिए उसे श्रीराम से मित्रता कर लेना चाहिए। उन्होंने उसे परामर्श देने में संकोच नहीं किया यद्यपि वह अत्यंत नीच प्रवृत्ति का था। यह गुण भगवान को बहुत प्रिय है क्यूंकि यह भूमिका (पालनहार) भगवान भी प्रायः धारण करते हैं।

आदि – इसका अर्थ है की उपरोक्त वर्णित गुणों से प्रारंभ करते हुए, श्रीजी में ऐसे और भी बहुत से गुण निहित हैं। भगवान के गुणों की व्याख्या करना यद्यपि संभव है परंतु श्रीजी के गुणों के विषय में चर्चा करना असंभव है,- ऐसा व्याख्यानकर्ता श्रीपेरियवाच्चान पिल्लै का कहना है।

अनवधिकातिशय – उपरोक्त वर्णित सभी गुण, विस्तार के संदर्भ में असीमित है और अद्भुत है।

असंख्य – अगणित गुण

कल्याण गुण गणाम् – यह सभी गुण भी दिव्य है। यह गुण जो भगवान में भी विद्यमान है, परस्पर एक दुसरे के पूरक है। यद्यपि कभी भगवान में दोष देखा जा सकता है– क्यूंकि वे पुर्णतः स्वतंत्र है, परंतु श्रीजी के गुणों में कोई भी दोष नहीं खोज सकता। भगवान का स्वातंत्रियम गुण, उन्हें हमारे द्वारा अपराध करने पर क्रोधित कर सकता है, परंतु श्रीजी हमारे अपराधों को भी सत्कर्मों में परिवर्तित कर देती है। और उनके सभी गुण अत्यंत प्रचुर मात्रा में है।

पद्मवनालयाम् –  इसका संदर्भ दिव्य कल्याण गुणों से है। वे स्वयं श्रीभगवान को दिव्य सुगंध प्रदान करती है, जिन्हें “सर्व गंध:” (सभी सुगंधों का प्रतीक) संबोधित किया जाता है। इसका संदर्भ इससे भी है कि वे भगवान से अत्यंत प्रेमपूर्वक व्यवहार करती है और उनके आनंद/ प्रसन्नता का स्त्रोत है।

भगवतिम् – इस व्याख्यान में उल्लेखित 6 गुण जिन्हें भगवान ने धारण किया है, उन्हें श्रीजी भी धारण करती है। उनकी पूजा करने में भगवान को भी प्रसन्नता होगी। पद्मवनालयां भगवतिम् एक साथ इन दोनों शब्दों का अर्थ है कि यदि शरणागत श्रीजी के द्वारा भगवान तक पहुँचता है, तब वह अपनी मधुरता से सुनिश्चित करती है कि भगवान उस शरणागत के समस्त दोषों पर ध्यान न दे और उन्हें इच्छानुसार मोक्ष प्रदान करेंगे।.

श्रियम् – यद्यपि इस संसार में सभी उनके श्रीचरणों में आश्रय प्राप्त करते हैं, और वे भगवान का आश्रय धारण करती है। वे सभी को नियंत्रित करती है और वे भगवान द्वारा नियंत्रित होती है। यद्यपि वे परस्पर एक दूसरे से अवियोज्य है, जिस प्रकार मणि और उसकी चमक अथवा पुष्प और उसकी सुगंध। श्रियं, “श्री:” शब्द से उत्पन्न हुआ है, जिसका अर्थ है सभी में अग्रणी, जिनके नायक भगवान है; वे हमारे रुदन को सुनकर, उस विनती को भगवान के समक्ष पहुँचाती है; वे हमारे सभी पूर्व दुराचारों और अपराधों को क्षमा कर हमें भगवान तक पहुँचाती है।

देविम – संपूर्णतः कांतिमय/ आभायमान।

नित्यानपायिनीम् – सदा सर्वदा भगवान के साथ निवास करती है, और उनसे अविभाज्य है जैसे की विष्णु पुराण में कहा गया है “विष्णोर श्रीरनपायनिम”

निरवद्याम् –किसी दोष/ त्रुटी के बिना, अन्य शब्दों में यदि उपरोक्त उल्लेख किये सभी विशेष गुण उनके साथ स्वयं के आनंद के लिए होते, तब वह दोषयुक्त समझा जाता। परंतु यह सभी गुण उनके आश्रितों को राहत प्रदान करने के लिए है, इसलिए यह संपूर्णतः दोष रहित है।

देवदेव दिव्य महिषिम् –सभी देवताओं के स्वामी की महारानी अर्थात श्रीभगवान की महिषी।

अखिलजगन्मातरम् – सभी प्राणियों की माता (सभी तीन प्रकार की जीवात्माएं)। वे सभी प्राणियों के कल्याण के लिए सदा चिंतित रहती है।

अस्मन मातरम् – श्रीरामानुज स्वामीजी स्वयं को ऐसे ही प्राणी के रूप में बोध करते हैं, परंतु किंचित विशेष टिपण्णी में श्रीजी को अपनी माता के रूप में भी पृथक उल्लेख करते हैं।

अशरण्य शरण्याम् – उनके लिए अंतिम आश्रय, जिनका और कोई आश्रय नहीं है। यदि हम किंचित मात्र भी अच्छे गुण प्रदर्शित करते हैं, तो वे हमारे सभी दोषों और अपराधों को क्षमा करती है। और यद्यपि हममें किंचित मात्र भी अच्छे गुण नहीं है, तब भी वे हमारे दोषों की उपेक्षा करती है। साधारणतय भगवान श्रीमन्नारायण ही निराश्रितों के अंतिम आश्रय हैं। परंतु उन प्राणियों के लिए जिनके लिए भगवान को प्राप्त करना दुर्लभ है, श्रीजी ही अंतिम आश्रय है।

अनन्यशरण: अहं – श्रीजी पूछती है – क्या ऐसा कोई है जिसका और कोई आश्रय नहीं है? श्रीरामानुज स्वामीजी निवेदन करते हैं “अहं” (अर्थात मैं) ही वो किंचित व्यक्ति हूँ।

शरणं प्रपध्ये – “ऐसा मनुष्य जिसके पास कोई और आश्रय नहीं है और जो आपकी शरण में आया है, अब उपाय स्वरुप आपके श्रीचरण कमलों में शरणागति निवेदन करता है,” प्रथम चूर्णिका के इस अंतिम पद में श्रीरामानुज स्वामीजी यही अनुरोध करते हैं।

अब हम द्वितीय चूर्णिका की ओर अग्रसर होंगे।

– अडियेन भगवती रामानुजदासी

आधार – http://divyaprabandham.koyil.org/index.php/2015/11/saranagathi-gadhyam-1/

प्रमेय (लक्ष्य) – http://koyil.org
प्रमाण (शास्त्र) – http://granthams.koyil.org
प्रमाता (आचार्य) – http://acharyas.koyil.org
श्रीवैष्णव शिक्षा/बालकों का पोर्टल – http://pillai.koyil.org

thiruvAimozhi – 3.6.5 – thiriyum kARRu

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krishna-githa-etc

Introduction for this pAsuram

Highlights from thirukkurukaippirAn piLLAn‘s introduction

No specific introduction.

Highlights from nanjIyar‘s introduction

In fifth pAsuram – AzhwAr says “Since emperumAn cannot survive even without one of his wealth, I am seeing emperumAn with all his wealth always”. Also explained as, emperumAn appearing with his wealth etc in his incarnations as said in SrI bhagavath gIthA 4.6 “bhUthAnAm ISwarO’pi san” (I am the lord of all beings).

Highlights from vAdhi kEsari azhagiya maNavALa jIyar‘s introduction

See nanjIyar‘s introduction.

Highlights from periyavAchchAn piLLai‘s introduction

See nampiLLai‘s introduction.

Highlights from nampiLLai‘s introduction as documented by vadakkuth thiruvIdhip piLLai

Fifth pAsuram. Explained as “due to his vAthsalyam (motherly affection) he is always present with all his wealth and appears [in manifested form] like a peacock with spread out feathers. Also explained as, emperumAn appearing with his wealth etc in his incarnations as said in SrI bhagavath gIthA 4.6 “bhUthAnAm ISwarO’pi san” (I am the lord of all beings).

pAsuram

thiriyum kARROdagal visumbu thiNindha maN kidandha kadal
eriyum thIyOdiru sudar dheyvam maRRum maRRum muRRumAyk
kariya mEniyan seyya thAmaraik kaNNan kaNNan viNNOr iRai
suriyum pal karum kunji engaL sudar mudi aNNal thORRamE

Listen

Word-by-Word meanings (based on vAdhi kEsari azhagiya maNavALa jIyar‘s 12000 padi)

kariya – blackish
mEniyan – having form
seyya – (contrasting with that) reddish
thAmarai – lotus like
kaNNan – having eyes
viNNOr – eternally enjoyable for nithyasUris (eternally free residents of paramapadham)
iRai – having supremacy
suriyum – curly
pal – many, wavy
karum – blackish
kunji – hairs
engaL – one who accepts our service
sudar – having radiance
mudi –  one who is having divine crown
aNNal – being the master/lord
kaNNan – krishNa’s
thORRam – appearance

(part of samashti Srushti)

thiriyum – constantly moving
kARROdu – with vAyu (air)
agal – vast
visumbu – AkASam (ether/space)
thiNindha – hard
maN – bhUmi (earth)
kidandha – staying, without breaching the shore
kadal – ocean
eriyum – with rising flames
thIyOdu – with agni (fire)

(part of vyashti Srushti)

iru sudar – starting with chandhra (moon) and Adhithya (sun)
dheyvam – groups of dhEvathAs (celestial beings)
maRRum – and manushyas (human beings)
maRRum – and thiryak (animals) muRRumAy – and will be with sthAvara (plants)

Simple translation (based on vAdhi kEsari azhagiya maNavALa jIyar‘s 12000 padi)

krishNa is the one with blackish form and with reddish lotus like eyes; is having the supremacy to be eternally enjoyable for nithyasUris; is having curly, many wavy blackish hairs; who is having divine radiant crown which makes him accept our service. Such krishNa’s appearance is together with the five great elements (which are part of samashti Srushti) viz vAyu (air) which is constantly moving, vast AkASam (ether/space), hard bhUmi (earth), ocean which is staying without breaching the shore and agni (fire) with rising flames, and (which are part of vyashti Srushti) groups of dhEvathAs (celestial beings) starting with chandhra (moon) and Adhithya (sun), manushyas (human beings), thiryak (animals)  and sthAvara (plants).

To know more about samashti Srushti and vyashti Srushti, please visit https://srivaishnavagranthams.wordpress.com/readers-guide/ .

The sAmAnAdhikaraNyam (Visit https://srivaishnavagranthams.wordpress.com/readers-guide/ to know more), is based on SarIra (body) – AthmA (Soul) relationship indicating dhArya (that which is borne) – dhAraka (bearer) aspect as explained in SrI bhagavath gIthA viSvarUpa adhyAyam (chapter 11).

vyAkyAnams (commentaries)

Highlights from thirukkurukaippirAn piLLAn‘s vyAkyAnam

See vAdhi kEsari azhagiya maNavALa jIyar‘s translation.

Highlights from nanjIyar‘s vyAkyAnam

See nampiLLai‘s vyAkyAnam.

Highlights from periyavAchchAn piLLai‘s vyAkyAnam

See nampiLLai‘s vyAkyAnam.

Highlights from nampiLLai‘s vyAkyAnam as documented by vadakkuth thiruvIdhip piLLai

  • thiriryum … – air which is constantly on the move, ether which provides space for all other entities, earth which is hard by nature, ocean which is not breaching the shores due to bhagavAn’s order, fire which rises up in flames by nature, radiant moon and sun.
  • dheyvam … – Celestial beings who are present to give refuge to those who are other than themselves and fulfil their desires. Humans who take shelter of such celestial beings. Animals. Plants.
  • muRRum Ay – His appearance is explained to be with all of these. Ay – being the AthmA of all of these. From this, bhagavAn’s sustenance of the universe is explained.

Subsequently, his presence with distinguished form is explained.

  • kariya mEniyan – One who is having divine invigorating form which eliminates the thApa thrayam (three types of distresses) of those who see him.
  • seyya thAmaraik kaNNan – One who is having beautiful eyes which reveals his vAthsalyam (motherly affection).
  • kaNNan – one who is subservient towards his devotees.
  • viNNOr iRai – even in such form as krishNa, he is having supremacy in human form, which makes the nithyasUris come and glorify him.
  • suriyum … – One who is having hairs which are curly, wavy, blackish which makes the one who sees him feel the coolness.
  • engaL sudar mudi aNNal thORRamE – thORRam – prakASam (glow), avathAram (appearance). sarvESvaran‘s appearance having divine radiant crown which reveals his supremacy and is enjoyable by ananyaprayOjanar (those who are exclusively devoted to emperumAn without any expectation in return).

In the next article we will enjoy the next pAsuram.

adiyen sarathy ramanuja dasan

archived in http://divyaprabandham.koyil.org

pramEyam (goal) – http://koyil.org
pramANam (scriptures) – http://granthams.koyil.org
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SrIvaishNava education/kids portal – http://pillai.koyil.org

Arththi Prabandham – 24

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paramapadham

Introduction: In this pAsuram, maNavALa mAmunigaL describes the events from the time when the mortal coil is shed to the extreme fortune of being  amidst the glorious AchAryas.

pAsuram

indha udal vittu iravimaNdalaththUdu yEgi
ivvaNdam kazhiththu idaiyil AvaraNamEzh pOy
anthamil pAzh kadandhu azhagAr virasaithanil kuLiththu angu
amAnavanAl oLi koNda sOdhiyum peRRu amarar
vandhu edhirkoNdu alankariththu vAzhththi vazhinadaththa
vaikuntham pukku maNimaNdapaththuch chenRu
nam thirumAladiyArgaL kuzhAngaLudan kUdum
nAL enakkuk kurugum vagai nalgu en ethirAsA

Listen


Word-by-Word Meanings

en ethirAsA – Oh! ethirAsA! my master! The leader of yathis!!!
nalgu – Please bless
enakku – me
kurugum vagai – that the days between today and that opportune day, shrinks rapidly.
kUdum nAL – That opportune day is the day when I join
nam thirumAladiyArgaL – our masters (who are actually servants of Sriya:pathi SrIman nArAyaNan)  who are known as ‘nithyasUris’
kuzhAngaLudan – and be one in their group.
indha udal – (This happens after) this mortal body of mine that is replete with impurities
vittu – discards itself
iravimaNdalaththUdu yEgi – and transgresses the solar orbit and
kazhiththu – transgresses
ivvaNdam – this universe
idaiyil – that is in between
AvaraNamEzh pOy – (after which) it transgresses the seven oceans
pAzh kadandhu – only to continue transgressing the “mUla prakruthi”
anthamil – that is described as never ending or abysmal.
azhagAr – Finally, it reaches the very beautiful
virasaithanil – river called “vrajA”
kuLiththu – takes a holy bath
angu – there
amAnavanAl – and gets lifted by the touch of a person known as “amAnavan”
oLi koNda sOdhiyum peRRu – and as a result, get a divine body that oozes with resplendence.
amarar vandhu edhirkoNdu – Thereupon, the nithyasUris come and greet
alankariththu – decorate
vAzhthi – praise
vazhinadaththa – and lead me (in the new body) in
vaikuntham pukku – the path towards SrIvaikuntham
maNimaNdapaththuch chenRu – and reach the altar known as “thirumAmaNi maNdapam”

Simple Translation:
In this pAsuram, maNavALa mAmunigaL asks SrI rAmAnuja to bless him that the days between now and the day of joining the nithyasUri ranks, shrink rapidly. maNavALa mAmunigaL goes ahead and describes the journey after the mortal body falls. The soul transgresses multiple locations including the solar orbit, universe, seven oceans and finally reach the river that is known as “vrajA”. In that holy river, it takes a bath upon which a person known as “amAnavan” lifts and the soul gets a new resplendent body thereupon. The nithyasUris come, greet, decorate and usher him towards thirumAmaNi maNdapam where Sriya:pathi SrIman nArAyaNan is seated. maNavALa mAmunigaL requests that the duration between now and his reaching the eternal abode of nithyasUris diminish quickly.

Explanation:
maNavALa mAmunigaL says, “Oh! My master! The leader of yathIs (sanyAsis)!!! This mortal body of mine is something that is replete with impurities as they say “immAyavAkkai (thiruvAimozhi 10.7.3)”. This body is not something to be desired and hence should completely be destroyed as per the phrase “manga ottu (thiruvAimozhi 10.7.9)”. After this the soul crosses multiple worlds and universes starting from the solar orbit as described by the phrase “mannum kadum kadhirOn maNdalaththin nannaduvuL (periya thirumadal 16)”. After this, it transgresses the worlds that are occupied by people who are known as “AdhivAhikas”.  Subsequently, it crosses the world that measures 1 crore yOjanAs and are inhabitated by dhEvas , as revealed by the phrase “imayOrvAzh thanimuttai kOttai (thiruvAimozhi 4.9.8)”. After this, it transgresses the seven oceans to reach the neven ending “mUla prakruthi” that is described as “mudivil perumpAzh (thiruvAimozhi 10.10.10)”. After crossing these, the soul reaches the most beautiful river called “vrajA”. It takes a holy bath in it after which a person who is known by the name of “amAnavan” comes and gives his hand to help come out from vrajA river. When this touch happens, the soul gets a new body that oozes with bright resplendence as per the phrase “oLikkoNda sOdhiyumAi (thiruvAimozhi 2.3.10))” and that which is often described as “panchOpanishath mayam” (made of five spiritual elements). After this, the nithyaSuris come and greet the soul (in the new body) as per “mudiyudai vAnavar muRaimuRai edhirkoLLa (thiruvAimozhi 10.9.8). They decorate him, praise him and usher him to the holy place known as “SrIvaikuNtam”. They take him until the altar that is famously known as “thirumAmaNi maNtapam”, along which there are numerous devotees”. maNavALa mAmunigaL asks SrI rAmAnuja, “As they say “adiyArgaL kuzhAngaLudan kUduvadhu yeNrukolO (thiruvAimozhi 2.3.10)” and “mathdhEvathai: parijanaisthava sankishUya:”, when will I get a chance to be amidst those great devotees? Those devotees are our masters. They are the servants of Sriya:pathi SrIman nArAyaNan and their proof of their very existence is established through their doing kainkaryam to HIM. Hey ethirAsA! Please bless me that the day between today and that day when the aforementioned list of things happen, actually shrink.

Translation by santhAna rAmAnuja dhAsan

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ఆర్తి ప్రభందం

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శ్రీః  శ్రీమతే శఠకోపాయ నమః  శ్రీమతే రామానుజాయ నమః  శ్రీమత్ వరవరమునయే నమః

ramanuja-srirangam

శ్రీ రామానుజ – శ్రీరంగం

mamunigal-srirangam

మణవాళ మాముని – శ్రీరంగం

మణవాళ మామునుళు మన సాంప్రదాయమునకు చేసిన మిక్కిలి ప్రసిద్దమైన తన సాహిత్య రచనలను అందమైన సంస్కృత ప్రభందమైన యతిరాజ వింశతి తొ మొదలుపెట్టెను. వారు ఆళ్వార్ తిరునగరిలో వుండి శ్రీ భవిష్యదాచార్యన్ సన్నిధి లో కైంకర్యం చేయున్నప్పుడు శ్రీ రామానుజులను కీర్తిస్తూ యతిరాజ వింశతిని రచించెను. అద్భుతమైన 20 సంస్కృత శ్లోకాల సంగ్రహమైన ఆ ప్రభందమున, యతిరాజుల ( శ్రీ రామనుజులు – యతులలో రాజు) యెడల మామునులు తన పూర్తి పారతంత్య్రమును చెప్పెను.

శ్రీ వైష్ణవ సత్ సాంప్రదాయము లొ తన ప్రసిద్దమైన సాహిత్య రచనను ఆర్తి ప్రభందం అను అందమైన తమిళ ప్రభందంఉతో ముగించెను. ఆ ప్రభమ్దమునందు కూడ శ్రీ రామానుజులనే కీర్తించెను. ఈ ప్రపంచ జీవితంలోని అంత కాలమున శ్రీరంగమున వుండి మన సాంప్రదాయమును అనుకోని ఉచ్చస్థితికి తీసుకెల్లునప్పుడు ఈ ప్రభందమును రచించెను. హృదయపూర్వకమైన 60 తమిళ పాశురముల సంగ్రహమైన ఈ ప్రభంభమునను యతిరాజుల యెడల తన పూర్తి పారతంత్య్రమును  చెప్పెను. శ్రీ రామానుజుల పాద పద్మములను ఆశ్రయిం చడమే మనకు (శ్రీ వైష్ణవులకు) శ్రేయస్సు మరియు వారి సంభంధమే మనకి ఈ లౌకికమున ఒకే జీవాధారం అని ఈ ప్రభందమున స్థాపించెను.

ఎమ్పెరుమానుల యెడల ఉన్న దృఢమైన విశ్వాసము/అనుభందము/ పారతంత్య్రము చే, మామునులు యతీంద్ర ప్రవణర్ ( యతీంద్రుల యెడల ప్రేమ పూర్వక భక్తి కి ప్రతిమ / ప్రమాణము) అని కీర్తించాబడ్డారు.

pillailokam-jeeyar

పిళ్ళై లోకం జీయర్

ప్రస్తుత సరణిలో, ఆర్తి ప్రభంద తత్వార్థముల యొక్క తెలుగు అనువాదములను చూచెదము. పిళ్ళై లోకం జీయర్ ల వారు ఈ అద్భుత ప్రభందానికి సవిస్తర వ్యాఖ్యానము చెసారు. దాని ఆదారంగానే ఈ అనువాద ప్రయత్నం చేయుచున్నము.

అడియేన్ వైష్ణవి రామానుజ దాసి

మూలము: http://divyaprabandham.koyil.org/index.php/2016/05/arththi-prabandham/

పొందుపరిచిన స్థానము: http://divyaprabandham.koyil.org/

ప్రమేయము (గమ్యము) – http://koyil.org
ప్రమాణము (ప్రమాణ గ్రంథములు) – http://granthams.koyil.org
ప్రమాత (ఆచార్యులు) – http://acharyas.koyil.org
శ్రీవైష్ణవ విద్య / పిల్లల కోసం– http://pillai.koyil.org

thiruvAimozhi – 3.6.4 – vaimmin nummanaththu

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Gods_prayed_Vishnu

Introduction for this pAsuram

Highlights from thirukkurukaippirAn piLLAn‘s introduction

No specific introduction.

Highlights from nanjIyar‘s introduction

In fourth pAsuram – AzhwAr speaks about emperumAn‘s qualities (such as Seela (excellent disposition) etc) which makes him approachable for very prideful brahmA, ISAna (rudhra) et al without hesitation.

Highlights from vAdhi kEsari azhagiya maNavALa jIyar‘s introduction

See nanjIyar‘s introduction.

Highlights from periyavAchchAn piLLai‘s introduction

See nanjIyar‘s introduction.

Highlights from nampiLLai‘s introduction as documented by vadakkuth thiruvIdhip piLLai

See nanjIyar‘s introduction.

pAsuram

vaimmin num manaththenRu yAn uraikkinRa mAyavan sIrmaiyai
emmanOrgaL uraippadhen adhu niRka nAL thoRum vAnavar
thammai ALum avanum nAnmuganum sadai mudi aNNalum
semmaiyAl avan pAdha pangayam sindhiththEththith thirivarE

Listen

Word-by-Word meanings (based on vAdhi kEsari azhagiya maNavALa jIyar‘s 12000 padi)

num – your
manaththu – in mind/heart
vaimmin – keep
enRu – as
yAn – I
uraikkinRa – saying
mAyavan – one who is having amazing qualities and activities
sIrmaiyai – great qualities such as excellent disposition
emmanOrgaL – like me (who are greatly attached to him)
uraippadhu – saying
en – what is surprising about it?
adhu niRka – that aside;
vAnavar thammai – celestial beings (who have their individual positions)
ALum avanum – indhra who rules them
nAnmuganum – brahmA (who creates, teaches etc)
sadai mudi – due to his greatness in penance which is highlighted by his having matted hair
aNNalum – rudhra, who is lord of this world
semmaiyAl – out of honesty (understanding the master/servitor relationship between bhagavAn and themselves, after giving up their false pride)
avan – his (i.e., bhagavAn who is the master)
pangayam – unsurpassed enjoyability
pAdham – divine feet
nAL thoRum – daily/always
sindhiththu – meditating on
Eththi – praising
thirivar – will do (as their routine)

Simple translation (based on vAdhi kEsari azhagiya maNavALa jIyar‘s 12000 padi)

What is surprising in some one like me (who are greatly attached to him) saying “keep the great qualities such as excellent disposition of one who is having amazing qualities and activities in your mind/heart “? That aside; indhra who rules the celestial beings, brahmA (who creates, teaches etc), rudhra who is lord of this world due to his greatness in penance which is highlighted by his having matted hair, out of honesty are always meditating on and praising bhagavAn’s divine feet which has unsurpassed enjoyability.

vyAkyAnams (commentaries)

Highlights from thirukkurukaippirAn piLLAn‘s vyAkyAnam

See vAdhi kEsari azhagiya maNavALa jIyar‘s translation.

Highlights from nanjIyar‘s vyAkyAnam

See nampiLLai‘s vyAkyAnam.

Highlights from periyavAchchAn piLLai‘s vyAkyAnam

See nampiLLai‘s vyAkyAnam.

Highlights from nampiLLai‘s vyAkyAnam as documented by vadakkuth thiruvIdhip piLLai

  • vaimmin … – The Seelam (excellent disposition) of emperumAn who is having amazing qualities and activities, and who is said by me as “Keep in your heart”. Alternatively – it is explaining the supremacy of emperumAn which makes it easier as in “he is so great to be taken shelter by qualified personalities such as brahmA, rudhra et al”.
  • emmanOrgaL uraippadhu en – What is the point of people like us speaking about it? Even if we spoke about it, others will simply disregard our words saying they were spoken due to great devotion [instead of real glories].
  • adhu niRka – [so] leave that aside.
  • nAL thoRum … – His excellent disposition is such that even qualified personalities such as brahmA, rudhra et al, come to him as ananyaprayOjana (those who are exclusively serving emperumAn without any other expectation than such service) and accept his refuge. Alternatively – it is explaining the supremacy of emperumAn which makes it easier as in “he is so great to be taken shelter by qualified personalities such as brahmA, rudhra et al”. Further, it is to be read as “nAL thoRum … sindhiththu Eththith thirivarE“.
  • vAnavar thammai ALum avanum – indhra who counts his subordinate dhEvas on Saturdays and Wednesdays, and who enquires their complaints etc.
  • nAnmuganum – chathurmuka (four-headed) brahmA who is the creator of the 14 layers of the world.
  • sadai mudi aNNalum – rudhra, though having the form of a sAdhaka (practising devotee), considers himself to be the supreme.
  • semmaiyAl … – Though they have ulterior motives in their heart, they would take shelter of emperumAn like an ananyaprayOjana. Though their heart is impure with ulterior motives, they would pretend to be like those who are exclusively devoted to him – emperumAn’s nature is such that he would even let them visit him, leave and roam around [like pure devotees would do]! semmai – sevvai – Arjavam – honesty. That is, as they meditate  upon his divine feet like ananyaprayOjana, they would praise him to reveal that those praises are a result of such meditation, and sustain them with that and would roam around [singing his glories] as said in kaNNinuN chiRuth thAmbu 2pAdith thirivanE” (I [madhurakavi AzhwAr] roam around singing nammAzhwAr‘s glories)

In the next article we will enjoy the next pAsuram.

adiyen sarathy ramanuja dasan

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