Daily Archives: September 5, 2016

पूर्वदिनचर्या – श्लोक – २२

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श्री:
श्रीमते शठकोपाय नमः
श्रीमते रामानुजाय नमः
श्रीमद्वरवर मुनये नमः

परिचय

श्लोक २१                                                                                                       श्लोक २३

श्लोक २२

ततस्सार्धम् विनिर्गत्य भृत्यैर्नित्यानपायिभिः ।
श्रीरङ्गमङ्गलं दृष्टुं पुरुषं भुजगेशयं ॥ २२

शब्दार्थ ततः              – द्वयमहामंत्र का उपदेश देने के बाद,
श्रीरङ्गमङ्गलम्         – (जो) श्रीरङ्गनगर का नियंत्रण करता हो,
भुजगेशयं                   – (जो) आदिशेष का सहारा लेते हुए उस पर सोते है,
पुरुषं                          – पेरियपेरुमाळ (पुरुषोत्तम),
द्रष्टुम्                        – देखे गए,
नित्यानपयिभिः भृतयैः – जो कोइल अण्णन और अन्य शिष्यों के संगत से अवियोज्य है,
विनिर्गत्य                   – अपने आश्रम (मट्ठ) से शुरु हुए

भावार्थ (टिप्पणि) – यहा “श्री” शब्द का अर्थ समान्यतः श्रेष्ठता को बतलाता है परन्तु यह शब्द इस संदर्भ मे श्रीरंगनगर का विशेषण होते हुए श्रीरंगनगर की श्रेष्ठता को दर्शाता है । रंगम् मायने “श्री” अतः श्रीरंगम् कहा गया है । क्या अरंगनगर पेरियपेरुमाळ ( जो शयित रूप मे स्थित है ) की वजह से विख्यात है ? पेरियपेरुमाळ की वजह से विख्यात नही है । पेरियपेरुमाळ जो अपने स्वेच्छा से श्रीरंग मे स्थित है जो अपने भक्तों को महत्ता प्रदान करते है इसी कारण श्रीरंग विख्यात है । इसी संदर्भ मे श्रीवरवरमुनि ने अज्ञात अनुमोदक के श्लोक “क्षीरपदेर्मण्डलत्पनोहि योगिनाम् हृदयद्यपि रतिनगतो हरिर्यत्र तस्मात् रंगमितिस्मृतं” को पेरियाऴ्वार के पेरियतिरुमोऴि (४.८.१) के टिप्पणि मे प्रस्तुत करते है । इस श्लोक मे अज्ञात अनुमोदक कहते है – भगवान अपने इच्छा से श्रीरंग मे स्थित है और इस स्थान से उन्हे इतना लगाव है की वे इस स्थान मे सदैव निवास करना चाहते है बजाय योगियों के हृदय मे, क्षीरसागर मे, सूर्यमण्डल इत्यादि मे । इसी कारण यह भगवान का निवास स्थान हुआ अतः श्रीरंगनगर से जाना गया है । पूर्वाचार्यों के आधार पर हमे यह सोचना चाहिये की भगवान स्वयम श्रीरंगनगर को विख्यात कर रहे है और हम सभी वैष्णवों को इसका आनंद लेना चाहिये ।  सच कहे तो दोनो अर्थ महत्व और विशेष है । यहा “पुरुषः” शब्द के तीन अर्थ है । पहला – पुरति इति पुरुषः अर्थात पहला शब्द व्युत्पत्ति है । पुरुषः का वाचनिकमूल “पुरु अग्रगमने” है जिसका अर्थ है – भगवान सृष्टि के सृजन के पहले भी मौज़ूद है और उसके बाद भी । अतः इस वाचनिकमूल शब्द का अर्थ “इस सृष्टि के सृजन का स्वरूप” है ।

दूसरा – पुरि चेते इति पुरुषः अर्थात जो हृदय मे निवास करता है । तीसरा – पुरोषोनति इति पुरुषः अर्थात जो बिना आरक्षण के पर्यात मात्रा मे हर एक चीज़ को प्रदान करता है । अतः यह औदार्य को प्रकाशित करता है । कहा गया है की पूर्वोक्त अर्थों का समावेश अऴगिय मणवाळपेरुमाळ है । विशिष्टवर्ग के लोगों का कहना है की – आदिशेष पर शयन करना आधिपत्य का प्रतीक है । यहा ध्यान दिया जाना चाहिये की – श्रीवरवरमुनि श्रीरंगनगर के अधिपती श्रीरंगनाथ का आश्रय केवल श्रीरामानुजाचार्य के आनन्द के लिये ही कर रहे है और किसी के खातिर नही । कहते है – हमारा परछाई ही ऐसा एक मात्र है जो हमसे अवियोज्य है और अन्धकार मे खुद की परछाई छिप जाती है परन्तु इस श्लोक मे कहा गया है की श्रीवरवरमुनि के शिष्य उनका त्याग अन्धकार मे भी कभी नही करेंगे । अतः कुछ इस प्रकार से अन्नप्पनगरस्वामि ने श्रीवरवरमुनि के शिष्यों के आचार्यभक्ति के वैभव का वर्णन किया है ।

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पूर्वदिनचर्या – श्लोक – २१

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श्रीमते शठकोपाय नमः
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परिचय

श्लोक  २०                                                                                                         श्लोक २२

श्लोक २१

साक्षात् फलैक लक्ष्यत्व प्रतिपत्ति पवित्रितम् ।
मन्त्ररत्नं प्रयच्छन्तं वन्दे वरवरं मुनिम् ॥ २१

शब्दार्थ

साक्षात्फल                              – दिव्यमहमंत्र के उपदेश के सुखानुभव से प्राप्त फल (भगवान के प्रति किया जाने वाला                                                   मंगलाशासन),
एक लक्ष्यत्वप्रतिपत्तिपवित्रितं – केवल यह सोचने से ही,
मंत्ररत्नं                                 – द्व्यमहामंत्र जिसे पूर्वाचार्य मंत्ररत्नं कहते आये है,
प्रयच्छन्तं                             – (जिसका) उपदेश मुझे दिया गया,
वरवरमुनिम्                          – अळगियमणवाळमामुनि,
वन्दे                                     – (मै) ऐसे गुरु का अभिवादन करता हूँ

भावार्थ (टिप्पणि) – श्रीवरवरमुनि अपने शिष्यों को द्व्यमहामंत्र का उपदेश देकर सोचते है की मेरे शिष्य अब परिवर्तित होकर द्व्यमहामंत्र का अर्थ जानते हुए भगवान का मंगलाशासन कैंकर्य करेंगे और अगर वरवरमुनि यह सोंचे तो ही उनका यह उपदेश सर्वोच्च पवित्रता प्राप्त करेगा । अतः हम यह कह सकते है की श्रीवरवरमुनि ने एरुम्बियप्पा को द्व्यमहामंत्र का उपदेश पवित्रता के सर्वोच्च क्रम पर दिया ।  अगर कोई द्व्यमहामंत्र का उपदेश उपर्युक्त भावना से नही करते है बल्कि इन निम्नलिखित भावनाओं जैसे

१) लौकिक विषयासक्त (पैसों, सेवा इत्यादि), २) शिष्य को मोक्ष के प्रति प्रेरित करना और इसी कारण शिष्य को मोक्ष की प्राप्ति होना, ३) शिष्य को नियंत्रित करते हुए भगवान की सेवा करना, ४) अपना व्यक्तिगत एकांतता को दूर करने के हेतु शिष्य के संगत मे रहना इत्यादि की इच्छा रखने से अन्ततः उपदेश का पवित्रता कम हो जाति है । यहा पर एक प्रश्न उठ सकता है की – पूर्वोत्क बिंदुवें आचार्य के लिये उपयुक्त नही है क्या ? क्योंकि आचार्य भी इस भौतिक जगत मे रहते है जिनको सेवार्थ के लिये पैसों की जरूरत होती है, शिष्य को मोक्ष दिलाने का कार्य, जीवन काल मे भगवान के प्रति सद्भावना से उनकी सेवा करना, और शिष्य के साथ अच्छे संबन्ध बनाये रखना – क्या ये सभी सच नही है और क्या ये सही नही है ? अगर इस प्रकार से द्वयमहामंत्र के उपकारों को सोचा जाये तो इन सभी से कभी उपदेश मंत्र की पवित्रता नही घटेगी और कैसे घट सकती है ? इन पूर्वोक्त उपकारों कौत्तर कुछ इस प्रकार है – पहला उत्तर – आचार्य के मामले मे, कोई भी शिष्य आचार्य को धनसंपत्ति समर्पित करता है, वह पूर्वोक्त प्रथम उपकार का आधिकारि है । दूसरा उत्तर – यह विचार की भगवान (जो एक जीव के संबन्ध मे पूर्वानुमान लगा सकते है), ऐसे भगवान जीव को आचार्य/गुरु के लिये निर्देशन देते है जिससे द्व्यमहामंत्रोपदेश जीव को प्राप्त हो सकता है और अन्ततः उसे भगवद्धाम के प्रति सक्षम बनाकर मोक्ष प्रदान करते है, इस प्रकार की भावना प्रत्येक आचार्य को होनी चाहिये । तीसरा उत्तर – अपने सदाचार्य के दिव्यमंगलगुणों को ध्यान मे रखते हुए, प्रत्येक आचार्य अपने शिष्यों को भगवान का मंगलाशासन करने का सदुपदेश देते है जिससे भगवान सहमत है । चौथा उत्तर – एक शिष्य जो कई लम्बे समय तक अहंकार और ममकार (मै, मेरा, इत्यादि) स्वभाव से प्रभावित था,  और इस कारण अपने व्यक्तिगत रूप का नष्ट किया  (आत्मा-परमात्मा का आधारभूततथ्य) और अपने आचार्य ( जिन्होने उस प्रपन्नजीव का उद्धार अपने दिव्य उपदेशों से करके उस जीव को भगवान का मंगलाशासन कैंकर्य मे संलग्न किया) के प्रति कृतज्ञता का भाव है, ऐसा प्रपन्नजीवशिष्य सदैव अपने आचार्य से अवियोज्य सत्संबन्ध की इच्छा रखने का प्रयास करता है । अतः एक आचार्य कभी भी एक शिष्य (जो अभी भगवान का मंगलाशासनकैंकर्य मे जुटा हो) को परिवर्तित करने का उपकारफल स्वीकार नही करते और इस प्रकार से अपना अध्यापन को पवित्र रखते है । इस प्रकार श्रीवरवरमुनि ने एरुम्बियप्पा को द्व्यमहामंत्र का उपदेश दिया । यहा ध्यान दिया जाने चाहिये की – श्रीवरवरमुनि ने श्रीरामानुजाचार्य के चरणकमलों पर केंद्रित कर द्व्यमहामंत्र का उपदेश दिया क्योंकि श्रीरामानुजाचार्य आचार्यगोष्ठी मे सर्वोच्च है । कहा गया है की द्व्यमहामंत्र का अनुसंधान केवल आचार्य परंपरा का ध्यान करने के बाद ही करना चाहिये । यह सौलवे श्लोक मे पहले ही प्रतिपादित है – “यतीन्द्र चरणद्वन्द्व प्रणवेनैव चेतसा” । अतः यह हमारे लिये स्मरणयोग्य है की द्वयमहामंत्र का अनुसंधान से पहले हमे अपने आचार्य जो रामानुजाचार्य से पहले और बाद मे प्रकट हुए है उन सभी का ध्यान करना चाहिये । श्रीवैष्णव जो पांच अंगों का नित्यानुशीलन करते है उसी मे उपादान (मायने – भगवान के तिरुवाराधन क्रम मे उपयोग करने वालि वस्तुएँ का एकत्रिकरण) का अनुशीलन श्रीवरवरमुनि ने एरुम्बियप्पा को शिष्य के रूप मे स्वीकार कर, (उन्हे) परिवर्तित कर, भगवान को समर्पित करने वालि वस्तुएँ के कैंकर्य मे संलग्न किया । यह पहले ग्यारहवें श्लोक “आत्मलाभात्परंकिञ्चित्” मे प्रतिपातिद है ।

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पूर्वदिनचर्या – श्लोक – २०

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परिचय

श्लोक  १९                                                                                                           श्लोक २१

श्लोक  २०

अनुकम्पा परीवाहै: अभिषेचनपूर्वकम् ।
दिव्यं पदद्वयं दत्त्वा दीर्घं प्रणमतो मम ॥ २०

शब्दार्थ –

अनुकम्पापरीवाहैः – अनुकम्पा(कृपा) के तेज़ प्रवाह से (यानि कृपा का ऐसा प्रवाह जो बद्धजीवात्माओं के दुःखों को सह नही                               सकता),
अभीषेचनपूर्वकं     – मेरे शुरुवात के दुःखों का उन्मूलन आपके पवित्र दृष्टि से करे,
दीर्घम्                  – लम्बी देर तक,
प्रनमतः               – उत्कृष्ठ भक्तिभाव से दण्दवत प्रणाम करते हुए,
मम                     – मेरे लिये,
दिव्यम्                – दिप्तीमान ( वैभवशालि ),
पदद्व्यम्             – दिव्य चरणकमल,
दत्वा                   – (ऐसे चरणकमलों को) मेरे मस्तिष्क पर रखा

भावार्थ (टिप्पणि) – एरुम्बियप्पा कहते है – जब उन्होने श्री मणवाळमामुनि को देखकर दण्डवत प्रणाम करते हुए बहुत देर तक उस अवस्था रहे, उसके प्रश्चात श्री  मणवाळमामुनि कृपालु दृष्तिकोण से देखकर अपने दिव्य कीर्तिमान चरणकमलों को उनके मस्तिष्क पर रखा और इसके प्रभाव से उनके दुःखों का विनाश हुआ । यहा “अनुकम्पा” शब्द व्यक्तिगत रूप से दुःखो से पीडित दिशा को प्रस्तुत करता है और यही अवस्था से श्री मणवाळमामुनि भी दुःखित और चिंतित थे । यही कृपालु- दयालु भाव को दर्शाता है । अमरकोश मे कहा गया है – “कृपा दया अनुकम्पा” इत्यादि । विष्णुधर्म (४-३६) कहता है – भगवान श्रीकृष्ण की पूजा करने का फल दस अश्वमेध यज्ञ के फल के बराबर है । अगर कोई दस अश्वमेध यज्ञ सम्पूर्ण करे तो उसके फल मे उसे स्वर्ग की प्राप्ति होती है और यह फल का भोग करने के बाद वापस भौतिक जगत मे आना पड़ता है  । परन्तु भगवान श्रीकृष्ण की पूजा करने के फल स्वरूप मे उनके स्वधाम (विष्णुलोक) की प्राप्ति होती है और फिर इस भौतिक जगत मे आने की ज़रूरत नही है । इस संदर्भ मे कहते है – अगर भगवान के प्रती कोई दण्डवत प्रणाम करे और उनकी पूजा करने के फल स्वरूप मे भगवद्धाम की प्राप्ति होती है तो सोचिये की आचार्य के चरणकमलों का आश्रय (आचार्य के समक्ष दण्डवत प्रणाम करने) से क्या प्राप्त हो सक्ता है और क्या फ़ायदा होता है । “दिव्यम् पदद्यवम्” – यानि आचार्य ने चरणकमल भगवान के चरणकमलों से भी श्रेष्ठ है । इसी संदर्भ के विषय मे श्री वचनाभूषण दिव्यशास्त्र के ४३३ सूत्र मे कहा गया है – की आचार्यसंबन्ध के कारण से मोक्ष की प्राप्ति होती है वह (मोक्ष) भगवद्-संबन्ध से प्राप्त जन्म और मोक्ष से कई गुना फ़ायदेमंद और सर्वोच्च है ।

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पूर्वदिनचर्या – श्लोक – १९

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परिचय

श्लोक  १८                                                                                                             श्लोक  २०

श्लोक  १९

भृत्यैह् प्रियहितैकाग्रैह्  प्रमपूर्वमुपासितम् ।
तत्प्रार्थनानुसारेण संस्कारान् संविधाय मे ॥ १९ ॥

प्रियहितैकाग्रैह्       स्वामीजी की इच्छानुसार और चार धार्मिक आदेश के अनुसार तिरुवाराधन के लिये                                                       सामग्रियों को एकत्रित करने की व्यवस्था करना,
भृत्यैह्                   कोइल अण्णन जैसे शिष्यों द्वारा ,
प्रमपूर्वम               तीव्र भक्ति के साथ ,
उपासितम्             तिरुवाराधान के लिये जरूरी सामग्रियों को संग्रहीत करना जो की अत्यन्त विशेष और रमणीय                                       होती है,
तत्प्रार्थनानुसारेण – वरवरमुनि स्वामीजी के श्रीचरणों का आश्रय लेनेवाले शिष्यों की इच्छा को स्वीकार करने के                                          लिये,
संस्कारान्           –    पंच संस्कार ताप, पुण्ड्र, नाम, मंत्र, याग ।
संविधाय मे         –    शास्त्र में वर्णन किये गये अनुसार करना ।

पहले वर्णन किये गये अनुसार वरवरमुनि स्वामीजी भगवत सन्निधि में स्तम्भ के पास विराजमान है । उनके शिष्य जन अत्यन्त श्रद्धा के साथ चावल, फल, दुध, दहि आदि सामग्रियों को संग्रहीत करके तिरुवाराधन के लिये स्वामीजी को भेंट किया । स्वामीजी ने उत्साह के साथ ग्रहण किया ।  पराशर संहिता में वर्णन आता है की श्रीवैष्णव धर्म का प्रचार करने के लिये पंच संस्कारों से समाश्रित करना, उभय वेदान्त के रहस्यों का कालक्षेप करना, उसमें वर्णन किये गये अनुसार शिष्यों को पालन करने के लिये आज्ञा करना, यह सभी करनेवाले महात्मा को मठाधीश के रूप में स्वीकार किया जाता है । अलगीय मनवाल  वरवरमुनि स्वामीजी को मठाधीश के पद को स्वीकार करने के लिये आज्ञा करते है, और कोईल अण्णन जैसे अनेक आचार्य जन वरवरमुनि स्वामीजी को आचार्य के रूप में स्वीकार किये है ।

इसलिये श्रीवरवरमुनि स्वामीजी को शिष्यों द्वारा भेंट दी हुयी सामाग्री को तिरुवाराधन के लिये उपयोग करना योग्य है, जहाँ पर भगवान को भोग लगाकर तदियाराधन होनेवाला है ।

ऐसा कहा जाता है की वरवरमुनि स्वामीजी के शिष्य जन स्वामीजी से प्रार्थना करते है की कल ही आप की शरण में आए हुये श्रीदेवराज स्वामीजी को पंच संस्कारों से समाश्रित कीजिये । अपने परम आप्त शिष्यों की प्रार्थना को स्वामीजी ने अत्यन्त उत्साह के साथ स्वीकार किया । जिसे श्लोक की दूसरी पंक्ति में वर्णन किया गया है । शास्त्र के आदेशानुसार शिष्य को एक साल तक आचार्य का ध्यान और स्मरण करने पर उसे पंच संस्कार से समाश्रित करना । शास्त्र के आदेश का पालन नहीं करने पर भी वरवरमुनि स्वामीजी की यह गलती नहीं होगी, क्योंकि अपने अपने शिष्यों द्वारा की गयी विनंती शास्त्र के आदेश से भी बढ़कर है । इसलिये तिरुवाराधान समाप्ति के पश्च्यात स्वामीजी ने पंच संस्कार किया ।

पराशर संहिता में वर्णन किये गये अनुसार आचार्य प्रातः स्नान आदि करके तिरुवारधान करते है, पश्च्यात शिष्य को आमंत्रित करके पंच संस्कार से सुशोभित करते है । इस श्लोक में तीन संस्कारों का वर्णन है –

ताप    – शिष्य के बाहुमूलों को शंख और चक्र से आंकित करना ।
पुण्ड्र   – शरीर के द्वादश स्थानों पर तिलक लगाना ।
नामम– रामानुज दास नाम रखना ।
याग  – भगवान का तिरुवाराधान कैसे करे इसका वर्णन आचार्य द्वारा शिष्य को किया जाता है ।
मंत्र   – रहस्यत्रय का उपदेश दिया जाता है ।

पंच संस्कार याने किसी जीव को श्रीवैष्णव बनाने के लिये आचार्य द्वारा की गयी विधि / अनुष्ठान है ।

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पूर्वदिनचर्या – श्लोक – १८

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परिचय

श्लोक  १७                                                                                                               श्लोक  १९

श्लोक  १८

ततस्तत्सन्निधिस्तम्भमूलभूतलभूषणम् ।
प्राड्ःमुखं सुखमासिनं प्रसादमधुरस्मितम् ॥ १८ ॥

तत                                                      –  अरगंनगरप्प के तिरुवाराधन समाप्ति के पश्च्यात ,
ततस्तत्सन्निधिस्तम्भमूलभूतलभूषणम्    सन्निधि के स्तम्भों के नजदीक बैठकर उस स्थान को अलंकृत करना,
प्राड्ःमुखं                                                पूर्वाभिमुख होकर विराजमान है ,
सुख                                                    –  उपयुक्त रूप से ( शांतमन का प्रतिक )
आसीनम                                               वरवरमुनि स्वामीजी जो विराजमान है ,
प्रसाद मधुरस्मितम्                              –  साफ मन से बाहर निकली हुई सौम्य मुस्कुराहट के साथ ।

पहले श्लोक में बताये अनुसार तिरुवाराधान समापन करके स्वामीजी द्वयानुसन्धान में निरत रहते है, जो की दैनिक अनुष्ठान का एक भाग है । पराशर मुनि कहते है दिन में तीन बार तिरुवाराधान के पश्च्यात द्वय मंत्र जिसे मंत्र रत्न भी कहा जाता है उसका १००८ बार या १०८ बार संभव नहीं है तो कम से कम २८ बार जरूर करना चाहिये । वरवरमुनि स्वामीजी इस मंत्र का अनुसन्धान करते समय श्रीरामानुज स्वामीजी के श्रीचरणारविन्दों का ध्यान करते है ।

श्री वरवरमुनि स्वामीजी का मन निर्मल और स्पष्ट रूप से प्रफुल्लित है और मुखारविन्द अत्यन्त सुन्दर और सौम्य मुस्कुराहट के साथ संयुक्त है । शास्त्र कहता है कोई भी सत्कार्य करते समय पूर्वाभिमुख या उतराभिमुख होकर करना चाहिये । इसलिये देवराज स्वामीजी “ प्राड्ःमुखं सुखमासिनं ” कहते है ।

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पूर्वदिनचर्या – श्लोक – १७

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परिचय

श्लोक  १६                                                                                                                 श्लोक  १८

श्लोक  १७

अथ रंगनिधिं सम्यगभिगम्य निजं प्रभूम् ।
श्रीनिधानं शनैस्तस्य शोधयित्वा पदव्दयम् ॥ १७ ॥

अथ                   –   सुबह के कार्यों को सम्पन्न करके मठ में पहुँचे ,
निजं                  –   तिरुवाराधन करने की वजह से ,
प्रभुं                    –   भगवान ,
रंगनिधिं             –   अरगंनगरप्प, जो श्रीरंगम के निधि है, वे मठ में विराजमान है,
सम्यगभिगम्य   –   निष्ठा के साथ व्यवस्थित रीति से साष्ठांग करना ,
तस्य पदद्वयम  –   पवित्र श्रीचरण ,
शोधयित्वा         –   तिरुमंजन करके तिरुवाराधान करना ।

शाण्डील्य स्मृति में कहा गया है की स्नान करने के पश्च्यात भगवत सन्निधि में जाना चाहिये । शाण्डील्य ऋषी कहते है भगवत सन्निधि में जाते समय शुद्ध स्नान करके, ऊर्ध्वपुण्ड्र धारण करना, मंदिर में प्रवेश करते समय अपने पैरों को सफाई करना, पानी से आचमन करना, मन और शरीर को नियंत्रित करना, सुबह सूर्योदय के समय और शाम में तारों  के उदय के समय मंत्रानुसन्धान करना, ऐसे करते हुये भगवान के सन्निधि में पहुँचना । यहाँ पर रंगनाथ भगवान के श्रीचरणों की सेवा का उल्लेख किया गया है, जो कि पूर्ण तिरुवाराधन को दर्शाता है । वरवरमुनि स्वामीजी अरगंनगरप्प कि सेवा करते है जो कि रामानुज स्वामीजी को अत्यन्त प्रिय है, यहाँ पर रामानुज स्वामीजी के श्रीचरणों कि निष्ठा को भी हम अनुभव कर सकते है । जैसे शत्रुघ्नजी सदैव भरतजी की मुखोल्लास के लिये श्रीरामजी के बारे में स्मरण करते रहते थे ।

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पूर्वदिनचर्या – श्लोक – १६

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परिचय

श्लोक  १५                                                                                                                   श्लोक  १७

श्लोक  १६

ततः प्रत्युषसि स्नात्वा कृत्वा पौर्याह्रिकीः क्रियाः ।
यतीन्द्रचरणद्वन्द्वप्रवणेनैव चेतसा ॥ १६ ॥

ततः                                      – तब,
प्रत्युषसि                               – सूर्योदय के पहीले ( अरुणोदय ),
स्नात्वा                                 – स्नान करने के बाद,
पौर्याह्रिकीः                            – प्रातः किये जानेवाले कार्य,
क्रियाः                                  – शुद्ध कपड़े धारण करना, संध्यावन्दन करना,
यतीन्द्रचरणद्वन्द्वप्रवणेनैव  – श्रीरामानुज स्वामीजी के श्रीचरणों में विशेष अनुराग,
चेतसा                                  – जागृत होकर,
कृत्वा                                  – पूर्ण करना ।

प्रत्युषसि – उषाकाल, सूर्योदय के ठीक एक घंटे ३६ मिनिट पहीले । पहले वर्णन किये गये अनुसार यह मध्य रात्रि के चौथे भाग को दर्शाता है ( जो कि तीन घंटे १२ मिनिट है ) जिसमे १ घंटा ३६ मिनिट शेष रहता है । शरीर और दांत कि सफाई, स्नान, गुरूपरम्परा का अनुसन्धान और भगवान के छःस्वरूपों का ध्यान वरवरमुनि स्वामीजी द्वारा किया जाता है । स्वामीजी द्वारा कषाय वस्त्र, तिलक और तुलसी का माला धारण किया जाता है जिसका वर्णन ६,७,८ श्लोक में किया गया है । शास्त्र बताता है कि आचार्य भगवान श्रीमन्नारायण का साक्षात अवतार है और शिष्य पूर्ण रूप से आचार्य में निष्ठा रखते हुये भगवान के रूप में आये हुये आचार्य के मुखोल्लास के लिये दैनिक अनुष्ठान करते है । वरवरमुनि स्वामीजी रामानुज स्वामीजी में अनुराग के साथ अपने दैनिक अनुष्ठानों को करते है ।

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पूर्वदिनचर्या – श्लोक – १५

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श्री:
श्रीमते शठकोपाय नमः
श्रीमते रामानुजाय नमः
श्रीमद्वरवर मुनये नमः

परिचय

श्लोक  १४                                                                                                                     श्लोक  १६

श्लोक  १५

ध्यात्वा रहस्यत्रितयं तत्वयाथात्म्यदर्पणम् ।
परव्यूहादिकान् पत्युः प्रकारान् प्रणिधाय च ॥ १५ ॥

तत्वयाथात्म्यदर्पणम्   – आत्मा का वास्तविक स्वरूप दर्पण के रूप में प्रतिबिम्बित होता है ,
रहस्यत्रितयं                   तीन रहस्य मूल मंत्र, द्वय मंत्र और चरम मंत्र ,
ध्यात्वा                        अर्थानुसन्धान ,
परव्यूहादिकान्            – पर, व्यूह इत्यादि,
पत्युः                          – पूर्ण ब्रम्हाण्ड के नायक श्रीमन्नारायण भगवान,
प्रकारान्                      – पाँच चरण,
प्रणिधाय च                 – मनन द्वारा ।

एक आत्मा का वास्तविक स्वरूप तीन रूपों द्वारा बताया गया है । यह आत्मा सिर्फ भगवान की दासता को स्वीकार किया है ( अनन्यार्हशेषत्व ), सिर्फ भगवान को उपाय के रूप में स्वीकार किया है ( अनन्यशरणत्व ) और सिर्फ भगवान का ही अनुभव किया है ( अनन्यभोग्यत्व )। मूलमंत्र “ ॐ नमो नारायणाय ” में तीन पद है क्रमशः जो इन चरणों को दर्शाता है । नमः शब्द मोक्ष का उपाय भगवान श्रीमन्नारायण को संबोधित करता है । द्वय मंत्र के पहीले वाक्य के तीन शब्द “ श्रीमन्नारायण चरणौ शरणं प्रपद्ये ” में स्पष्ट रूप से उल्लेख किया गया है । भगवत गीता के चरम श्लोक की प्रथम पंक्ति में “सर्वधर्मान परीत्यज मामेकं शरणं ब्रज” आता है जिसमें मोक्ष पाने के लिये एक मात्र भगवान श्रीमन्नारायण को उपाय के रूप में स्वीकार किया गया है । इसलिये ये तीन रहस्य आत्मा के वास्तविक रूप को दर्शाते है ।

भगवान के पाँच स्वरूप है, पर, व्यूह, विभव, अंतर्यामी और अर्चावतार ।

  • पर – परमपद में नित्यसुरी और मुक्तामा भगवान श्रीमन्नारायण का अनुभव करते है ।
  • व्यूह – ब्रम्हादि देवताओं की मदद करने के लिये क्षीरसागर में विराजमान है ।
  • विभवम – राक्षस और असुरों का संहार करने के लिये राम, कृष्ण आदि अवतारों को लिया ।
  • अंतर्यामी – चेतन और अचेतनों में, सभी प्राणियों में सर्वव्यापी है और दिव्य मंगल विग्रह का ध्यान करनेवालों के हृदय में विराजमान है ।
  • अर्चा – उपरोक्त चारो प्रकारों से भी अत्यन्त सुलभ रूप धारण करके सेवा ग्रहण करते हुये मंदिरों में, घरों में विराजमान है ।

इसके अलावा छठवाँ चरण बताया गया है , जिसमें आचार्य वैभव का वर्णन है । विष्णुचितसूरी पेरीयालवार तिरुमोली ५.२.८ में कहते है “ पीठक वडै पीरनर पीरम गुरुवगी वन्धु ” याने जो रेशम के कपड़े को धारण करते हुये आचार्य के रूप में विराजमान होकर भगवत विषय के बारे में उपदेश देते है ।

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पूर्वदिनचर्या – श्लोक – १४

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परिचय

श्लोक  १२-१३                                                                                                                       श्लोक  १५

श्लोक  १४

परेद्युः पश्चिमे यामे यामिन्यास्समुपस्थिते ।
प्रबुद्धय शरणं गत्वा परां गुरूपरम्पराम् ॥ १४ ॥

परेद्युः          – वरवरमुनि स्वामीजी के अनेपक्षित संबंध के अगले दिन,
पश्चिमे यामे  – रात्री के अंतिम भाग में,
समुपस्थिते   – जब संपर्क किया गया,
प्रबुद्धय          – वरवरमुनि स्वामीजी शयन से जागृत हुये,
परां                भव्य,
गुरूपरम्पराम् – श्रीमन्नारायण भगवान से लेकर वरवरमुनि स्वामीजी के आचार्य श्री शैलपूर्ण स्वामीजी तक                                           गुरू परम्परा,
गत्वा             – मनन करते हुये प्रार्थना करना ।

यहाँ पर देवराजमुनि पहीले वर्णन किये हुये कुछ संदर्भों को संक्षेप में बता रहे है ।  वरवरमुनि स्वामीजी के दैनिक कार्यों को वर्णन कर रहे है । भगवतगीता में कृष्ण भगवान चरम श्लोक में कहते है मोक्ष प्राप्त करने के लिये सभी धर्मों का त्यागकर मुझे एक मात्र साधन के रूप में स्वीकार करो । फिर भी हमारे पूर्वज दैनिक अनुष्ठान को भगवत कैंकर्य समझकर करते है ताकि आगे आनेवाली पीढ़ी इसका पालन करे । वरवरमुनि स्वामीजी इसका पालन करते हुये दिन के पाँच भागों को जैसे उपादानम, अभिगमनम, याग, स्वाध्याय, योग को भगवत कैंकर्य मानकर करते है । शिष्य को आचार्य निष्ठा दृढ़ करने के लिये आचार्य के दैनिक अनुष्ठानों का पालन करना शास्त्र में बताया गया है । इन बातों को ध्यान में रखते हुये देवराजमुनि ने वरवरमुनि स्वामीजी की दिनचर्या का निवेदन किया । पहले जैसे वरवरमुनि स्वामीजी को पंक्तिपावन कर्ता बताया गया है, उसके अनुसार स्वामीजी के इस स्तोत्र के पठन से तदियाराधन के समय श्रीवैष्णव और श्रीवैष्णवों की गोष्ठी को पवित्र कर देता है ।

अगले श्लोक में रहस्यानुसन्धान का वर्णन किया गया है, उसके एक भाग याने गुरुपरम्परानुसन्धान का वर्णन यहाँ पर किया गया है ।  गुरूपरम्परा अनुसन्धान के बिना  रहस्यानुसन्धान नहीं करना चाहीये । आचार्यों की परम्परा को गुरुपरम्परा कहते है, गुरुपरम्परा के द्वारा मोक्ष पाने के लिये भगवान को उपाय के रूप में स्वीकार करने के लिये और भगवत कैंकर्य करते हुये अनुभव करने का उल्लेख किया जाता है ।

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पूर्वदिनचर्या – श्लोक – १२-१३

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परिचय

श्लोक  ११                                                                                                                         श्लोक  १४

श्लोक  १२-१३

भवन्तमेव नीरन्ध्रम पश्यन्वश्येन चेतसा ।
मुने ! वरवर ! स्वामिन् ! मुहुस्त्वामेव कीर्तयन् ॥१२॥

त्वदन्यविषयस्पर्शविमुखैरखिलेन्द्रीयैः ।
भवेयं भवदुःखानामसहानामनास्पदम् ॥१३॥

स्वामीन वरवर                 – मै तुम्हारी संपति के रूप में हूँ ,
मामुनिगल ! मूने              – एक प्रमुख संत जो महान आत्मा है, दयालुता के साथ मुझे स्वीकार करने के लिये सोच रहे है,
भवन्तमेव                        – आपका दिव्य मंगल विग्रह सादगी के निहित गुणवता के सौन्दर्य की  विशेषताओं से परीपूर्ण                                          हो गया है,
नीरन्ध्रम                         – निर्विघ्न रूप से,
पश्यन                             – एक दृष्टि,
वश्येन चेतसा                   – आपकी कृपा के लिये मेरा मन नियंत्रित है,
तमेव                              – आपकी प्रशंसा करने के लिये,
मुहुहु                               – लगातार,
कीर्तयन                          – प्रशंसा ( अहं – अपने आप को )
त्वदन्यविषयस्पर्शविमुखै  – आपके अलावा अन्य सांसारीक विषयों में ध्यान ही नहीं देते ,
अखिलेन्द्रीयैः                   – ज्ञानेन्द्रिय जैसे त्वचा, जीभ, आँख, कान, नाख और कर्मेन्द्रिय जैसे मुह
असह्यनं                         – इसके साथ सहने योग्य नहीं,
भवदुःखानाम                   – जन्म की वजह से जो पश्चाताप होता है,
अनस्पदम                       – अधीन नहीं,
भावेयम                           – जा रहा है ।

इस श्लोक में देवराजमुनि वरवरमुनि स्वामीजी की प्रार्थना करते हुये कहते है, ज्ञानेन्द्रीयों के अधीन होकर जन्म के भय से ग्रस्त थे, अब निरन्तर आचार्य की सेवा करते हुये गुणगान कर रहे है और पूर्ण रूप से ज्ञानेन्द्रीयों को कैंकर्य में लगाकर मोक्ष प्राप्ति के अधिकारी हो गये हैं ।

‘पश्यन’ और ‘कीर्तयन’ यह दो शब्द प्रत्यय के रूप में है, जो देखना और प्रार्थना को संबोधित करते है । इन शब्दों के साथ ‘भवदुःखानाम अनास्पदम् भवेयं अगले श्लोक का शब्द भी जोड़ा जा रहा है । यहाँ पर ‘भवेयं’ का अर्थ होता है ‘प्रार्थना’, देवराजमुनि कहते है वरवरमुनि स्वामीजी के दर्शन करने से, स्तुति करने से और सभी इन्द्रीयों को स्वामीजी की सेवा में लगाने से मोक्ष के अधिकारी बन गये है और संसार के दुःख से मुक्त करने के लिये प्रार्थना करते है । यह देखा जाता है की आचार्य के दर्शन और स्तुति करने से शिष्य के सभी सांसारीक दुःख मिटा दिये जाते है, वह सदैव आचार्य के बारे में ही ध्यान करता रहता है जिस कारण से भगवान के मन में अनुराग उत्पन्न होकर उस शिष्य को मोक्ष दे देते है ।

सभी इन्द्रीयाँ, सांसारीक पदार्थ / सुःख – दुःख से विमुख हो रहे है , इससे जाना जाता है की वे सभी श्रीवरवरमुनि स्वामीजी को प्रार्थना करना चाहते है । इन्द्रीयाँ किसी कारण वश सदैव अन्य विषयों में लिप्त रहती है । इसलिये देवराजमुनि प्रार्थना करते है की सदैव उनकी इन्द्रीयाँ वरवरमुनि स्वामीजी के सेवा में लगी रहे । जिससे वे मोक्ष के अधिकारी बन जायेगें, दुनिया के मामलों में निर्देशित नहीं होगें और पश्च्याताप भी नकार दिया जायेगा । शाण्डील्य स्मृति, भारद्वाज परीशीस्तम और अन्य धर्म शास्त्र बताता है की त्वचा, जीभ, आँख, कान, नाक जैसे सभी इन्द्रीयों को भगवान के कैंकर्य में लगाना चाहीये ।

अभी तक इस स्तोत्र के प्रस्तावना को बताया गया है । आगे अभिगमनम, उपादानम, यागम, स्वाध्याय और योगं ऐसे पाँच कार्यों को बताया गया है, जिसमे यागम को छोड़कर सभी का विवरण दिया गया है । अभिगमनम याने अपने प्रातः काल के कार्यों को करके भगवान की सेवा के लिये तैयार होना । दूसरे श्लोक में इसका विवरण दिया गया है, जहाँ पर वरवरमुनि स्वामीजी भगवान की सेवा करने के लिये मंदिर की ओर जा रहे है । उपादानम याने भगवान की सेवा के लिये आवश्यक सामग्रियों को संग्रहीत करना । ११वें श्लोक में इसका वर्णन किया गया है, जहाँ पर बताया गया है की आत्मा भगवान की शेषी है, उसको प्राप्त करना ही इसका उदेश्य है, वरवरमुनि स्वामीजी देवराजमुनि को शिष्य के रूप में स्वीकार किया है, जिससे देवराजमुनि को भगवान कैंकर्य करने के लिये अपना लेगें है । स्वाध्याय का अर्थ वेद, दिव्य प्रबन्ध आदि का अध्ययन करना, जिसे ९ वें श्लोक में बताया गया है जहाँ पर वरवरमुनि स्वामीजी द्वय मंत्र का अनुसन्धान कर रहे है जो की मंत्रो मे मुकुटमणि है । योगं याने भगवान पर केंद्रीकृत करना, जिसे ९ वें श्लोक में बताया गया है । द्वय मंत्र भगवान और अम्माजी को दर्शाता है अथवा रामानुज स्वामीजी को दर्शाता है जिन्हे वरवरमुनि स्वामीजी सदैव ध्यान करते रहते है । भारद्वाज मुनि बताते है की भगवान की सेवा करने के लिये मंदिर जाना, सेवा के लिये सामग्री संग्रहीत करना, वेद और दिव्यप्रबन्ध का अध्ययन करना, भगवान पर अपना ध्यान केन्द्रीकृत करना , यह सभी कार्य अपने जीवन में कालक्षेप करने के लिये अत्यन्त महत्वपूर्ण है ।

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