प्रमेय सारम् – तनियन्

श्रीः
श्रीमते शटकोपाय नमः
श्रीमते रामानुजाय नमः
श्रीमद् वरवरमुनय् नमः

प्रमेय सारम्                                                                                            श्लोक – १

प्रमेय सारम तनियन:

 नीङ्गमल एन्रुम निनैत्तुत तोलु मिंकल नीणिलत्तीर
पाङ्गाग नल्ल पिरमेय सारम परिन्दलिक्कुम
पूङ्गा वलम पोलिल सूल पुडै वालुम पुदुप्पुलि मण
आङ्गारमट्रे अरूलाल मामुनि अम पदमे!!!

अर्थ:

नीणिलत्तीर         : अरे! इस बड़े संसार के लोग!!!
एन्रुम नीङ्गमल    : किसी भी समय में उन्हें अलग नहीं करना
निनैत्तुत             :  निरन्तर सोचना
तोलु मिंकल         : और उनके प्रति विलम्ब करना
अम पदमे            : उनके सुन्दर चरण कमल
अरूलाल मामुनि  : जो श्रीदेवराज मुनि स्वामीजी है
आङ्गारमट्रे         : एक अभिमान रहित व्यक्ति (ज्ञान, धन और उच्च जाति जन्म) और वह जो
परिन्द                : अपनी कृपा के साथ आशिर्वाद दिया और
लिक्कुम             : हमें ग्रन्थ रूप में प्रदान किया
पिरमेय सारम     : “प्रमेय सारम” कहलाता है जो हमें तिरुमंत्र का तत्त्व देते है
पाङ्गाग             : लाभप्रद है
नल्ल                 : आत्मा के पोषण के लिये
मण                  : यह देवराज मुनि स्वामीजी कवि थे (मार्गदर्शक)
वालुम               : जो रहते थे
पुदुप्पुलि           : एक जगह जिसका नाम “पुधुप्पुली” जो घिरा हुआ था
पूङ्गा               : सुन्दर बागों से और
वलम पोलिल    : उपजाऊ बाग
सूल पुडै            : चारों ओर से
स्पष्टीकरण:

तनियन में पद “नीणिलत्तीर!!! अरूलाल मामुनि अम पदमे नीङ्गमल एन्रुम तोलुमिंकल!!!” होना चाहिये।  इसका अर्थ यह है कि इस तनियन के रचयिता सांसारिक लोगो को बुलाते है और उन्हें जाकर अरूलाल मामुनि के चरण कमलों में हमेशा दण्डवत करने को कहते है। यहाँ “एन्रुम” शब्द “नीङ्गमल” और “निनैत्तुत” से पहिले जोड़ना चाहिये। इसलिये यह पद “एन्रुम नीङ्गमल” का अर्थ “बिछड़े बिना या कभी नहीं जाना” और “एन्रुम निनैत्तुत” यानि “हमेशा इस विषय के बारें में विचार करना”। “प्रमाणम” शब्द विश्वसनिय / उययुक्त मूल है जिसके साथ कोई भी कुछ भी जान सकता है। प्रमाणम का अभिप्राय है प्रमेयम। प्रमेयम का तत्त्व प्रमेयसारम है।

प्रमाणम – मापदण्ड जो एक वस्तु से जाना जाता है
प्रमेय – वह जिसे मापा गया है / समझे
सारम – कठिन बात / तत्त्व
मानम / मेयम – तत्त्व
यहाँ प्रमाण तिरुमंत्र है। तिरुमंत्र का अर्थ प्रमेयम है। प्रमेयम का तत्त्व प्रमेयसारम। “नल्ला प्रमेयसारम” “नल्ला मरई” कहने के समान है जिसका अर्थ बिना दोष या दोषरहित।

पाङ्गाग: प्रमेयसारम ग्रन्थ बहुत सरल है जो इसे पढना चाहते है वह इसके सुन्दरता और सरलता में पकडे जाते है। तिरुमंत्र के तत्त्वों को इन १० पाशुरों में बहुत सुन्दरता से समझाया गया है। इसलिये इसे प्रमेयसारम कहा गया है।

परिन्दलिक्कुम: श्रीदेवराज मुनि स्वामीजी ने इस संसार के लोगो पर “प्रमेय सारम” नामक सुन्दर ग्रन्थ देकर कृपा कि है। उन्होंने सभी लोगों को आशीर्वाद दिया कि वह अपने सर्वश्रेष्ठ लक्ष्य के  तह तक पहूंच जाये। उनका श्रेष्ठ आशीर्वाद एक बहुत आसान संक्षेप ग्रन्थ रूप आ गया। उन्होने  अपने आचार्य श्रीरामानुजाचार्य कि आज्ञा का पालन किया जिन्होंने अपने शिष्यों को उन सब को जिन्हें इसमे रुचि है सर्वश्रेष्ठ अभिप्राय का प्रचार प्रसार करने को कहा ।

अरूलाल मामुनि: “मुनि” वह है जो हमेशा दूसरों कि भलाई के बारें में सोचता है। यह स्वभाव केवल मुनि में देखा जा सकता है और किसी व्यक्ति में नहीं। इसलिये यहाँ उन्हें “मामुनि” या विशेष मुनि कहकर सम्मानित किया है। ऐसे मामुनि  के लक्षण यह है कि वह अभिमान रहित होते है। उनमें पूर्णत: किसी भी अभिमान की दुर्लभता को “अंगाराम अर्रा” कहते है। इस तानियन के लेखक हमे ऐसे आचार्य के चरण कमलों पर दण्डवत करने को कहते है। वह व्यक्ति जब दण्डवत करता है तो उसे अपने मन में उसी तरह एक देह और परछाई के सम्बन्ध के समान मामुनि के चरण कमलों का ध्यान करना चाहिये। “अम पदमे” शब्द में दूसरा दर्जा जो समाप्त हुआ वह गुप्त है। वह टोल्काप्पिया व्याख्यान का पालन करता है जी कहता है “ऐयुं कण्णुम अल्ला पोरुलवैं में उरुबु थोगा”।

अम पदमे: “अम” शब्द का अर्थ सुन्दर और “पदमे” सुन्दर चरण को दर्शाता है। चरण कि सुन्दरता यह है कि अपने किसी भी शिष्य को किसी भी समय में नहीं त्यागना। “अमपदमे” में समाप्त होने वाला शब्दांश “एकाराम” यह तथ्य समझाता है कि अगर हम श्री अरूलाल मामुनि स्वामीजी के चरण कमलों में आ जाये तो हमें भगवान के पास जाने कि कोई जरूरत नहीं है और यही तात्पर्य है।

पुदुप्पुलि: जगह जहाँ श्री अरूलाल मामुनि निवास करते थे।

मण: वह जो मार्गदर्शकों कि सेवा करते थे जो वेदों और शास्त्रों में निपुण थे। वह स्थान “पुदुप्पुलि” जो एक स्थान था सुन्दर बागों और उपजाऊ बाग से घिरा हुआ था। वह आगे और कहते है जिन्हें अधिक ज्ञान ग्रहण करना हो उनके लिये यह उत्तम स्थान है।

पुडै: चारों ओर से घिरा हुआ।

हे! इस महान संसार के लोगों!!! कृपया स्वामी अरूलाल मामुनी स्वामीजी के चरण कमलों कि शरण ले लो जो पुदुप्पुलि नामक ग्राम से है जो सुन्दर बागों और उपजाऊ बाग से घिरा हुआ है और वह जिन्होंने इस संसार को तिरुमंत्र का तत्त्व “प्रमेयसारम” नामक ग्रन्थ रूप में दिया।

इस कार्य कि शुरूवात होने के कारण – श्रीदेवराज मुनि स्वामीजी एक ऐसे व्यक्ति थे जो वेद लेख के गुप्त अर्थ को समझते थे। उन्हें उसमे बताये दूर के लक्ष्य को पहूंचने कि राह मालूम थी। उन्हें उसके सच्चे लक्ष्य (भगवान श्रीमन्नारायण और उनके भक्त कि खुशी) भी पता थी। वह सभी लोगों में आगे थे जिन्हें यह सत्य का पता था। वह ऐसे व्यक्ति थे जिन्हें इस संसार के सभी लोगों को इस अनगिनत जन्म मरण के चक्कर से मुक्त करने कि इच्छा थी। वह श्रीरामानुज स्वामीजी के शिष्य थे जिन्होने  ८० वर्ष तक उनकी सेवा कि। वह श्रीरामानुज स्वामीजी के तत्त्व (सच्चे विचार), हितम (उनका मतलब) और पुरुषार्थ (उनके फायदे) इन उपदेशों को सुनते और वह सभी के महत्त्व को सिखते। वह अपने आचार्य के शिक्षा को अपने रोजमर्रा के जीवन में पालन करते। तत्त्व भगवान है, हितम उनके पास पहूंचने कि राह और पुरुषार्थ उनके पास पहूंचने का लाभ। वह इन सब का मूल अर्थ समझते थे। इसे “थल स्पर्श ज्ञानम” कहते है। “थल” (तमिल में स्थलम यानि “भूमि” और स्पर्श यानि छुना)। एक व्यक्ति जो पानी में डुबकी लगाता है उसका शरीर नीचे चला जाता है, रेत को छुता है और किनारे पर आ जाता है। उसी तरह श्रीदेवराज मुनि स्वामीजी ऐसे व्यक्ति थे जिन्हें ज्ञान का अन्त पता था। यह एक कदम आगे बढ़कर इसे उनकी दिव्य दृष्टी को बताता है। सबसे पहिला कदम हमें भगवान को जानना है। अन्त में भगवान के भक्तों कि महिमा जानना। यह और कुछ नहीं भगवान के दासानुदास है। श्रीदेवराज मुनि स्वामीजी अपने सबसे उच्च योग्यता से और अपनी दया से हमें यह ग्रन्थ दिया “ज्ञान सारम” जिसके जरिये इस संसार के सांसारिक लोग जो जन्म मरण के चक्कर से दु:खी है वह भी मुक्त हो जाते है। ज्ञान सारम समाप्त होने के पश्चात उन्होंने प्रमेय सारम लिखा। वेद ऐसा है जिसे किसीने नहीं लिखा परन्तु वह चिरकाल से है। जैसे भगवान वैसे हीं वेदों का कोई अन्त नहीं है। इसलिये वेदों को “प्रमाण” कहा जाता है। वेदों का तत्त्व “तिरुमंत्र” में है जो “ॐ नमों नारायणाय” है (अष्टाक्षर मंत्र)। तिरुमंत्र का तत्त्व प्रमेय सारम में दिया गया है। इसलिये इस कार्य को “प्रमेय सारम” कहते है।

हिन्दी अनुवादक – केशव रामानुज दासन्

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