प्रमेय सारम् – श्लोक – ७

श्रीः
श्रीमते शटकोपाय नमः
श्रीमते रामानुजाय नमः
श्रीमद् वरवरमुनय् नमः

प्रमेय सारम्

श्लोक  ६                                                                                                           श्लोक  ८

श्लोक  ७

प्रस्तावना:

पिछले पाशुर में परमात्मा को हीं ऐसा समझाया गया है कि केवल वों हीं सम्पूर्ण है और कोई नहीं। जीवात्मा वों है जो परमात्मा को कुछ भी नहीं दे सकते। कम्बन श्रीराम और माता सीता को इस तरह वर्णन करते है “मरूंगीला नंगैयुं वसैयिल ऐय्यनुम”। वह उन्हें कौतुक व्यवहार में वर्णन करते है। वह माता सीता को बिना कूल्हा और श्रीराम बिना कोई शिकायत वाला ऐसे बुलाते है। उसी तरह योग्यता के अभाव के कारण कुछ स्वीकार करना और योग्यता के अभाव के कारण कुछ अर्पण करना दोनों पर पिछले पाशुर में चर्चा कि गयी है। इसी विचार पर आगे बढ़ते हुए श्रीदेवराज मुनि स्वामीजी कहते है भगवान पर विजय पाने वाला कोई नहीं है। यह सच जानने वाला “ज्ञानी” कहलाता है। श्रीकृष्ण कहते है ऐसे ज्ञानी मेरे आत्मा है। ये ज्ञानी जन मेरे प्रेम को नित्य ग्रहण करने वाले है। “मैं उनके प्रेम के नीचे हमेशा हार जाता हूँ”। श्रीदेवराज मुनि स्वामीजी इन ज्ञानीयों में उत्सव मनाते है यह कहकर कि ऐसे ज्ञानी कहाँ प्राप्त होते है? श्री आण्डाल भगवान का वर्णन इस तरह करती है “कूड़ारै वेल्लुम श्री गोविन्दा” इसका अर्थ भगवान वों है जो अपने भक्तों के आगे झुक जाते है। यह पाशुर ये ज्ञानी कितने दुर्लभ है यह समझाता है।


इल्लै इरुवर्क्कुम एन्रिरैयैवेन्रि रुप्पार
इल्लै अक्दोरुवर्क्कु एट्टुमदो – इल्लैकुरै
उडैमै तान एन्रु कूरिनार इल्ला मरै
उडैय मार्गत्ते काण

अर्थ:

इरै यै वेन्रि रुप्पार इल्लै  : यहा पर ऐसा कोई उपलब्ध नहीं है जो भगवान से जीत सके ऐसा सोच के की
इरुवर्क्कुम                    : दोनों जीवात्मा और परमात्मा के लिये
इल्लै एन्रि                    : किसी वस्तु की कमी होना
अक्दो                          : यह विचार
एट्टुमदो                        : यह ऐसा कुछ है की
ओरुवर्क्कु                    : एक व्यक्ति को मिल सके?
इल्लै                           : भगवान में कोई गलती नहीं जिसके कारण से
कुरै तान                      : यह स्वीकार करना कि भगवान को सम्पूर्ण बना सके
एन्रु                             : इस विशेष विचार से
मरै उडैय मार्गत्ते         : जो वेदों में डाला गया है
कूरि नार इल्ला            : कुछ वो जो कोई कह नहीं सकता
काण                          : कृपया वेदों में पढ़कर इस तथ्य के बारें मे देखे !!!

स्पष्टीकरण:

इल्लै इरुवर्क्कुम एन्रि: कुछ है जो दोनों परमात्मा और जीवात्मा में है। परमात्मा के विषय में वह जिसमें कोई दोष नहीं है जिसे इस पद में समझाया गया है “कुरै ओनृम इल्लाध गोविंधन”। हालाकि जीवात्मा के विषय में उनमें ऐसा कुछ भी नहीं जिसे इस पद में समझाया गया है “अरिवोनरूमील्लाधा आयकुलम” और “पोरुल अल्लाध”। यह जीवात्मा और परमात्मा कि सच्ची स्थिति है। यह हमें इस सच को स्विकार करने के लिये कहता है। अगर इस आत्मा पर कोई विचार करता है तो ऐसे आत्मा के लिये भगवान श्रीमन्नारायण स्वयं आकर उसकी निरन्तर सेवा करेंगे। यह देखने के लिये हम आल्वारों के पाशुर के उदाहरण दे सकते है। “वळवेळ् उलगु”, “मिन्निडै मडवार्”, “कण्गल् सिवन्दु” और् “ओरायिरमाय्” जैसे तिरुवाय्मोळि ऐसे उदाहरण है जहाँ भगवान् स्वयं पधार कर सेवा करते है | वह लोग जो इस सत्य को नहीं जान सकते है उनके लिये भगवान को सेवा करना नामुमकिन है। यह आगे समझाया गया है।

इरै यै वेन्रि रुप्पार इल्लै: भगवान को किसी कि आज्ञा पालन करने कि जरूरत नहीं है। वह स्वतंत्र है और अपने संकल्पनुसार काम करते है। भगवान को नियंत्रण में करना किसी के लिये भी मुमकिन नहीं है। हालाकि ज्ञानी जन उनको आसानी से अपने वश में कर सकते है। वह उन ज्ञानी जन को आसानी से प्राप्त हो सकते है जो इस तरह कहा गया है “पत्तुडै अडियवर्क्कु एळियवन्”। क्या हम ऐसे ज्ञानी को देख सकेंगे?

अक्दोरुवर्क्कु एट्टुमदो: क्या कोई निरन्तर भगवान के पूर्ण सम्पूर्णता और पूर्ण असम्पूर्णता के बारें में सोच सकता है? यह इस संसार में पालन करना बहुत कठीन है जो पूरी तरह “मैं” और “मेरा” से भरा हुआ है (अहंकार और ममकार)। इसीलिये यह कहा गया है की भगवान को नियंत्रण में करना नामुमकिन है।

इल्लै कुरै उडैमै तान एन्रु कूरि नार इल्ला: उसका अर्थ जानने के लिये इस पद को इस तरह पढ़ा जाना है “कुरै तान इल्लै उडैमै तान इल्लै”। “तान” शब्द मध्य में आता है जिसका अर्थ “इसमें कोई दोष नहीं है” और “इसमें कोई अधिकार नहीं है”। जैसे पहिले कहा गया है भगवान जीवात्मा से कुछ ग्रहण करें इसमें कोई दोष नहीं है। जीवात्मा भगवान को कुछ नहीं दे सकता है। यह सत्य है जिसे आसानी से समझा नहीं जा सकता है और इसका कारण आगे कहा गया है।

मरै उडैय मार्गत्ते काण: वेदों में यह गुप्त है और इसलिये यह समझना बहुत मुश्किल है। वेद कोई साधारण वस्तु नहीं जिसे किसी ने रचा है। यह समय के बन्धन में भी नहीं है। यह दोष रहित है जैसे “ऐयं” और “तिरुबु” (धुंधला और अनेक अर्थ) और इसलिये वह काम में विश्वसनीय और अधिकारिक संस्था है। जिसने पढ़ा है उसी से हमें सिखना चाहिये। “काण” शब्द का अर्थ “हे देखो!” और इसलिये लेखक श्रीदेवराज मुनि स्वामीजी उनसे वार्ता करते है जो उनके सामने हो (या इसे इस तरह भी समझा जा सकता है कि वह व्यक्ति सभी मनुष्य योनि को संबोधित कर रहा है और अत: श्रीदेवराज मुनि स्वामीजी हमें उपदेश कर रहे है)। श्रीवरवर मुनि स्वामीजी जिन्होंने इसका स्पष्टीकरन लिखा है ऐसे ज्ञानियों के लिए उत्सुक होते है और सोचते है कि क्या वें इस व्यवहारिक संसार में मिल सकते है।

इस पाशुर का पूर्ण तत्त्व इस प्रकार है। भगवान श्रीमन्नारायण सम्पूर्ण है। जीवात्मा उसकी सम्पत्ति है। अत: ऐसा कुछ “सम्पत्ति” कि सम्पत्ति कहलाने वाला नहीं है। यह वेदों में छुपा गुप्त अभिप्राय है। इसका अर्थ वों हीं जान सकते है जो वेदों को समझ सकते है और बाक़ी के लिये नामुमकिन है। ज्ञानि जो इन दोनों का स्वभाव समझ सकता है भगवान उनके निकट आकर उनके इशारों पर नाचते है और उनकी सेवा करते है। केवल उन ज्ञानियों को छोड़ यह समझने के लिये इस संसार में लोगो को नामुमकिन है। अत: यह “परमात्मा-जीवात्मा” का विचार भगवान को आकर उस मनुष्य कि सेवा करने के लिये मजबुर करता है और यह कमी इसे नामुमकिन कर देता है। श्रीशठकोप स्वामीजी कहते है “पट्टुदै अदियवरक्कु एलियवन पिरर्गलुक्कु अरिया विट्टगन”। भगवान शास्त्र को मानने वाले लोगों के करीब होते है और जो नहीं मानते उनसे बहुत दूर रहते है। भगवान श्रीकृष्ण ज्ञानियों को भगवद गीता में उनकी आत्मा ऐसा समझाते है। वह पूर्णत: उनके समीप थे। श्रीगोदम्बाजी समझाती है कि अगर श्रीविष्णुचित्त स्वामीजी कहे “काप्पिड़ा वारै”, “पूच्चूड़ा वारै”, “अम्मां उण्णा वारै” आदि तो भगवान श्रीकृष्ण दौड़ते हुए आयेंगे। श्रीवरवर मुनि स्वामीजी कहते है “ज्ञानीयर्क्कु ओप्पोरिल्लै इव्वुलगु तन्निल”।

हिन्दी अनुवादक – केशव रामानुज दासन्

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