प्रमेय सारम् – श्लोक – ६

श्रीः
श्रीमते शटकोपाय नमः
श्रीमते रामानुजाय नमः
श्रीमद् वरवरमुनय् नमः

प्रमेय सारम्

श्लोक  ५                                                                                                             श्लोक  ७

श्लोक  ६

उल्लपडि उणरिल ओन्रु नमक्कु उण्डेन्रु
विल्ल विरगिलदाय विट्टदे – कोल्लक
कुरै एदुम इल्लार्क्कुक कूरुवदेन सोल्लीर
इरै एदुम इल्लाद याम

अर्थ:

उल्लपडि:            : अगर हमे सही तरिके से समझना है और
उणरिल               : जीवात्मा का सही स्वभाव जानना है
ओन्रु                   : तब हम उसे देख सकते है
उण्डेन्रु                 : वहाँ है
नमक्कु               : हमारे उपर कुछ नहीं है (जो बहुत कम स्वभाव के कारण)
विल्ल                 : हमारे पास कुछ नहीं है जिसके बारें में हम बात कर सके
विरगिलदाय        : हमारी स्थिति यही है और हमारे पास कोई राह नहीं जिसके बारे में हम बात कर सके
विट्टदे                  : हमारे सत्य स्वभाव को देखिये!!!
एदुम इल्लार्क्कुक : भगवान श्रीमन्नारायण जिनका स्वभाव वर्णन करता है
एदुम इल्लाद       : किसीका भी सम्पूर्ण दुर्लभता
कोल्लक कुरै        : हमसे भगवान को सम्पूर्ण बनाने के लिये
सोल्लीर              : हे मनुष्य जन !!! कृपा कर मुझे कहिये
याम                   : हम, जिनका बुनियादि स्वभाव भगवान श्रीमन्नारायण का दास बनकर रहना है
कूरु वदेन            : हमे अपने आप कि रक्षा करने के लिये हम पर ही क्या कहना है

स्पष्टीकरन:

उल्लपडि उणरिल: यह पद का अर्थ यह है कि “अगर हमें जीवात्मा के सही स्वभाव को जानने और पहिचाने का”। तिरुवल्लूवर कहते है “एप्पोरुल एत्तंमै ताईनुम अप्पोरुल में पोरुल काण्बधु अरिवु”। इसका अर्थ है ज्ञान / समझ और कुछ नहीं जीवात्मा का सही स्वभाव जानना है। जब हम हमारे संसार को देखते है हम पदार्थ को सजीव निर्जीव (चित अचित) समझते है। उसमे ही हम मनुष्य, जानवर, पेड़ आदि भेद को देखते है। हम उस जीवात्मा को जानते नहीं है जो उसमे रहता है। एक समझदार व्यक्ति कभी उसमे सजीव / निर्जीव स्वभाव या वर्ग / उप वर्ग ऐसा सतही स्वभाव नहीं देखेगा। वह जीव के जो उनमें सत्य स्वभाव है उसको देखते है। हालाकि स्वयं हमसे जीव के सत्य स्वभाव को देखना आसान नहीं है। हमें उसे शास्त्रों कि सहायता से जानना चाहिये। जीवात्मा ज्ञान से बना है जिसे हम “विवेक” कहना पसन्द करते है। आत्मा को विवेक से मनुष्य गुण प्राप्त होते है। इसके अलावा आत्मा में एक और स्वभाव है “विवेक”। इसलिये हमारे लेख आत्मा को इस तरह समझाते है (अ) वह जो कुछ भी नहीं परन्तु सम्पूर्ण विवेक है और (आ) वह जिसमे विवेक प्राप्त है। इसीलिए आत्मा स्वाभाविकता से अहंकार स्वभाववाला है कि “मैं हीं वो हूँ जो यह कर सकता है”। अगर हम इस वर्णन को घेहराई से देख सकते है तो हम कुछ मनभावक अर्थ निकाल सकते है। आत्मा में विवेक मनुष्यगुण आदि है फिर भी वह स्वयं नहीं कर सकता है। उसे उस कार्य को करने के लिये कोई मार्गदर्शक चाहिये। वह और कोई नहीं भगवान श्रीमन्नारायाण है जो आत्मा के अन्दर है जो “आत्मा के आत्मा” का कार्य करता है। अत: श्रीमन्नारायाण आत्मा है और आत्मा शरीर बन जाता है जहाँ भगवान श्रीमन्नारायाण निवास करते है और आत्मा को राह बताते है। अत: आत्मा जिसे हम देखते है स्वयं कुछ कार्य नहीं कर सकती है। अत: आत्मा भगवान श्रीमन्नारायण कि निरन्तर दास है। भगवान श्रीमन्नारायाण का निरन्तर दास बनकर रहना आत्मा का सत्य स्वभाव है। अगर कोई इस बात को जान ले तो उसको स्वयं के रक्षा के लिये और कुछ भी जानने कि जरुरत नहीं है। तिरुवल्लूवर कहते है “इयल्बागुम नोन्बिर्का ओनृ इनमै उदैमै मयालागुम मर्रुम पेयार्त्तु”। ऋषियों कि स्थिति ऐसी है कि उन्हें यह समझ है कि भगवान श्रीमन्नारायाण छोड़ और कोई भी हमारा लक्ष्य नहीं प्राप्त करा सकता। अगर हम यह सोचे कि इसे छोड़ और कोई दूसरा राह है तो  केवल यह सोच हमारे दूसरे जन्म का कारण बन जाती है।

ओन्रु नमक्कु उण्डेन्रु विल्ल विरगिलदाय विट्टदे: इस पद का अर्थ यह है कि हम अपना मुख नहीं खोल सकते और अभिमान भी नहीं कर सकते कि हम केवल अपने आप के लिये “मोक्ष” भी नहीं ले सकते। “विनोदगृह” का अर्थ “कहना”। इस शब्द का एक और अर्थ है “विल्ला विलगि निर्का”। यह उस व्यक्ति के अवस्था को दर्शाता है जो यह भी नहीं कह सकता है कि उसके पास कोई ऐसी राह है जिससे वह अपनी सुरक्षा स्वयं कर सकता है और भगवान श्रीमन्नारायण के चरण कमल के शरण नहीं होता है। इस व्यक्ति कि दशा जो अपने आप को अलग रखने कि कोशिश करता है और कर नहीं पाता है इसलिये “विल्ला विलगि निर्का” यह कहा गया है। इस तथ्य का अर्थ यह है कि सभी आत्मा भगवान श्रीमन्नारायण के शरीर जैसा कार्य करते है और वही सत्य आत्मा है जो शरीर में निवास करता है। एक शरीर बिना आत्मा के कोई भी काम नहीं कर सकता है।

इस भाग में एक प्रश्न आता है। हमारे शरीर में हम जानते है एक आत्मा है। यह शरीर-आत्मा का एक सामान्य उदाहरण है। एक कदम आगे बढ़कर एक आत्मा के लिये आत्मा क्या है? हमने यह देखा कि आत्मा के लिये आत्मा भगवान श्रीमन्नारायण है और अत: अगर हम आत्मा को शरीर समझे तो उस आत्मा का आत्मा भगवान श्रीमन्नारायण है। हमने पहिले देखा कि आत्मा पूर्ण विवेक है, वह जो हमारे भीतर रहे या आत्मा के आत्मा के अन्दर रहे। क्योंकि उसमें विवेक है और इसलिये उसे अपने पक्ष मे रहकर सब कार्य करना है। क्योंकि वह स्वयं कार्य कर सकता है क्या परमात्मा जीवात्मा से कोई कार्य कि अपेक्षा करता है उससे यह सुनकर कि “हे परमात्मा आप मेरी रक्षा करें”। क्या इसका यह अर्थ है कि केवल जीवात्मा ही कह सकता है “ओ परमात्मा! कृपया मेरी रक्षा करें”। परमात्मा इस पर कार्य कर उस पर अपनी कृपा बरसा सकते है? अगर वह कृपा बरसाने से पहिले कुछ अपेक्षा करता है तो वह उसके लिये “भूल” हो जाता है। इसके अलावा, हम दूसरी तरफ कुछ नहीं दे सकते है। यह आगे समझाया गया है।

कोल्लक कुरै एदुम इल्लाद याम: हमारे पास जो शरीर है और उसमे जो आत्मा है वह सब भगवान श्रीमन्नारायण के है। शारीर और आत्मा को स्वतंत्र कार्य करने कि क्षमता नहीं है। उनके पास स्वयं का कुछ भी नहीं है। इसलिये वह शरीर से कुछ अपेक्षा नहीं करते है। यह बात एक कहानी के जरिये समझाया गया है।

एक समय कि बात है एक व्यक्ति था उसने भगवान श्रीमन्नारायण के पास जाकर कहा “हे भगवान! मैं आपको क्या दे सकता हूँ? मेरे पास कुछ भी नहीं है क्योंकि मैं आपका दास हूँ। कुछ भी वस्तु जो मैं सोचता हूँ कि मेरी है वह सच में आपकी हीं है। अत: मेरे पास आपको अर्पण करने हेतु कुछ भी नहीं है। हालाकि मेरे पास आपको अर्पण करने के लिये कुछ है। वह और कुछ नहीं मेरे कर्म है जो मुझे कल्प वर्षो से प्राप्त हुए है। मेरे पास वही है और वहीं मे आपको अर्पण कर सकता हूं। इसके अलावा मेरे पास और कुछ भी नहीं है”। एक अध्याय है श्रीरामायण में भरत और ऋषी वशिष्ठ के बीच जो इधर बताया गया है।

ऋषी वशिष्ठ भरत से कहते है “हे भरत! श्रीराम वन चले गये है। आपके पिता स्वर्ग पहूंच गये है। अब आपको हीं इस राज्य पर राज करना चाहिये”। यह सुनकर भरत अपने हाथों से कान बन्द कर यह कहते है “आप कहते है श्रीराम वन चले गये है। अगर ऐसा है तो क्या मैं यह राज्य ले सकता हूँ जो उनका है? अगर कोई दूसरे कि वस्तु लेता है तो वह चोरी है”। भरत अपनी तर्क उन लेख के आधार पर करते है जो कहते है “उल्लात्ताल उल्ललूम थिधे पिरन पोरुलै कल्लात्ताई कल्वम एनल”। इसके पश्चात भी ऋषी वशिष्ठ ने उनको नहीं छोड़ा। उन्होंने कहा “क्योंकि श्रीराम अभी यहाँ नहीं है, यह राज्य जो उनकी आस्ती है जब तक वें लौट कर नहीं आते आप ले सकते है”। भरत उत्तर देते है “यह अयोग्य है। किसी को भी किसी कि वस्तु को नहीं लेना चाहिये। मैं और राज्य दोनों श्रीराम के हीं है। अत: मैं उनका राज्य नहीं ले सकता”। उनकी बात सुनकर भी वशिष्ठजी ने उन्हें नहीं छोड़ा। वह आगे कहते है “राज्य वह है जिसे कोई विवेक नही है। हालाकि आप ऐसे नही हो। आपको विवेक और ज्ञान है। इसलिये आप जिसके पास ज्ञान है वह राज्य ले सकता है। इसके लिये मैं आपको एक समानता देता हूँ”। एक व्यक्ति के पास बहुत आभूषण है। वह एक सन्दूक में रखकर उसे ताला लगाता है। वह सन्दूक उन आभूषण कि रक्षा करता है। हालाकि दोनों आभूषण और सन्दूक उस व्यक्ति के संपत्ति है। परन्तु आप देख सकते है कि वह सन्दूक उसमे रहने वाले आभूषण कि रक्षा करता है। उसी तरह, आप जो श्रीराम कि संपत्ति है इस राज को राज्य कर सकते है जो भी श्रीराम कि हीं संपत्ति है? भरत उत्तर देते है “स्वामीजी। यह समानता जो आपने दिया है वह निर्जीव वस्तु है जिनमे कोई विवेक नहीं है। सन्दूक को यह ज्ञान नहीं है कि उसमे जो आभूषण है उन्हें उसका मालिक धारण करता है। क्योंकि उसे ज्ञान नहीं है वह वहीं करता जो उसे कहा गया हो। परंतु मुझमे विवेक है मैं अपने स्वामी श्रीराम कि संपत्ति पर अधिकार ग्रहण नहीं कर सकता मैं और राज्य दोनों श्रीराम कि संपत्ति है। हालाकि यह सत्य है कि मुझमे ज्ञान है और राज्य में नहीं यह अन्तर है। मुझमे ज्ञान है कि मैं श्रीराम का दास हूँ जो कि राज्य में नहीं है। अत: मुझे  इस ज्ञान के तथ्य पर रहना है और उसके प्रति सत्यवादी रहना है और मिले हुए संपत्ति के गुण को प्रदर्शित करना है”। इसके पश्चात वशिष्ठजी तर्क कर नहीं पाते और भरतजी के तर्क को स्वीकार करते है। यह इस तथ्य को साबीत करता है कि जीवात्मा के पास ज्ञान है यह ज्ञान तभी अच्छा है जब जीवात्मा को इसके सत्य स्वभाव का एहसास होता है जो और कुछ नहीं भगवान श्रीमन्नारायण का दास बनकर रहना। सत्य स्वभाव को जानने के बाद कोई भी “मैं” या “मेरा” नहीं करेगा।

यह ध्यान में रखकर श्रीदेवराज मुनि स्वामीजी कहते है भगवान श्रीमन्नारायण सम्पूर्ण है। उन्हें  स्वयं को सम्पूर्ण करने के लिये कुछ भी जरूरत नहीं है। इसके उपर जीवात्मा के पास कुछ भी नहीं जिसे वह खुद का कह सके। उनके पास भगवान को अर्पण करने हेतु कुछ भी नहीं है। यह देखकर हम यह कह सकते है कि वह कुछ भी स्वीकार नहीं करते और हम कुछ भी अर्पण नहीं कर सकते। श्रीदेवराज मुनि स्वामीजी वहाँ उपस्थित जनों से पूछते है “आप इसके बारें क्या कहते है”। “इरै एदुम इल्लाद याम:” में “नाम” शब्द श्रीदेवराज मुनि स्वामीजी को शामिल करता है और जो लोग बाकि सभी सिवाय भगवान श्रीमन्नारायण के उनके सामने है। यहाँ “इरै” शब्द का अर्थ कण है और “इरै एदुम” बिना कण के। यह “अगलगिल्लेंन ईरैयुंम एनृ” के समान है जहाँ उसका अर्थ “क्षण भर के लिये भी अम्माजी भगवान से अलग नहीं होती है”। अगर कोई जीवात्मा के सच्चे स्वभाव को जानना चाहता है तो उसके विशेष लक्षण इस प्रकार है (अ) भगवान कि संपत्ति बनकर रहना (आ) क्योंकि भगवान से मालिक का सम्बन्ध होने के कारण जीवात्मा को कुछ भी करने की आवश्यकता नहीं है। वह हर रूप से सम्पूर्ण है और इसलिये स्वयं को सम्पूर्ण करने के लिये उसे दूसरों से कुछ भी आवश्यकता नहीं है। एक भिखारी एक धनवान को कुछ भी दे नही सकता है। स्वयं को ज्यादा धनवान होने के लिये धनवान को उस भिखारी के पास जाकर उसकी संपत्ति लेने की कोई आवश्यकता नहीं है। इसलिये जीवात्मा क्या दे सकता है? परमात्मा क्या ले सकते है? दोनों सवालों का उत्तर कुछ नहीं है।

इसलिये यह सत्य जानने के पश्चात जीवात्मा इस सत्य को जाने और उसके अनुरूप जीवन व्यतित करें। जीवात्मा यह जाने कि यह भगवान कि संपत्ति है और उन्हें कुछ भी अर्पण नहीं कर सकते है। मालिक स्वयं उस सब कि देख-रेख कर लेगा। ऐसा जीवन व्यतित करना हर जीवात्मा का कर्तव्य है। यह मूल मन्त्र के “नम:” शब्द का तत्त्व है।

इस मोड पर हमें श्रीवचन भूषण के निम्म चूर्णिकै पर विचार करना चाहिये। “पलत्तुक्कु आत्म ग्यानमुम् अप्रतिशेदमुमे वेण्डुवदु. अल्लाद पोदु बन्दतुक्कुम् पूर्त्तिक्कुम् कोत्तैयाम्”. “अन्तिम कालत्तुक्कु तन्जम्, इप्पोदु तन्जमेन् एन्र निनैवु कुलैगै एन्ऱु जीयर् अरुळिच्चेय्वर्” और्  “प्राप्तावुम् प्रापगनुम् प्ऱप्तिक्कु उगपानुम् अवने” जैसे सूत्र है जिनके तत्त्व के साथ एक कथा प्रचलित है। श्रीवेदान्त देशिक स्वामीजी अपने एक शिष्य के पास जाते हैं जो अपने अन्तिम समय के निकट था। वह शिष्य अपने आचार्य श्रीवेदान्त देशिक स्वामीजी को निकट देख बहुत प्रसन्न हुआ और पूछता है की अन्तिम क्षणों में आप कुछ कहना चाहते है। श्रीवेदान्त देशिक स्वामीजी उत्तर देते है “हम सब भगवान श्रीमन्नारायण कि सम्पत्ति है। केवल मालिक हीं उसकी रक्षा हेतु सोच सकता है और कोई नहीं। हमें अपने रक्षा हेतु कभी कुछ नहीं करना चाहिये, चाहे वो आज हो या जीवन का अन्तिम क्षण। हमारे में यदि यह विचार भी आवे तो हटा देना चाहिये। तभी भगवान श्रीमन्नारायण हमारे रक्षा हेतु आते है। तब तक कितना भी मनुष्य कोशिश कर ले सब व्यर्थ है”।

श्रीरामायण में जब ऋषी गण वन में श्रीराम से मिलते है वें अपने आप को उस शिशु समान समझते है जो माँ के गर्भ में है। कारण यह है कि शिशु के सभी कार्य कि रक्षा गर्भ में उसकी माता करती है। उसी तरह ऋषी कहते है वें भगवान श्रीमन्नारायण के सुरक्षा में है। इसलिये जीवात्मा कि गतिविधियाँ स्वयं से नहीं परमात्मा से बंधी है। इसीको “पारतंत्रियम” कहते है। कभी कभी इसे “अचितत्त्व पारतंत्रियम” भी कहते है। यह और कुछ नहीं जीवात्मा का गुण है जहाँ वह निर्जीव वस्तु के समान है जो एक हीं स्थान पर रहता है जहाँ उसे रखा गया है। उसी तरह जीवात्मा आज्ञा पालन करता है और स्वयं कि रक्षा के लिये कुछ भी नहीं करता है। वह पूर्णत: परमात्मा पर निर्भर है और वहीं रहता है जहाँ भगवान उसे उस समय रहने के लिये कहे है।

तिरुकककोलूर्पेन्पिळ्ळै अम्माळ् कहते है – “वैत्त इडत्तिल् इरुन्दॅओ भरताळ्वानैप् पोले”. कुळशेखर आळ्वार कहते है – “पडियाय्क् किडन्दु उन् पवळ वाइ काण्बेने”. अगर कोई व्यक्ति इस स्थिति में है तो भगवान अपने संकल्प से बाहर आकर उसकी रक्षा करते है। समुन्द्र दण्ड पर क्या हुआ था इसे पक्का करने के लिये कि हमारे पूर्वज एक कथा लेते है।

समुन्द्र किनारे पर श्रीराम और श्रीलक्ष्मण कि सुरक्षा हेतु बहुत से वानर थे। वह आपसमे बात करते है कि उन्हें श्रीराम और श्रीलक्ष्मण को राक्षसों के हमले से बचाना है। हालाकी जैसे रात बढ़ती गयी वानरों को नींद आगयी और वें सो गये। यह तो श्रीराम और श्रीलक्ष्मण थे जो हाथ में धनुष और बाण लेकर उन वानरों कि रक्षा किये थे। अत: यह भगवान श्रीमन्नारायण का कर्तव्य है उनके भक्तों कि रक्षा करें। यह जीवात्मा का काम हैं भगवान के रक्षत्व में बाधा न करें।

हिन्दी अनुवादक – केशव रामानुज दासन्

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