प्रमेय सारम् – श्लोक – ५

श्रीः
श्रीमते शटकोपाय नमः
श्रीमते रामानुजाय नमः
श्रीमद् वरवरमुनय् नमः

प्रमेय सारम्

श्लोक  ४                                                                                                                श्लोक  ६

श्लोक  ५

प्रस्तावना:

श्रीमन्नारायण, पेरिया पिराट्टी श्रीमहालक्ष्मी के स्वामी जीव को परमपदधाम में स्थान प्रदान करते है। यह वह अपने निर्हेतुक कृपा से करते है। वह जो बुद्धि विषयक, वीरतापूर्ण विशेषताओंसे और वह जो कल्याण गुणों से और वह जो किसी मनुष्य से इस संसार में जुदा नहीं हो सकते। इसलिए किसी आत्मा के प्रति भगवान जो भी करते है उस जीव के उज्जीवन के लिये करते है। मनुष्य को अपने बेहतर जीवन के लिये शास्त्र में और भी राह बताये गये है जैसे कर्म योग, ज्ञान योग, भक्ति योग आदि। शास्त्र उसके सामने कही राह दिखाकर और सहीं राह को अंगिकार करने के लिये आत्मा के ज्ञान की परिक्षा लेता है। जीवात्मा जिसे इस तथ्य का ज्ञान है कि उपर बताये गये राह भगवान कि कृपा पाने के लिये पर्याप्त नहीं है। अत: यह व्यक्ति उन्हें कभी भी पहिले स्थान में स्वीकार नहीं करेंगे परन्तु उनके चरण कमल को हीं स्वीकार करेंगे। इस तरह करने से कोई यह सोचेगा कि किसी व्यक्ति का भगवान के शरण होना उसकी कृपा पाने की  एक राह है। इसका उत्तर यह है कि यह जीव जब भगवान के चरण कमलों के शरण होते है यह विचार करके करते है कि उनकी शरण होना भगवान तक पहूँचने की एक राह नहीं है। अत: उन तक पहूंचने का और कोई मार्ग नहीं बल्कि वों हीं है। श्रीदेवराज मुनि स्वामीजी कहते है कि अगर किसी के मन में यह बात आती भी है तो यह विचार भी उसके मन में भगवान हीं लाते है।

वळियावदु ओन्रु एन्राल् मट्रेवै मुट्रुम
ओळियावदु ओन्रु  एन्राल् ओम् एन्रु – इळियादे
इत्तलैयाल एदुमिलै एन्रिरुंददु तान
अत्तलैयाल वन्द अरुल

अर्थ:

वळियावदु                   : राह जिसे “शरणागति” कहते है,
ओन्रु एन्राल्                 : अगर उसे समझना है कि यह हीं वह राह है तब
मुट्रुम                          : सभी
मट्रेवैयुम                     : दूसरे राह जैसे कर्म, ज्ञान और भक्ति योग
ओळि                          : का त्याग करना बिना कोई लक्षण के
यावदु                          : शरणागति कि राह
ओन्रु  एन्राल्                 : यह अहसास होना कि यही वही राह है
ओम् एन्रु                     : अगर कोई मनुष्य उसे स्वीकार करता है और अंगीकार करता है और
इळियादे                      : फिर भी शरण नहीं होता है (क्योंकि यहीं एक राह है और फिर उसके न करने का उपाय हीं नहीं है)
इत्तलैयाल                   : अगर कोई व्यक्ति इस दिशा में सोचता है कि
एदुमिलै                       : यहाँ कोई अच्छा कर्म नहीं है जो उससे स्वयं हीं किया जा सकता है
एन्रु                             : और उस पथ पर “प्रयत्न नहीं” उसके बारे मे सोचता है
इरुंददु तान                  : और उस मत से लगा रहता है
अत्तलैयाल वन्द अरुल : यह उसके कृपा से हीं मुमकिन है

स्पष्टीकरण:

वळियावदु ओन्रु एन्राल्: यह पद जिसने शास्त्र के परिणाम के अर्थ को समझा है उस मनुष्य कि मन कि स्थिति को समझाता है। यह और कुछ नहीं दूसरे साधन जैसे कर्म योग, ज्ञान योग, भक्ति योग आदि की तुच्छता को प्रमाणित करना है, जो स्वतंत्रपने से भगवान श्रीमन्नारायन के स्वाधीन होना है। पूर्णत: शरण होना जिसे शरणागति भी कहते है परंतु दूसरे साधन के अच्छे परिणाम के लिये भगवान के सहारे कि जरूरत होती है। इसीलिये उनके पास किसी मनुष्य को बिना भगवान के सहायता के भगवान के चरण कमल के पास ले जाने के लिये अधिकार नहीं होता है। इसीलिये एक समझदार मनुष्य इन राह में कभी नहीं चलेगा परन्तु प्रपत्ति या शरणागति का पालन करेगा क्योंकि यह सीधे भगवान से जुड़े है।

मट्रवै मुट्रुम् ओळिया: शरणागति छोड़ दूसरे उपाय के परिणाम का सत्य जानकार सभी को कुछ क्षण भी न सोचकर उन्हें त्याग देना चाहिये। “मट्रेवै” शब्द सामूहिक रूप से कर्म योग, ज्ञान योग, भक्ति योग को दर्शाता है। “मुट्रुम” शब्द  यह बताता है कि तीनों साधन को बिना सोचे समझे त्याग देना चाहिये। “ओलि:” शब्द “ओलितु” शब्द का व्याकरणिक रूपांतर है यानि त्यागना।

अदु ओनृ एन्राल्: “अदु” – प्रपत्ति या शरणागति। इसे “भगवान” भी कहते है। “ओनृ” शब्द जो केवल भगवान से जुड़ा है और इसलिये उसका अर्थ “भगवान हीं” है। तमिल व्याकरण में इसे “पिरिनीलै एकाराम” कहते है। जिसका अर्थ “केवल भगवान और कोई नहीं और भगवान के सिवाय और कुछ नहीं”। यह बुद्दिमान व्यक्ति जो भगवान श्रीमन्नारायण के चरण कमलों कि शरण लेता है वह कभी यह सोच भी नहीं सकता है कि उसका भगवान के शरण होना भगवान के पास पहूँचने कि एक राह है। क्योंकि वह व्यक्ति यह जानता है कि उसके द्वारा किया गया कार्य भी उसे भगवान के पास नहीं ले जा सकता। अगर कोई व्यक्ति यह सोचता है “भगवान ही उपेय है” और हमेशा यही विचार के बारें में सोचता है तब यही विचार भगवान के पास पहूँचने में बाधा बन जाता है क्योंकि वह व्यक्ति अनुचित ढंग से यह सोचता है कि उसका यह विचार उसे भगवान के पास ले जाता है। यह सत्य नहीं है। दूसरे शब्दों में किसी व्यक्ति से कुछ भी कार्य करने से उसे भगवान के पास ले नहीं जा सकता। उसे तो भगवान ही अपने पास ले जाते है। वह स्वयं अपने सिवाय कुछ स्वीकार नहीं करते है। अत: शरणागति शब्द भगवान के साथ बदला जा सकता है। इसिलिये भगवान को “अदु ओनृ” ऐसे संबोधित करते है जो र्निजीव वस्तु के लिये उपयोग करते है। यह और कुछ नहीं परन्तु यह समझाने के लिये कि उपेय और भगवान एक हीं है और इसलिये “अदु ओनृ” को “अवन ओनृ” के जगह उपयोग किया गया है। श्रीशठकोप स्वामीजी कहते है “अदु इदु उदु एदु”। इसलिये यह पद “अदु ओनृ” का अर्थ “केवल भगवान और कुछ नहीं”।

ॐ एनृ इळियादे: यह पद पिछले पद “अदु ओनृ एंराई:” के संयोग से समझने के लिये है। श्रीदेवराज मुनि स्वामीजी यह बात कह रहे है कि कोई भी व्यक्ति यह समझता है कि शरणागति कि राह जो और कोई नहीं भगवान श्रीमन्नारायण ही है वें ही रक्षक है। अत: वह व्यक्ति यह सोचकर कि यहीं शरणागति कि राह उसे भगवान के चरण कमलों तक ले जायेगी उनके शरण हो जाता है। दूसरे शब्दों में वह व्यक्ति भगवान के शरण होना उस तक पहूँचने कि राह है यह सम्पादन करता है। शास्त्र कहता है यह भी गलत है और बड़ा विरोधी भी हो सकता है। “पूर्ण शरण” होना यह शब्द का अर्थ एकही पर सब कुछ छोड़ उसके पास जाना है यह विचार भी त्यागकर कि वह उसके शरण गया है। इसलिये इस पद में “ॐ” शब्द का अर्थ वह व्यक्ति ने शरणागति को स्वीकार किया है जो सर्वोत्तम राह है और “इलियादे:” शब्द का भाव वह व्यक्ति जो शरणागति को यह विचार करके कि उसने यह कर लिया है स्वीकार नहीं करता।

इत्तलैयाल एदुमिलै एन्रिरुंददु तान: इसलिये अब यह प्रश्न आता है कि किसी व्यक्ति को शरणागति करते समय क्या विचार करना चाहिये। इसका उत्तर यह है कि उस व्यक्ति को कुछ नहीं करना चाहिये और इस विचार के साथ रहना चाहिये वह भगवान के कृपा बिना कुछ भी नहीं कर सकता है। एक व्यक्ति जब किसी भी कार्य को करता है जो भगवान के पास पहुचता है तब उसे उससे बनी हुई खालीपन के बारे मे सोचना चाहिये।

अत्तलैयाल वन्द अरुल: अत: में श्रीदेवराज मुनि स्वामीजी कहते है कि अगर किसी व्यक्ति को ऐसे उपरोक्त विचार आते है तो वह विचार भी भगवान कि निर्हेतुक कृपा का हीं परिणाम है और कुछ नहीं। शास्त्र में यह कहा गया है कि मोक्ष प्राप्त करने का और भगवान श्रीमन्नारायण के चरण कमलों तक पहूँचने का एक मात्र उपाय है “पूर्ण शरणागति”। जब कोई इस सर्वोच्च अर्थ के बारें में सचेत हो जाता है तब उसे अन्य अर्थ को जैसे कर्म योग, ज्ञान योग और भक्ति योग के बारें में जानने कि आवश्यकता नहीं है। इसका अर्थ यह है कि भगवान तक पहूँचने का उपाय “शरणागति” है। इसका अर्थ यह है कि किसी व्यक्ति का यह शरणागति करना भगवान तक पहूँचने की एक राह है। इस प्रश्न को हमारे सम्प्रदाय में निरर्थक कर दिया गया है और वों ही जरिया है और कोई है भी नहीं और हो भी नहीं सकता। जब शास्त्र यह कहता है कि “केवल भगवान श्रीमन्नारायण कि कृपा हीं उपेय है” तब “केवल” शब्द सारे प्रश्न को निकाल देता है जो दूसरे योग को साधन रूप में स्वीकार करने को कहता है। यह “केवल” एक विशेष अनयता है जिसे “पिरिनिलै एकाराम” कहते है। यह एकाराम यह स्पष्ट करता है कि अन्य योग उपाय नहीं है बल्कि भगवान श्रीमन्नारायण हीं उपाय हैं और कोई नहीं। इसलिये अगर भगवान श्रीमन्नारायण किसी पर कृपा करते है तो वह कुछ भी नहीं माँगता नाहीं कुछ आशा करता है।  वह अपनी कृपा से आगे बढ़कर निर्हेतुक कृपा करते है। इसे “वेरिधे अरुल सेय्वर” पाशुर में देखा जा सकता है। अत: भगवान श्रीमन्नारायण एक व्यक्ति जिसके पात्र में वहाँ कण मात्र भी क्रियाशीलता नहीं है उसको अपने संकल्प से बाहर जाकर आशीर्वाद और कृपा करते है। अगर कोई व्यक्ति इस विषय को समझ सके तब यह अंतर्निहित तथ्य है कि यह व्यक्ति इस दृग्विषय को समझने के लिये स्वयं से कुछ नहीं करता है। उचित रूप से यह समझने कि योग्यता भी और निरर्थक रहना और कुछ न करना यह सोच भी भगवान श्रीमन्नारायण ने हीं किसी व्यक्ति को प्रदान कि है। एक प्रश्न यहाँ आ सकता है कि कुछ नहीं करने के लिये भी भगवान श्रीमन्नारायण कि कृपा कि जरूरत है। इसका उत्तर “हां” है। कुछ न करना एक बहुत बड़ा आव्हान है। कुछ किए बिना रहना बहुत मुश्किल है। इसलिये एक व्यक्ति के तरफ से उसके स्वयं के पास उनके कृपा के सिवाय और कुछ भी नहीं है। यह विषय विस्तार से कई आल्वारों द्वारा कहा गया है। श्रीभक्तान्घ्रिरेणु स्वामीजी कहते है “vAzhum sOmbar”। श्रीविष्णुचित्त स्वामीजी कहते है “निनरुळे पुरिन्दिरुन्देन्”। “एन् उणर्विन् उल्ले इरुत्तिनेन्” श्रीशठकोप स्वामीजी कहते है। “उन् मनत्तिनाल् एन् निनैन्दु इरुन्दाय्” श्रीपरकाल स्वामीजी कहते है। “निरन्तरम् निनैप्पदाग नी निनैक्क वेण्डुमे” श्रीभक्तिसार स्वामीजे कहते है। “सिरु मानिडवर् नाम् सेय्वदेन्” श्री गोदाम्बाजी  कहती है। तिरुकएनण्णमंगै आण्डन इस तत्त्व के आधार पर अपना जीवन व्यतित करते थे।

इसे मुमुक्षुपड़ी चूर्णीकै (२३०) देखा जा सकता है जो कहता है “अवनै इवन् पट्रुम् पट्रु अहन्कार गर्भम्. अवद्यकरम्. अवनुडय स्वीकारमे रक्शकम्”। यहाँ एक उदाहरण के बारें में कहा गया है। श्रीरामायणजी में माता सीता भगवान श्रीराम से मिलने के हेतु कोई राह के पीछे नहीं जाती है। परन्तु श्रीराम बहुत से कार्य करते है जैसे धनुष का तोड़ना आदि, वह श्रीराम ही थे जो जहां माता सीता थी वहाँ गये। उपर बताये विचार इस उदाहरण से स्पष्ट हो जायेंगे। यह वाल्मीकि ऋषि कि महानता है।

अत: यह देखा जाता है कि पूर्ण शरणागति का विचार निर्जीव है। यह भगवान श्रीमन्नारायण कि कृपा है जो किसी को ऐसे विचार आते है। तिरुवाय्मोलि ६.१० (उलगमुन्ड पेरुवाया) दशक पासुरों मे, हम सभी एक दृष्टान्त को देख सकते है जिसका उल्लेख “आवावेन्नुम्” पासुर की ईडु व्याख्या मे है |
श्रीकलिवैरिदास स्वामीजी श्रीवेदांति स्वामीजी से पूछते है कि “स्वामीजी लोग कहते है भगवान तक पहूँचने का ५वा मार्ग भी है”? क्या यह सत्य है कि ५वा मार्ग भी है? श्रीकालिवैरिदास स्वामीजी उत्तर देते है “अड़िएन को इसके बारें में जानकारी नहीं है। जो चौथे मार्ग को अपनाता है वही अन्तिम मार्ग है। उससे बढ़कर और कोई नहीं है”।

हिन्दी अनुवादक – केशव रामानुज दासन्

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