प्रमेय सारम् – श्लोक – ४

श्रीः
श्रीमते शटकोपाय नमः
श्रीमते रामानुजाय नमः
श्रीमद् वरवरमुनय् नमः

प्रमेय सारम्

श्लोक  ३                                                                                                                    श्लोक ५

श्लोक ४

भगवान श्रीमन्नारायण सभी के स्वामी है। कोई उन्हें आज्ञा नहीं कर सकता है। वह स्वतंत्र है और कोई उन्हें रोक भी नहीं सकता नाहीं गलत राह दिखा सकता है। अत: जीवों को उन्हें प्राप्त करने हेतु शास्त्र में कई मार्ग है जैसे कर्म योग, ज्ञान योग, भक्ति योग आदि। जिसे शास्त्रों के बारीकी और तीव्रता पता नहीं होती है वह उपर बताये कठिन मार्ग से भगवान को पाने कि कोशिश करते है। यह एक सत्य है जो बताया गया है कि वह उन लोगों कि तरफ निर्देश किया गया है। जबतक भगवान स्वयं अपने चरण कमल उनके मस्तक पर नहीं रखते इनके पास भगवान के पास पहूंचने के लिये अपने कर्म के सिवाय और कोई भी राह नहीं है। अत: श्रीदेवराज मुनि स्वामीजी यह सलाह देते है कि हम सब यह चाहना करे कि भगवान स्वयं अपने इच्छा से अपने चरण कमल हम पर रखे।

“करूमत्ताल ज्ञानत्ताल काणुम वगै उण्डे?
दरूमत्ताल अन्रि इरै तालगल
ओरुमत्ताल मुन्नीर कडैन्दान अडैन्दान मुदल पडैत्तान
अन्नीर अमर्न्दान अडि”

अर्थ:

कडैन्दान              : भगवान श्रीमन्नारायण देवताओ के लिये मथते है।
मुन्नीर                 : समुंदर जो तीन स्त्रोतों के जल से बनता है यानि बारीश का पानी, नदी का पानी और पानी जो निचे से उछलता है
ओरुमत्ताल          : “मंथारम” पर्वत का उपयोग करके
अडैन्दान              : उन्होंने माता सीता को लाने के लिये समुंदर के उपर एक सेतु बनाया
मुदल पडैत्तान      : उन्होंने पहीले जल कि रचना कि और उत्पत्ति करते वक्त
अन्नीर अमर्न्दान  : उस जल पर चले
अडि                     : ऐसे भगवान के
इरै तालगल          : चरण कमल
दरूमत्ताल अन्रि   : हमें स्वयंगतिशीलता प्रदान करते है। इसके अतिरिक्त
करूमत्ताल          : दूसरे मार्ग जैसे कर्म योग जो अपने स्वयं के प्रयत्न से करते है
ज्ञानत्ताल            : मार्ग जैसे ज्ञान योग और भक्ति योग
काणुम वगै उण्डे?  : हमें भगवान के चरण कमल प्रदान नहीं करेंगे। क्या वह?

स्पष्टीकरण:

करूमत्तालज्ञानत्ताल काणुम वगै उण्डे?:- क्या कोई व्यक्ति स्वयं के प्रयत्न जैसे कर्म योग, ज्ञान योग और भक्ति योग से भगवान के चरण कमल को प्राप्त कर सकता है? इसका जवाब है नहीं। भक्ति “ज्ञान” में अपने आप शामिल हो जाती है। भक्ति और कुछ नहीं “ज्ञान” का सर्वोच्च  पद है। तीनों मार्ग भगवान को पाने के लिये कर्म योग, ज्ञान योग और भक्ति योग वेदांती के लेख अनुसार समझाया गया है। राजा जनक माता सीता के पिताश्री भगवान के चरण कमल कर्म योग द्वारा प्राप्त किये। भगवद् गीता में ज्ञान योग से पवित्र और कुछ भी नहीं कहा गया है। श्रीकृष्ण ने अर्जुन से कहा “अगर कोई व्यक्ति मुझे प्राप्त करना चाहता है तो उसे अपना मन और हृदय दोनों को मेरे में लगाना होगा और बिना अपना ध्यान को एक क्षण के लिये भी नष्ट किये बिना निरन्तर मेरे बारें में विचार करना होगा। उसे मेरी हीं पूजा करनी होगी”। अब हमें एक प्रश्न आता है कि क्यों श्रीदेवराज मुनि स्वामीजी ने कहा “इवर्राई काणुम वगै उण्डे”? इस पर विचार करना होगा। श्रीदेवराज स्वामीजी को उपर बताये भगवान को प्राप्त करने के राह का सही गुण पता था। उन्हें यह श्रीरामानुज स्वामीजी से प्राप्त हुये ज्ञान के कारण पता था। इसलिये उन्होंने यह कहा। यही वह राह है जिसे भगवान कि पूर्ण शरणागति करने के पश्चात सबको को पालन करना है। इसलिये यह स्पष्ट है कि वें जो शरणागति करते है वह उनके कार्य के लिये आधार बन जाते है। अत: यह बिना बोले हो जाता है कि यह राह स्वयं के प्रयत्न से होते है, शरणागति का सहारा लेना हीं है। अत: शरणागति के मदद से हीं इस तरह से भगवान के पास पहूंचने कि राह जा सकती है। अत: कोई भगवान को अपने स्वयं के राह से प्राप्त नहीं कर सकता है क्योंकि सफल होने के लिये इस राह को कुछ और की भी जरूरत है। अगर कोई शरणागति नहीं करता हो तो जो कुछ भी जैसे कर्म योग या ज्ञान योग नियम वह निभाता हो फिर भी कुछ भी जरूरी फल नहीं देंगे। यह संदेश अत्यंत गोपनिय है जो वेदांतिक लेख में दिये गये है। श्रीदेवराज मुनि स्वामीजी इस पाशुर का विशेष भाव बताकर श्रीरामानुज स्वामीजी के निर्हेतु कृपा से हम सब कृपा करते है ।

यह जीवात्मा और भगवान के बीच सम्बन्ध हैं। अत: जीवात्मा को भगवान पर पूर्ण अधिकार होता है। जब उनके पास पहूंचने के आसान राह है तो हम कर्म योग आदि जैसे कठिन राह क्यों अपनाये। श्रीयामुनाचार्य स्वामीजी अपने गीतार्थ संग्रह में यह कहते है:

“निज कर्माधि भक्त्ययातम कुर्यात पृत्यैव कारितह
उपायधाम परित्यज्य न्यसेत देवेतु तामफि”

श्री भक्तिसार आल्वार नान्मुगन तिरुवंदादि में कहते है:

“इन्राग नालैये आग इनिच्चिरिदुम
निंराग निन अरुल एन पालदे – नंराग
नान उन्नै अन्रि इलेन कण्ड़ाय नारणने
नी एन्नै अन्रि इलै” (नान्मुगन तिरुवंदादि-७)

यह दो पद यह प्रमाण करते है कि भगवान श्रीमन्नारायण के चरण कमलों के सिवाय और कोई राह हैं हीं नहीं।

दरूमत्ताल अन्रि इरै तालगल:– इस पद का वाचन इस तरह करना चाहिये “इरै तालगल दरूमत्ताल अन्रि”। इस का अर्थ यह हैं कि भगवान श्रीमन्नारायण अपने चरण कमल स्वयं हीं दे देते है और इसके अलावा और कोई राह है ही नहीं। यह उस विषय को आधार देता हैं कि भगवान के चरण कमल हीं हमारे क मात्र उपाय है। यहीं मुमुक्षुपड़ी चूर्णिकै में बताया गया है “पिराट्टियुं विदाधु, तिंकझलाई इरुक्कुम”। इस पाशुर में “इरै” का अर्थ वहीं है जो अष्टाक्षर महामन्त्र के पहिले शब्द का है (ॐ नमो नारायणाय) यानि “ॐ” शब्द में अकार। वह और कोई नहीं “ॐ” शब्द में जिसे “अ” कहा गया हो।

“तालगल दरुम अत्ताल अन्रि” का अर्थ यह हैं कि हम सब के एक मात्र उपाय केवल भगवान श्रीमन्नारायण के चरण कमल हीं हैं और कुछ नहीं। यह वेदों में विस्तार से लिखा गया है। द्वय महामन्त्र के पहिले भाग में हम यह देख सकते है कि “तिरुवडिगले शरणमाग पट्रुगिरेन” मे अनयता है। श्रीशठकोप स्वामीजी कहते है “आरेनेक्कु निन पादमे शरणागा तंधोझिंदाई”, “कझगल अवये शरनागा कोण्डा”, “अडिमेल सेमम्कोल तेन कुरुगूर शठकोपन” और “चरणे चरणं नमकु”। हम यह देख सकते है कि उन्होंने बहुत से पाशुरों में विशेषकर भगवान के चरण कमल हीं हमारे उपाय है यह कहा हैं और इसीलिए आल्वारों ने भी यही कहा है। अत: भगवान के चरण कमलों  के अतिरिक्ति मनुष्य को और कुछ भी पकड़ना हीं नहीं है। बहुत से उदाहरण हैं जो बताये गये हैं।

ओरुमत्ताल मुन्नीर कडैन्दान: एक समय कि बात हैं देवलोक में इन्द्र अपने वाहन “ऐरावत” हाथी पर विराजमान होकर भ्रमण करने लगे। ऐसे करते समय वें दुर्वासा मुनि के आश्रम पर से गुजर रहे थे जिनके पास एक माला थी जिसे उन्होंने देवी कि आराधना करके प्रसाद रूप में पाया था। इन्द्र को उस माला में बिल्कुल भी रुचि न थी इसलिये “ऐरावत” हाथी को उसे लेकर उसको नष्ट करवा दिया। यह देख कर दुर्वासा मुनि क्रोधित हो गये और इन्द्र को श्राप दिया कि उनका सारा धन नष्ट हो जाये और उनका अहंकार जमीन पर आ जाये। इन्द्र का सारा धन उसी क्षण मिट गया। उनको अपनी गलती का एहसास हुआ परंतु उन्हें क्या करना कुछ समझ मे नहीं आया और उन्होंने भगवान श्रीमन्नारायण के चरण कमलों का शरण स्वीकार किया। भगवान उनके शरण में आये किसी को नहीं छोड़ते। उन्होंने वासुकि नामक सर्प को रस्सी जैसे और मंथारा पर्वत को घुमने का औज़ार बनाकर समुंदर को मथा। उन्होंने कछुआ का अवतार लिया और पर्वत का सारा बोझ अपने उपर लिया। उन्होंने न हिलने वाले समुंदर को हीलाया जो कोई भी कर नहीं पाता। उन्होंने इस पाशुर के अनुसार मथा “आयीरम तोलाई अलाई कदल कदैंधान” (उन्होंने समुंदर को १००० कन्धों से मथा)। मथने के क्रिया से बहुत सा धन उत्पन हुआ और भगवान ने यह सब धन इन्द्र को दिया और उनका धन वापस जमा किया।

अडैन्दान: माता सीता जो भगवान श्रीराम से बहुत दूर थी बहुत उदास थी। भगवान श्रीराम ने माता सीता कि प्रसन्नता हेतु समुंदर पर एक सेतु का निर्माण किया। उन्होंने यह सेतु वानरों कि सहायता से बनाया। उन्होंने उस सेतु को बनाने के लिये बड़े पहाड़ के पत्थरों का उपयोग किया जिसे कोई भी नाप नहीं सकता।

मुदल पडैत्तान: लौकिक अतिवृष्टि के समय सभी जीव जन्तु के पास कोई शरीर न था और ना  ही उस स्थिति में थे जहाँ वें खुशी या दुख को समझ सके। उस समय जब सभी जन उस स्थिति में थे तब भगवान एक और समय का निर्माण कर रहे थे। उन्होंने समुंदर बनाया, तत्पश्चात चार मुखों वाला ब्रह्मा और फिर सब कुछ। इसलिये वह जल है जिसे भगवान ने सर्व प्रथम बनाया।

अन्नीर अमर्न्दान: उन्होंने उस समुंदर का सहारा लिया जिसे उन्होंने निर्माण किया और सब कि रक्षा की। कुछ पाशुर जैसे “वेल्ला तड़ंकदलूल विदनागणै मे मरुवि”, “पार्कदल योगा नितीरै सेयधाई”, “पार्कदलूल पय्या तुईंरा परमन”, “वेल्ल वेल्लातिन मे ओरु पाम्बै मेतयाग विरितु अधन मेईए कल्ला निधिरै कोलगिरा मार्गम”  यही भगवान कि दशा दर्शाते हैं जहाँ वें क्षीरसागर पर विराजमान है।

अडि:- क्या हमारे पास भगवान के चरण कमलों को प्राप्त करने का कोई स्वयं का उपाय है जिन्हें उपर समझाया गया है? ऐसे भगवान के चरण कमल जिन्होंने समुंदर को मथा, सेतु का निर्माण किया, जल का निर्माण किया और जिन्होंने क्षीरसागर का सहारा लिया यह समझाया गया है। यह कथाएं यह सूचित करती है कि वें हीं सब के रक्षक है जैसे इन्द्र जो सांसारिक वस्तु के लिये उनके पास गया, माता सीता जिन्होने भगवान को छोड़ और किसी कि इच्छा नहीं कि और अनगिनत मनुष्य जो प्रलय में नाश हो गये और फिर जन्म भी लिया। उन्होंने किसी में भेद नहीं किया जिसने शरण लिया या नही लिया हो। ऐसे भगवान के चरण कमल को इस पाशुर में “अडि” समझाया गया है। अत: इस पाशुर का अर्थ इस क्रम में होगा “मुन्नीर अडैन्दान मुदल पडैत्तान अन्नीर अमर्न्दान अडि इरै वनुदया अड़ियागिरा इरैतालगल दरूमत्ताल अन्रि करूमत्ताल, ज्ञानत्ताल काणुम वगै उण्डे”

अत: इसका पूर्ण संदेश यह है कि हम स्वयं अपने प्रयत्न से कुछ भी कर ले भगवान के चरण कमलों को प्राप्त करने के लिये वह उपाय नहीं है। उपाय तो भगवान श्रीमन्नारायण के चरण कमल हीं है। उसके अलावा और कुछ भी नहीं।

हिन्दी अनुवादक – केशव रामानुज दासन्

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