प्रमेय सारम् – श्लोक – १

श्रीः
श्रीमते शटकोपाय नमः
श्रीमते रामानुजाय नमः
श्रीमद् वरवरमुनय् नमः

प्रमेय सारम्

तनियन्                                                                                                                          श्लोक  २

श्लोक १

तिरुमन्त्र का तत्त्व “ॐ” है जिसे “प्रणव” भी कहते है। प्रणव कि कठिनाई यहाँ पहिले पशुर में समझायी गयी है।

अव्वानवरूक्कु मव्वानवर एल्लाम
उव्वानवर अडिमै एन्रु रैत्तार – इव्वारु
केट्टिरुप्पार्क्कु आलेन्रु कण्डिरुप्पार मीद्चियिला
नाट्टिरुप्पार् एन्रि रुप्पन नान्!!!

 अर्थ:

उव्वानवर              : आचार्य
उरैत्तार                 : कहते है कि
मव्वानवर एल्लाम : सभी आत्मा एकत्रित में “म” शब्द को संबोधित करते है वह
अडिमै                  : सेवक है
अव्वानवरूक्कु      : भगवान श्रीमन्नारायण के जो “अ” शब्द से संबोधित किये हुए है।
इव्वारु                  : कुछ लोग है जो
केटु                      : ध्यान से सुनते है
रुप्पार्क्कु               : आचार्य द्वारा उपर बताये उपदेशानुसार रहना।
कण्डिरुप्पार          : वह लोग जिन्हें यह एहसास हो जाता है कि
आलेन्रु                  : वह उन जनों के सेवक है जो अपने आचार्य के आज्ञानुसार रहते और सुनते है
इरुप्पार् एन्रि         : और नित्य, मुक्त और अन्य भक्तों के साथ जाते और हमेशा के लिये रहते
नाडु                      : परमपदधाम में जहाँ
मीद्चियिला          : से वापस नहीं आना है
नान्                     : अड़िएन जो श्रीरामानुज स्वामीजी का भक्त है
इरुप्पन                : वह दृढ़ता से इस पर विश्वास करता है।

स्पष्टीकरन:

अव्वानवरूक्कु: “अ” शब्द / शब्दांश का अर्थ भगवान श्रीमन्नारायण हीं है। वेदों में भगवान को “अ” बताया गया है। इस पाशुर में “अ” शब्द दोनों “नाम” और उसके अर्थ के लिये उपयोग किया गया है यानि “अ” शब्द भगवान उसका लक्ष्य ऐसा दर्शाया गया है और उसका अर्थ भगवान ऐसा बताया गया है। नाम और उसका अर्थ दोनों के बीच में सम्बन्ध का अस्तित्व अलग अलग नहीं है यह हमेशा सामांजस्य होना चाहिये। यह इस पाशुर में “अ” शब्द से समझाया जा सकता है। महाकवि कालिदास अपने महान कलाकृत “रघुवंशं” में यह स्थिति समझाते है जहाँ भगवान और अम्माजी साथ में है। वह उन्हें न जुदा होनेवाला ऐसा समझाया जैसे “शब्द और उसका अर्थ”। यह “नमक” ऐसे कहने के समान है क्योंकि यह नमकिन है। इसलिये भगवान स्वयं भगवद् गीता में कहते है “सभी अक्षरों में मैं हीं “अ” हूँ”। इसलिये तिरुवल्लुवर कहते है “अगरा मुधला एझुतेल्लाम आदिभगवान मूधर्रे”।

“अ” नाम श्रीमन्नारायण को हीं संबोधित करता है। इसका मूल है “अ” = “अव रक्षणे” यानि वह जो रक्षा करता है। वेदों में एक अलग विभाग है जो यह चर्चा करता है और कोई नहीं। यह “सामन्याधिकरणं” तर्क शास्त्र पर चर्चा करता है जो यहाँ से नही गुजरता है। पर हम इसे एक बहुत सरल और सामान्य शास्त्र में समझेंगे। श्रीमन्नारायण सभी कारणों के कारण है। यह आल्वारों के पाशुर, वेदों, उपनिषद आदि में सिद्ध हुआ है। वह सभी वस्तु, सीमित, अनंत, चेत, अचेत के सूत्र है। इस संसार में ऐसा कुछ भी नहीं है जो उनके या उनके सम्बन्ध के बिना जन्म न लिया हो। उसी तरह “अ” शब्द सभी शब्दों में है एक रूप या अलग रूप में।

वह सभी अक्षरों / शब्दों / ध्वनी का स्त्रोत है जैसे भगवान सभी वस्तु के स्त्रोत है। श्रीशठकोप स्वामीजी सहस्त्रगीति में कहते है “करन्धेंगुम परंधुलन” और “करन्धा सिलिदम थोरूं इदन थिगझ पोरुल थोरूं”। वह सभी अस्तित्व में है। वह दूध में घी देखने के समान है। वह दूध में मौजूद है परन्तु हमें दिखता नहीं है। परन्तु दूध में घी की उपस्थिती नकारी नहीं जा सकता। इसलिये “अ” शब्द और भगवान एक हीं समान है क्योंकि यह दोनों में से सब का जन्म हुआ है। इसलिये “अ” भगवान को संबोधित करता है और किसी को नहीं।

कंबनात्ताझ्वान अपने बाल काण्ड के कड़िमणप पदलम में कहते है “भू मगल पोरुलूम एना”। इसका अर्थ यह है कि अगर हम “अ” उसका अर्थ कहते है यानि “भगवान” के बारे में अपने आप हीं समझाया जा सकता है।

मव्वानवर एल्लाम: “म” शब्द सभी आत्मा के स्वर को दर्शाता है। यही “म” शब्द का अर्थ है। शास्त्र कहता है “म” कार हमेशा एक वस्तु को दिखाता है जिसके पास विवेक है। हालाकि वह यह कहता है कि “एक” वस्तु और इस का अर्थ एक आत्मा, वह सामुहिक नाम है उसमे सब कुछ शामिल है। इसको एक उदाहरण देते हुए अगर हम कहे कि “यह एक धान का बीज है” हम यह नहीं कहते कि वहाँ केवल धान का एक ही बीज है। हमारा यह अर्थ है कि वहाँ केवल एक प्रकार के धान का हीं बीज है। इसलिये एक वचन एक प्रकार के लिए है ना कि इकाई के लिए। उसी तरह “म” सभी आत्मा जिसमे विवेक है उन्हें शामिल करता है। आत्मा को तीन प्रकार कि श्रेणी में बांटा गया है। (अ) वह जिसका जन्म उसके कर्मानुसार शरीर में ही बार बार होता है, (आ) वह जो भगवान कि निर्हेतुक कृपा से संसार के जन्म मरण के चक्कर से छुटकारा पाता है और (इ) वह जो कर्म से प्रभावित नहीं है और भगवान के साथ समान स्वर में है। यह तीन को “बद्ध”, “मुक्त” और “नित्य” कहते है। इन तीनों को सामुहिक एक ही शब्द “म” से कहते है ।

उव्वानवर: “उव्वानवर” शब्द उस व्यक्ति को संबोधित करता है जो “उ” शब्द का अर्थ है। “उकार” आचार्य को समझाता है। शास्त्र कहते है “उ” कार का सीधा अर्थ अम्माजी पेरिया पिरट्टी श्री महालक्ष्मी है। वह एक आत्मा और परमात्मा के बीच कि डोर है और दोनों का मिलन हो जाये यह सुनिश्चित करती है। उसी तरह वह आचार्य हीं है जो आत्मा और भगवान श्रीमन्नारायण को मिलाते है। क्योंकि अम्माजी और आचार्य का कार्य एक ही है इसलिये “उ” कार आचार्य को भी संबोधित करता है। इसके अलावा आचार्य को अम्माजी के प्रति भक्ति और उनका स्नेह प्राप्त है। आचार्य यह सुनिश्चित करते है कि जो आचार्य के चरण कमलों के शरण होता है उसे अम्माजी का स्नेह प्राप्त होता है और फिर भगवान का प्रेम और स्नेह भी प्राप्त  होता है। क्योंकि आचार्य और अम्माजी वही कार्य करते है यानि भगवान का हमारे प्रति प्रेम, आचार्य को “उ” से संबोधित किया है वही शब्द जिसका अर्थ “अम्माजी” है।

इस दृष्टांत के लिये एक कथा है। एक बार जब श्रीरामानुज स्वामीजी प्रसन्न थे उन्होंने अपने शिष्य “श्रीदाशरथी स्वामीजी” को “उ” कार का अर्थ समझाया। श्रीदाशरथी स्वामीजी ने यह अपने पुत्र “कन्धादै आण्डान” को बताया जिन्होंने यह “भट्टर” को बताया। जैसे श्रीरामानुज स्वामीजी ने “उ” कार का अर्थ समझाया था उसे एक ग्रन्थ रूप में संग्रह किया गया जिसका नाम “प्रणव संग्रहं” है। इस ग्रन्थ में “उ” कार का अर्थ आचार्य कहा गया है। “प्रमेय सारम” के लेखक है श्रीदेवराज मुनि स्वामीजी। क्योंकि वह इस ग्रन्थ में “उ” कार के अर्थ कि चर्चा करते है, यह हम परिणाम निकाल सकते है कि श्रीरामानुज स्वामीजी श्रीदेवराज मुनि स्वामीजी को “उ” कार का सही अर्थ कहते है। वह श्रीरामानुज स्वामीजी के प्रिय शिष्य थे। उन्होंने उनकी कई वर्षो तक सेवा कि और उनके श्रेष्ठ दया का लक्ष्य बने।

अडिमै एन्रुरैत्तार: यह जीवात्मायें उनके अनादि स्वामी जिन्हें “अ” (श्रीमन्नारायण) कहते है उनकि सेवा करते है । “म” और “अ” के बीच में जो सम्बन्ध उत्पन्न हुआ वह “स्वामी-दास” है। यह सम्बन्ध “म” को आचार्य प्रधान करते है जो मध्यस्थ है। केवल जब आचार्य (जो यहा उ से दर्शाया गया है) शिष्य (जो यहा म से दर्शाया गया है) को सम्बन्ध दिखाते है तब शिष्य को पूरी विवेक से यह मालुम होता है। इसलिये यह पद उव्वानवरूक्कु मव्वानवर एल्लाम उव्वानवर अडिमै एन्रु रैत्तार” आगे बढ़कर आचार्य भगवान और आत्मा के बीच में “स्वामी / दास” सम्बन्ध को बाताते है। इसे बताने के लिये एक कथा है जो श्रीसहस्त्रगीति के इडु व्याख्यान में है।

एक समय एक व्यापारी था जिसका काम दूसरे जगह जाकर व्यापार कर धन कमाना था। उसकी पत्नी गर्भवती थी। एक दिन वह घर छोड़ समुद्र के उस पार दूसरे देश व्यापार के लिये पहुँच गया। जाने से पूर्व उसने अपनी पत्नी से कह गया कि उसे आने में समय लगेगा और वह उनके आनेवाले पुत्र को “व्यापार” का पाठ सिखाये। कुछ समय बाद उसने एक लड़के को जन्म दिया। वह लड़का बड़ा हुआ और वह व्यापार के गुण सिख गया। अब दूसरे देश में व्यापार करने का उस लड़के का समय था। संयोग से वह उसी देश में चला गया जहाँ उसके पिता गये थे। वह वहाँ व्यापार करने लगा। एक दिन पिता पुत्र में कुछ व्यापार नियम को लेकर झगड़ा हो गया। यह देख बहुत जन जमा होगये। उन लोगों में एक बुढ़ा था जो बाप बेटे दोनों को जानता था। यह देख वह बुढ़ा बोला “आप दोनों झगड़ा क्यों कर रहे हो? आप दोनों पिता पुत्र हो”। उसने  उनका सम्बन्ध बताकर उन्हें एक कर दिया। उनके सम्बन्ध जानकर उनके खुशी का ठिकाना न रहा। अत: आचार्य भक्त और भगवान के बीच में मध्यस्थ है। यह सम्बन्ध कोई नहीं बनाता। यह सदैव के लिये है। इस कथा में उस बुढे व्यक्ति ने कोई नया सम्बन्ध नहीं बनाया उसने केवल उनके सम्बन्ध को याद करवाया। एक बात इस कथा में यह है कि पिता यह भूल गया कि वह पिता है परन्तु सच्चाई में भगवान कभी कुछ नहीं भुलते। वह सिर्फ आचार्य के रूप में अवतार लेते है ताकि कोई भी उन तक आसानी से पहुँछ जाये और शरण हो जाये।

अत: आचार्य वह है जो भगवान और भागवत के बीच मध्यस्थ का कार्य करते है । वह उनमें “भगवद-सेवक” सम्बन्ध प्रगट करते है। आचार्य शिष्य को भगवान के बारें में बताते है। वह कहते है भगवान हीं हम सब के लिये माता, पिता, सम्बन्धी और सब कुछ है। दूसरी तरफ यही आचार्य भगवान से कहते है कि यह आत्मा आप से अलग रह नहीं सकता इस पुत्र को क्षमा कर आपके चरण कमलों में शरण दे। आचार्य ऐसा कर उस आत्मा को मुक्त कर देते है। यही कार्य आचार्य एक व्यक्ति के लिये करते है जिसे इस पाशुर में उत्सव रूप में मनाया गया है।

इव्वारु केट्टिरुप्पार्क्कु: यह उन समूह के लोगों को दर्शाता है जो “अ”, “उ” और “म” कार को अच्छी तरह सुनकर उसका पालन करते है। तिरुमन्त्र स्वयं में भगवान का नाम है “नारायण”।  इसको “नर” और “आयण” में अलग किया जा सकता है। एक बार आचार्य अपने शिष्य को “नर” और “आयण” के सम्बन्ध के बारें में समझाते है। “नर” आत्मा है और “आयण” भगवान श्रीमन्नारायण है। आचार्य यह ज्ञान देते है कि आत्मा अपने स्वामी श्रीमन्नारायण का दास है। यह ज्ञान प्राप्त कर शिष्य अपना जीवन इसे पालन करके बिताता है।

आलेन्रु कण्डिरुप्पार: कुछ लोग है जो ऐसे शिष्य कि सेवा करते जो पिछले प्रकरण में समझाया गया है। यह लोग इन शिष्य को उनके लिये सब कुछ मानते है। सबसे पहिले भगवान श्रीमन्नारायण का दास हूँ ऐसा मानना चाहिये। इस शास्त्र को आगे बढ़ाते हुए यह मतलब है कि वह दास सबकुछ करेगा जो उसके स्वामी श्रीमन्नारायण को पसन्द है। भगवान कि पसन्द और कुछ नहीं वह व्यक्ति उनके दासों का दास रहे और उनका कैकर्य करें यही है। अत: एक व्यक्ति के अंतिम नियम यह है कि वह भगवान श्रीमन्नारायण के दासों का दास रहे। इस पाशुर में “आलेन्रु कण्डिरुप्पार”  पद में यहीं समझाया गया है।

तिरुमन्त्र में एक आत्मा के तीन गुण को समझाया गया है। वह है (अ) यह आत्मा भगवान श्रीमन्नारायण का हीं दास है। (आ) भगवान श्रीमन्नारायण छोड़ आत्मा को शरण लेने के लिए और कोई स्थान हीं नहीं है और (इ) भगवान छोड़ आत्मा के पास और कोई आनंदमय नहीं है। इन आत्मा के तीन गुणों में एक ऐसा अर्थ है जो अंतनिर्हित है। अगर हम “श्रीमन्नारायण” को “श्रीमन्नारायण के भक्तों” से बदलते है तो हमें आत्मा के तीन गुण प्राप्त होते है जो भगवान श्रीमन्नारायण के भक्तों के सम्बन्ध से है। वह है (अ) यह आत्मा श्रीमन्नारायण के भक्तों के सिवाय और किसी का दास नहीं। (आ) श्रीमन्नारायण के भक्तों के अलावा इस आत्मा का और कोई शरण नहीं है। (इ) श्रीमन्नारायण के भक्तों के सिवाय आत्मा के पास और कोई खुशी नहीं है। “श्रीमन्नारायण” को छोड़ “श्रीमन्नारायण के भक्तों” के बारें में चर्चा करने का यह कारण है कि भगवान श्रीमन्नारायण अपने भक्तों से हीं सर्वाधिक प्रेम करते है। अत: यह अंतर्विरोधि नहीं है। यह आगे बढ़कर भगवान के भक्तों के दास होने का अर्थ समझाता है जिसे “चरम पर्व निष्ठा” कहते है। अत: किसी को सही पहचानना हो तो यह जानना चाहिये कि वह भगवान का भक्त है। यह समझने के पश्चात दूसरे कदम कि और चलना नाकि अंतिम पडाव कि ओर।

मीद्चियिला नाट्टिरुप्पार् एन्रि रुप्पन नान्: श्रीदेवराज मुनि स्वामीजी को यह दृढ़ विश्वास है कि जो भगवान के दासों के दास है वह परमपद अवश्य जायेंगे जहाँ से कोई वापस नहीं आता। वहाँ वें सब नित्यसूरी के संग में रहेंगे जो हमेशा भगवान के निकट रहते है। वह “नान्” शब्द का प्रयोग करते हुऐ यह ज़ोर देते है कि वह इस पर विश्वास करते है। इसका यह कारण है कि श्रीदेवराज मुनि स्वामीजी अपने आचार्य श्रीरामानुज स्वामीजी से वेदों के गुप्त अर्थ कि शिक्षा प्राप्त किये है। वह बहुत सम्माननीय थे क्योंकि वह अपने आचार्य श्रीरामानुज स्वामीजी के शब्दानुसार जीवन व्यतीत करते थे। श्रीदेवराज मुनि स्वामीजी अपने आचार्य श्रीरामानुज स्वामीजी से वेद और अन्य शास्त्र सीखने के पश्चात यह निर्णय किये कि यही सत्य है। सत्य यह है कि यह लोग जो भगवान के दासों के दास है इस संसार के भोगो को भोगने के लिये फिर वापस नहीं आते। वह परमपद पहूंचकर वहाँ नित्यसुरीयों के साथ हमेशा रहते है।

हिन्दी अनुवादक – केशव रामानुज दासन्

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