Daily Archives: July 3, 2016

thiruvAimozhi – 3rd centum

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SrI:  SrImathE SatakOpAya nama:  SrImathE rAmAnujAya nama:  SrImath varavaramunayE nama:

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Mahavishnu-universesFocus of this centum – vyApakathvam – bhagavAn’s omnipresence

Highlights from vAdhi kEsari azhagiya maNavALa jIyar‘s introduction

While the first two centums explained the goal, that is brahmam (bhagavAn), specifically, his SEshithva (lordship) which highlights his rakshakathva (being the protector) and bhOgyathva (being the most enjoyable), in the subsequent two centums, the jIvAthmA who pursues the goal, specifically his bhagavadhEka SEshathva (exclusive servitude towards bhagavAn) which highlights his exclusive engagement with bhagavAn and exclusive love towards bhagavAn are explained. Among those two qualities,this third centum, which explains jIvAthmA‘s exclusive engagement with bhagavAn, highlights the following aspects (in each decad):

  1. the natural servitude of jIvAthmA towards bhagavAn which is based on bhagvAn’s lordship
  2. the relationship of jIvAthmA with the material body etc which is a hurdle for such servitude, should be eliminated
  3. for such jIvAthmA who has been freed from the hurdles, the actions in service to bhagavAn are to be requested (from bhagavAn himself)
  4. jIvAthmA‘s inseparable relationship with bhagavAn in the form of prakAra-prakAri (prakAri – object [bhagavAn], prakAra – mode/attribute [jIvAthmA]), is a manifestation of jIVAthmA’s servitude towards bhagavAn
  5. the loving emotions acquired by this tasteful servitude
  6. the recipient of such servitude stretches [from bhagavAn in paramapadham] to archAvathAram emperumAns [deity forms in dhivya dhESams]
  7. the improvement of such servitude leads up to the ultimate servitude towards thadhIyas (bhagavAn‘s devotees)
  8. the great attachment in having the experience with emperumAn [in deity forms] who is dependent on his devotees
  9. the distinct/special nature of vAchika anubhavam (engaging with bhagavAn through speech/words) which is one type of engagement
  10. the eradication of all hurdles which is an outcome of engaging with bhagavAn in all manners

With these aspects, AzhwAr explains jIvAthmA‘s exclusive engagement with bhagavAn.

We will see each thiruvAimozhi (decad) in detail.

adiyen sarathy ramanuja dasan

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यतिराज विंशति – श्लोक – १९

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श्रीः
श्रीमते शठकोपाय नमः
श्रीमते रामानुजाय नमः
श्रीमद् वरवरमुनय् नमः

यतिराज विंशति

श्लोक  १८                                                                                                                  श्लोक  २०

श्लोक  १९

श्रीमन् यतीन्द्र! तव दिव्य पदाब्जसेवां श्रीशैलनाथकरूणा परिणामदत्ताम् |
तामन्वहं मम विवर्धय नाथ तस्या: कामं विरूद्धमखिलं च निवर्त्तय त्वम्| १९ | 

नाथ श्रीमन् यतीन्द्र                        : हमारे नायक आचार्य श्रीरामानुज!
श्रीशैलनाथ करूणा परिणाम दत्ताम् : (मेरे आचार्य) श्रीशैलनाथ ने अपनी करूणा के परिवाह से जिसको दिया था
तां तव दिव्य                                 : आपके उन सुन्दर
पदाब्ज सेवां अन्वहं                       :  चरणकमलों की सेवा को प्रति दिन
मम विवर्धय                                 :  मेरे लिये अभिवृद्धि बना इच्छाओं को
त्वं निवर्तय                                  :  इस संसार में (जहाँ उसकी महिमा जान कर उसकी भक्ति   वाला कोई नहीं

आपके आचार्य श्रीशैलनाथ ने श्रीरामानुज की मूर्ति दिखा कर कहा कि इनके विषय में एक स्तोत्र की रचना करो| उसके फलस्वरूप यह स्तुति निकली| इसका उल्लेख करते हुए एक प्रार्थना करते हैं इस श्लोक में| आचार्य श्रीरामानुज! आपके चरणकमलों का दर्शन मैं स्वयं नहीं कर पाया| आचार्य के कृपया दिखाने के कारण देख सखा| इसलिए वह विषय जेपी परमप्राप्य है आज मुझे नया नहीं मिला, लेकिन पहले ही से प्राप्य है अगर आपको मिल गया है तो अब आपको क्या चाहिए? उसकी शक्ति तो आप में पर्याप्त मात्रा में विध्यामान है| अन्तिम पाद से यह प्राथना भी की जाती है कि उसके विरोधिभूत कामनाओं को भी दूर कीजिए|

“तस्या विरूद्धमखिलञ्च कामं निवर्तय ” इसका भाव है कि सब कामों को दूर कीजिए चाहे भगवत्काम हो या विषयान्तरकाम | जैसे भगवद्विषय में रात भक्तों को विषयान्तरकाम हेय हैं, वैसे ही आचार्यविषय में बैठे रहने वालों को भगवत्काम भी त्याज्य ही होगा|

अगर बात यह है तो विषयान्तरों की तरह भगवद्विषय से दूर रहना चाहिए न ? वैसे तो लोग नहीं देखते| यह इसलिए कि भगवान आचार्य के उपास्य हैं; यदि हम भगवान से प्रेम करें तो वह भी आचार्य के मुखोल्लास का ही कारण होगा| इसलिए भगवान को बिल्कुल छोड़ नहीं देते| जैसे कहा है “शत्रुघ्नो नित्यशत्रुघ्न:” अर्थात् श्रीरामचन्द्र पर अपनी इंद्रियों को विहरने न देकर भरत से ही लगे रहने वाले शत्रुघ्न भी कभी-कभी रामचन्द्र की सेवा करें तो वह भी अपने देवता भरत की तृप्ति ही के लिए || १९ ||

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यतिराज विंशति – श्लोक – १८

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श्रीः
श्रीमते शठकोपाय नमः
श्रीमते रामानुजाय नमः
श्रीमद् वरवरमुनय् नमः

यतिराज विंशति

श्लोक  १७                                                                                                श्लोक  १९

श्लोक  १८

कालत्रयेऽपि करणत्रयनिर्मिताति पापक्रियस्य शरणं भगवत्क्षमैव |
सा च त्वयैव कमलारमणेऽर्थिता यत् क्षेम: स एव हि यतीन्द्र! भवच्र्छितानाम्| १८ |

यतीन्द्र                                 : रामानुज स्वामिन्!
कालत्रये                                : भूत भविष्य वर्तमान तीनों कालों में
करणत्रय निर्मित अतिपाप      : मनो वाक् काय से जिसने बहुत
भगवत् क्षमा एव शरणम्        : भगवान की क्षमा एक ही गति है
सा च त्वया एव                     :  वह क्षमा भी आप से
कमलारमणे अर्थिता इति यत् : श्रीरंगनाथ की सेवा में प्रार्थित थी
स एव भवत् श्रितानां              : वह प्रार्थना ही आपकी शरण में आए हुए मनुष्यों की
क्षेम:                                    :     कुशलता का कारण है||

पिछले श्लोक में उक्त विषय का समर्थन इस श्लोक में किया जाता है| यध्यपि शास्त्रों में कहा जाता है कि अपराधी चेतनों को परमात्मा की क्षमा एक ही गति है, मेरे जैसे अपराधियों को भगवान तक जाने की आवश्यकता नहीं|

एक फाल्गुन उत्तरफाल्गुनी के उत्सव के दिन दिव्यदम्पति के सामने गध्यत्रय का अनुसन्धान करके आपने जो प्रार्थना की थी उसका जो उत्तर आपको भगवान की ओर से प्राप्त हुआ वह विश्वविख्यात है| भगवान तथा लक्ष्मी का यही प्रतिवचन था कि आपको और आपके सम्बन्धी के सम्बन्धी लोगों को भी किसी तरह की कमी नहीं है| जब वह है, तब भगवान के सामने जाकर मुँह बाए बैठने की क्या जरूरत है?

यहाँ पर आचार्य श्रीनिगमान्तदेशिक के न्यासतिलक का श्लोक अनुसन्धेय है;

उक्त्या धनञ्जयविभीषणलक्ष्यया ते, प्रत्याय्य लक्ष्मणमुनेर्भवता वितीर्णम् |
श्रुत्वा वरं तदनुबन्धमदावलिप्ते , नित्यं प्रसीद भगवन्! मयि रंगनाथ
|| ”

अर्थात् अर्जुन और विभीषण सूरि को लक्षित करके आपकी जो उक्ति हुई थी,
अर्जुन के लिये        : सर्वधर्मान् पारित्यज्य मामेकं शरणंव्रज | अहंत्वा सर्व पापेभ्यो मोक्षयिष्यामि माशुचः ||
विभीषण के लिये    : सकृदेव प्रपन्नाय तवास्मीति च याचते | अभयं सर्वभूतेभ्यो ददाम्येतत् व्रतं मम ||
लक्ष्मणमुनि को, रामानुज स्वामीजी को भी भगवान ने कह दिया था कि रामानुज! :
अस्योचिंता परम वैदिक दर्शनस्य रामानुजार्य कृतिनोऽपि कृतं कृतज्ञ:रंगेश्वर: प्रथयितुं प्रथयाञ्चकार-रामानुजास्य मतमित्यभिधानमस्य ||

श्रीरामानुज स्वामीजी द्वारा श्रीभाष्य, गीताभाष्य आदि प्रस्थानत्रयी जो कृति पर तथा उनके द्वारा की गई अद्भुत सेवाओं, जीवों का संरक्षण भाव इत्यादि से प्रसन्न होकर कृतज्ञता ज्ञापन करते हुये श्री रंगनाथ भगवान ने उन्हें एक बड़ा वरदान दिया था कि परम वैदिक दर्शन, विशिष्टाद्वैत दर्शन श्रीरामानुज मत के नाम से कहा जायेगा, अर्थात् आपके नाम से ही यह सम्प्रदाय चलेगा, श्रीरामानुज सम्प्रदाय कहा जायेगा|

(विशिष्टाद्वैत या श्री सम्प्रदाय इसका नाम है और लक्ष्मीनाथ समारम्भां नाथयामुन मध्यमाम् , के अनुसार पहले लक्ष्मीनारायण भगवान हैं, फिर श्रीजी हैं, विष्वक्सेनजी हैं श्रीशठकोप स्वामीजी हैं, फिर नाथमुनि, यामुनमुनि हैम, फिर महापूर्ण स्वामीजी तब रामानुज स्वामीजी हैं, कितना दूर हैं फिर भी श्री रंगनाथ भगवान ने आपसे किये अनेक कृत्यों से उपकृत हो उन्हें यह वरदान दिया था )

कालत्रयेऽपि – अच्छे चालचलन के लिए कोई भी समय न रख कर सभी कालों में मन वाक् शरीर तीनों से पाप ही पाप कराते रहने वाला, भगवान की क्षमा का ही पात्र बन कर ठहरेगा| जो पाप प्रायश्चित्तों से या अनुभव से नहीं कट सकते, उन्हें तो भगवान की क्षमा के सिवाय दूसरी गति नहीं| वह क्षमा भी आज हमको नये सिर से प्रार्थना करके नहीं प्राप्त करनी है| पहले ही आपने प्रार्थना कर ले राखी है| अब आपके अभिमान में अन्तर्भूत होने के अतिरिक्त हमें तो कुछ करना नहीं है || १८ ||

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यतिराज विंशति – श्लोक – १७

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श्रीः
श्रीमते शठकोपाय नमः
श्रीमते रामानुजाय नमः
श्रीमद् वरवरमुनय् नमः

यतिराज विंशति

श्लोक  १६                                                                                                 श्लोक  १८

श्लोक  १७

श्रुत्यग्र वेध्य निजदिव्य गुणस्वरूप: प्रत्यक्षतामुपगतस्त्विह रङ्गराज: |
वश्यस्सदा भवति ते यतिराज तस्मात् शक्त: स्वकीयाजनपापविमोचने त्वम्|| १७ ||

यतीन्द्र                                    : श्रीरामानुज !
श्रुत्यग्रेवध्य निज दिव्यगुण       : वेदान्तों से ही जिसके गुण
स्वरूप:                                    : स्वरूप आदि का ज्ञान हो सकता है
देशिक वर उक्त समस्त नैच्यम् : उत्तम आचार्यों ने जो नैच्यानुसंधान किया था वह सब
इह                                          : इस संसार में (जहाँ उसकी महिमा जान कर उसकी भक्ति करने वाला कोई नहीं)
प्रत्यक्षतां उपगत:                     : प्रत्यक्ष रूप से जो दीख पड़ता है
रङ्गराज:  सदा                        : वह भगवान श्रीरंगनाथ हमेशा
ते वश्य: भवति तस्मात्            : आपके वश में रहता है इसलिये
स्वकीय जन पाप विमोचन       : अपने दासों के पाप दूर करने में
त्वं शक्त:                               : आप शक्तियुक्त हैं

यह समझ कर कि अब तक के श्लोकों में जो प्रार्थना की गई थी, उसे सुन कर श्रीरामानुज कहते हैं – यह आप क्या कहते हैं, इष्ट की प्राप्ति और अनिष्ट की निवृत्ति करने वाला तो ईश्वर है| मैं उसे थोड़े ही कर सकता हूँ? इस दशा में मेरे पास प्रार्थना करने से क्या लाभ है यह उन्हीं के सामने की जानी चाहिए| आगे कहते हैं ‘यह प्रसिद्ध है कि वह परमात्मा जब श्रीरंगनाथ बनकर आया, तब सब प्रकार से आपके आधीन है और आप जो कुछ चाहते हैं उसे कर ही देता है| ऐसा हो तो प्रार्थनाएँ आपकी सेवा में ही की जानी चाहिए|’

पुरूषसूक्त नारायणानुवाक आदि ही में गुरूमुख से जिसका स्वरूप, रूप, गुण आदि विदित होता है, वह भगवान आज भूमि पर, संसार के मनुष्यों के उज्जीवन के लिए, सब दु:ख दूर होने एवं सुख अभिवृद्धि होने के लिए श्रीरंग में आकार दक्खिन की और मुहँ करके शयन कर रहा है| जैसे कूरेशजी लिखते हैं;

“ अखिलनेत्रपात्रमिह सन् सह्योद्भवायास्तटे |
श्रीरंगे निजधाम्नि शेषशयने शेष वनाद्रीश्वर || ”

अपनी विभव दशा एवं अर्चा दशा में वह आपका आज्ञाकारी है| तब अपनी इच्छा से उसे आज्ञा देकर काम कराने में क्या संकोच है ?

यह कैसे कहते हैं कि “ वश्यस्सदा भवति ते यतिराज” , इसका उत्तर हो सकता है; शरणागति गध्य में आपने जो जो प्रार्थनाएँ कीं, रंगनाथ ने सबके बारे में यही कहा कि वैसा ही हो| तथा अन्य कई इतिहास भी हैं जिनके बल से आप यह कहते हैं| श्रीशठकोप स्वामी की सहस्त्रगीति की ४.३.५ वीं गाथा की ३६००० व्याख्या में एक ऐतिह्य है – एक दिन एक श्रीवैष्णव धोबी भगवान के पीताम्बर बहुत ही सुन्दर ढंग से साफ कर लाया और रामानुज के सामने रखा| उसे देखकर वे बहुत प्रसन्न हुए और उसे रंगनाथ के सामने ले जाकर वस्त्रों को दिखा कर बोले – यह देखने की कृपा कीजिये कि कैसे सुन्दर रूप से इसने पीताम्बर साफ किया है|

वह देख कर भगवान तृप्त हुए और रामानुज से बोले; लीजिये, इसके बदले में उस दोष को क्षमा कर देता हूँ जिसे एक धोबी ने हमारे प्रति किया था| (धोबी का पिछला अपराध – अक्रूर के संग एक बार कृष्ण और बलराम मथुरा गये और वहाँ वीथि में कंस का धोबी कपड़ों की गठरी लाड़ कर आ रहा था| उसे देख दोनों ने उससे कुछ कपड़े माँगे, उसने इनकार कर दिया |)

श्रीरांगनाथ के सम्बन्ध में कुलशेखर कहते हैं कि ये वही श्रीराम हैं जिन्होंने विश्वामित्र के यज्ञ की रक्षा कर के उनका अवभृथ कराया| जब वे राम थे तब उनके किंकर बन कर उनकी सेवा करने के लिए विश्वामित्र के पीछे गये|

“ इमौ स्म मुनिशार्दूल किंकरौ समुपस्थितौ |
आज्ञापय यथेष्टं वै शासनं करवाव किम् ||”
श्रीराम होकर विश्वामित्र के विधेय रहे तो श्रीरामानुज के विषय में क्यों पूछें ? १७ ||

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यतिराज विंशति – श्लोक – १६

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यतिराज विंशति

श्लोक  १५                                                                                                     श्लोक  १७

श्लोक  १६

शब्दादि भोग विषया रूचिरस्मदीया नष्टा भवत्विह भवद्दयया यतीन्द्र |
त्वद्दासदासगणना चरमावधौ य: तद्दासतैकरसताऽविरता ममास्तु || १६ ||

यतीन्द्र! अस्मदीया      : रामानुज! मेरी
शब्दादि भोग विषया    : रूचि   शब्द आदि विषयों का भोग करने की रूचि
भवद् दयया इह           : आपकी दया से इस संसार में
नष्टा भवतु य             : नष्ट हो जाय; जो
त्वद् दास दास गणना  : आपके भक्तों के भक्तों की गणना
चरम अवधौ               : करने पर अन्तिम छोर पर रहता है
तद् दासता एक रसता : उसकी दासता में ही रात रहना
मम अविरता अस्तु     : मुझमें अविच्छिन्न रूप से होवे |

हे आचार्य श्रीरामानुज! मेरी इन्द्रियाँ विषयों में लीन होकर रहती हैं| मुझे जो कि आपके प्रति प्रवण ऐसे नहीं होना चाहिए| विषयों की मेरी इस रूचि को आप ही अपना कृपा से दूर कीजिये, क्योंकि मुझ में कोई योग्यता नहीं है| उत्तराधे से बतलाते हैं कि मेरा नाम ‘यतीन्द्र-प्रवण प्रवण प्रवण प्रवण’ हो|

हिमालय की गुफा में बैठ कर भजन करना और दिव्य देश में रह कर दर्शन करना, कैंकर्य करना दोनों अपनी जगह बड़े विलक्षण हैं| दिव्य देश में जो गुणानुसन्धान होता है, जो उत्सवों का अनुसंधान होता है, उसमें जो कैंकर्य बनाता है, दिव्यदेश में अर्चारूप की जो सेवा है, उत्सव, सवारी, आदि-आदि इसलिये यह कुछ विचित्र सा दीखता है| गुफा में यह सब नहीं बन पाता, वहाँ तो अकेले भजन ही है| परमात्मा कहीं जन्म दें तो कैंकर्य करने के लिये जीव आये | यह कम नहीं है कि मानव बना दें, उसमें भी भक्त बना दें, फिर दिव्य देश में भेज दें, वहाँ कैंकर्य कराते हुये रहे; यह बहुत बड़ी चीज है || १६ ||

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यतिराज विंशति – श्लोक – १५

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यतिराज विंशति

श्लोक  १४                                                                                                    श्लोक  १६

श्लोक  १५

शुद्धात्म यामुनगुरूत्तम कूरनाथ भट्टाख्य देशिकवरोक्त समस्तनैच्यम् |
अध्यास्त्यसंकुचितमेव मयीह लोकेतस्माद्यतीन्द्र करूणैव तु मद्गतिस्ते | १५ |

यतीन्द्र                                           : श्रीरामानुज !
शुद्धात्मयामुनगुरूत्तम                     : परमपवित्र उत्तमयामुन गुरू (आलवंदार)
कूरनाथ भट्टाख्य                              : कूरनाथ (आल्वान्) भट्ट आदि
देशिक वर उक्त समस्त नैच्यम्        : उत्तम आचार्यों ने जो नैच्यानुसंधान किया था वह सब
इह लोक अध्य                                :  इस संसार में परिपूर्ण रूप से है
मयि एव असंकुचितम् अस्ति           : मुझ ही में परिपूर्ण रूप से है
तस्मात् ते करूणा एव तू मद्गति:    : इसलिये आपकी करूणा ही मेरी शरण है; अथवा आपकी करूणा की शरण मैं एक ही हूँ |
 

पिछले श्लोक में उक्त रीति से कूरेशजी एक का नैच्य ही नहीं, परन्तु आलवन्दार, कूरेशजी भट्ट इन आचार्यों के नैच्य भी उनमें तो कुछ नहीं, सब मुझ में ही हैं| इस समय इस संसार में जहाँ भी देखिये मुझ जैसा दूसरा नीच व्यक्ति आप को नहीं मिलेगा| इसलिए, अपनी कृपा का पात्र मुझे बना कर मेरी रक्षा कीजिए|

आलवन्दार का नैच्यानुसन्धान “न निन्दितं कर्म तदस्ति लोके” “अमर्याद: क्षुद्र:” इत्यादि श्लोकों में देखने में आता है| कूरेशजी का नैच्यानुसन्धान “तापत्रयीमयदावानलदह्यामान” से लेकर बीस पचीस श्लोकों में उपलभ्य है| भट्ट का नैच्यानुसन्धान “गर्भजन्मजरामृति” “असन्निकृष्टस्य निकृष्टजंतो:” इत्यादि श्लोकों में है|

शुद्धात्म यह विशेषण तीनों आचार्यों के लिए लागू है| इसका तात्पर्य यह है की उस नैच्यानुसन्धान की उनके पास संभावना नहीं है || १५ ||

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