Daily Archives: June 18, 2016

यतिराज विंशति – श्लोक – १४

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श्रीः
श्रीमते शठकोपाय नमः
श्रीमते रामानुजाय नमः
श्रीमद् वरवरमुनय् नमः

यतिराज विंशति

श्लोक  १३                                                                                                                                      श्लोक  १५

श्लोक  १४

वाचामगोचर महागुणदेशिकाग्राचकूराधिनाथ कथिताखिल नैच्यपात्रम् |
एषोऽहमेव न पुनर्जगतीद्वशस्तद्रामानुजार्य ! करूणैव तू मद्गतिस्ते|| १४ ||

आर्य   रामानुज      : रामानुज! सब वस्तुओं में
वाचामगोचर हागुणदेशिकाग्रचकूराधिनाथ कथित अखिलनैच्यपात्रम्  : जिनके महागुण सबकी प्रशंसा से बाहर हैं, जो सब आचार्यों में श्रेष्ठ हैं ऐसे श्रीकूरनाथजी से वर्णित सभी नीचताओं का एकमात्र पात्र जगति एषः अहम् एव इस संसार में सिर्फ मैं एक ही हूँ
ईद्वश:                  : पुन: न ऐसा दोषयुक्त दूसरा कोई नहीं (इसलिये)
ते करूणा:              : तु  आपकी करूणा की तो
मद्गति:                : एव   मैं एक ही गति हूँ |

अपने स्तवों में श्रीवत्साङ्कमिश्र जो नैच्यानुसन्धान कराते हैं वे सब सचमुच मुझमें ही हैं, मेरे जैसा नीच इस संसार में दूसरा कोई नहीं| इसलिए आपकी कृपा को छोड़ कर मेरे लिये और कोई शरण (उपाय) नहीं हैं|

यहाँ श्रीकूरत्ताल्वान् को वाचामगोचरमहागुणदेशिकाग्रच विशेषण दिया गया है| यह बहुत ही उचित है, क्योंकि उनके समकाल में ही कहा जाता था की परमात्मा के गुणों का वर्णन भी सफलता से कोई कर जाता है, श्रीरामानुज के गुणों का भी पूरा पूरा वर्णन कोई कर पायेगा, लेकिन कूरेशजी के गुणों का वर्णन आदिशेष से भी नहीं किया जा सकता| यह रामानुजनूत्तंदादि की कूरेश सम्बन्धी गाथा से भी स्पष्ट है| ऐसे गुणयुक्त कूरेश भी भगवान की स्तुति में प्रवृत्त होकर उनकी स्तुति कम और अपना नैच्यानुसन्धान अत्याधिक करके ही ठहरे| यह नैच्यानुसन्धान वैकुण्ठस्तव तथा वरदराजस्तव के पिछले भाग में देखा जा सकता है| वास्तव में उस नैच्यानुसन्धान का वे तो पत्र नहीं| हमारे अनुसन्धान ही के लिए उन्होंने अपने ऊपर आरोपित करके कहा था| इसलिए मेरी रक्षा के लिए आपकी कृपा के सिवाय दूसरा कोई उपाय नहीं|

करूणैव तु मद्गतिस्ते ते करूणा – आपकी करूणा, मद्गति:- मुझको शरण मानने वाली है, अर्थात् आपकी करूणा मुझे छोड़ कर और किसी के पास तो सफल नहीं होगी|

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यतिराज विंशति – श्लोक – १३

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श्रीः
श्रीमते शठकोपाय नमः
श्रीमते रामानुजाय नमः
श्रीमद् वरवरमुनय् नमः

यतिराज विंशति

श्लोक  १२                                                                                                            श्लोक  १४

श्लोक  १३

तापत्रयीजनित दु:खनिपातिनोऽपि देहस्थितौ मम रूचिस्तु न तन्नीवृत्तौ |
एतस्य कारणमहो मम पापमेव नाथ त्वमेव हर तध्यतिराज शीघ्रम् | १३ |

यतिराज!                                          : रामानुज
तापत्रयीजनित दु:खनि पातिन: अपि   : तापत्रयों से जनित दु:खों में गिर कर भोगने पर भी
मम रूचि: तु                                     : मेरी इच्छा तो
देहस्थितौ                                         : इस शरीर की रक्षा में ही है
तत् निवृत्तौ न                                  : उसको दूर करने में नहीं
एतस्य कारणं मम पापम् एव              : उसको कारण मेरा पाप ही है
अहो नाथ                                         : हाय, मेरे रक्षक स्वामिन्!
तत् त्वम् एव                                    : उस पाप को आप ही
शीघ्रं हर                                           : बहुत जल्दी दूर कीजिए

यध्यपि सब वस्तुओं के भीतर व बाहर रहने वाले ईश्वर को तुम देख नहीं पाये, आँखों से दीख पड़ने वाली नफरत करने लायक वस्तुओं के दोषों को तो ठीक ठीक देखते हो| उन्हें देखते हो तो क्या उन्हें त्यागने की इच्छा नहीं होती? इस प्रश्न के उत्तर में कहते हैम – मेरी दशा ऐसी है कि दु:खों को भी मैं सुख समझता हूँ| इसका कारण मेरे प्रबल पाप ही हैं| उन्हें आप ही को दूर करना चाहिए|

तापत्रयी तीन प्रकार के पाप, पहला आध्यात्मिक ताप जो हाथ-पावँ आदि शरीर के अंगों से उत्पन्न होता हैं, शरीर तथा मानस भेद से वह दो तरह का है| शरीर ताप व्याधि कहलाता है और मानस ताप आधि| इस प्रकार आधि-व्याधि ही आध्यात्मिक ताप हैं |

पशु पक्षी मनुष्याध्यै: पिशाचोरग राक्षसै: | सरीसृपाध्यैश्र्च नृणां जायते चाधिभौतिक: ||”

अर्थात् जानवर और चिड़िया, मनुष्य और पिशाच, उरग और राक्षस तथा साँप आदि जीवों से मनुष्यों को जो ताप उत्पन्न होता है वह आधिभौतिक कहलाता है |

शीत वातोष्ण वर्षाम्बू वैध्युतादिसमुद्भव: | तापो द्विजवरश्रे ष्ठै: कथ्यते चाधिदैविकः ||

अर्थात् ठण्ड और गरमी, वायु और वर्षा और बिजली आदि से उत्पन्न होने वाले ताप ही श्रेष्ठों से आधिदैविक कहे जाते हैं| ये तीन स्वयं दु:ख रूप और असह्य हैं|

 जब शरीर इतने दु:खों का कारण है, मुझे उसके नाश की प्रतीक्षा में रहना चाहिए| किन्तु मेरी रूचि इसी में है कि यह कैसे और भी चिरस्थायी होगी| इसलिए प्रार्थना कराते हैं कि इसमें अरूचि उत्पन्न करके इसे दूर करने का उपाय करना आप ही का काम है || १३ ||

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यतिराज विंशति – श्लोक – १२

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श्रीमते शठकोपाय नमः
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यतिराज विंशति

श्लोक  ११                                                                                                                                            श्लोक  १३

श्लोक  १२

अन्तर्बहि: सकलवस्तुषु संन्तमीशं अन् : पुर: स्थितमिवाहमवीक्षमाण: |
कन्दर्पवश्यहृदय: सततं भवामि हन्त त्वदग्रगमनस्य यतीन्द्र नार्ह: || १२ ||

यतीन्द्र सकलवस्तुषु     : रामानुज! सब वस्तुओं में
अन्त: बहि:                  : भीतर और बाहर
सन्तम् ईशं                  : व्याप्त करके स्थित भगवान को
अन्ध: पुर: स्थितम् इव : जैसे एक अन्धा अपने सामने की वस्तु को नहीं देख सकता वैसे
अवीक्षमाण:                : अहं सततं   नहीं देख कर, मैं हमेशा
कन्दर्पवश्यहृदय:         : काम के अधीन हो कर
भवामि हन्त                : रहता हूँ | हाय !
त्वदग्र गमनस्य न अर्ह:: तुम्हारे सामने आने तक के लिये मैं योग्य नहीं |

पिछले श्लोक में ‘अघं कुर्वे’ | अगर कोई पूछे कि जब सर्वेश्वर सब स्थानों में व्याप्त होकर तुम्हारे कर्म देख रहा है, तुम उससे छिप कर कैसे पाप कर सकते हो, इसका उत्तर इस श्लोक से देते हैं| मैंने तो ईश्वर को नहीं देखा है, तुम कहते हो कि सब वस्तुओं में भीतर और बाहर व्याप्त है| यदि अंधा अपने सामने वाली वस्तु को नहीं देख पाता तो इसमें आश्चर्य का क्या विषय है? मैं उस अन्धे की तरह ही हूँ|

 ईशमवीक्षमाण: कन्दर्पवश्यहृदय: सततं भवामिईश्वर को आँखों से देखता तो क्या उसी में मुग्ध हो कर नहीं रहता? उसका दर्शन न होने से ही मैं मनमाना काम कर रहा हूँ और क्षुद्र विषयों का यह दर्शन और भाग तो हमेशा करता रहता हूँ| ऐसा नहीं कि किसी एक समय पर ही, किन्तु ‘सततं’ सर्वदा ही|

त्वदग्रगमनस्य नार्ह: – मैं ऐसा पापी हूँ कि आपके सामने खड़े होने योग्य भी नहीं| जब यह मेरी योग्यता है, तब आपसे पास कैसे आ सकूँगा? || १२ ||

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यतिराज विंशति – श्लोक – ११

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श्रीमते रामानुजाय नमः
श्रीमद् वरवरमुनय् नमः

यतिराज विंशति

श्लोक  १०                                                                                                                   श्लोक  १२

श्लोक  ११

पापे कृते यदि भवन्ति भयानुताप लज्जा: पुन: करणमस्य कथं घटेत |
मोहेन मे न भवतीय भयादिलेश: तस्मात् पुन: पुनरघं यतिराज कुर्वे |११|

यतिराज                          : श्रीरामानुज!
पापे कृते                          : जब पाप किया जाता है, तब
यदि भयानुताप लज्जा:     : यदि भय अनुताप और लज्जा हों तो
अस्य पुन: करणं              : इस पाप का फिर भी करना
कथं घटेत मे                    : कैसे घटेगा ? मुझे तो
मोहेन इह                        : अज्ञान के कारण पाप करने में
भयादि लेश:                    : भय आदि का थोड़ा सा अंश भी
न भवति तस्मात् अघं      : नहीं होता इसलिये पाप को
पुन: पुन: कुर्वे                  : बार-बार करता हूँ |

अज्ञान से भरे इस संसार में पाप करना कोई अद्भुत विषय नहीं, इसलिए पाप हो जाने की चिन्ता तो मुझे नहीं| ‘हाय! मैंने पाप कर लिया| इससे इस लोक तथा परलोक में मेरी क्या दशा होगी?’ इस तरह का भय, अनुताप और लज्जा हो तो यह किये हुए पाप का कुछ प्रायश्चित होगा, बाद में जान बूझ कर पाप करने से हमें रोकेगा| लेकिन मुझको पापों के विषय में जरा भी न भय है, न अनुताप है और न लज्जा| इसका कारण है विवेक का अनुभव| पाप से रोकने वाले अनुताप आदि के अभाव से बार-बार पाप करता ही रहता हूँ| अपने पापों की अधिकता को उपरोक्त शब्दों में श्रीरामानुज की सेवा में निवेदन कराते हैम की मुझे ऐसे पापी को आपकी कृपा के सिवाय दूसरी कोई गति नहीं|

श्रीवत्साङ्कमिश्र ने पिल्लै-पिल्लै आल्वान् से जो कहा था वह इस श्लोक के पूर्वार्ध से मेल खाता है| वह ऐतिह्य यों है; श्रीवत्साङ्कमिश्र (कूरत्ताल्वान्) के कई शिष्यों में पिल्लै-पिल्लै आल्वान् एक थे| आभिजात्य आदि गुणों से कुछ ऊँचे होने के कारण वे भागवतों से विनयहीन होकर बरताव करते थे| इसे देख कूरेशजी ने सोचा; हाय! इसका यह भागवतापचार बहुत ही हानिकारक है| वह तो इसके ज्ञान अनुष्ठान सबको नष्ट करके स्वयं बलवान होकर अन्त में इसका ही सर्वनाश कर डालेगा| इसलिए इसे पाप से बचना चाहिए| एक दिन पुण्यकाल में स्नान करने के बाद कूरेशजी ने उससे पूछा, “क्या तुम मुझे कोई दान नहीं दोगे जब कि इस पुण्यकाल में सभी कुछ न कुछ दान कराते हैं?” उसने उत्तर दिया, “स्वामिन्! मैं दान क्या दे सकता हूँ जब मेरा सब कुछ आप ही का है|” तब कूरेशजी ने कहा, “अच्छा, तब मेरे हाथ में उदकदान कर दो कि मैं आगे मनो वाक् काय तीनों से भागवतों के प्रति अपचार किये बिना सावधानी से रहूँगा|” उसने भी वैसा ही कर दिया| आगे चल कर एक दिन पूर्व वासना से भागवत का अपचार हो गया| उससे भी भयभीत हो और कूरेशजी के सामने जाने में लज्जित होकर अपने ही घर में ठहर गया| हमेशा की तरह जब यह कूरेशजी के यहाँ नहीं आया तब कूरेशजी ने स्वयं उसके घर जाकर पूछा, क्या बात है? उसने कहा, ” आज मेरे से एक भागवत के प्रति अपचार हो गया| मालूम होता है कि इस शरीर के साथ जब तक रहता हूँ तीनों करणों से अपचार के बिना जीवन बिताना असंभव है| मैं क्या करुँ?” यह कह कर दु:ख से भूमि में गिरकर कूरेशजी के चरणों से लिपट गया| इसका पश्चात्ताप देखकर कूरेशजी खुश हुए और बोले, “मन से अपचार होने पर यदि अनुताप होता है तो ईश्वर उसको क्षमा कर देते है| इस डर से कि खुले त्पोर पर किसी का अपचार करने से राजा का दण्ड मिलेगा तुम शरीर से किसी को नहीं सताओगे| अब वाक् एक ही रह गया है| उसे वश में रख कर सावधानी से रहो” || ११ ||

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यतिराज विंशति – श्लोक – १०

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श्रीमद् वरवरमुनय् नमः

यतिराज विंशति     

श्लोक ९                                                                                                                           श्लोक  ११

श्लोक  १०

हा हन्त हन्त मनसा क्रियया च वाचा योऽहं चरमि सततं त्रिविधापचारान् |
सोऽहं तवाप्रियकर: प्रियकृद्वदेवं कालं नयामि यतिराज! ततोऽस्मि मूर्ख: | १० |

यतिराज! य: सततं              : है यतिराज! जो (मैं) हमेशा
मानसा वाचा क्रियया च       : मन, वाक्, शरीर तीनों करणों से
त्रिविध-अपचारान्               : तीन तरह के अपचारों को
चरामि स: अहं                    : कर रहा हूँ वह मैं
तव अप्रियकर:                   : आपका अप्रिय कराते हुए
एवं कालं नयामि                : ऐसे समय बिता रहा हूँ
प्रियकृद्वत्                       : मानों आपके प्रिय ही को करने
तत: मूर्ख: अस्मि               : वाला हूँ इसलिये मैं मूर्ख हूँ
हा हन्त हन्त                     : हाय हाय! कैसी वंचना है!

स्वामिन् श्रीरामानुज! यध्यपि मन, वाक्, काय तीनों करण आपकी सेवा में लगाने ही के लिए बनाये गये हैं, तथापि अभागा मैं उनसे भगवदपचार, भागवतापचार एवं असह्यापचार तीन तरह के अपचारों को कराते हुए जीता था| आपके हृदय को दु:ख पहुँचाते हुए यध्यपि मैं रहता था, फिर भी मैं ऐसा ढोंगी बन कर समय बिताता था, मानो आपकी प्रीति के कारण ही काम कर रहा हूँ| यह था मेरी मूर्खता|

त्रिविधपचारान् तीन प्रकार के अपचारों में;

भगवदपचार – सर्वेश्वर को भी देवतान्तरों के समान मानना, रामकृष्ण आदि अवतारों को यह समझना की वे भी हमारे जैसे मनुष्य ही हैं, अर्चावतार में मूर्ति के उपादान द्रव्य का विचार करना आदि|

 भागवतापचार – अहंकार से तथा अर्थ और काम से प्रेरित होकर श्रीवैष्णवों के प्रति किये जाने वाले अपराध|

 असह्यापचार – पूर्वोक्त प्रकार से अर्थ कामों से प्रेरित न होकर, हिरण्यकशिपु की तरह भागवद्विषय एवं आचार्यापचार भी असह्यापचार कहलाता है || १० ||

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Arththi prabandham – 5

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SrI:  SrImathE SatakOpAya nama:  SrImathE rAmAnujAya nama:  SrImath varavaramunayE nama:

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ramanujar-mamunigalemperumAnArmAmunigaL

Introduction

In the previous pAsuram, maNavALa mAmunigaL used the phrase “uNarndhu pAr” towards SrI rAmAnuja that means “please ponder over it”. The continuation to this pAsuram comes in the form of a question as to what makes maNavALa mAmunigaL tell SrI rAmAnuja with such an authority. What relationship does he share with SrI rAmAnuja? Why should SrI rAmAnuja consider the case of maNavALa mAmunigaL as “inevitable” and take his case for granted? This pAsuram answers that question. maNavALa mAmunigaL firmly says that he is the son of SrI rAmAnuja and that is the relationship that guarantees the inevitable nature of his case.

pAsuram 5

than pudhalvan kUdAmal thAn pusikum bhOgaththAl
inburumO thandhaikku ethirAsA – un pudhalvan
anRO yAn uraiyAy AdhalAl un bhOgam
nanRO enai ozhindha nAL

Word-by-Word Meanings:

ethirAsA – Oh emperumAnArE!!!
thandhaikku – For a father
inburumO – does he get any happiness when
than – his
pudhalvan – son
kUdAmal – is not there with him
thAn – and he alone (the father)
pusikum – enjoys
bhOgathAl – the luxuries like wealth etc
un – You  (my father)
yAn – and I
pudhalvan – am your son , as you are my father.
anRO – Is this not true?
uraiyAy  – Please tell me.
AdhalAl – Hence
un – your
bhOgam – enjoyment on
nAL – the day when (you)
ozhindha – are without
enai – me
nanRO – will it give you happiness?

Simple Translation:

maNavALa mAmunigaL gives an analogy in this pAsuram. Would a father while alone, separated from his son, be able to enjoy the luxuries of life all by himself? Will he not be always thinking about the son who is far away? Certainly he will and this will make him unable to enjoy the luxuries and make him yearn to be with the son. maNavALa mAmunigaL asks Sri rAmAnuja that he is his son and questions whether he (SrI rAmAnuja) is getting any kind of happiness in paramapadham while his son (maNavALa mAmunigaL) is still suffering here.

Explanation

There is a father whose dear son is in some land far away. In this situation, will this father be able to solely enjoy the luxuries that includes wealth etc., that is in front of him? maNavALa mAmunigaL asks SrI rAmAnuja, “Oh!!! The leader of yathIs (sanyAsis)!!! In a similar fashion, adiyen is like a son to you inevitably” (as per the SrI sUkthi “kariyAn brahmatha pithA”). maNavALa mAmunigaL continues “Oh! emperumAnArE!!! Please confirm this relationship of father and son. This relationship is inherently natural. Hence, the luxuries that is described as “kattezhil vAnavar bhOgam (thiruvAimozhi 6.6.11)”, will that be enjoyed by you on the day when you did lose me? Adiyen (maNavALa mAmunigaL) does know that you will not be able to enjoy the luxuries in paramapadham as you are separated from me, your son. Hence, adiyEn requests you to kindly take me into your fold.

adiyEn santhAna rAmAnuja dAsan

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