अष्ट श्लोकी – श्लोक 7 – 8- चरम श्लोक

श्री:
श्रीमते शठकोपाये नम:
श्रीमते रामानुजाये नम:
श्रीमदवरवरमुनये नम:

अष्ट श्लोकी

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githai-karappangadu-wrapperअंतिम 2 श्लोक, चरम श्लोक का वर्णन करते है, जो भगवान द्वारा कहा गया है ।

श्लोक 7

मत्प्राप्यर्थतया मयोक्तमखिलम संत्यज्य धर्मं पुन :
मामेकं मदवाप्तये शरनमित्यार्तोवसायम कुरु ।
त्वामेवम व्यवसाययुक्तमखिलज्ञानादिपूर्णोह्यहं
मत्प्राप्तिप्रतिबन्धकैर्विरहितम कुर्यां शुचं मा कृतः ।।

अर्थ

मेरी प्राप्ति हेतु, मेरे कहे अनुसार अन्य सभी उपाय (कर्म, भक्ति ,ज्ञान योग) को छोड़कर, केवल मेरी शरण को ही अपना उपाय मानकर, निश्चिन्त होकर, दृढ़ विश्वासित रहो। इस दृढ़ विश्वास के रहने पर, मैं, अपने ज्ञान एवं कल्याण गुणों के द्वारा, इस मार्ग में उत्पन्न होने वाले सभी विरोधि तत्वों से तुम्हें मुक्त करूँगा और मोक्ष प्रदान करूँगा।

श्लोक 8

निश्चित्य त्वदधीनतां मयी सदा कर्माध्युपायान् हरे
कर्तुमं त्यक्तुमपि प्रपत्तुमनलम सिद्धामी दुःखाकुल:।
एतज्ज्ञानमुपेयुषो मम् पुनस्सर्वापराधक्षयम्
कर्तासीति दृदोस्मि ते तु चरमं वाक्यं स्मरन् सारथे: ।।

अर्थ

हे प्रभु! मैं अपने कर्मों को न उत्तम प्रकार से निभा पाने में समर्थ हूँ, न ही उन्हें त्यागकर आपकी शुद्ध शरणागति करने में समर्थ हूँ। मैं इस शोक से अत्यंत दुखी हूँ। क्यूंकि आपने अपनी कृपा से मुझे यह भाव और ज्ञान प्रदान किया है तों में आश्वस्त हूँ कि आप चरम श्लोक में कहे अनुसार ही आप मेरे अज्ञान, दोष और अन्य बाधाओं को हटाकर मेरी रक्षा करेंगे और मुझे अपनाएंगे।

अष्ट श्लोकी यहाँ संपन्न होती है।

श्रीआलवारों के चरणकमलों में शरण लेता हूँ
श्रीआलवन्दार के चरणकमलों में शरण लेता हूँ
श्रीरामानुज स्वामीजी के चरण कमलों में शरण लेता हूँ
श्रीवरवरमुनि स्वामीजी के चरण कमलों में शरण लेता हूँ

– अडियेन प्रीती रामानुज दासि

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