यतिराज विंशति – श्लोक – ६

श्रीः
श्रीमते शठकोपाय नमः
श्रीमते रामानुजाय नमः
श्रीमद् वरवरमुनय् नमः

यतिराज विंशति     

 श्लोक  ५                                                                                                                                   श्लोक  ७

श्लोक  ६

अल्पापि मे न भवदीयपदाब्जभक्तिः शब्दादिभोगरुचिरन्वहमेधते हा।
मत्पापमेव हि निदानममुष्य नान्यत् तद्वारयार्य यतिराज दयैकसिन्धो ॥ ()

दया एक सिंधो यतिराज  :  सागर जैसा अनंत होते हुए भी अतुलनीय दया रखनेवाले यतिराज
आर्य:                            :  आचार्य
मे                                 : मुझे
भवदीयपदाब्जभक्तिः    :  आपके चरणों में भक्ति
अल्पापि मे न                : लेश मात्र नहीं
शब्दादिभोगरुचि            : रूप , रस, स्पर्श, गन्द जैसे अल्पतर वासनाओं से पीड़ित
अंनवहम  एधते             : प्रतिदिन बढ़ता जाता है
हा                                : हाय (शोक और आश्चर्य से)
अमुष्य निदान              :  धार्मिक चिन्तनों से वियुक्तः अल्पतर विषयों से आकर्षित होने वाले इस स्थिति का मूल कारण
मत्पापमेव                   :  मेरा स्वयं अर्जित पापों ही
अन्यत न                    : और कुछ / कोई भी नहीं
तद वारय                    : उस पापों से विमोचन दीजिये

चौथाई श्लोक में प्रार्थना किये थे कि प्रतिदिन अपने मन श्री रामानुजाचार्य के दिव्य स्वरुप में ही लगाते रहेँ | लेकिन इस श्लोक में अपना मन अभी भी उसके विरुद्ध अन्यत्र विषयों में भटकते रहने को इंगित करते हैं | इस विपरीत स्थिति को हटाने के लिए इस श्लोक में उसका मूल कारण होने वाले अपने असंख्य पापों को हटाने की प्रार्थना करते हैं |

दया माने – अन्यों का कष्ट देख्कर निस्स्वार्थ उससे दुखी होना | श्री रामानुजाचार्य उस दया स्वभाव का सागर होते हैं | “अतुलनीय” का गोपनीय अर्थ होता है कि भगवान श्रीमन नारायण का दया को भी कोई सीमा होगा लेकिन श्री यतिराज के दया का कोई सीमा नहीं |

आर्य माने –

  1. आचार्य शब्ध के समानार्थक मानकर तत्व, हित , पुरुषार्थ को स्पष्टीकरण करनेवाले यानि मोक्षप्राप्ति कारणात्मक श्री रामानुजाचार्य !
  2. “आराध याति इति आर्य” – इस व्युत्पत्ति से वेद में नियमित धर्मी पथ के पास और उससे विरुद्ध अधर्मी पथ से दूर लेनेवाले श्री रामानुजाचार्य!
  3. अरयते – प्राप्यते – सर्व जनों से पुरुषार्थ स्वरूप में प्राप्य लायक श्री रामानुजाचार्य !

हा (शोक और आश्चर्य) माने –

  • शोक का कारण – धार्मिक चिन्तनों से वियुक्तः अल्पतर विषयों से आकर्षित होने वाले स्थिति
  • आश्चर्य का कारण – सीमित सुख देनेवाले शब्दादि विषयों में प्रीति और असीमित सुख देनेवाले यतिराज से अप्रीति करना

मत्पापमेव ही  निदान माने – जो कोई लोग भक्तिमान बन जाते हैं, उनका मोक्षप्राप्ति के लिए भगवान उनका पाप को उनके विरोधियों से लदवाते हैं | मामुनिजी कहते हैं कि उनका पाप ऐसे वाले पाप नहीं जो भगवान अपने स्वतंत्रा से या मुझसे खेलने के लिए लाद लिया गया है, मगर वो सब स्वयं अर्जित किया पाप है | इसका कारण और कोई व्यक्ति या भगवान नहीं |

archived in http://divyaprabandham.koyil.org
pramEyam (goal) – http://koyil.org
pramANam (scriptures) – http://srivaishnavagranthams.wordpress.com
pramAthA (preceptors) – http://acharyas.koyil.org
srIvaishNava education/kids portal – http://pillai.koyil.org

 

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *