Daily Archives: April 2, 2016

यतिराज विंशति – श्लोक – ५

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श्रीः
श्रीमते शठकोपाय नमः
श्रीमते रामानुजाय नमः
श्रीमद् वरवरमुनय् नमः

यतिराज विंशति     

श्लोक  ४                                                                                                                श्लोक  ६

श्लोक  ५

अष्टाक्षराख्वय मनुराजपदत्रयार्थ निष्ठां ममात्र वितराध्य यतीन्द्र नाथ !
शिष्टाग्रगण्य जन सेव्यभवत्पदाब्जे हृष्टाऽस्तु नित्यमनुभूय ममास्य बुद्धि: ||

नाथ यतीन्द्र !                    : हे यतिराज
अष्टाक्षराख्य मनुराज        : अष्टाक्षर नामक मूल मन्त्र के
पद त्रयार्थ निष्ठां                : तीन पदों में क्रमश: संगृहीत अनन्यार्हशेषत्व, अनन्यशरणत्व तथा अनन्यभोग्यत्व की निष्ठा को
ममात्र अध्य वितर             : आज यहाँ मुझे प्रदान कीजिये |
असि मम बुद्धि:                 : इस मुझे नीच की बुद्धि
शिष्टाग्रगण्य जनसेव्य      : शिष्टाग्रणी लोगों के द्वारा सेवित आपके चरण कमालों का
भवत्पदाब्जे
नित्यं अनुभूय हृष्टा अस्तु  : नित्य अनुभव कराते हुए प्रसन्न हो |

पिछले श्लोक में कैंकर्य करने की जो प्रार्थना की गई थी उसी की पुष्टि में अष्टाक्षर मन्त्र का स्मरण इस श्लोक में किया गया है| इस श्लोक में यह प्रार्थना के गई है कि अष्टाक्षर मन्त्र में जिन निष्ठाओं का उल्लेख है, वे प्राप्त हों|

मनु मन्त्र का पर्यायवाचक शब्द है| अत: मनुराज से मन्त्रराज अर्थ प्रकट होता है | सम्प्रदाय में अष्टाक्षर को मन्त्रराज और द्वय को मन्त्ररत्न कहने की परिपाटी है| मन्त्रराज में प्रणव, नम: और नारायणाय ये तीन पद हैं | यध्यापि प्रणव का विश्लेषण करने पर आ, उ और म भी तीनों अलग अलग तीन पदों का रूप ग्रहण कराते हैं तथापि यहाँ पर प्रणव को उक्त पद के रूप में ही ग्रहण किया गया है| ‘नाम:’ को भी विभक्त कर दो पद कहे जा सकते हैं किन्तु यहाँ पर एक ही पद है| नारायण तो एक पद है ही| इन तीन पदों में क्रमश: अनन्यार्हशेषत्व, अनन्यशरणत्व और अनन्यभोग्यत्व के भाव प्राप्त होते हैं| ये मुमुक्षु के लिए परम ज्ञातव्य हैं| मुमुक्षुप्पडि आदि रहस्य ग्रन्थों में इनका वर्णन है| इन निष्ठाओं के लिए ही यहाँ पर यतिराज से प्रार्थना की गई है| अनन्यशेषत्व, उपायान्तरप्रवृत्ति एवं भोग्यांतरप्रावण्य की संभावना भी न हों यही प्रार्थना है|

अर्थ और अध्य अर्थात् यहाँ व आज के लिए इन निष्ठाओं को सीमित कर आँय देश काल में देने का विचार दूर किया हैं| आँय देश काल में ये होंगी ऐसा कह कर प्रार्थना को टाला नहीं जा सकता|

श्रीपरकाल ने मन्त्रराज की व्याख्या कराते हुए बताया है कि इसमें भागवतशेषत्व की भावना प्रधान प्रमेय है| श्लोक के उत्तरार्ध में उसको अपनाने के लिए अभिलाषा प्रकट की गई है| आचार्य सार्वभौम भागवतोत्तम हैं| उनके शेषत्व के लिए प्रार्थना, इस श्लोक का लक्ष्य है| अंत में कहा गया है कि शिष्टाग्रणी अनन्त आल्वान् आदि महानुभावों के द्वारा यतिराज के चरणों की सेवा होती है| उन चरण कमलों के नित्यानुभव की प्रार्थना यहाँ पर की गई है| उक्त श्लोक में यतिराज से यह भी प्राथना की गई है कि अष्टाक्षर में निहित तीनों प्रकार की निष्ठायें भगवान श्रीमन्नारायण के अलावा आपके प्रति भी स्थिर हों || ५ ||

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यतिराज विंशति – श्लोक – ४

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श्रीः
श्रीमते शटकोपाय नमः
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यतिराज विंशति     

श्लोक  ३                                                                                                                           श्लोक  ५

श्लोक  ४

नित्यं यतीन्द्र! तव दिव्यवपुस्स्मृतौ मे सक्तं मानो भवतु वाग्गुण कीर्तनेऽसौ |
कृत्यं छ दास्यकरणं तु करद्वयस्य वृत्तयंतरेऽस्तु विमुखं करणत्रयं च ||

यतीन्द्र! में मन: नित्यं          : हे यतिराज! मेरा मन सदा
सक्त दिव्यवपु:स्मृतौ           : आपके दिवि रूप के चिन्तन में
तव गुणकीर्तन सक्ता भवतु  : आपके गुणानुवाद के गाँ करने में लगी रहे
कर द्वययस्य कृत्यं             : दो हाथो का कार्य
तव दास्य करणं भवतु         : आपकी सेवा करना हो,
करणत्रयञ्च                       : इस प्रकार मन, वाणी और शरीर
वृत्त्यन्तरे विमुख अस्तु      : आँय व्यापार से विमुख हों |

इस श्लोक में आचार्य ने यह इच्छा प्रकट की है की मन, वाणी और शरीर यतिराज की सेवा में लगे रहें| मन यतिराज के दिव्य रूप के चिन्तन में लग जाय| वाणी उनके गुणानुवाद में अनुरक्त हो जाय| हाथ उनकी सेवा में लग जायँ| और किसी कार्य में मन वाणी तथा शरीर न लगें यह अभिलाषा आचार्य ने श्लोक के अंतिम चरण में व्यक्त की है|

श्री एम्बार के एक पध्य से भी प्रथम पाद का भाव प्रकट होता है| आचार्य ने भी “आर्तिप्रबंध” में ऐसा ही भाव वर्णन किया है| अन्य स्थलों पर भी ऐसी उक्तियाँ मिलती हैं| दूसरे पाद में आत्मसम्बन्धी गुणों का कीर्तन करने की बात काही गई है| ये गुण हैं दया, क्षांति, उदारता आदि| इनमें दया की प्रधानता है| आँय सारे गुण इसी में सामाविष्ट हो जाते हैं| इसके साथ-साथ वात्सल्य, सौशील्य आदि गुणों का कीर्तन भी यहाँ पर अभीष्ट है| तृतीय पाद में कोई कोई ‘दास्य करण’ के स्थान पर दास्यकरणे पाठ करते हैं| वास्तव में शुद्ध पाठ दास्यकरणं ही है| ‘दास्यकरणं कृत्यं भवतु’; इस तरह समानाधिकरण से अन्वय ही ठीक होगा|

यहाँ पर यह शङ्का हो सकती है कि यतिराज के रूप एवं गुणों का चिंतन – कीर्तन आज किया जा सकता है किन्तु यतिराज की सेवा प्राप्त नहीं हो सकती, क्योंकि उनके वैकुण्ठधाम वापिस गए इतना समय व्यतीत हो गया| इसका समाधान यही है कि यहाँ पर यतिराज की मूर्तियों की सेवा करने का भाव ग्रहण करना होगा| श्लोक के पहिले तीन पादों मेम जो कुक अन्वय रूप से कहा गया है वही चतुर्थ पाद में व्यतिरेक रूप से कहा गया है || ४ ||

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यतिराज विंशति – श्लोक – ३

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यतिराज विंशति     

श्लोक २                                                                                                                         श्लोक ४

श्लोक  ३

वाचा यतीन्द्र! मनसा वपुषा च यष्मत्पादारविंदयुगलं भजतां गुरूणाम्
कूराधिनाथ कुरूकेश मुखाध्यपुंसां पादानुचिंतन परस्सततं भवेयम् ||

हे यतीन्द्र !                                      : हे यतिराज
मनसा वाचा वपुषा च                       : मन, वाणी एवएं कर्म से
युष्मत् पादारविन्द युगलं                 : आपके दो चरणकमलों की
भजताम् गुरूणाम्                            : सेवा करने वाले गुरूओं के
कूराधिनाथ कुरूकेश मुखाध्यपुंसाम्   : जिनसे कूराधीश, कुरूकेश आदि प्रधान हैं
पादानुचिंतनपर:                              : चरणों का चिन्तन  करने वाला
सततं भवेयम्                                 : निरंतर होऊँ |

श्रीरामानुजनूत्तंदादी के एक पध्य को जिसका भाव ऐसा ही है, ध्यान में रखकर आचार्य ने इस श्लोक की रचना की है| श्रीरामानुज के चरणकमलों की स्तुति करने की अपेक्षा उनके भक्तों के चरणकमलों की स्तुति करना बढ़ कर है, यही उक्त गाथा का सारांश है| इस श्लोक से भी यही प्रकट होता है| भगवान को प्रसन्न करने के लिए सीधे भगवान की स्तुति न कर भगवद्भक्तों की स्तुति करना शास्त्रीय मार्ग है| उसी प्रकार यहॉँ भी समझ लेना होगा|

मनसा वाचा वपुषा भजताम् – यतिराज की मन, वाणी एवं अनुष्ठान के द्वारा भक्ति करने वाले थे श्रीकूरेश, श्रीकुरूकेश्वर आदि महानुभाव, मन से वे यतिराज के दिव्य गुणों का चिन्तन कराते थे तथा उनके दिव्यमंगलविग्रह का ध्यान करते थे| वाणी से वे यतिराज की स्तुति करते थे| अपनी देह के द्वारा वे यतिराज की सेवा करते थे| ऐसे महानुभावों का चिन्तन करने से वैसी ही भावना का आविर्भाव होगा जैसी कि उनके हृदय में थी| इस श्लोक में वैयाकरण ऐसी शंका कर सकते हैं कि ‘युष्मत्पादारविंद’ के स्थान पर त्वत्पादारविंद होना चाहिए था किन्तु आचार्य श्रीपराशरभट्ट ने अपने श्रीगुणरत्नकोश के अन्तिम श्लोक में ऐसा ही शब्द प्रयोग उपस्थित कर आचार्य को मार्ग प्रदर्शित किया था| “युष्मत्पादसरोरूहांतररज: स्याम त्वमम्बा पिता|” अत: ऐसे शब्द प्रयोग में आचार्य अपने पूर्वाचार्यों के ही अनुगामी थे ||३||

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यतिराज विंशति – श्लोक – २

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यतिराज विंशति     

श्लोक १                                                                                                                                         श्लोक  ३

श्लोक 

श्री रङ्गराज चरणाम्बुज राजहंसं श्रीमत्परांकुश पदाम्बुज भृंगराजम् ।
श्रीभट्टनाथ परकाल मुखाब्जमित्रं श्री वत्सचिह्नशरणं यतिराजमीड़े ॥ २ ॥

श्री रङ्गराज चरणाम्बुज राजहंसं    : श्री रङ्गनाथ भगवान के चरणकमलों  के राजहंस
श्रीमत्परांकुश पदाम्बुज भृंगराजम्  : श्रीशठकोपमुनि के चरणकमलोंके भ्रमर
श्रीभट्टनाथ परकाल मुखाब्जमित्रं    : श्री विष्णुचित्त श्री परकाल आदि आल्वारोंके मुख कमल खिलानेवाले सूर्य
श्री वत्सचिह्नशरणं                      : श्रीवत्सचिह्नमिश्र के आश्रयभूत
यतिराजम्                                   : श्री रामानुज मुनि की
ईडे                                              : स्तुति करता हूँ

पिछले श्लोक में नतमस्तक होकर प्रणाम करने की बात कही गई। इस श्लोक में वाणी को सफल करने के लिए स्तुति करने की बात कही गई है। श्रीरामानुज मुनि की उपमा राजहंस एवं भ्रमर को संदेशवाहक बताया है। यहाँ पर आचार्य श्रीरामानुज को वही उपमा दी गई है।

श्रीरंगराज चरणाम्बुज राजहंसम् – जैसा कि जीवनवृत से ज्ञात होता है आचार्य श्रीरामानुज का श्रीरंगनाथ भगवान के प्रति विशेष अनुराग था। साथ ही श्रीरंगनाथ ने भी शरीर रहते तक श्रीरंगनगर में निवास करने का आदेश दे कर अपना विशेष अनुग्रह प्रदर्शित किया था। जिस प्रकार राजहंस कमल के समीप निवास करता है उसी प्रकार यतिराज श्रीरंगनाथ भगवान के चरणों में निवास करते थे। राजहंस के सारे गुण यतिराज में मिलते है। जिस प्रकार हंस दूध और जल को अलग – अलग करने की शक्ति रखता है , उसी प्रकार यतिराज में सार एवं असार को पृथक़् –पृथक़् करने की शक्ति है। हंसावतार भगवान ने वेदों का उपदेश दिया , यतिराज भी शिष्यों को उपदेश देते थे। राजहंस कीचड़ से प्रेम नहीं करता , उसी प्रकार परमहंस परिव्राजकाचार्य श्रीरामानुज का संसार से प्रेम नहीं था। हंस स्त्रियों का अनुकरण करता है। यतिराज ने चेतन जीवों के पुरषकार भी अपेक्षित है। श्रीवेदान्तदेशिक स्वामीजी ने ‘दते रंगी निजमपि पदं देशिकादेशकांक्षी’  कहकर इसको बतलाया है।

श्रीमत्परांकुश पदाम्बुज भृंगराजम् – पिछले श्लोक में ‘ परांकुशपादभक्त ’ कहकर स्वरूपयुक्त दास्य का निर्देश किया गया था। इस श्लोक में गुणप्रयुक्त दास्य का उल्लेख किया गया था। कमल की मधुरिमा से भ्रमर आकर्षित होता है। उसी प्रकार आलवार श्रीशठकोप के चरणों को अमृतप्रापकत्व समझ कर यतिराज उधर आकर्षित हुए। भ्रमर चंचरीक है। वह एक स्थान पर ही सीमित नहीं रहता। उसी प्रकार यतिराज भी विभिन्न दिव्यदेशों में उपस्थित हो कर भगवान का अनुभव किया करते थे। श्री शठकोप के पद्यों को भी परांकुश पद कहा जा सकता है। अतः पद से सहस्त्रगीति का संकेत मानने पर यह अर्थ निकलता है कि श्रीशठकोप की सूक्तियों में भगवत्सम्बन्धी जो माधुर्य है उसको यतिराज भ्रमर की तरह ग्रहण करते हैं।

श्रीभट्टनाथ परकाल मुखाब्जमित्रम् – आलवार श्रीविष्णुचित एवं आलवार श्रीपरकाल के मुख कमल को विकसित करनेवाले सूर्य कहने का तात्पर्य यह है की जिस प्रकार श्रीविष्णुचित ने श्रीमन्नारायण का परत्व स्थापित किया उसी प्रकार उसी मार्ग से श्रीरामानुज ने परतत्व की सिद्धि की। श्रीपरकाल स्वामीजी ने मन्दिर, गोपुर, मण्डप आदि निर्माण कर दिव्यादेशों की सेवा की। श्रीरामानुज भी वही करते हैं जिससे परकाल संतुष्ट होते हैं। यहाँ पर ‘मुख’ शब्द से यह भाव भी निकलता है कि श्रीविष्णुचित्त एवं श्रीपरकाल स्वामीजी जिन आलवारों में प्रमुख हैं उन सभी आलवार रूपी कमलों को विकसित करने वाले सूर्य श्रीरामानुज हैं।

श्रीवत्सचिह्न शरणम् – श्रीभाष्यकार की शिष्य मण्डली में श्रीवत्सचिह्नमिश्र के सम्बन्ध में विशेष रुप से इस विशेषण का वर्णन क्यों किया गया है ? वस्तुतः उनमें यतिराज के प्रति विशेष प्रेम था जिसके फलस्वरूप उनको यतिराज का चरण स्थानीय माना जाता है। शिष्य दाशरथि में भी यह विशेषता थी। श्रीमद्वरवरमुनि ने यहाँ पर उनका उल्लेख किया है। ‘चरणं’ यह भी पाठ है ॥ २ ॥

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यतिराज विंशति – श्लोक – १

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श्रीमद् वरवरमुनय् नमः

यतिराज विंशति     

तनियन्                                                                                              श्लोक  २

 

श्लोक १                                                      

श्रीमाधवाङ्घ्रि जलजद्वयनित्यसेवा प्रेमाविलाशयपरांकुश पादभक्तम् ।
कामादि दोषहरमात्म पदाश्रितानां रामानुजं यतिपतिं प्रणमामि मूर्ध्ना ॥ १ ॥

श्रीमाधवाङ्घ्रि जलजद्वय                : भगवान के कमल रूपी चरणों की
जलजद्वयनित्यसेवा प्रेमाविलाशय  : नित्य सेवामें प्रेम से जो व्याकूलित हैं
परांकुश पादभक्तम्                        : ऐसे श्री शठकोप मुनि के चरणोंके भक्त
आत्म पदाश्रितानाम्                       : अपने चरणोंका आश्रय लेने वालों के
कामादि दोषहरं                              : काम आदि दोषोंकों नष्ट करने वाले
यतिपतिं रामानुजं                          : यतिराज श्री रामानुज मुनि को
मूर्ध्ना प्राणमामि                            : सिर से प्रणाम करता हूँ ।

श्रीशठकोप मुनि के चरणों के अनुरागी, अपने चरणानुरागियों के दोषों का निवारण करने वाले श्री रामानुज मुनि को प्रणाम करता हूँ। यद्यपि श्री रामानुज मुनि में उनकी महत्ता को व्यक्त करनेवाली अनेकों विशेषतायें मिलती हैं तथापि उन सब में उनका श्रीशठकोप मुनि के चरणों का रसिक होना बढ़ कर है। श्रीरग़ांमृत कवि एवं आचार्य हृदयकार ने इसका उल्लेख किया है। श्रीमद्वरवरमुनी ने  परांकुशपादभक्तम् कह कर इसी का निर्देश किया है।

श्री शठकोप मुनि कैसे थे ? इस प्रश्न का उत्तर श्लोक के पूर्वार्ध में मिलता है। भगवान के चरण कमलों को ही वे अपना परम प्राप्तव्य समझते थे। उनमें उनकी सतत प्रेमव्याकुलता थी। कर्म जनित व्याकुलता हेय होती है। चरणों की उपादेयता का संकेत यहाँ पर हैं। श्रीवचनभूषण और उसकी व्याख्या में बताये गये सिद्धोपाय का यहाँ पर स्मरण किया जा सकता है।

इस श्लोक में ‘ परांकुश ’ नाम से श्री शठकोप मुनि का उल्लेख किया गया है। ‘ परांकुश ’ शब्द की व्युत्पति दो प्रकार की होती है। पर अर्थात दूसरे लोगों के अंकुश तथा पर अर्थात परमतत्व के अंकुश। दूसरे लोगों से तात्पर्य उन लोगों का है जो परमात्मा परमतत्व को निर्गुण, निराकार एवं विभूतिहीन समझते हैं। श्री शठकोप अपनी दिव्य सूक्तियों के द्वारा उन पर अंकुश के रूप में स्थित हैं और उनकी प्रतिगामिता को रोकते हैं। परात्पर भगवान के अंकुश होने का तात्पर्य यह है कि उनकी भक्ति से प्रसन्न होकर भगवान स्वयं उनके वशीभूत हैं। यह श्रीशठकोप मुनि ने सहस्त्रगीति में स्वयं स्वीकार किया है।

श्लोक के उत्तरार्ध का आरम्भ कामादि दोषहर  से हुआ है। ‘आदि’ से क्रोध, लोभ, मोह, मद, मात्सर्य, अज्ञान, असूया अभिप्रेत है। ‘कामादि हरम्’ न कह कर ‘कामादि दोष हरं’ कहने का तात्पर्य यह है कि नियमित कामना दोष नहीं। नियमानुकूल विहित कामना का प्रवेश गुणों कि कोटी में होता है। भगवान के सम्बन्ध में कामना, भगवान एवं भागवतों के विरोधी के प्रति क्रोध, मात्सर्य आदि गुण हैं, दोष नहीं। काम आदि दोषों के निवारण का सामर्थ्य होने के कारण ‘दोष हरं’ कहा गया है। नतमस्तक होकर प्रणाम करने कि बात ‘मुर्ध्ना प्रणमामि’ से व्यक्त होती है। मस्तक झुकाने के प्रयोजन आलवार – सूक्तियों में वर्णित हैं ॥ १ ॥

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