यतिराज विंशति – तनियन (ध्यान श्लोक)

श्रीः
श्रीमते शटकोपाय नमः
श्रीमते रामानुजाय नमः
श्रीमद् वरवरमुनय् नमः

यतिराज विंशति                                                                                         श्लोक १

 yathirajarइस प्रकार श्री देवराज स्वामीजी ने पूर्व दिनचर्या में अपने आचार्य श्री वरवरमुनि स्वामीजी के दिनचर्या में अभिगमनम्, उपादानम्, एज्ज्याई का अनुभव किया।

अब वें श्री वरवरमुनि स्वामीजी की चौथी दिनचर्या स्वाध्याय का अनुभव करते हैं। अनेक स्वाध्यायोंमेसे एक प्रकार है जिसमें पूर्वाचार्योंके ग्रंथोंके आधारपर शिष्योंकों कालक्षेप दिया जाता है। इसका उल्लेख उत्तर दिनचर्या श्लोक क्रमांक १ में किया गया है, “वाक्यालंकृति वाक्यनं व्याक्यादरम्”। परंतु यतिराज विंशति (जो श्री रामानुजाचार्य के प्रति के समर्पण भाव को दर्शाता है) के संबंधमें सोचते हुये श्री देवराज स्वामीजी यह स्तोत्र दोहराते हैं।

श्री शठकोप स्वामीजी “प्रपन्नजनकुटस्थ” कहलाते हैं, जिसका अर्थ है श्री शठकोप स्वामीजी प्रपत्ति के अवलंब में मूल पुरुष हैं, जो यह प्रतिपादन कराते हैं की मोक्ष का भगवान ही एकमात्र उपाय हैं। श्री वरवरमुनी स्वामीजी, जो सबके आराध्य हैं, उन्हे श्री शठकोप स्वामीजीसे प्रारम्भ कर अपने आचार्य श्री शैलेश स्वामीजी तक के गुरूपरंपरा का ज्ञानपूर्वक उपदेश प्राप्त हुवा।

तीन रहस्य जैसे मूलमंत्र, द्वयमंत्र, और चरममंत्र का मूल आशय है की भगवद रामानुज ही उपाय और उपेय हैं। इस प्रकार के अविरत भक्ति से श्री वरवरमुनी स्वामीजी ने लोगोंकों जन्म मरण के चक्र से छुड़ानेकी प्रबल इच्छा से यतिराज विंशति नामक स्तोत्र की रचना की। स्तोत्र लिखते समय कोई रुकावट ना आए इसलिए उन्होने श्री यतिराज के प्रति प्रथम २ श्लोक निवेदन किए।

यह रचना रहस्यत्रय के सार को प्रगट करती है। व्याख्यानकर्ता श्री अन्नाप्पंगार स्वामीजी के अनुसार हम देख सकते हैं की यतिराज विंशति स्तोत्र में २० शब्द हैं – ३ शब्द मूलमंत्र के लिए, ६ शब्द द्वयमंत्र के लिए, और ११ शब्द चरमश्लोक के लिए। विंशति का अर्थ है २०।

तनियन्

य: स्तुतिं यतिपति प्रसादनीं व्याजहार यतिराज विंशतिम्।
तं प्रपन्नजन चातकांबुजं नौमी सौम्य वरयोगी पुंगवम्॥

य:  – जो भी, यतिपति प्रसादनीं  – यतिराज से कृपा की प्रार्थना करता है, यतिराज विंशतिम्  – यतिराज के बारेमें रचित २० श्लोक,  स्तुतिं – स्तुति, व्याजहाररचना की, प्रपन्नजन चातकांबुजं  – चातक के समान प्रपन्न जन, तं वरयोगी पुंगवम्  – वरवरमुनी स्वामीजी, नौमी  – आराधना करते हैं

इस तनियन की रचना श्री देवराज स्वामीजी ने की है। “यतिपति प्रसादनीं” का अर्थ है, जो भी इस स्तोत्र का अनुसंधान करेगा उसे श्री रामानुज स्वामीजी की कृपा प्राप्त होगी। “प्रपन्नजन चातकांबुजं” का अर्थ है श्री रामानुज स्वामीजी उस घन की तरह हैं जो चातक पक्षी के लिए जल वर्षा करते हैं। श्री रामानुज स्वामीजी शरणागतोंकी सहायता करते हैं। “वरयोगी पुंगवम्” श्री वरवरमुनी स्वामीजी को दर्शाता है।

devaraja swami

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