श्री देवराज अष्टकम् – श्लोक

श्री:
श्रीमते शठकोपाये नम:
श्रीमते रामानुजाये नम:
श्रीमद्वरवरमुनये नम:

thirukkachi-nambi-kanchi varadhar-3

श्लोक 1

नमस्ते हस्त्भी शैलेष ! श्रीमन ! अम्भ्जलोचन !
शरणं त्वां प्रपन्नोस्मी प्रणतार्ति हराच्युत ! ।।

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हे हस्तगिरी नाथ! श्रीपति! अरविंदाक्ष! आपके चरणों में प्रणाम है। आप उनके दुखों का नाश करते है, जो आपके चरणों की आराधना करते है। आप अच्युत है, अपने दासों की सदा रक्षा करने वाले। मैं आपके चरणों में आश्रय लेता हूँ।

श्लोक 2

समस्त प्राणी संत्राण प्रवीण करुणोलबण
विलसंतु कटाक्षास्ते मय्यस्मिन जगतांपते ।।

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आप सभीजन की रक्षा करने में पुर्णतः सक्षम, दया/ कृपा से परिपूर्ण, इस जगत के एक मात्र रक्षक है। आपकी कृपामय दृष्टि मुझ पर भी अनुग्रहित हो।

श्लोक 3

निन्दिताचार करणं निवृत्तम कृत्य कर्मण:
पापियांसं अमर्यादम् पाहिमाम् वरद प्रभो! ।।

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हे देवराज! उत्तम मनुष्यों द्वारा निषेध कार्यों को करनेवाला, अपने विहित कर्तव्यों को न करनेवाला, अपराधो में लिप्त और अनुशासनहीन मेरी, कृपया आप रक्षा करें।

श्लोक 4

संसार मरुकांतारे ध्रुव्याधि व्याग्र भीषणे
विषय क्षुद्र गुलमाद्ये तृषा दपशालिनी ।।

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श्लोक 5

पुत्र धार गृह क्षेत्र मृग तृषण्म्बू पुष्कले
कृत्या कृत्य विवेकान्दम परिभ्रान्तं इतस तथ: ।।

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श्लोक 6

अजश्रम जात तृष्णार्थ अवसंनांगमक्षमम्
विलसंतु कटाक्षास्ते मय्यस्मिन जगतांपते ।।

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श्लोक 7

संतप्तं विविदैर दु:खै: ध्रुवचैरेवमाधीभि
देवराज ! दयासिंधो देव देव जगतपते ।।

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श्लोक 8

त्वाधिक्षण सुधासिंधु विचि विक्षेपसिकरै
कारुण्य मरूतानितै शीतलैरभीशिन्चमाम् ।।

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इन पांच श्लोकों में वे अपनी स्थिति को उपमा के द्वारा दर्शाते है और देवराज भगवान से अपनी रक्षा की विनती करते है। यह जीवन एक मरुस्थल है। इस मरुस्थल में रोग भयावह व्याघ्र के समान है। यहाँ, तुच्छ सुख आदि काँटों के समान है। वासनाएं, पेड़ के समान है। पत्नी, संतान, घर, भूमि, संपत्ति आदि इस मरुस्थल में मृगजल के समान है। इस मरुस्थल में यह जाने बिना ही कि क्या करना चाहिए और क्या नहीं, मैं एक विक्षिप्त मनुष्य के समान भटक रहा हूँ, वह करते हुए जो नहीं करना चाहिए और उसे न करते हुए जिसे करना चाहिए, शरीर से दुर्बल, निर्बल/ क्षीण, मंद बुद्धि, सभी कार्यों में अयोग्य, आपके प्रति भक्ति से हीन, हे देवराज! दयासागर! देवो के देव! आप अपनी दया की शीतल पवन के द्वारा मेरी रक्षा करें, जो आपके आनंदायी रूप और आपकी प्रभूत कृपा की तरंगों से जल की बूंदों के समान बरसती है। मैं याचना करता हूँ कि आपकी यह कृपामयी दयादृष्टि मुझ पर भी हो।

-अदियेन भगवती रामानुजदासी

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