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ज्ञान सारं – पासुर (श्लोक) १९

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श्रीमते शठकोपाय नम:
श्रीमते रामानुजाय नम:
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ज्ञान सारं

ज्ञान सारं – पासुर (श्लोक) १८                                                               ज्ञान सारं – पासुर (श्लोक) २० 

पाशूर १९

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नल्ल पुदल्वर् मनैयाळ् नवैयिळ् किळै
इल्लम् निलम् माडु इवै अनैत्तुम् – अल्लल् एनत्
तोट्रि एरी तीयिर् सुडु मेल् अवर्क्कु एळिदाम्
एट्ररुम् वैगुन्दत्तु इरुप्पु

सार

अरुळाळ पेरुमाळ एम्बेरुमानार् स्वामीजी इस पाशूर मैं कहते हैं की जिन लोगों को अच्छे बच्चों, पत्नी ,संबंधियों ,घर ,ज़मीन को जलन के दर्द के समान लगता हैं,उन लोगों के लिए परमपाद का उच्चतम् निवास पाना बहुत ही सुलभ हैं |

शब्दशः अर्थ :

नल्ल पुदल्वर् – वह जिसके पास महान बेटा | मनैयाळ् नवैयिळ् किळै – पत्नी,अच्छे सम्बन्धि,| इल्लम् – परिपूर्ण घर | निलम् -समृद्ध और उपजा भूमि | माडु  – बहुत दूध देने वाली गाये हो |इवै अनैत्तुम्अल्लल् एनत् तोट्रि – लेकिन फिर भी इन सब बातों के साथ जिसे कोई अहंकार या लगाव न हो और वह अपने अन्तरंग हृदय से यह जनता हो की ये सब दर्द और पीड़ा के स्रोत हैं एरी तीयिर् सुडु मेल् अवर्क्कु एळिदाम् – और, धधकते आग में इन सब को छोड देता है एट्ररुम् वैगुन्दत्तु इरुप्पु – वही एक हैं जो कालातीत परमपद जाकर श्रीमन्नारायण भगवान के दूसरे भक्तों के साथ रहने का अधिकारी हैं ,वो भी अती सुलभता से | क्यूंकी यह कार्य तो अपने खुद के प्रयासों से प्राप्त करना असंभव हैं |

स्पष्टीकरण :

नल्ल पुदल्वर्: कुछ बच्चों की प्रशंसा हर कोई करता हैं क्यूंकी वे अच्छे गुणों से भरे होते हैं (सद्गुणि) | ये बच्चे उन बच्चों से बिल्कुल अलग हैं जिन्हे बुरी आदतें हैं और जो हर समय अपने माता पिता के मुसीबत के कारण बनाते हैं | यहाँ “नल्ल पुदल्वर्” पहले समूह के बच्चों को संबोधित करता हैं जो सद्गुणि हो |

मनैयाळ् : यह विशेषण “नल्ल” यहाँ पर “मनैयाळ्” शब्द से जोड़ा जा रहा हैं | यह अच्छे गुणों वाली पत्नी को संबोधित करता हैं | तिरुवळ्ळुवर् कहते हैं “मनैतक्क माण्बुदयळागि तऱ्कोन्डान् वळतक्काळ् .वाळ्कैतुणै” | शिलपधिगारम् कहते हैं “अट्रवोर्कु अळितलुम्, अन्धणर् ओम्बलुम्, तुट्रन्दोर्कु एदिर्तलुम् , थोल्वोर् मरबिल् विरुन्धेदिर् कोडलुम्” | यहाँ पर उन अच्छे गुणों के बारे मैं बताया गया हैं जो एक औरत मैं होने चाहिए जैसे की महात्माओं का सम्मान करना, सभी की अच्छे तरह से देखबाल करना और ज़रूरतमंदों की मदद करना | इसके अलावा एक औरत को पता होना चाहिए की एक अच्छा जीवन बिताने के लिए क्या अच्छा हैं | यह बात यहाँ पर ख़त्म नहीं होती, उन्होने जो सीखा हैं उसका पालन भी करना होगा, भोजन बनाने के अलावा ग़रीबों को दान देना और अपने पति की मन को जानकर उनके कहे अनुसार ही रहना |

नवैयिळ् किळै : “नवै” का मतलब ग़ल्तियाँ | “इल्” का मतलब कमी | “किळै” संबंधो को दर्शाता हैं | इसलिए “नवैयिल् किळै” का मतलब हुआ की वो सारे संबंध जो बेदाग और जिसमे कोई दोष नहीं हैं | ये संबंधी उन संबंधियों की तरह नहीं हैं जो सिर्फ़ नाम के लिए संबंधी हो लिकिन असल मे वे दुश्मन की तरह बर्ताव करते हैं | अरुळाळ पेरुमाळ् एम्बेरुमानार् स्वामीजी “नवैयिल् किळै” कहते हुए उन संबंधियों को सम्बोधित करते हैं जिनके साथ हर कोई संपर्क मे रहना चाहता हैं और अच्छे तरह से व्यवहार करना चाहता हैं |

इल्लम्जैसे की उपर कहा गया हैं की “नल्ल” विशेषण सभी सज्ञाओं से पहले लगाना चाहिए | इसलिए “नल्ल इल्लम्” का मतलब होगा बहुत सुंदर घर | घर जो जीर्ण न हुआ हो और जिसमे लोग रहते हों | इसके बजाय इसका मतलब यह भी है, सुंदर घर जिसमे बहुत से स्तरों, कई परतों और छज्जे है |

निलम् : एसी कई जगह हैं जहाँ बहुत से जंगली घास उगी हों | वह बंजर ज़मीन हैं और वहाँ कोई वनस्पति नहीं उग सकती हैं | “नल्ल निलम्” का मतलब उसके विपरीत हैं जिसका मतलब हैं वह ज़मीन जहाँ बिना कोई खाद के फसल उग रही हों | फसल इस वृद्धि से उग रहा हैं की जो बोया हुआ था उससे १० गुना ज़्यादा उपज हो |  अगर कोई सुबह बीज बोता हैं तो श्याम को घर लौटते वक्त लंबे उगे हुए पेड़ों को देखने के लिए उसे अपने हाथों को अपनी आखों के उपर रखकर उपर देखना पड़े |एक तरफ़ के पौधे इस तरह से सम्रुध हो कर बडते हैं की वे सारे क्षेत्र आर कब्जा कर लेते हैं | यह खेत एसए होते हैं जहाँ धान के खेत गन्ने जैसे लंबे बडते हैं |

माडु : “नल्ल माडु” का अर्थ हैं अच्छी गायें ।  वे उन क्रूर गायों जैसे नहीं हैं जिन्हे पकड़ना और नियंत्रित करना न हो | यह बुरी गाएँ अपने रास्ते मैं जो भी आएँ उसे नष्ट करके अपने पड़ोसियों के घर मैं और खेतों मैं कहर मचा देती हैं | अरुळाळ पेरुमाळ एम्बेरुमनार् स्वामीजी एसी बुरी गायों के बारे मैं नहीं बोल रहें हैं बल्कि उन अच्छी गायों को संबोधित करते हैं जो बच्‍चों के छोटे से गुच्छे से भी बँध जाएँ | यह गाय इन बच्चों को ही प्राप्त हो जाती हैं और इन बच्चों की भी आज्ञाकारी होकर और इनसे भी अच्छा व्यवहार करेगी | ये दूध भी बहुत अधिक मात्रा मैं देती हैं |

अल्लल् एनत् तोट्रि : अरुळाळ पेरुमाळ एम्बेरुमनार् स्वामीजी कहते हैं की हमें एसा सोचना चाहिए की यह सारी उपर बताई गयी विलासिता दुख और दर्द का कारण हैं | भले ही अल्लल् का मतलब दुख या दर्द हैं लेकिन इस सन्दर्भ मैं हमे इसका मतलब कुछ इस तरह लेना चाहिए की जो खुद मैं दर्द न हो बल्कि दुख और दर्द को लाता हैं | वे उनके एक अप्रत्यक्ष स्रोत हैं |

एरी तीयिर् सुडु मेल् : चमकदार आग जो ठाठ से जलती हैं | इन विलासिता से अगर किसी को धकधकाती आग के गर्मी के समान कष्ट हो तो वह व्यक्ति आगामी अनुच्छेद में वर्णित फल का पात्र है |

अवर्क्कु एळिदाम् एट्ररुम् वैगुन्दत्तु इरुप्पु : अगर कोई व्यक्ति यह महसूस कर रहा हैं की इस दुनिया के विलासिता आग के गर्मी के कष्ट के समान हैं तो वह एक अच्छी तरह से परिपक्व व्यक्ति है | ऐसे व्यक्ति को भगवान ऐसी चीज़ देते हैं जो उसे खुद अपने प्रयासों से नहीं मिल सकती | भगवान  ऐसे व्यक्ति को परमपद देते हैं जहाँ पर वह भगवान के दूसरे दासों के साथ मिलकर नित्य भगवान का कैन्कर्य सेवा करे |

 

अडियेन् केशव रामानुज दासन्

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ज्ञान सारं – पासुर (श्लोक) १८

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ज्ञान सारं

ज्ञान सारं – पासुर (श्लोक) १७                                                                 ज्ञान सारं – पासुर (श्लोक) १९

पाशूर १८

Dhruva-Vishnu-and-Garuda-thumb

 

ईनमिला अन्बर् एन्रालुम् एय्दिला
मानिडरै .एल्लावणत्तालुम् – तान् अरिय
विट्टार्कु एळियन् विडादार्क्कु अरिवरियन्
मट्टार् तुळाय् अलङ्गल् माल्

शब्दशः अर्थ :

ईनमिला अन्बर् एन्रालुम् एय्दिला  – श्रीमन्नारायण भगवान के चरण कमलों के दास जो दोषों से रहित और भक्ति से भरे हो उन्हे इस तरह रहना चाहिए  |मानिडरै .एल्लावणत्तालुम् – वे इस अनित्य और संसारी लोगों से किसी भी तरह की बातचीत और संबंध जारी नहीं रखते | तान् अरिय – साथ ही भगवान को पता हैं की वे अब किसी के साथ संबंध नहीं रखते | विट्टार्कु एळियन् विडादार्क्कु अरिवरियन् मट्टार् तुळाय् अलङ्गल् माल् वह जिन्होने इस अनित्य संसारी संबंध त्याग दिया है , उन के लिए उसे प्राप्त करना जिसके पास पवित्र तुलसी(तिरुतुळाय्) हैं जिससे शहद बहता हैं,बहुत ही सुलभ हैं लेकिन बहुत कठिन हैं उन के लिए जिन्होने संसारी संबंधों का त्याग नहीं किया |

स्पष्टीकरण :

ईनमिला अन्बर् एन्रालुम् : “ईनम्” दुष्टता को दर्शाता है | यह शब्द “पोल्ला अरक्कनै” कहते समय आमतौर आर रावण जैसे लोगों को संबोधित करते हुए कहते हैं | परकाल स्वामीजी(तिरुमङ्गै आळ्वार्) “मुन्पोला रावणन्” कहते हैं | विष्णुचित्त स्वामीजी(पेरियाळ्वार्)कम्स की दुष्टता दिखाने लिए उसे “तीय पुन्डि कंजन” कहते हैं | इसीलिए रावण और कम्स जैसे लोगों के कृत्यों को “पोल्लांगू” के  कृत्य कहते हैं |  तो, ईनमिल् का मतलब हैं एसे दुष्टता के बिना | एसे लोग श्रीमन्नारायण भगवान के चरण कमलों में निष्काम भक्ति से परिपुर्ण होते हैं | भगवद् गीता मैं कृष्णजी बताते हैं की जिनके पास उन्हे छोड़कर दूसरा कुछ नहीं हैं उनके लिए वे ही अंतिम लक्ष हैं | इसलिए इस तरह की निष्टा और भक्ति रहने वाले भक्तों को “ईनमिला अन्बर्” कहा गया हैं |

एय्दिला मानिडरै : लोग जिन्हें कभी श्रीमन्नारायण भगवान की तरफ झुकाव नहीं था ।  आद्यात्म की ओर बडकर सदा के लिए श्रीमन्नारायण भगवान के साथ रहना ही इस मनुष्य जन्म का एकमात्र फल है । जो लोग ऐसा नहीं करते वे “विलन्गोडु मक्कळ् अनयर्” के अनुसार चलते फिरते जानवर हैं । यह बात कुछ आळ्वारों द्वारा बतायी गयी हैं । परकाल स्वामीजी(तिरुमंगै आळ्वार) कहते हैं “आन्वीडैयेळ अन्रू अडर्तार्कु आळानार अल्लाधर मानिडवर अल्लर् ” । भुतयोगी स्वामीजी कहते हैं “चेन्णगण माल् नामम् मारनधारै मानिडमावयेन्” । इससे हमे यह पता चलता हैं की वे लोग जो “श्रीमन्नारायण” को भुल जाते है वे मनुष्य ही नहीं हैं । आळ्वार जिन्हें साक्षात श्रीमन्नारायण भगवान द्वारा ही परम ज्ञान और भक्ति प्रदान की गयी थी, वे भी ऐसे लोगों की निन्दा करते हैं और उनसे दुर ही रहते हैं । ऐसे लोग श्रीमन्नारायण भगवान का अपमान करते हैं और उनसे दुर रहते हैं । ऐसे लोगों को ही “एय्दिला मानिडरै” कहा गया हैं । वे बहुत ही तुछ और पापी लोग हैं ।

ऐसे नासमझ लोगों के लिए शठकोप स्वामीजी कहते हैं “याधानुम् पट्रि नीनगुम् विरधमुडयार्”।दो अलग मतों पर आधारित अगर हम “एय्दिला” के जगह पर “एय्दिलारम्” शब्द का प्रयोग करे तो इसका मतलब होगा वह लोग जो श्रीमन्नारायण भगवान के दुश्मन हैं | तीरुवळ्ळुवर् इस बारे में यह कहते हैं “एय्दिलार् कुट्रम् पोला “। “एय्दिलार्” का अर्थ है दुष्मन ।

एल्लावणत्तालुम् : इसका मतलब हैं सभी तरह के सम्बन्ध जैसे उनके साथ रहना, चीजों का लेनदेन करना, बातचीत करना और दुसरे सभी लौकिक आदतें ।

तान् अरिय विट्टार्कु एळियन् :  लोग जिन्हें  “एय्दिला मानिडरै ” कहा गया है ऐसे लोगों से हमें सारे उपर बताये गये सम्बन्धों को छोड़ देना चाहिए । हमें इन सम्बन्धो को इस तरह छोड़ देना चाहिए की ना सीर्फ हमें और हमारे आसपास रहने वाले लोगों को पता हो बल्कि हमारे अंदर रहने वाले भगवान को भी पता हो की हमने पुरी तरह से इमानदारी के साथ ऐसे लोगों से सारे सम्बन्ध छोड़ दिये हैं । जिन्होंने इस तरह के सारे सम्बन्धो का त्याग कर दिया हैं उनके लिए भगवान बहुत ही सुलभ हो जाते हैं । भगवान को ही उळ्ळुवार् उळ्ळितेल्लाम् उडनिरुन्धु ” कहा गया है, मतलब वे ही एक हैं जो हम सभी में हैं, और इतनाही नहीं वे हमारे गहरे से गहरे विचार मे भी हैं । इसलिए, यह त्यागने की बात वहाँ तक पता होना चाहिए जबतक ये भगवान इस बात की मोहर लगादे की हाँ हमने “सही में छोड़ दीया हैं ।” इस जगह पर वरवरमुनी स्वामीजी(स्वामी मणवाळ मामुनी) कहते हैं की श्रीवैष्णवम् वह हैं जो इस बात मे सीमित न हो की किसी व्यक्ति को क्या पता हैं या संसार को क्या पता हैं । जो प्रधान हैं वह तो यह हैं की श्रीमन्नारायण भगवान को क्या पता हैं ।

श्री पेरिय आच्चान पिळ्ळै स्वामीजी इसको तमिळ मैं इस तरह कहते हैं “तान अऱिन्ध वैणवत्वमुम् वैणवत्वम् अल्ला,नडरिन्ध वैणवत्वमुम् वैणवत्वम् अल्ला,नारायणन् अरिन्ध वैणवत्वमे वैणवत्वम् | ”

विडादार्क्कु अरिवरियन् : उन लोगों को जिन्होने ऐसे “एय्दिला मानिडर्” को नहीं छोड़ा हैं,भगवान कभी प्राप्य न होंगे वे कभी भगवान तक नहीं पहुँचा सकते | शठकोप स्वामीजी कहते हैं “अडियार्कु एळियवन् ,पिरर्गळुक्कु अरीय वित्तगन्” | तो ,ऐसे सांसारिक लोगों के साथ जो “एय्दिला मानिडर्” की श्रेणि मैं आते हैं उन लोगों के साथ भक्तों को कोई भी सम्बन्ध नहीं रखना चाहिए |

मट्टार् तुळाय् अलङ्गल् माल् : भगवान श्रीमन्नारयण वे हैं जिनके सिर पर और कंधों पर तुलसी माला सजी हों | क्यूंकी इस तुलसी माला को भगवान के दिव्य शरीर का स्पर्श होता हैं,यह सुंदर हो जाती हैं और इससे शहद बहने लगता हैं | तुलसी माला भगवान की श्रेष्ठता का वर्णन करती हैं | कुल मिलाकर, अर्थ के संदर्भ में इस पाशूर को हमें इस तरह पड़ना चाहिये “मट्टार् तुळाय् अलङ्गल् माल्,ईनमिला अन्बर् एन्रालुम् एय्दिला मानिडरै एल्लावणत्तालुम् – तान् अरिय विट्टार्कु एळियन् विडादार्क्कु अरिवरियन् “|

 

अडियेन् केशव रामानुज दासन्

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ज्ञान सारं – पासुर (श्लोक) १७

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ज्ञान सारं

ज्ञान सारं – पासुर (श्लोक) १६                                                                ज्ञान सारं – पासुर (श्लोक) १८

 

पाशूर १७

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ओर्निडुग विण्णवर् कोन् सेल्वमोलिंदडुग
एंरूम इरवादिरुन्दिडुग – इन्रे
इरक्कक कलिप्पुम कवर्वुम इवट्राल
पिरुक्कुमो? तट्रेलिन्द पिन

प्रस्तावना:

पिछले पाशुर में श्री देवराज मुनि उस मनुष्य के बारे में बताते है जिन्हे जीवात्मा के असली स्वरूप के बारे में समझ आ गया हैं। उन्हें वह कुछ इस तरह प्रस्तुत करते हैं की एक ऐसा जो हमेशा परमात्मा श्रीमन्नारायण का दास हैं किसी और का नहीं उसे आत्मा का असली स्वभाव मालूम है । श्री देवराज मुनि आगे बढ़ते है और उदाहरण देकर शरण हुई आत्मा अपने असली स्वभाव के बारे में सोचते हैं यही समझाते है। इस पाशुर में वह एक व्यक्ति जो आत्मा के असली स्वभाव के बारे में नहीं जानता उसके बारे में बताते हैं। ऐसे मनुष्यों के लिए, धन का बहोत प्रवाह, तुरंत उसका कम होना, ज्यादा जीवन जीने की योग्यता या ज्यादा जीवन जीने की अयोग्यता, यह सब सुख और दु:ख पर स्थापित हैं। इसीलिए जो व्यक्ति सच में परमात्मा श्रीमन्नारायण के शरण हैं और किसी के नहीं ,वहा धन का कम या ज्यादा प्रवाह, कम या ज्यादा जीवन इन के कारण से लौकिक सुख और दु:ख का उतार चढ़ाव नहीं होता। यह उच्च विचार क्या हैं वह इस पाशूर में वर्णित हैं।

अर्थ:

ओर्निडुग विण्णवर् कोन् सेल्व मोलिंदडुग – इस संसार में बहोत सारा धन हैं, जैसे देवताओं के पास (इन्द्र आदि), जो की किसी भी वक्त आता और जाता रहेगा और हमेशा एक सा नहीं रहेगा। एंरूम इरवादिरुन्दिडुग – इन्रे इरक्कक और जीवन का वैसे ही है, हमेशा के लिए नहीं हैं और कोई भी अचानक मर सकता हैं। कलिप्पुम कवर्वुम इवट्राल पिरुक्कुमो? तट्रेलिन्द पिन –परन्तु आत्मा के स्वभाव को जानने के बाद और समझने के बाद | एक प्रपन्न के लिए जिसे जीवात्मा का स्वभाव समझ में आ गया है, उसे धन के सम्बन्ध में वह मिल रहा है या छूट रहा है या दीर्घायु उसके पास है या नहीं हैं इस बाबत कोई सुख या दु:ख नहीं होता। ओर्निडुग विण्णवर् कोन् सेल्व: “सेल्व” इन्द्र जो सभी देवताओं का राजा हैं उसके अधिक धन को संबोधित करता हैं। वह धन जिससे कोई भी तीनों लोकों भूलोक, भुवर लोक और स्वर्ग लोक के उपर शासन कर सकता हैं। ऐसा धन अगर मनुष्य न चाहे तो भी उसके पास आ सकता हैं। मोलिंदडुग:  ऐसा धन उस व्यक्ति के पास से कुछ इस तरह नष्ट हो जाये की उसे वापिस कमाना या सौभाग्य से मिलना संभव न हो। एंरूम इरवादिरुन्दिडुग: और किसी भी समय वह व्यक्ति मृत्यु के बिना सदा चिरकाल जीवित रहे। इन्रे इरक्कक: पहिले कहे हुये चिरकाल जीवन के बिना वह व्यक्ति तत्काल मर जाये | कलिप्पुम कवर्वुम इवट्राल पिरुक्कुमो? सांसारिक मनुष्य सुख का अनुभव करता हैं क्योंकि वे या तो धन पाते हैं या चिरकाल जीवन। वे लगातार आने वाले धन की हानी या प्रत्यक्ष रूप से अचानक आने वाली मृत्यु के कारण चिरकाल जीवन की कमी इस वजह से दु:ख का अनुभव करते हैं। तट्रेलिन्द पिन: यह उस अवस्था को संबोधित करता हैं जहाँ कोई अपने आप को, मतलब जीवात्मा के सच्चे स्वभाव को जान सकता हैं जो यही हैं कि जीवात्मा भगवान श्रीमन्नारायण का ही दास हैं और किसी का नहीं।

 

अडियेन् केशव रामानुज दासन्

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ज्ञान सारं – पासुर (श्लोक) १६

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ज्ञान सारं

ज्ञान सारं – पासुर (श्लोक) १५                                                                    ज्ञान सारं – पासुर (श्लोक) १७

 

पासुर-१६

I_Intro2

 

देवर मनिसार तिरियक्कुत तावरमान
यावैयुम अल्लन इलगुम उयिर-पूविन मिसै
आरणङ्गिन केलवन अमलन अरिवे वङिवाम
नारनण ताट्के अडिमै नान

प्रस्तावना:

श्री देवराज मुनि यह समझाते हैं कि किस तरह सत्य जीवात्मा जो कि जीवात्मा के सत्य स्वभाव को जानते हैं और अपने स्वभाव के स्थिर दशा के बारें में सोचते हैं। सभी जीवात्मा भगवान श्रीमन्नारायण के ही दास हैं और यहीं दासत्व इन जीवात्माओं का स्वभाव हैं। यहीं इस पाशुर में समझाया गया हैं।

अर्थ:

देवर मनिसार तिरियक्कुत तावरमान – देवता इन्द्र के जैसे और मनुष्य जैसे ब्राह्मण या राजा, गाय, पक्षीयाँ, पेड़, पौदे और जड़ी-बुटी को सम्मिलित करना। यावैयुम अल्लन इलगुम उयिर – और इस जगत में अन्य कोई भी वस्तु का कोई शाश्वत नाम नहीं हैं और नाहीं ऐसे नाम से जाना जायेगा। पूविन मिसै आरणङ्गिन केलवन – अस्तु सभी वस्तु और सभी लोग कमल पुष्प पर विराजमान माता लक्ष्मी के पति के दास हैं। अमलन – नाहीं किसी दोष से और |अरिवे वङिवाम नारनण ताट्के अडिमै नान – जिसे जीवात्मा की पहचान हो गयी और यह ज्ञान हो गया की वह भगवान श्रीमन्नारायण के ही दास हैं।

स्पष्टीकरण:

देवर मनिसार तिरियक्कुत तावरमान: जीवात्मा को कोई विशेष नाम नहीं होता हैं जैसे देवता, मनुष्य, जानवर, पेड़, पौदे और जड़ी-बुटी आदि। इनमें से कोई एक प्रकार की भी जीवात्मा नहीं हैं। उनके अच्छे और बुरे कर्मों के अनुसार उनके पिछले अंगिनत जन्मों के हिसाब से एक जीवात्मा एक शरीर को धारण करती हैं जैसे मनुष्य, जानवर, पक्षी, पेड़, आदि । यह थिरुकुरल आदि में पाया जा सकता हैं। वह इस प्रकार है:

“ऊर्व पधिनोंराम, ओंबधू मानिदम, न्ल्र, परवै नालकाल, ऑर पप्पथु, स्ल्रिया बंधमान्धेवर पधिनालु, अंधमिल स्ल्र थावरम नालैधु। मक्कल, विलंगु परवै, ऊर्वना, न्लृंथीरिवना, परूपधाम एनविवै येझु पिरापागुमेंबा”। शरीर के कर्मों के आधार पर आत्मा किस शरीर में जायेगा यह यहाँ समझाया गया हैं। यह इसलिए कि जीवात्मा अपने आप को अनगणित शरीर में कल्पों से रहता हैं और जब वह जीवात्मा एक विशेष शरीर में विशेष समय में मौजूद हैं तब वह जीवात्मा सोचता हैं कि “मैं देवता हूँ”, “मैं मनुष्य हूँ”, “मैं जानवर हूँ”, “मैं पेड़ हूँ”। यहाँ “मैं” शब्द से अभिमान दिखाता हैं। हालाकि यह जीवात्मा कि दशा तब तक ही हैं जब उसे यह मालुम नहीं पड़ता कि यहीं उसका सत्य स्वभाव हैं। जीवात्मा के सत्य स्वभाव से यह जान सकते हैं कि भगवान श्रीमन्नारायण के लिए जीवात्मा नाहीं पेड़ हैं नाहीं पौधें,न जानवर, न देवता और नाहीं कुछ और। जीवात्मा केवल यही सोचता हैं कि वह भगवान श्रीमन्नारायण का हीं दास हैं और किसी का नहीं।

इलगुम उयिर नान: पाशुर के अन्त में “नान” को यहां पर जोड़ना चाहिए। यहाँ “नान” का मतलब हैं कि जीवात्मा कभी नहीं मरते नाहीं उसे नष्ट किया जा सकता हैं। पहिले आनेवाला विशेषण “इलगुम उयिर” हमें यह समझाता की शास्त्रों में स्थापित लक्षण किस तरह हमारे उपयोगी हैं। “उयिर” (जीवात्मा) ज्ञानी ठहराना, आनन्द ठहराना और बुद्धिमान ठहराना। यह जीवात्मा को अन्य निर्जीव तत्त्वों से अलग करता हैं क्योकिं वह ज्ञान प्राप्त करता हैं जो कि निर्जीव तत्त्वों के पास किसी भी समय में नहीं रहता हैं। हमें इस बात का ध्यान रखना चाहिए जो स्वामी पिल्लै लोकाचार्यजी ने अपने “तत्त्व त्रय” (चित प्रकरणम) में कहा हैं।   “आत्म स्वरूपं सेंरू सेंरू परमपरमै एंगिरापदिए धेहेंद्रिय मनः प्राण बुध्धी विलक्षणामी, अजदमै, आनान्धा, रूपमै, नित्यमै, अणुवै, अव्यक्थामै, अचिंथ्यमै, निरवयमै, निर्विकारमै, ज्ञानाश्रयमै, ईश्वरनुकु नियाम्यमै, धार्यमै, सेशमायिरुकुम”।

पूविन मिसै यावैयुम अल्लन आरणङ्गिन केलवन: श्री शठकोप स्वामीजी (नम्माल्वार) के तिरुवैमोझि ४.५.२ “मलर मेल उरैवाल” के अनुसार, इसका मतलब हैं की वह जो किसी का स्वामी हैं जो सुन्दर कमल पुष्प पर विराजमान हैं। आणंगु परिया पिराट्टि को संबोधीत करता हैं जिसमे पूरी तरह भगवान के गुण हैं, जिसमें भगवान का सबसे ज्यादा सुन्दरता भी गुण हैं। “केल्वन” पति (स्वामी) को संभोधीत करता हैं और इस प्रसङ्ग में भगवान श्रीमन्नारायण हैं।

अमलन: वह जो बुरें स्वभाव के बिल्कुल विपरित हैं।

अरिवे वङिवाम नारनण: भगवान श्रीमन्नारायण जिनमें “ज्ञानी ठहराना” और “आनन्द ठहराना” यह गुण हैं।

ताट्के अडिमै: जीवात्मा केवल भगवान श्रीमन्नारायण का ही दास हैं और किसी का नहीं।

“नारायण” नाम का मतलब यह हैं कि वह जिसमे खुद को जैसे उसके शरीर छोड़कर सब कुछ हैं और एक वही जगह हैं जहाँ सब अंग रह सकते हैं। ऐसे ही “नारायण” खुद को छोड़कर सब के लिए जीवन (उयिर) हैं। यह जो अलग पदार्थ हैं वह उनके शरीर के अंग हैं जिसे वह अपने पास अपने शरीर में रखते हैं।

संदेश:- जीवात्मा को पूर्ण ज्ञानी, पूरा आनंदित, जो नाहीं देवता हैं न मनुष्य, नाहीं जानवर, न पेड़, पौदे और न जड़ी बूटी ऐसे वर्णित किया गया हैं। जीवात्मा भगवान श्रीमन्नारायण का दास हैं, सुन्दर पेरिया पीरट्टि (लक्ष्मी अम्माजी) के स्वामी हैं जो सुन्दर कमल पुष्प पर विराजमान हैं ऐसे वर्णन किया गया हैं। ऐसे भगवान श्रीमन्नारायण सभी बुरे स्वभाव से बिल्कुल विरुद्ध हैं और इस पूरे संसार के सभी जीव और निर्जीव प्राणियों के जीवन दाता हैं।

अडियेन् केशव रामानुज दासन्

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ज्ञान सारं – पासुर (श्लोक) १५

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ज्ञान सारं – पासुर (श्लोक) १४                                                                          ज्ञान सारं – पासुर (श्लोक) १६

पाशूर १५

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कुडियुम् कुलमुम् एल्लाम् कोकनगैक् केळ्वन्
अडियार्क्कु अवन् अडिये आगुम्पडियिन्
मेल् नीर् केळुवुमारुगळिन् पेरुम् निरमुम्
एल्लाम् आर् कलियैच् सेर्न्दिड माय्न्दट्रु

अर्थ

कुडियुम् कुलमुम् एल्लाम्  – जन्म स्थान, लिंग, गोत्रम् और जन्म के समय के अन्य सभी पहचान व्यर्थ बताये गये हैं | कोकनगैक् केळ्वन् अडियार्क्कु अवन् अडिये आगुम् – श्रियःपति के चरण पहुँचने पर और उनके दास बनकर और बिना कोई अंतर के उन्ही की तरह स्वरूप मिलनेकेबाद | पडियिन् मेल् नीर् केळुवुमारुगळिन् – इन दासों की अवस्था वैसे ही है जैसे इस धरती पर पानी से भरी बहती नदियों की | पेरुम् निरमुम् एल्लाम् – जो अलग अलग नामों से और रंगों से जैसे लाल,सफेद,काली आदि और भी कई व्यत्यासों से पहचानी जाती हैं |आर् कलियैच् सेर्न्दिड माय्न्दट्रु – लिकिन जब वे समुद्र से मिलती है तब सभी व्यत्यासों का नष्ट हो जाता है और वे एक हो जाती हैं |

प्रस्तावना

पिछले पाशूर मै अरुळाळ पेरुमळ् एम्बेरुमानार् स्वामीजी “एव्वुयिर्क्कुम् इन्दिरै कोन् तन्नडिये तानुम् सरण्” कहते हैं | इस पाशूर मै स्वामीजी कहते हैं की श्रीमन्नारायण भगवान के चरण कमल ही हम सभी के शरण्य हैं | श्रीमन्नारायण भगवान के दासों को “तिरुमगळ् मणाळनुक्कु अडियार्”(उन भगवान[पेरुमाळ्] के दास जो श्री महालक्ष्मीजी[पिराट्टि] के पती है)| यह सब दास(भक्त) अपने सच्चे स्वरूप को जानने के पहले कई लौकिक चीज़ो से पहचाने जाते थे जैसे उनके नाम के साथ उनका जन्म स्थान, उनके नाम के साथ उनका वर्ण और कई ऐसे दूसरे लौकिक संबंध | लेकिन उनको जब(आचार्य और दिव्य दंपत्ति श्री लक्ष्मीनारायण भगवान की निर्हेतुक कृपा से )अपने सच्चे स्वरूप का ज्ञान हो जाता है तब वे उनके लौकिक संबंधो जैसे जन्म स्थान,वर्ण आदि से नहीं पहचाने जाते | उनकी एक मात्र पहचान श्रीमन्नारायण भगवान के चरण कमाल ही हो जाती है और दूसरा कुछ नहीं |

स्पष्टीकरण

कुडियुम् कुलमुम् एल्लाम् – इस वाक्य का अर्थ जानने के लिए निम्नलिखित तीन अंशों का अर्थ समझना होगा | वे इस प्रकार हैं :

“सोण्णाट्टु पून्जाट्रुर् पार्पान गौणियन् विण्णतायन्” – पुरनानोरु

वेग्ङण् मा कळिरुन्दि वेण्णियेट्र
विरल् मन्नर् तिरल् अळिय वेम्मा उय्त्त
शेग्ङणान् को च्चोळन्  – पेरीय तिरुमोळि (६.६.४)

इरुक्किलङ्गु तिरुमोळि वाय् एण् तोळ् ईशर्कु
एळिल् माडम् एळुपदु शेय्दुलगम् आण्ड तिरुक्कुलत्तु वळ च्चोळन्  – पेरीय तिरुमोळि (६.६.८)

इन तीन उदाहरणों मै हम देख सकते है की लेखक ने अपने जन्म स्थान(कुडि),वर्ण(कुलम्),गोत्र और कई जन्म की पहचानों(एल्लाम्) का उल्लेख करते हैं |

कोकनगैक् केळ्वन् अडियार्क्कु – “कोकनगम्” का मतलब है कमल,इसतरह “कोकनगै” उनको संबोधित करता है जो कमल पर बिराजमान हो, मतलब श्री महालक्ष्मीजी(अम्माजी या पिराट्टि)| “केळ्वन्” का मतलब है नायक और इसतरह “कोकनगैक् केळ्वन्” वाक्य “श्रीमन्नारायण भगवान” को संबोधित करता है जो श्री अम्माजी के नायक हैं | “अडियार्” शब्द उन भगवद् दासों को संबोधित करता है जो श्री अम्माजी के नायक श्रीमन्नारायण भगवान के कमल चरणों के नीचे रहते हैं | श्रीमन्नारायण भगवान के कमल चरणों के नीचे रहना ही इनकी पहचान हैं |

अवन् अडिये आगुम् – इसका मतलब है यहाँ उपर बताए गये भक्त जो अपने जन्म,वर्ण,गोत्र आदि चिन्हों से पहचाने जाते है उनका अब इन चिन्हों से कोई सम्बन्ध न रहेगा जब वे एक बार श्रीमन्नारयण भगवान के दास बन जाएँगे | उनके सारे पहले के पहचान चिन्ह नष्ट हो जाते हैं और उस पल से उनकी पहचान श्रीमन्नारयण भगवान के दास के रूप मैं होती हैं | श्रीमन्नारायण भगवान के साथ उनका संबंध ही उनकी पहचान बन जाती हैं | इसलिए उनको “तिरुमाल अडियार्” कहा गया हैं | अरुळाळ पेरुमाळ् एम्बेरुमानार् स्वामीजी उदाहण के साथ पाशूर के दूसरे आधे हिस्से मे बताया हैं |

पडियिन् मेल् – धरती के उपर |

नीर् केळुवुमारुगळिन् पेरुम् निरमुम् एल्लाम् – नदियों में बहुत पानी भरा होता हैं | और नदियों के अलग अलग नाम होते है जैसे गंगा,यमुना आदि और अलग अलग रंगों मे आते है जैसे लाल,कला,सफेद आदि |

माय्न्दट्रु – उसी तरह नष्ट होते है (जैसे नदियाँ समुद्र से मिलने पर अपनी सारी पहचान खो देती हैं)|

निष्कर्ष : श्रीमन्नरायण भगवान के दास हो जाने के बाद उनकी सारी पहले की पहचान नष्ट हो जाती हैं | यह उसी तरह विनाश होते हैं जैसे नदियों की पहचान का विनाश होता है, समुद्र से मिलने पर | नदियाँ अपना नाम,रंग आदि खो देती हैं | इसलिए हमें लौकिक और अनित्य कारक(चिन्ह) जैसे वर्ण आदि को महत्व नहीं देना चाहिए और केवल नित्य वास्तु जिसे हम “अडियराम् तन्मै” कहते है उसी को महत्व देना चाहिए | इसका मतलब और कुछ नहीं बल्कि यहीं हैं की हमेशा सर्वत्र श्री अम्माजी(पिराट्टि) और श्री नारायण भगवान(पेरुमळ्) के दास बनकर रहे | श्री अम्माजी और श्री नारयण भगवान के दास बनने का यह गुण सिर्फ़ एक या दो चुने हुए जीवात्माओं के लिए नही है बल्कि हर एक के लिए हैं | इस तरह यह अनित्य कारणों से उत्पन्न सारें मतभेदों को दूर करेगा और सभी जीवात्माओं को “तिरुमाल अडियार्” नामक एक ही छतरी के नीचे एकजुट ले आएँगा |

अडियेन् केशव रामानुज दासन्

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ज्ञान सारं – पासुर (श्लोक) १४

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ज्ञान सारं

ज्ञान सारं – पासुर (श्लोक) १३                                                          ज्ञान सारं – पासुर (श्लोक) १५

 

पासुर  १४satya

 

बूदङ्गळ् ऐन्दुम् पोरुन्दुडलिनार् पिरन्द
सादङ्गळ् नान्किनोडुम् सङ्गतमाम्पेतङ्गोण्डु
एन्न पयन् पेरुवीर् एव्वुयिर्कुम् इन्दिरै कोन्
तन्नडिये काणुम् सरण्

अर्थ

बूदङ्गळ् ऐन्दुम् पोरुन्दुडलिनार् पिरन्द  – यहाँ पर जन्म लिये सभी मनुष्यों का शरीर पाँच प्रकार के तत्त्वों से बना हैं – धरती, जल, अग्नि, वायु और आकाश। सादङ्गळ् नान्किनोडुम् सङ्गतमाम् – और सभीको चार प्रकार के वर्ण में अलग अलग किया गया हैं – ब्रामण, राजा, व्यापारी और किसान (चौथे वर्ण को देखते हुए) और सभी से यह आशा रखते हैं की वह एक ही स्वर में इसका पालन करेंगे। पेतङ्गोण्डु एन्न पयन् पेरुवीर् – फिर भी, यह भेद उपयोगी और मूल्यहीन हैं क्योंकि | एव्वुयिर्कुम् इन्दिरै कोन् तन्नडिये काणुम् सरण् – सभी जीवात्माओं को भगवान श्रीमन्नारायण के ही चरणों के शरण होना होगा ज्यो की श्री लक्ष्मीजी(तिरुमामगळ्) के स्वामी हैं ।

प्रस्तावना

यहा एक प्रश्न आता हैं: “जब तक कोई भी पुरूष या स्त्री इस संसार में जीवित हैं वह वर्ण के भेद भाव में टकराता रहेगा। कोई भी इससे बच नहीं सकेगा और वह जब तक इस संसार में हैं उन्हीं के पीछे जाते रहेगा”। श्री देवराज मुनि इस पाशुर में यह कहकर जवाब देते हैं कि “इन वर्णों का कोई उपयोग नहीं हैं” और आगे बढ़कर यह भी कहते हैं कि सभी जीवात्माओं को केवल ज्यो की श्री लक्ष्मीजी(तिरुमामगळ्) के स्वामी हैं उन्ही की चरणों के ही शरण होना हैं।

स्पष्टीकरण

बूदङ्गळ् ऐन्दुम् पोरुन्दुडलिनार् पिरन्द – श्री परकाल स्वामीजी (तिरुमड्गैयाल्वार स्वामीजी) कहते हैं “मन्जुसेर्वानेरिनीर्निलम्कालिवैमयकिनिन्द्रान्जुसेर् आकै”. थिरुवल्लूवर  कहते हैं, ” सुवैओळिऊऱुओसैनाट्रमिव्वैन्धिन्वगैतेरिवान्कतेउलगु ” उपर लिखे गये छोटी दो सारों का यह मतलब हैं कि तत्त्व जैसे धरती, जल, अग्नि, वायु और आकाश यह सब मिलकर ही शरीर बनता हैं। जिस तरह यह शरीर पाँच तत्त्वों से बना हैं इससे हम यह परिणाम निकाल सकते हैं कि शरीर और आत्मा के बीच में कोई सम्बन्ध नहीं हैं। इसके अतिरिक्त, शरीर बहुत से रूपांतरों से निरन्तर गुजरता हैं जैसे कि एक मनुष्य के जीवन मे नव जन्म, तरुण, युवा और वृध्द अवस्था देखी जा सकती हैं। इसके ऊपर यह अस्थाई हैं और इससे घृणा करनी चाहिये। अत: यह स्पष्ट हैं कि आत्मा के लिए शरीर एक अस्थाई निवास करने का स्थान हैं।

सादङ्गळ् नान्किनोडुम् – यहा पर चार वर्ण हैं जिसमे ब्राम्हण, राजा(क्षत्रीय), व्यापारी(वैश्य), किसान (क्षुद्र) शामिल हैं। “सादङ्गळ्” का मतलब वर्ण हैं। यह चारों वर्णों का जन्म उपर बताए हुए पाँच तत्त्वों के मिश्रण से हुआ हैं।

नान्किनोडुम् सङ्गतमाम्पेतङ्गोण्डु – इन चारों वर्णों के अन्दर ही बहुत से अंगिनत छोटे भाग हैं जो उनमें ही ऊँच-निच के भेद भाव को उत्पन्न करते हैं। “ब्राम्हणोँ” के विषय में एसी अवस्था हैं जैसे “ब्रह्मचार्यं”, “इल्लराम”, “वानप्रस्थम” और “थूरवरम”। और यह भेद-भाव केवल “ब्राम्हणोँ” तक सीमित नहीं हैं बल्कि सभी वर्णों में भी हैं। परिमेलझ्हगर एक पद के जरिए पकड़ लेते हैं “नाल्वगइनिलाइथाई वर्णम थोरुंवेरुपातुदमईन”

एन्न पयन् पेरुवीर् – श्री देवराज मुनि इस जगत के लोगों से यह पुछते हैं कि वह इस भेद-भाव से क्या परिणाम निकालते हो। और उनके प्रश्न के जवाब में यह उभरकर आया कि इस भेद-भाव से कोई भी लाभ उत्पन्न नहीं हो सकता। और इससे यहीं विषय उभरता हैं कि सभी वर्णों में भेद-भाव “मैं” और “मेरा” यहीं रचते और फैलाते हैं जो कि अंत में आत्मा के लिए हानिकारक हैं।

“पाटबेधम” के कारण “एन्न पयन् पेरुवीर् के बदले में एक परस्पर पद भी हैं और दूसरा पद हैं “एन्नपायङ्केदुव्ल्र” जिसे कुछ लोग पालन भी करते हैं। इस सिखने कि पाठशाला में “केदुवल” एक विलिचोल (संभोधनम) हैं जो श्री देवराज मुनि के पास खड़े हुए मनुष्यों कि तरफ ईशारा करते हैं। यह अनुमान लगाया जाता हैं कि श्री देवराज मुनि उन सब से वार्तालाप कर रहे हैं जो उन्हें “केदुवल” नाम से संबोधित कर रहे हैं।

एव्वुयिर्कुम् इन्दिरै कोन् तन्नडिये काणुम् सरण् इस पद “एव्वुयिर्कुम्” से यह समझा जायेगा कि यह सब के लिए हैं। जैसे कि वें कहते हैं कि “वेण्डुधल्वेडामैइलान्”, ” इन्नारिनैयारेन्ड्रवेऱुपादुइल्लामल् “, भगवान श्रीमन्नारायण के चरण कमल जो श्री लक्ष्मीजी(तिरुमामगळ्) के स्वामी, सभी के लिए एक और जैसे हैं। यह सभी जीवों का शरण हैं और सभी जीव उनके ही चरणों कि शरण लेते हैं। इससे यह समझा जाता हैं कि क्योंकि सभी जीव भगवान श्रीमन्नारायण के ही चरणों के शरण हैं, उन जीवों में कोई भी भेद-भाव नहीं हैं क्योंकि सभी का उद्देश एक ही हैं। उन में कोई भेद-भाव नहीं हैं और जो भी भेद-भाव शरीर से उत्पन्न होते हैं उससे कोई मतलब नहीं हैं। सभी जीव अपने नित्य स्वामी भगवान श्रीमन्नारायण के दास हैं। स्वामी भूतयोगी आल्वार कहते हैं कि:

“अदु नन्रिदु तीदैन्रू ऐयप्पडादे
मदु निन्र तण तुलाय मार्वन
पोदु निन्र पोन् अम् कलले
मुन्नम् कललुम् मुडिन्दु || ८८ ||

–       मून्राम् तिरूवन्दादि

यह पद “पोदु निन्र पोन् अम् कलले” का मतलब हैं कि भगवान श्रीमन्नारायण के चरण कमल सबके लिए साधारण हैं। यहीं कारण हैं कि जो भी भगवान के मंदिर में आता हैं उसके सिर पर शठारी (शठकोप) रखते हैं। “शठारी” को नम्माल्वार (श्री शठकोप स्वामीजी) समझा जाता हैं जो भगवान श्रीमन्नारायण के चरण कमलों का प्रतिनिधीत्व करते हैं।

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ज्ञान सारं – पासुर (श्लोक) १३

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ज्ञान सारं – पासुर (श्लोक) १२                                                                ज्ञान सारं – पासुर (श्लोक) १४

 

पासुर (१३)

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पण्डे उयिर् अनैत्तुम् पंगकयत्ताळ् नायगर्के
तोण्डम् एनत्तळिन्ड तूमनत्तार्क्कु – उण्डो ?
पल कत्तुम् तम् उडम्बैप्पार्तु अबिमानिक्कुम्
उलगत्तवरोडु उरवु

शब्दार्थ

पण्डे उयिरनैत्तुम् – क्या कर्तव्यनिष्ठ चित जिवात्माए सदैव | पंगयत्ताळ् नायगर्के तोण्डम् एनत्तेळिन्ड – (क्या वे) शुद्ध चित्त और यतार्थ तत्वज्ञान जानकर श्री लक्ष्मी नाथ के आनन्दित सेवक है ? उरवो उण्डो – (क्या) ऐसे सम्बंधित थे ? तम् उडम्बैप्पार्त्तु अबिमानिक्कुम् – ऐसे लौलिक व्यक्ति जो जन्म वर्ण के आधार पर घमण्डि है (भौतिक शरीर के प्रती अत्यासक्त) |पल कत्तुम् – (क्या) वे सुशिक्षित विद्वान (ज्ञानि) के तरह दिखाई देते है

भूमिका

पासुर मे कहा गया है की ऐसे भगवान के प्रपन्नभक्त है जो केवल भगवान के चरणकमलों के प्रती आसक्त होकर भगवद्-भागवत कैंकर्य मे संलग्न है । अगर ऐसे प्रपन्नभक्त के सम्बंध/सम्पर्क, ताल्लुक निज़ी लौकिक रिश्तेदारों, दोस्तों इत्यादि से है तो क्या ऐसे भक्तों के कैंकर्य मे यह संभव नही की इस संभन्ध से उनको कठिनाई तो नही ? यह पासुर इस प्रश्न का उत्तर देते हुए दर्शाता है – हलांकि यह संभव है की ऐसे लौकिक संभन्ध से प्रपन्नभक्तों के कैंकर्य मे कठिनाई होगी परन्तु अगर प्रपन्नभक्तों को सच्चे ज्ञान का आभास है (जिवात्मा का आधारभूत तथ्य) तो निश्चित रूप से वे ऐसे अमान्य संभन्धों के प्रती अनासक्ति होगी और आनन्ददायक भगवद्-भागवत कैंकर्य मे संलग्न होंगे ।

विवरण

पण्डे – “पण्डे” शब्द “उयिर्” और “तोण्डम्” शब्दों के साथ संयुक्त होता है तो “पण्डे उयिर् तोण्डम्” वाक्य उपलब्ध होता है । यहा पर जीवात्माओं का स्वाभाविक स्वरूप बतलाया गया है – ज्योकि स्वाभावतः जीवात्मा श्रीमन्नारायण का सेवक है और श्रीमन्नारायण ऐसे जिवात्माओं के आधारभूत है । विशेषतः यह स्वाभाविक स्वरूप अभी उत्पन्न/जागरुक नही हुआ है । यह कालातीत समय से था और यह अटूट स्वाभाविक स्वरूप (जिवात्मा और परमात्मा(श्रीमन्नारायण) (सेवक और स्वामि) के बींच का संबन्ध) का ना तो कोई शुरुवात है और ना अंत है ।

तोण्डम् एनत्तळिन्ड तूमनत्तार्क्कु – इस वाक्यांश मे, स्वामि अरुळळमामुनि ऐसे कुछ लोगों के समूह का वर्णन करते हुए वे उनको “तूमनत्तार्क्कु” शब्द से संबोधित कर रहे है । वे कहते है – ऐसे लोगों को तिरुमंत्र का अर्थ पता है और अतः समझते है की एक जीवात्मा भगवान श्रीमन्नारायण का आज्ञाकारी सेवक है और किसी के पराधीन नही है । यह विचार जो वेदों का सरांश और संक्षिप्त अर्थ है यही तिरुमंत्र मे निहित है ।

उण्डो – क्या (ऐसे संबन्ध) नही है ? इस शब्द मे स्वामि प्रश्न पूछ रहे है – क्या (संबन्ध) नही है (उण्डो) ? इस प्रश्न का संदर्भ उत्तरवर्ति पासुर मे “उरवु” शब्द से की गई है । अतः उण्डो और उरवु शब्दों को जोडकर “क्या ऐसा संबन्ध है” इत्यादि प्रश्न उत्पन्न होता है जिसका उत्तर स्पष्टतः “नही” है ।

पल कत्तुम् तम् उडम्बैप्पार्त्तु अभिमानिक्कुम् – पल कत्तुम् मायने शास्त्रों और वेदों मे प्रस्तुत की गई कई विषयग्राहि तत्वों को सीखना इत्यादि । तम् उडम्बु – भौतिक शरीर से संबंधित है । उदाहरण देते हुए स्वामि कहते है – भौतिक शरीर एक ऐसा जगह है जहा एक जिस प्रकार ब्राह्मण वर्ण से ब्रह्मचर्य नियम जुडा हुआ है उसी प्रकार लोग अपने वर्ण के प्रती अत्यासक्त होकर, भौतिक शरीर को देखते हुए बहुत गर्व से अपने वर्ण से सम्बंधित संबंध को दर्शाते है और इसि विचारों से अपने आप को बहुत ऊँच महान मानते है ।

उलगत्तवरोडु उरवु – उद्घृत है ऐसे लौकिक लोग जो अपने वर्ण से अत्यासक्त होकर वर्ण के आधारपर अपने आप को महान ऊँच मानते है ।

तूमनत्तार्क्कु – यहा हमे तूमनत्तार्क्कु, उरवु, उण्डो इन तीन शब्दों को जोडकर कहना है – ऐसे लोग जिन्हे हम तूमनत्तार्क्कु से संबोधित करते है, ऐसे लोगों का संबंध लौलिक व्यक्तियों से साथ होगा जो केवल भौतिक शरीर से अत्यासक्त वर्ण के आधारपर गर्वित है ?  स्वामि अरुळळ मामुनि कहते है – कदाचित यह संभव नही की ऐसे तूमनत्तारक्कु लोगो का संबंध लौलिक व्यक्तियों के साथ होगा ।

आंतरिक विवरणार्थ

ओम् ( अ, , म् ) – यह शब्द प्रणव से जाना गया है । इस शब्द ने एक जीवात्मा और परमात्मा (भगवान श्रीमन्नारायण – जो ‘अ’ शब्द का अर्थ है) के बींच के संबंध का खुलासा किया है । यह शब्द जीवात्मा को परमात्मा के पराधीन होने का आधारभूत तथ्य को दर्शाता है । जीवात्मा को ‘म्’ शब्द से संबोधित किया गया है । यहा ‘म्’ शब्द से संबोधित जीवात्माओं मे उन जीवात्माओं का वर्णन है जो चित है (विवेक) और अविवेक (अचित) जिवात्माओं का वर्णन नही है । ये जीवात्माये ज्ञान और आनंद के साकार है और अपने स्वामि भगवान श्रीमन्नारायण के पराधीन सेवक है । ऐसे लोग जिन्हे ‘म्’ शब्द का तथ्यार्थ पता है उनको तूमनत्तारक्कु शब्द से संबोधित किया गया है । ऐसे तूमनत्तार लोगों का संबंध लौलिक विषयों मे आसक्त लोगों के साथ कदाचित भी नही होगा । ऐसे लोग जिन्हे ‘म्’ शब्द का अर्थ नही पता हो उनके लिये भौतिक शरीर ही सब कुछ है और आत्मा-शरीर मे भेद करने मे असक्षम है । ऐसे लौलिक लोगों को बहुत गर्व/अभिमान होता है की वे ऐसे उच्छ वर्ण मे पैदा हुए है । इसी कारण ऐसे विभिन्न विचार के लोगों के बींच मे संबंध कदाचित नही होगा । यहा हमे एक संदेह हो सकता है की अगर शायद तूमन्नत्तार लोगों का भेंट ऐसे लौलिक लोगों के साथ हो तो वे उनके प्रती कैसे बरताव करेंगे या क्या कहेंगे ? इसी को दर्शाते हुए स्वामि अरुळळमामुनि से एक घटना को उदाहरण के रूप मे प्रस्तुत किया है –

दक्षिण भारत मे तिरुवहीन्दिरपुरम् नामक स्थान है । उस स्थान मे विल्लिपुत्तूर पगवर नाम के एक ब्राह्मण संयासि निवास कर रहे थे । वह एक ऐसे प्रसिद्ध संयासि थे जिन्होने यह विचार की हर एक चीज़ जिसके माध्यम से भगवान श्रीमन्नारायण को प्राप्त कर सकते है उन सभी का त्याग कर दिया क्योंकि उन्हे मालूम था की ये सारे कभी उपाय नही कहलायेंगे परन्तु श्रीमन्नारायण के चरणकमल ही उपाय और उपेय है । कहते है की वे हर रोज़ नदी के दूसरे ओर जाकर नहाते थे और कदाचित भी उन्होने नदी के समीप तट पर नहाने का प्रयास नही किया क्योंकि वहा स्मार्थ ब्राह्मण नहाते थे । यह किस्सा बहुत दिनो तक चलता रहा । एक दिन ये ब्राह्मण इकट्ठित होकर विल्लिपुत्तूर पगवर स्वामि से पूछे – स्वामि, आप नदी के दूसरे ओर नहाने क्यों जा रहे है बजाय आप नदी के निकट तट पर नहा सकते है जहा हम सभी नहाते है और इस प्रकार से आप क्यों परे मानकर हम सभी से दूरी बनाये है ? इसके उत्तर मे विल्लिपुत्तूर स्वामि ने कहा – हे ब्राह्मणों !! हम लोग भगवान श्री विष्णु ( श्रीमन्नारायण ) के सेवक है परन्तु आप श्रीमान ऐसे ब्रह्मण है जो वर्ण के आधार पर अपना धर्म का अनुसरण कर रहे है । इसी कारण मुझे ऐसे संबंधों मे रुची नही है और यह कदाचित भी संभव नही हो सकता है । श्रीमन्नारायण के सेवक होने की वजह से हमारे और आपके बींच मे दोस्ती , रिश्तेदारि, नाता इत्यादि नही हो सकता है ।

इस प्रकार स्वामि अरुळळ मामुनि ने अपने ज्ञान सार नाम ने ग्रंथ के टिप्पणि मे इस घटना का वर्णन किया है ।

अडियेन् केशव रामानुज दासन्

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ज्ञान सारं – पासुर (श्लोक) १२

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ज्ञान सारं – पासुर (श्लोक) १                                                           ज्ञान सारं – पासुर (श्लोक) १३

                                                                             पासुर (१२)

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माराय् इनैन्द मरुदम् इरत्तवऴ्न्द
सेराररविन्दस्च सेवडियै – वेराग
उळ्ळादार ओण्निधियै तन्तिडिणुम् तान् उवन्दु
कोळ्ळान् मलर् मडन्दै कोन्

 

शब्दार्थ –

मलर्मडन्दै कोन् – भगवान श्रीमन्नारायण पद्म (कमल) मे रहने वालि (श्री महालक्ष्मि) के राजा (स्वामि) है | माराय् इणैन्द मरुदम् – जुडवें राक्षसों (असुरों) के एकमात्र शत्रु भगवान हैं और ये राक्षस एक शाप के कारण मरुद वृक्ष के रूप मे जुड गए | इरत्तवऴ्न्ड – ये राक्षस जो मरुद रूपी वृक्ष मे निवसित थे । वृक्षों के बींच भगवान श्रीमन्नारायण के रेंगने की वजह से जड़ सहित उखड कर विपरीत दिशा मे गिर गए | वेराग उळ्ळदार् ओण्निधियै ईन्दिदिनुम् – यह ज़रूरि नहि है की “लोगों द्वारा भगवान को समर्पित किया गया धन को भगवान स्वीकार करेंगे” क्योंकि यह विचार अनुचित है और भगवान के ऐसे | सेरार् अरविन्दम् सेवडियै – (जिनके चरण कमल कीचड मे खिलने वाले एक लाल रंग के कमल के जैसे है) चरण कमलों का आश्रय ना लेते है | तान् उवन्दु कोळ्ळान् – निश्चित रूप से भगवान श्रीमन्नारायण हृदयपूर्व उन लोगों का समर्पण कदाचित भी स्वीकार नही करेंगे |

भूमिका

जिन लोगों को भगवान श्रीमन्नारायण के कमल चरणों के प्रती आसक्ति नही होती है, और भगवान श्रीमन्नारायण से लौकिक विषयों की परिपूर्णता मे आसक्ति रखते हुए भेंट समर्पित करते है भगवान सदैव हृदयपूर्वक ऐसे समर्पणों का तिरस्कार करेंगे ।

विवरण

माराय् इणैद मरुदम् इरत्तवऴ्न्द – यमलार्जुन वृक्ष जो अभिन्न और जुडवें थे जिन्होने भगवान श्रीकृष्ण को अपना शत्रु मान लिया था, ऐसे वृक्षं के बींच मे श्री कृष्ण के रेंगने से जड़ समेत उखड कर गिर गए ।

पहले की घटना – एक बार माँ यशोदा श्री कृष्ण को बिस्तर मे लेटाकर यमुना नदी मे स्नान करने हेतु चली गई । उनके जाने के पश्चात श्री कृष्ण को भूंख लगी । कहा गया है की हर रोज़ माँ यशोदा श्री कृष्ण को दूध पिलाति थी और इस कारण अपनी माँ को अपने समीप न पाकर परेशान श्री कृष्ण ने पास मे स्थित पहिये को लात मारा । लात मारने की वज़ह से पहिये मे निवसित असुर तुरन्त मर गया ।

शापग्रस्त नलकूवर और मणिग्रीव (जो जुडवे मरुद वृक्षों के रूप मे नन्दगोप के आंगन मे स्थित थे), का उद्धार भगवान ने अपने दामोदर लीला मे किया । यह लीला के पहले – श्री कृष्ण घर के पास रहने वालि गोपिकावों के घर से माखन चुरा कर माखन का आनन्द ले रहे थे । यह जानकर वे सारी गोपिकायें माँ यशोदा से श्री कृष्ण के इस स्वभाव पर शिकायत करती है । एक एक कर सारे वृन्दावन के निवासियों के शिकायत सुनकर और यह बर्दाश्त नही कर पाते हुए तुरन्त श्री कृष्ण को घर मे स्थित एक ओखलि से बान्ध देती है और अपने कामकाज मे जुट जाति है । श्री कृष्ण बाल्यावस्था मे होने के कारण उनको समझ नही आया की वे अब क्या करें । वे अपने आंगन की ओर ओखलि को अपने साथ घसीटते हुए ले गए और ले जाते हुए वे दो वृक्षों मे बींच मे फँस गए । ओखलि चौड़ा होने के कारण से उन दो वृक्षों के बींच मे से घुस नही पाई । श्री कृष्ण ने बलपूर्वक प्रयत्न किया और इसी प्रयत्न मे उनके दिव्य जांघ दोनो वृक्षों को रगड़े और इसी कारण दोनो वृक्ष उखडकर गिर गए । असुर रूपी गौणदेवता के पुत्र जो मरुदरूपि वृक्षों मे निवसित थे उनका नाश इस प्रकार हुआ । एक और दृष्टि कोन से देखा जाये तो हमारे आऴ्वारों को यह लगा की ये अभिन्न विशाल वृक्ष केवल कंस के विश्वसनीय राक्षस थे जो कंस की आज्ञा से भगवान श्री कृष्ण को मारने हेतु नन्दगोप के आंगन मे प्रकट हुए और जिनका नाश श्री कृष्ण ने स्वयम किया । अतः अगर कोई किसी के खातिर श्री कृष्ण का विरोधी बन जाए अन्ततः उनको श्री कृष्ण के हाथों मे परास्त होना पडेगा और शत्रु चाहे कोई भी हो भगवान श्री कृष्ण निश्चित रूप से उनका विनाश करेंगे ।

सेराररविन्दस्च सेवडियै – श्रीमन्नारायण भगवान के चरणकमलों का रंग एक ताज़ा खिले हुए कमल के जैसा है जो अभी अभी सरोवर / तालाब मे प्राकृतिक समायोजन से खिला हो । सेवडि अर्थात लाल रंग के चरणकमल । यहा द्रविद भाषा के व्याकरण (यएपुलि कोडल्) के अनुसार उनके चरणकमल केवल लाल रंग को ही नही दर्शाते है परन्तु इस सौन्दर्य से सम्युक्त प्रत्येक लक्षण जैसे शीतलता, महक इत्यादि को भी दर्शाते है । श्री पराशर मुनि श्री विष्णुपुराण मे इस लीला का वर्णन करते है और इस लीला मे भगवान श्री कृष्ण के लाल आखों के सौन्दर्य की स्तुति करते है जब श्री कृष्ण भगवान ओखलि की ओर मुढते हुए गिरे वृक्षों को देख रहे थे । यद्यपि श्री अरुळळमामुनि ने भगवान के लाल आखों की स्तुति न करते हुए उनके लाल चरणकमलों की स्तुती किये जिसे श्री मणवाळमामुनि ने उल्लिखित पासुर के व्याख्यान मे कहे |

पोरुन्दिय मामरुदिन् इडै पोय वेम्
पेरुन्तागै उन् कऴल कणिये पेदुत्रु
वरुन्दि नान् वासग मालै कोन्डु उन्नये
इरुन्दु इरुन्दु एत्तनै कालम् पुलम्बुवने – तिरुवाय्मोऴि ३-८-१०

कहते है – श्री नम्माऴ्वार भी भगवान के ऐसे चरणकमलों का आश्रयानन्द लेना चाहते थे जिन चरणकमलों से उन्होने उन दो वृक्षों मे स्थित नलकूवर और मणिग्रीव का उद्धार किया । (पोन्नमाय् मा मरुदिन् नडुवे एन् पोल्लामणिये – इत्यादि पासुर से)

वेराग उळ्ळादार – यहा उन लोगों का उल्लेख है जिनके के लिये श्रीमन्नारायण के चरणकमल ही सर्वश्रेष्ट और अत्यानन्ददायक है और जो अन्य लौकिक विषयों मे अनासक्त है ।

ओण्निधियै तन्तिडिनुम् – यदि पूर्वलिखित लोग भगवान को महत्तम धन भेंट मे दे

तान् उवन्दु कोळ्ळान् मलर्मडन्दै कोन् – श्री कृष्ण (तिरुवुकुम् तिरुवागिय सेल्वन्) जो साक्षात भगवान श्रीमन्नारायण है, ऐसे भगवान खुद श्रीमहलक्ष्मी (पेरियपिराट्टि) को भी “तिरु” देते है (यानि श्री महालक्ष्मी को अपने चरणकमलों का सेवा का सौभाग्य देते है) । अतः भगवान सम्पूर्ण ( परिपूर्ण/आत्माराम – श्रीमद्भागवतम् १.७.१० ) है । अपनी परिपूर्णता को निभाने / पूर्ण करने के लिये भगवान अन्य जीवों से कुछ भी अपेक्षा नही करते है । इसीलिये कहते है की ऐसे लौकिक लोगों का भेंट भगवान हृदयपूर्वक स्वीकार नहि करते | अगर भगवान सम्पूर्ण (परिपूर्ण) नही होते तो यह निश्चित है की वे समर्पित धन को स्वेछा और सर्वोच्च तृप्ति से स्वीकार करते । चूंकि भगवान परिपूर्ण है इसीलिये हम यह कह नही सकते की भगवान हृदयपूर्वक ऐसे समर्पित धन को स्वीकार करेंगे । हलांकि कहा गया है की – भगवान भक्तों के विचार धारणा को ध्यान मे रखते हुए समर्पित धन को हृदयपूर्वक स्वीकार करते है । इस पासुर के अनुसार हम यह कह सकते है की – भगवान उन लोगों के ऐसे समर्पण को केवल स्वीकार करने हेतु ही स्वीकार करते है परन्तु वस्तविकता मे इसके पींछे कोई सुख और आनन्द नही है । चूंकि भगवान एक ही है जिनपर प्रत्येक जीव निर्भर है, अतः ऐसे जिवों का समपर्ण भगवान स्वीकार करते है । अगर भक्त भगवान को हृदयपूर्वक भेंट (जो चाहे कुछ भी हो – पत्र, पुष्प, फल, धन, मन, तन इत्यादि) समर्पित करता है, उसी के अनुसार भगवान अत्यधिक खुश होकर उस भक्त से भी ज़्यादा हृदयपूर्वक होकर उस भेंट को स्वीकार करते है । इसी कारण से ऐसे इस भावना को हमारे माता-पिता के भावना से तुलना किया गया है । जिस प्रकार माता-पिता अपने मान्य स्वभाव के सन्तान के द्वारा समर्पित सब कुछ स्वीकार करते है और कभी कभी अमान्य स्वभाव के बच्चे के भेंट को भी स्वीकार करते है उसी प्रकार की भावना भगवान मे भी प्रतीत होता है क्योंकि आखिरकार भगवान एक जीव के लिये माता-पिता है ।

अडियेन् केशव रामानुज दासन्

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ज्ञान सारं – पासुर (श्लोक) ११

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श्री:
श्रीमते शठकोपाय नम:
श्रीमते रामानुजाय नम:
श्रीमत् वरवरमुनये नम:

ज्ञान सारं

ज्ञान सारं – पासुर (श्लोक) १०                                                                                     ज्ञान सारं – पासुर (श्लोक) १२

पासुर ११

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तन् पोन्नडि अन्ऱि माट्रोन्ऱिल् ताज़्ह्वु सेय्या
अन्बर् उगन्दिट्टदु अणु एनिनुम् – पोन् पिऱज़्हुम्
मेरुवाय्क् कोळ्ळुम् विरैयार् तुज़्हाय् अलन्ग्कल्
मारि माक् कोण्डल् निगर् माल्

शब्दार्थ

तन् पोन्नडि अन्ऱि माट्रोन्ऱिल् ताज़्ह्वु सेय्या अन्बर्श्रीमन्नारायण के ऐसे प्रपन्न भक्त जो भक्ति से परिपूर्ण है जिनको अपनी पर्वाह और अन्य लाभों की चिन्ता ना करते हुए केवल भगवान के चरण कमलों की चाह है। उगन्दिट्टदु अणु एनिनुम्भगवान श्रीमन्नारायण को समर्पित वस्तु चाहे एक परमाणु के सामान छोटा हो | विरैयार् तुज़्हाय् अलन्ग्कल् मारि माक् कोण्डल् निगर् माल्तिरुमाळ श्रीमन्नारायण जो तुलसी के हार से सुशोभित है, जिनका वर्ण बारिश के पानि से भरपूर काले बादल के वर्ण के समान है | पोन् पिऱज़्हुम् मेरुवाय्क् कोळ्ळुम्(वह) उन समर्पित वस्तुवों को रत्नों से भर पूर मेरु पर्वत की तरह स्वीकार करते है

भूमिका

नवें पासुर “आसिल् अरुळाळ” मे, स्वामि अरुळळपेरुमाळ एम्बेरुमानार ने समझाया की कैसे भगवान श्रीमन्नारायण उन लोगों के हृदय मे निवास करते है जिनको भगवान और पिराट्टि के अलावा अन्य चाह नही है।अब दसवें पासुर “नालुम्उलगै” मे, स्वामि ने समझाया की कैसे श्रीमन्नारायण उन लोगों के हृदय मे रहते जो भगवान ने चरणकमलों के अतिरित भौतिक विषयों मे आसक्त है।इस पासुर मे, स्वामि आगे बड़ते हुए समझाते है की कैसे भगवान के शुद्ध भक्तों के द्वारा निष्कलंक भक्ति भाव से समर्पित वस्तुओं (चाहे वह कितना भी छोटा हो) को कैसे भगवान श्रीमन्नारायण स्वीकार करते है। स्वामि कहते है की भक्त द्वावा समर्पित छोटी सी चीज़ को भगवान श्रीमन्नारायण कैसे अत्यन्त प्रेम-भावना से स्वीकार करते है। ठीक इसी तरह “पोय्यामोळि”  इस बात को दोहराता है “तिनै तुणैनन्रिसेयिनुम्पनैतुणयागकोळवर्पयन्तेरिवार्”. कम्बनाऽताळ्वार  “उयम्दर्वरुकुउदवियोप्पवे” से उस भगवान को संबोधित करते है जिन्होने अपने चरण कमलों से इस पूरे विष्व को परिमित किया था।

भावार्थ

तन्पोन्नडिअन्रि – “तन्” उस हालात / स्थिति को दर्शाता है जहाँ भगवान श्रीमन्नारायण स्वाभाविक रूप से हर एक जिवात्मा मे बिना किसी कारण से उपस्थित है। “पोन्नडिअन्रि” श्री मन्नारायण के दिव्य भव्य सुंदर वांछनीय चरण कमलों से संदर्भित है।यहा “तन्पोन्नडि” मायने प्रत्येक जीव को उनके चरण कमलों का बराबर का हक है। “पोन्नडि” मायने ऐसे चरण कमल जो सुंदरता और आनन्द लेने-देने मे सर्वोच्च है।

माट्रोन्रिलताळवुसेय्यान्बर – पूर्वोक्त वाक्यांश मे बताया गया है की श्रीमन्नारायण के दिव्य चरण कमल अत्यन्त सुन्दर है और प्रत्येक जीव को उन चरण कमलों पर बराबर का आधिकार है। अतः यह वाक्यांश उन लोगों के बारें मे बताता है जिनके लिये श्रीमन्नारायण के दिव्य चरण कमल ही सब कुछ है और इनके अतिरित वे किसी अन्य विषयों मे आसक्ति नही है। “माट्रोन्रु” शब्द का अर्थ भौतिक जगत की संपत्ति है जिसके माध्यम से एक बद्ध जीव विषयासक्त होकर आनन्द लेता है जैसे कैवल्य जिसमे एक जीव खुद की आत्मा की खुशी का आनन्द लेता हो इत्यादि। “तळवु” शब्द मायने अपमान जनक अंदाज़ से और इसका अर्थ है – “निम्नश्रेणिसेसंबन्धितकुछभी” । यह शब्द श्री मन्नारायण के चरण कमलों के अतिरित प्रत्येक वस्तुओं को प्रस्तुत करता है। इस संदर्भ मे तिरुवाय्मोलि के २. १०.२ पासुर  “सदिरिळमडवार्ताळिचियैमदियादु” का उल्लेख योग्य है। तिरुवाय्मोलि के इस पासुर का “ताळ्चि” शब्द और हमारे पासुर का “ताळवु” शब्द का एक ही अर्थ है। यही विचार “ताळ्चिमाट्रुएन्गुम्तविर्तु” वाक्यांश से प्रतिपादित है – “अळ्वार कहते है श्रीमन्नारायण के चरण कमलों के अतिरित किसी भी अन्यवस्तुओं मे आसक्ति’ यह अधम प्रवृत्ति दर्शाता है” । अतः हम साबित कर सकते है की ऐसा भागवतों का समुदाय है जो कदाचित भी श्रीमन्नारायण के चरण कमलों के अतिरित किसी भी अन्य विषयों मे तल्लीन नही होते है।

उगन्दिट्टदु “उगपु” शब्द मायने खुशी / खुशहालि और “इट्तदु” शब्द मायने “दूसरोंकेदेना” । अतः यह पूर्ण शब्द का अर्थ है – “वह चीज़ जो बहुत खुशी से दिया गया हो” ।इस संदर्भ मे पूर्वाचार्य कहते है – दो प्रकार के सेवक होते है।पहला जो शास्त्रों के आधार पर सेवा कर रहा है। वह (सेवक) केवल सेवा करने हेतु ही सेवा कर रह है क्योंकि उसे सेवा करने को कहा गया है। इसके विपरीत मे दूसरा (सेवक) है जो अपने प्रेम भक्ति-भावना से सेवा कर रहा है।उदाहरण मे पूर्वाचार्य कहते है – एक पत्नि अपने पति के लिये जो भी करती है वह शास्त्रों के नियमानुसार ही होता है और जिसके माध्यम से वह अपने पति से कैसे बर्ताव करे यह जानती है। तिरुवळ्ळुवर इस संदर्भ मे कहते है – “तर्कातुतर्कोन्डान्पेनि” यानि जब एक पति अपनी पत्नि के खातिर सारे काम-काज़ करता है वह पत्नि के प्रति अत्यधिक प्रेम भावना को दर्शाता है। एक भक्त को इस प्रकार का सेवक होना चाहिये बजाय शास्तों द्वारा विवश होकर सेवा नही करना चाहिये। सेवा सदैव भगवान श्रीमन्नारायण के प्रति शुद्ध प्रेम और भक्ति से करनी चाहिये। इसी कारण श्रीनम्माळ्वार अपने तिरुवाय्मोळि “उगन्दुपनिसेय्दु” पासुर मे यह बताते है।

उट्रेन् उगन्दु पणि सेय्दु उन पादम्
पेट्ट्रेन्, ईधे इन्नम्वेण्डुवदेन्दाई
कट्टार्मरै वानर्गल्वाळ तिरुपेरार्कु
अट्ट्रार्अडियार्तमकु अल्लल्निल्लावे (१०.८.१०)

अतः ऐसे भक्त जो अपने अपरिमित निष्कलंक प्रेम भक्ति भाव को श्रीमन्नारायण के लिये प्रकट करते है , वह चाहे कितना भी कम हो, भगवान श्री मन्नारायण सिर्फ़ इसी का आनन्द लेते है और कुछ नही।

पोन्पिरळुम्मेरुवाय्कोळ्ळुम् – श्री मन्नारायण सदैव परिपूर्ण प्रेम से समर्पित वस्तुओं का सम्मान मेरू जितना विशाल पर्वत से करते है जो विशेष अनमोल रत्नों औ रमणियों से भर पूर है और जो इनके कारण चमक्ता है। अगर वह (भगवान) ऐसे होते की सम्पदा से सम्पन्न होने लिये उन्हे इन सबकी ज़रूरत है, तो वह भक्तों द्वारा समर्पित भेंट से पूर्णता को प्राप्त करते । अतः वह धनवान होने के लिये इन तुछ अल्प चीज़ों के लिये तरसते। इस कारण “अल्पतनम्” शब्द से संबोधित किया जाना चाहिये अर्थात जो ऐसे तुछ लघुना समझ वस्तुओं के प्रति तरस्ते है। परन्तु वास्तव मे, वह ऐसे नही है। वह परिपूर्ण है, वह आत्माराम है, निष्कलंक है, जो दोष रहित है। अतः स्वाभाविकरूप से उन्हे यह आवश्यक्ता नही की वे ऐसे किसी पर निर्भर हो और ऐसे चीज़ों के लिये तरसे की वह अपने दोषों का नाश करे या धनवान हो। अतः उनके भक्त चाहे कितने कम मात्रा मे भेंट दे भगवान पूर्ण संतुष्टि से स्वीकार करते है और इसका सम्मान मेरु पर्वत के बराबर करते है। इस प्रकार के भगवान श्री मन्नारायण का वर्णन अगले परिच्छेद मे है।

विरैयारतुळायलन्ग्कल्मारिमाक्कोण्डाल्निगरमाल् – श्रीमन्नारायण हि ऐसे पूर्ण पुरुषोत्तम है जो तुलसि माल से विराजमान होकर खडे है। जिनके शरीर का वर्ण काले बारिशवाले बादलो के वर्ण के समान है। “विरै” मायने सुगंधित , “अलन्ग्कल्” मायने माला, “मारि” मायने बारिश, “मा” मायने बडे, “कोण्डल्” मायने बादल।

तत्वसार – चूंकि वह जो परिपूर्ण है से वर्णित है, जिसके प्रति शुद्ध भागवत अपने हृदय और बुद्धि मे उनके दिव्य चरण कमलों के सिवा य अन्य को नही रखते, ऐसे भगवान उन भक्तों को विभिन्न आभूषणों से सुसज्जित अपना दिव्य सुंदर रूप की सौंदर्यता को अधिकाधिक रूप से दर्शाते है। अतः इस प्रकार वह अपने भक्तों को अपने प्रति आकर्शित कर चिपकाये हुए रखते है जिसके कारण उन भक्तों की भक्ति अत्यधिक रूप से बढती जाती है। अन्ततः इस पासुर का सही अन्वय क्रम इस प्रकार से है – “विरैयार्तुळाय्अलन्ग्कल्मारिमाक्कोण्डल्निगर्माल्तन्पोन्नडि अन्रिमाट्ट्रोन्रिल्ताळ्वुसेय्याअन्बर्उगन्दिततडु अणुएनिनुम्पोन्पिरळुम्मेरुवाय्क्कोळ्ळुम् ” जो सही सार दर्शाता है।

 

अडियेन् केशव रामानुज दासन्

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thiruvAimozhi – 1.3.8 – nALum ninRadu

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Previous pAsuram

Tirupati-Thayar-Balaji

Introduction for this pAsuram

Highlights from thirukkurukaippirAn piLLAn‘s introduction

No specific introduction.

Highlights from nanjIyar‘s introduction

Eighth pAsuram. nammAzhwAr explaining sriya:pathithvam (being the husband of srI mahAlakshmi) that is the basis for emperumAn being worshippable, says that in the beginning of such worship, all obstacles for such worship will be eliminated.

Highlights from vAdhi kEsari azhagiya maNavALa jIyar‘s introduction

Subsequently, AzhwAr says that on approaching the lotus feet of sarvEsvaran who is srIya:pathi, the obstacles for such surrender and the ultimate materialising of the result will be destroyed.

Highlights from periyavAchchAn piLLai‘s introduction

Similar to nampiLLai‘s introduction.

Highlights from nampiLLai‘s introduction as documented by vadakkuth thiruvIdhip piLLai

Some people ask “You are saying at least surrender to emperumAn now. But we have accumulated sins since time immemorial. How do we eliminate that? Do we have time to surrender unto him?” AzhwAr replies “When you get ready to surrender, your obstacles will be destroyed. Since you are surrendering to sriya:pathi (husband of srI mahAlakshmi), don’t think that you have lost your opportunity. Even if you are too old and walking with a stick, you can fall at his lotus feet with the stick and will still be protected”.

pAsuram

nALum ninRadu nama pazhaimai am kodu vinai udanE mALum
Or kuRaivillai mananaga malamaRak kazhuvi
nALu nam thiruvudai adigaL tham nalam kazhal vaNangi
mALumOr idaththilum vaNakkodu mALvadhu valamE

Word-by-Word meanings (based on vAdhi kEsari azhagiya maNavALa jIyar‘s 12000 padi)

mananagam – in  the heart
malam – dirt which is created due to confusion on thrimUrthi sAmyam (brahmA vishNu rudhra being considered equal)
aRa – to remove
kazhuvi – purified through knowledge
nALum – everyday which is dear to us
nam – for us
thiruvudai – srImAn (one who has srI mahAlakshmi)
adigaL tham – unto the swAmi (master)
nalam – approachable by all, most enjoyable
kazhal – lotus feet
vaNangi – surrendering
nALum – everyday
ninRu – always being with us
adum – torturing
nama – accumulated by us knowingly
pazhamai – eternal, always existing since time immemorial
am kodu – most cruel
vinai – pApams (sins) such as akruthya karaNa (indulging in the prohibited acts) etc
udanE – at the time of surrender
mALum – will be destroyed
Or kuRaivillai – nothing to worry
mALumOr idaththilum – even while leaving the body
vaNakkodu – with surrender
mALvadhu – dies
valam – strong

Simple transalation (based on vAdhi kEsari azhagiya maNavALa jIyar‘s 12000 padi)

By purifying one’s heart through knowledge eliminating the dirt of considering the three dhEvathAs (brahmA, vishNu, rudhra) to be equal and surrendering unto the most enjoyable and easily approachable lotus feet of our swAmy (master) srIman nArAyaNan who is the husband of srImahAlakshmi, we can eliminate the most cruel sins which were accumulated by us knowingly and which have tortured us every day, during such time of surrender. Even if we are able to surrender at the last moments of our life, it will be strong enough.

vyAkyAnams (commentaries)

Highlights from thirukkurukaippirAn piLLAn‘s vyAkyAnam

Similar to vAdhi kEsari azhagiya maNavALa jIyar‘s translation. In addition, piLLAn says “Even if those who realise this at the last moments of their life are unable to engage in bhakthi yOgam for even a small period of time, just an anjali (namaskAram with folded hands) or even a word or even a thought towards emperumAn is better than such bhakthi yOgam”.

Highlights from nanjIyar‘s vyAkyAnam

Similar to piLLAn‘s vyAkyAnam.

Highlights from periyavAchchAn piLLai‘s vyAkyAnam

Similar to nampiLLai‘s vyAkyAnam.

Highlights from nampiLLai‘s vyAkyAnam as documented by vadakkuth thiruvIdhip piLLai

  • nALum ninRadum – continuously torturing. Though emperumAn‘s svarUpam (true nature) and guNams (auspicious qualities) are existing eternally, his qualities are subservient to him. Similarly, though jIvAthmA is eternal and eternally subservient to emperumAn, jIvAthmA‘s connection with achith (matter) in samsAram is also going on since time immemorial.
  • nama – our own. It is said in sAtyAyana sAkhA “suhrudhassAdhukruthyAm dhvishantha: pApakruthyAm” (Friends receive the result of pious deeds and enemies receive the result of sinful deeds) – unlike that these were caused by our own deeds which were done knowingly. nampiLLai explains here ALavandhAr‘s sthOthra rathnam 25th pAsuram “abhUthapUrvam…” where ALavandhAr says that he suffers the results of many sinful deeds from past and present and it is only inappropriate for emperumAn to allow such sufferings to happen to the ones who are surrendered unto him.
  • pazhamai – this is not something from recent past, but ancient.
  • am – krauryam – cruel nature. Explanation in arumpadham – “am” generally means beautiful. But this is called viparItha lakshaNai – for example, in thamizh “nalla pAmbu” refers to cobra, a very poisonous snake, though “nalla” means good.
  • kodu vinai – those which are only exhausted by experiencing the fruits of the actions.
  • udanE mALum – will be immediately eliminated while approaching emperumAn. chAndhOgya upanishath 5.25 explains this principle “yathEshIkathUlamagnau prOtham pradhUyEtha Evam hAsya sarvE pApmAna: pradhUyanthE” (Just like cotton gets burnt fully in fire, all his sins are destroyed). Similar principle is explained in vishNu dharmam 78th chapter SlOkam as well “mErumantharamAthrOpi…” which explains that one who approaches krishNa, even if his sins amount to the size of mEru mountain, they will be removed just like a disease is removed by the doctor. These 2 statements explain the removal of previously committed sins.
  • Or kuRaivillai – [anishta nivruththi (removal of unfavourable aspects)] There won’t be any further obstacles [In the arumpadham, to establish that the future sins will be eliminated, the author quotes chAndhOgya upanishath 4.14.3 “yathA pushkarapalAsa ApO na slishyanthE Evam Evamvidhi pApam karma na slishyathE” (Just like water does not stay on a lotus leaf and just slides down, for the one who has this brahma vidhyA, the sins will not stay and he will be unaffected by them)]. Subsequently it can also be said as all the favourable aspects will be attained. In gIthA 9.31, bhagavAn says “kaunthEya prathigyAnIhi na mE bhaktha: praNasyathi” (arjuna! you declare that my devotee never perishes). Devotees and sins are like fire and soaking – unrelated. nampiLLai then explains mahAbhAratha sAnthi parva slOkam “dhurAchOpi sarvAsI kruthagna: nAsthika: purA samAsrayEdh…prabhAvAth paramAthmana:” – Even when a person was previously having bad manners/discipline, eating that which is not to be eaten , ungrateful to those who helped him, disrespecting vaidhika principles, etc., if he is surrendered to srIman nArAyaNan, he is explained to be pure. Considering him to be lowly is to disrespect bhagavAn‘s glories. This is also explained in mahAbhAratham (sahasranAma adhyAyam – pala sruthi) “na vAsudhEva bhakthAnAm asubham vidhyathE kvachith” (For the one who has devotion towards vAsudhEva, there will be no inauspiciousness).
  • mananaga malamaRak kazhuvi – should not be bewildered seeing vishNu in between brahmA and rudhran and always having pure faith that sarvEsvaran is our protector. One should have the faith as in nAnmugan thiruvandhAdhi 68 “thiruvadi than nAmam maRandehum puRam thozhA mAndhar” (Even if forgetting srIman nArAyaNan, one should not worship others).
  • nALum – every day, any day. One cannot touch ocean/sea on aparva kAlam (parva kAlam – EkAdhasi, paurNami, amAvAsyai, mAsa pravEsam) [Explanation in arumpadham – It is forbidden to see and touch peepal tree and ocean/sea everyday – peepal tree can only be seen on Tuesdays and ocean/sea can only be touched on parva kAlam] – this is in connection with next phrase, which says that emperumAn’s relationship with thAyAr is eternal/always.
  • nam thiruvadai adigaL tham – unto our master who is always having srI mahAlakshmi (on his chest) – this explains nithyayOgam – eternal togetherness of perumAL and thAyAr. nanjIyar asks bhattar “When one surrenders to sarvEsvaran, he is going to be delivered by bhagavAn. What is the need for the purushakAram (recommendation) of thAyAr?” bhattar replies “It is explained in this pAsuram by AzhwAr that one should approach perumAL with the purushakAram of thAyAr”. He continues “This is because, when a jIvAthmA surrenders to emperumAn, thAyAr will keep him under her protection and when bhagavAn turns towards her, she will make him ignore the faults of the jIvAthmA and accept him. Thus one should approach emperumAn through thAyAr”.
  • nalam kazhal – good feet – those lotus feet which will accept those who surrender with the purushakAram of thAyAr without seeing their defects.
  • mALumOr idaththilum – Even at the last moment of one’s life.
  • vaNakkodu mALvathu valam – Instead of being as rAvaNa said in srI rAmAyaNam yuddha kANdam 36.11 “dhvidhA bhajyEyamapyEvam na namEyam…” (Even if I am cut into two, I will not worship any one), even at the last moment if one dies with a bowed head, that will be better.
  • valamE – strong/best. Instead of approaching him and others, even if he is approached at the end of one’s life, it will lead to fruitful result. From this we can understand that, even if one is surrendered to someone other than bhagavAn throughout one’s life, there is no benefit; but if one surrenders even at the last moment to bhagavAn, (best) result is certain to be accomplished.

In the next article we will the next pAsuram.

adiyen sarathy ramanuja dasan

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