ज्ञान सारं – पासुर (श्लोक) ४०

श्री:
श्रीमते शठकोपाय नम:
श्रीमते रामानुजाय नम:
श्रीमत् वरवरमुनये नम:

ज्ञान सारं

ज्ञान सारं – पासुर (श्लोक) ३९ 

पाशुर ४०:

Arjuna_meets_Krishna_at_Prabhasakshetra

अल्लि मलर पावैक्कन्बर अडिक्कन्बर
सोल्लुम अविडु सुरुदियाम नल्ल
पड़ियाम मनु नूर कवर सरिदै पार्वै
सेडियार विनैत तोगैक्कुत ती

प्रस्तावना:

“आचार्य भक्ति” और “भक्तों के भक्त” के विचार को पिछले कई पाशुरों में विस्तार से बताया गया है। इसके बावजूद भागवतों का महत्त्व और गंभीरता सांसारिक लोगों को बल देकर समझाना होगा। यह भागवत जन निरन्तर आचार्य और दूसरे भागवतों के बारें में वार्ता करते है। उनका कार्य ही आचार्य और दूसरे भागवतों के प्रति कैंकर्य है। अत: उनके शब्दों और कार्य में हमेशा आचार्य और दूसरे भागवत ही रहते हैं। इनके विचार सांसारिक लोगों के विचार से पूर्णत: विपरीत हैं। इस विषय के उदाहरण के लिये हम श्रीआन्ध्रपूर्ण स्वामीजी कि कथा देख सकते हैं। एक समय कि बात हैं श्रीरंगम मे पेरिया तिरुनाल उत्सव चल रहा था और भगवान श्रीरंगनाथ कि पालखि श्रीरंगम कि गलियो से गुजर रही थी। श्रीरामानुज स्वामीजी के एक महान शिष्य थे “श्रीआन्ध्रपूर्ण स्वामीजी” जो अपने आचार्य श्रीरामानुज स्वामीजी के सिवाय और किसी को जानाते हीं नहीं थे। श्रीरामानुज स्वामीजी भगवान कि आराधन के लिये बाहर गये हुवे थे। अपने साथ श्रीआन्ध्रपूर्ण स्वामीजी को न पाकर श्रीरामानुज स्वामीजी ने पुकारा “हे! आन्ध्रपूर्ण भगवान कि पूजा करने के लिये इधर आवों”। तब श्रीआन्ध्रपूर्ण स्वामीजी श्रीरामानुज स्वामीजी के लिये दूध गरम कर रहे थे। जब उन्होंने श्रीरामानुज स्वामीजी कि आवाज सुनी तो कहा कि “अगर अडिएन आपके भगवान कि आराधन करने के लिये बाहर आता तो उनका ध्यान दूध गरम करने के कैंकर्य से हट जाता तब मेरे भगवान (जो और कोई नहीं श्रीरामानुज स्वामीजी है) के लिये दूध न रहता”। अगर कोई सांसारिक मनुष्य यह कथा देखता है और श्रीआन्ध्रपूर्ण स्वामीजी के स्वभाव को देखता है तो उसके रोज के दिनचर्या से बहुत विपरीत होगा। अत: वह सांसारिक जीव ऐसे लोग और उनके कार्य के प्रति अपमानजनक शब्द कहेंगे। वह संसारी यहीं नही रुकेगा। यह उन भागवतों के लिये भी सत्य है जो भगवान के भक्त है। ऐसे जन भी श्रीआन्ध्रपूर्ण स्वामीजी और उनके जैसे भक्तों के प्रति गलत या निषेधात्मक शब्द का प्रयोग करेंगे। वह यह कह सकते हैं “भगवान के प्रति इन लोगों कि आज्ञा का पालन देखिये और यह लोग आचार्य और अन्य जनों के पीछे जा रहे है। अन्त मे तो भगवान ही सब पर कृपा करेंगे और ऐसा हैं तो क्यों ये लोग दूसरे लोगों के पीछे घूमते है”। अब यह प्रश्न आता है कि भक्तों के भक्त प्रति क्या होता है अगर इनके उपर शिकायत आती है। यह पाशुर जो सांसारिक लोग और भगवान के भक्त शिकायत करते है उन प्रश्नों का उत्तर देता है। इन जवाबो के अलावा श्री देवराज मुनि स्वामीजी इन महान आत्मा की भाषाए, कार्य और अनुभव को सांसारिक लोगों से पूर्णत: विपरीत बताते है। यह अपने आप मे एक कीर्ति हैं।

पाशुर ४० अर्थ: अविडु सोल्लुम – वह हास्यजनक चर्चाये; अडिक्कन्बर – भक्तों कि जो चरण कमल में है; अंबर – भगवान के जो प्रेमी है ; अल्लि मलर पावैक्कु – पेरिया पिराट्टी का ; सुरुदियाम – स्वयं वेदों के बराबर है ; कवर सरिदै – उनकी गतिविधियाँ ; मनु नूर नल्ल पड़ियाम – मनु धर्म शास्त्र के लिये एक उच्च उदाहरण है ; पार्वै – उनकी दूरदृष्टी ; ती – अग्नि के तरह कार्य करती है ; विनैत तोगैक्कुत – बुरे कर्मो का नाश करने के लिये जो ; सेडियार – एक व्यक्ति को डुबाती है।

स्पष्टीकरण:

अल्लि मलर पावैक्कन्बर अडिक्कन्बर: भगवान श्रीमन्नारायण हमेशा अपने पत्नी पेरिया पिराट्टी से प्रेम करते है जो उनके कमल पुष्प से आयी हैं। क्यों भगवान हमेशा उनकी पत्नी के साथ रहते दिखते है उसके लिये एक कारण है। हमें यह समझाने के लिये कि भगवान कि कृपा के लिये सबसे पहिले अम्माजी का पुरुषकार होना आवश्यक हैं। उनकी कृपा और आशिर्वाद भगवान

कि पहचान बनाता है जिससे हम उन्हे जान सके। यह हमें यह भी दिखाता हैं कि भगवान अम्माजी के प्रति अतृप्त प्रेम व्यक्त करते है। अत: जो भगवान के चरण कमलों में हो जो अपने पत्नी से प्रेम करता हो उसे “अल्लि मलर पावैक्कन्बर अडिक्कन्बर” कहकर बुलाते हैं। वह प्रेम जो यह भक्त भगवान के चरण कमल के प्रति बताते उनकी पहिचान बताते हैं। सोल्लुम अविडु सुरुदियाम: ऐसे भक्त कुछ हास्यजनक और अलग बात बोल सकते है। हालाकि वो जो भी कहते है उसमे वेदों के जैसे हीं विश्वसनीयता है । गुरूपरम्परा मे हम ऐसे शब्दों को देख सकते है। उदाहरण के लिये “उड़यवर वार्ता”, “भट्टर वार्ता”, “कुरेश वार्ता”, “कलिवैरिदास वार्ता”, “तिरुकोलूर वार्ता” शामिल हैं। यह वार्ताएं इन महान पूर्वाचार्यों से कही गयी हैं। वह बहुत महान गुप्त और बहुत ही आनंदित मतलब सरल तरिके से पहूंचाते है। जो श्रीराम अपने भाई लक्ष्मण के लिये वाक्य का प्रयोग करते है उसको दर्शाने के लिये कंबनाताज्वार “वाई तंधना कूरुधियों मरई तंधा वायाल” का प्रयोग करते है। “पेडयैप पीड़िट्टु तन्नै पीड़िक्का वंधदैन्ध पेधै वेदवनुक्कु उधवि सेयधु, विरगीदै वेंध्ल मूति पादुरु पसियै नोक्कि तन उदल कोदुत पैम्पुल व्ल्दु पेट्रू उयर्न्धा वार्ताई वेदांतिन विज़्हुमिधु अनरो?”। यह पद्य कम्बर रामायण से है जो एक शिकारी और कबुतर की कथा को लेकर शरणागति शास्त्र के बारे में चर्चा करता है। शरणागति के बारें में जो उस कबुतर ने वर्णन किया हैं वह वेद से भी उच्च हैं।

नल्ल पड़ियाम मनु नूर कवर सरिदै पार्वै: ऐसे भक्तों का इतिहास और कुछ नहीं उनका आचरण है। लोगों कि रोज कि दिनचर्या और आज्ञा पालन मे पक्का रहना मनु शास्त्र मे दस्तावेज़ किया हैं। ऐसे भक्तों का आचरण मनुशास्त्र के लिये उदाहरण हैं। ऐसे शास्त्र में उनके जाती के अनुसार जिसमे उनका जन्म हुआ है,क्या करना और क्या नहीं करना सब लिखा हैं। जिन्होंने इसे पढ़ा हैं और जानते हैं वह उसके अनुसार रहते है। हालाकि सांसारिक लोगों को जो शास्त्रों में बताया हैं सिखना और आज्ञा पालन समझना आसान नहीं हैं। यह सांसारिक लोग भगवान के भक्तों के रोज कि दिनचर्या और आचरण का पालन कर उसी कि तरह रह सकते है। ऐसे भक्तों का आचरण उसे पालन करने के लिये सभी के लिये एक उदाहरण हैं। वास्तव में यह भी कहा जा सकता है कि स्वयं शास्त्र वह भक्त कैसे व्यवहार करते है इतना ही जानते है। अत: यह देखा जा सकता है कि ऐसे भक्तों का आचरण हीं मूल है और शास्त्र ऐसे भक्तों के आचरण का प्रतिबिम्ब है। ऐसा विश्वास है इन भक्तों के आचरण पर रखा है। फिर से भगवान श्रीमन्नारायण के पास जाकर,

येनैतू उलमाराइ अवै इयाम्बर्प पालना
पनैतिरल करकरि भरधन सेयगए
अनैतिराम अल्लना अल्ला; अन्नधु
निनैतिलै, येंवायिं नेया नेंजिनाल” (कम्बरामायण, अयोध्या काण्ड, तिरुवड़ी चूट्टू पदलम-४४)

वेद वों है जो पूरे संसार को क्या करना और क्या नही करना यह बताता है। जो भी श्रीभरतजी ने किया वह सब शास्त्र में बताया गया है। ऐसे भी कुछ है जो शास्त्र में बताया गया है परन्तु भरतजी में नही देखा गया है ऐसे भी बाते वेदों को मान्य नहीं है। जो भी श्री भरतजी करते है वह माननिय है और खुशी मनायी जाती हैं। यह बात श्रीरामजी ने श्रीलक्ष्मणजी से कही थी। यह श्रीभरतजी का आचरण और उसी तरह दर्शाया गया है जैसे “मनु नूर्क्कु नल्ला पडियम”। सेडियार विनैत तोगैक्कुत ती: ऐसे भक्तों कि दृष्टी ऐसी होती है कि वह अपराधिय कर्मों को जो कोई एक ने जमा किया है और दबा रखा हैं उसे नष्ट कर देता है। क्योंकि उनकी दृष्टी ऐसे पाप, दबे हुये कर्म एक व्यक्ति को भीतर से नष्ट करती है और वह अपने आप ही उस जीवात्मा को जो उसके भीतर है उसे रास्ता दिखाता है। सम्पूर्ण सारांश: भगवान के भक्तों के शब्द और व्याख्यान, जो हमेशा उनकी पत्नि पेरिया पिराट्टी पर प्रिती रखते है, हालाकि वह हमे व्यंग लगता है परंतु वह हमेशा वेदों के बराबर रहता है। उनकी क्रियावों की नीव मनु शास्त्र जैसे शास्त्र मे से रखी गयी है जो मनुष्य सभ्यता मे क्या करना और क्या न करना ऐसा बतलाता है। यानि उनकी क्रिया मूल है और शास्त्र कि नकली। ऐसे ही भक्तों कि दृष्टी अग्नि की तरह काम करती है और लोगों कि बोझ और अपराधिय कर्मों को नष्ट कर देता है और स्वयं प्राप्ति के लिये राह बताता हैं।

हिन्दी अनुवादक – केशव रामानुज दासन्

Source: http://divyaprabandham.koyil.org/index.php/2015/05/gyana-saram-40-alli-malar-pavaikku/

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2 thoughts on “ज्ञान सारं – पासुर (श्लोक) ४०

    1. Sarathy Thothathri

      Yes – it is already available in the website. In the menu, please see “Other” and underneath that we have “gyAna sAram” in multiple languages including thamizh.
      adiyen sarathy ramanuja dasan

      Reply

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