ज्ञान सारं – पासुर (श्लोक) ३७

श्री:
श्रीमते शठकोपाय नम:
श्रीमते रामानुजाय नम:
श्रीमत् वरवरमुनये नम:

ज्ञान सारं

ज्ञान सारं – पासुर (श्लोक) ३६                                                             ज्ञान सारं – पासुर (श्लोक) ३८

पाशुर-३७

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पोरूलुम उयिरूम उडम्बुम पुगलुम
तेरूलुम गुणमुम सेयलुम अरुल पुरिन्द
तन आरियन पोरूट्टाच सङ्गर पम सेय्बवर नेञ्जु
एन्नालुम मालुक्किडम

प्रस्तावना: इस पाशुर में श्री देवराजमुनि स्वामीजी यह कहते हैं कि भगवान श्रीमन्नारायण उन लोगों के हृदय में विराजमान रहते हैं जो अपने आचार्य को हीं धन, आत्मा, शरीर आदि समझते हैं।

अर्थ: मालुक्किडम – भगवान श्रीमन्नारायण, एन्नालुम – हमेशा, डम– विराजमान , नेञ्जु – हृदय में , सङ्गर पम सेय्बवर – जो कृपा, पोरूलुम – अपना धन , उयिरूम – अपनी जिन्दगी (हर एक कि आत्मा) , उडम्बुम – उनका शरीर , पुगलुम – ध्यान लगाने का स्थान , तेरूलुम – उनका ज्ञान , गुणमुम – उनके अच्छे गुण और ,

सेयलुम – उनके कर्म , तन आरियन पोरूट्टाच – उनके आचार्य के सिवाय और कोई नहीं जिन्होंने , अरुल पुरिन्द – इस शिष्य को अपनाया हैं अपने पूर्ण दया से,

स्पष्टीकरण:

पोरूलुम: एक शिष्य के सभी सांसारिक धन
उयिरूम: एक शिष्य का जीवन
उडम्बुम: एक शिष्य का शरीर
पुगलुम: एक शिष्य के ध्यान करने का स्थान (घर आदि,)
तेरूलुम: एक शिष्य का ज्ञान
गुणमुम: एक शिष्य के अच्छे गुण जैसे नम्रता।
सेयलुम: एक शिष्य के सभी कार्य का स्वर

अरुल पुरिन्द तन आरियन पोरूट्टाच: यहाँ आचार्य के गुणों को दर्शाया गया हैं। वह एक व्यक्ति हैं जो हमसे अपने कार्य के बदले में कुछ नहीं माँगते और यह भी नहीं देखते कि वह शिष्य उनके जरूरत का कार्य करेगा या नहीं। कुछ भी मांग नहीं कर के , पूर्ण दया रखकर वह अपनी निर्हेतुक कृपा अपने शिष्य पर बरसाते हैं।

सङ्गर पम सेय्बवर नेञ्जु: ऐसे आचार्य के प्रति सम्मान रखकर अगर एक शिष्य अपना सब कुछ जैसे धन, शरीर, घर, ज्ञान, अच्छे गुण और कार्यों का आदर करता हैं तो ऐसे व्यक्ति का हृदय भगवान के लिए निवास स्थान हो जाता हैं।

एन्नालुम मालुक्किडम: भगवान उपर बताये हुए लोगों के हृदय में निवास करते हैं। वह थोड़े समय के लिये नहीं बल्कि हमेशा के लिये निवास करते हैं। अगर शिष्य अपने आचार्य का पूर्ण आदर करता हैं तो भगवान को इस पवित्र विचार से अत्यन्त आनन्द होता हैं और वह हमेशा के लिये वहाँ निवास करते हैं। श्री मधुरकवि आल्वार ऐसे आल्वार थे जिन्हे अपने आचार्य जो कि श्री शठकोप स्वामीजी हैं उनको छोड़ और कोई ज्ञात नहीं

होता था। यह उनके हीं पद से देखा जा सकता हैं “तेवु मर्ररियेन” जिसका अर्थ हैं कि वह सिवाय अपने आचार्य के और कोई दूसरे भगवान को नहीं जानते । उनके हीं एक पद से “अन्नैयाई अत्तानै एन्नै आंदिदुम तन्मयान शठकोपन एन नंबिए” उन्होंने श्री शठकोप स्वामीजी को अपना सब कुछ माना और ऐसा ही सम्मान दिया। श्री कृष्ण ऐसे भक्तों के हृदय में रहना पसन्द करते हैं जिसका हृदय शुद्ध और निर्मल हैं। ऐसे आल्वार का हृदय जो भगवान श्रीमन्नारायण के सिवाय और कोई भगवान को नहीं जानते हैं ऐसा स्थान श्री कृष्ण के लिये हमेशा के लिये वास स्थान बन जाता हैं। श्री देवराज मुनि स्वामीजी इस ग्रन्थ जो कि ज्ञान सारम हैं उसे “तेरुलारूं मधुरकवि निलय तेलिन्धोन   वाझिये” यह कहकर उत्सव मनाते हैं। अत: हम उनका उनके आचार्य श्री रामानुज स्वामीजी के प्रति प्रेम और आदर देख सकते हैं। श्रीगोदम्बाजी भी इसी श्रेणी में आती हैं। यह हम उनके नाच्चियार तिरुमोलि के पाशुर मे देख सकते हैं “विल्लिपुदुवै विट्टुशित्तर तङ्गल तेवरै वल्ल परिशु वरूविप्परेल अदु काण्डुमे” (नाच्चियार तिरुमोलि १०-१०) |

हिन्दी अनुवादक – केशव रामानुज दासन्

Source:  http://divyaprabandham.koyil.org/index.php/2015/03/gyana-saram-37-porulum-uyirum/

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