ज्ञान सारं – पासुर (श्लोक) ३६

श्री:
श्रीमते शठकोपाय नम:
श्रीमते रामानुजाय नम:
श्रीमत् वरवरमुनये नम:

ज्ञान सारं

ज्ञान सारं – पासुर (श्लोक) ३५                                                             ज्ञान सारं – पासुर (श्लोक) ३७

पाशुर-३६

nammalwar-final

विल्लार मणि कोलिक्कुम वेंकटा पोर कुंरु मुदल
सोल्लार पोलिल सूल तिरुप्पदिगल एल्लाम
मरुलाम इरूलोड मत्तगत्तुत तन ताल
अरूलालै वैत्त अवर

प्रस्तावना: एक शिष्य जो अपने आचार्य के शरण हो गया उसके लिये उसके आचार्य के चरण कमल ही १०८ दिव्य देश हैं। यह बात इस पाशुर में बताई गयी हैं।

अर्थ: अवर – आचार्य अपने, अरूलालै – दया से, वैत्त – रखते हैं, तन ताल – अपने पवित्र चरण कमल, मत्तगत्तुत – शिष्य के मस्तक के उपर रखते हैं, लोड – नाश करते हैं, मरुलाम इरू – अज्ञानता के कारण अंधेरा; इसलिये यह शिष्य को जाना नहीं पड़ेगा, तिरुप्पदिगल एल्लाम – कौन से भी १०८ दिव्य देश (भगवान श्रीमन्नारायण के इस धरती पर विराजमान करने वाले पवित्र स्थान), पोर कुंरु मुदल – तिरुमला जैसे सुन्दर पर्वत भी शामील हैं, वेंकटा – तिरुपति में जो, कोलिक्कुम – बहता हैं, विल्लार – चमकीला, प्रकाशमान और , मणि – अधिक मूल्यवान मणि और वह एक , सोल्लार – जगह हैं जहां बादल मिलते हैं , सूल – और घिरे हुए हैं , पोलिल – सुन्दर बागों से

स्पष्टीकरण:

विल्लार मणि कोलिक्कुम: “विल” का अर्थ चमकीला हैं और “आर” अधिक का प्रतिनिधित्व करता हैं। इसलिये “विल्लार” का एकसाथ में अधिक चमकीला ऐसा अर्थ हैं। “अधिक चमकीला” विशेषण को मणियों के जैसे इस्तेमाल किया गया हैं।

नंमणि वण्णन ऊर अलियुम कोलरियुम
पोन मणियुम मुत्तमुम पू मरमुम पंमणि नी –
रोडु पोरूदुरुलुम कानमुम वानरमुम
वेडुमुडै वेंगडम

श्री भक्तिसार आल्वार के इस पाशुर में हम तिरुवेंकट का वर्णन देख सकते हैं। यह वह स्थान हैं जहाँ याझिस (शेर और हाथी के बीच में प्रजाती), शेर, मणि, अनमोल धातु अधिक मात्र में प्राप्त हो सकते हैं। इसके अलावा पाणि के झरने इस जगह में बहुत प्रमाण में मणि और फूलों के पेड़ लेकर आते हैं। झरने जंगल में हैं जहाँ अधिक संख्या में जंगली जानवर और शिकारी हैं। यह दोनों पाशुर के बीच में जो तिरुवेंकट का वर्णन है उसकी समानता को लिख लेना चाहिये।

वेंकटा पोर कुंरु मुदल: जैसे तिरुवेंकट दिव्यदेश जो सुन्दर तिरुमला के पहाड़ो में हैं और जो शोभायमान प्रकृति से घिरा है।

सोल्लार पोलिल सूल: यह स्थान “तिरुवेंकट” कहा गया है जो बगीचों से घिरा है और बादल उस पर मंडराते हैं। अर्थात यह पहाड़ इतने ऊँचे हैं कि बादलों को आसानी से स्पर्श कर सकते हैं।

तिरुप्पदिगल एल्लाम: भगवान के सभी १०८ दिव्यदेश वह स्थान हैं जहाँ भगवान स्वयं स्पष्ट रूप से आनन्दित हैं।

मरुलाम इरूलोड मत्तगत्तुत तन ताल: इसका अर्थ है कि अंधकार के कारण जो गुणों की अज्ञानता है, वह चली जाती हैं।

अरूलालै वैत्त अवर: आचार्य वह है जो अपने दया के कारण अपने शिष्य पर अपने चरण कमलों को रखते हैं। “अरूलालै” शब्द का अर्थ यह है कि आचार्य अपने चरण कमल को शिष्य पर किसी निमित्त के कारण नहीं रखा हैं। कोई यह प्रश्न कर सकता हैं कि शिष्य द्वारा जो अच्छा कार्य किया गया है उसके इस लक्षणों को देखकर आचार्य उनके चरण कमल उसके मस्तक पर रखते है। हालकि ऐसी कोई बात नहीं क्योंकि वह हम से कुछ भी अपेक्षा नही करते हैं। वह अपने नांमुगन तिरुवंदादि # ४८ चरण कमल केवल दया के कारण रखते हैं और इसलिये उन्हें शिष्य से कुछ भी अपेक्षा नहीं होती हैं। वह उसकी रक्षा के लिये करते हैं। “तिरुवेंकटं” को इस पाशुर में प्रतिनिधी के तौर पर इस्तेमाल किया गया हैं और इसलिये परमपद, तिरुपार्कदल आदि। वह भगवान के विभव अवतार जैसे राम, कृष्ण और अन्तर्यामी आदि को शामील किया हैं जहाँ वह सब के अन्दर विराजमान रहते हैं। इसलिये शिष्य को सभी पाँच स्थान जहाँ भगवान स्वयं को स्पष्ट करते हैं (पर, व्यूह, विभव, अन्तर्यामी और अर्चा) वह ओर कुछ नहीं आचार्य के चरण कमल हीं हैं। यही वह बात हैं जिसे श्री वचनभूषण में समझाया गया हैं जो शिष्य के गुण के बारें में चर्चा करता हैं। चूर्निका का भाव यह हैं “पाट्टु केत्कुम इदमुम, कूपिदु केत्कुम इदमुम, कुधिता इदमुम, वलैता इदमुम, ऊतुं इदमुम एल्लां वगुता इदमे एनृ इरुक्का कदवन” (चूर्निकाई #४५०)। इसका अर्थ इस प्रकार हैं: पाट्टु केत्कुम इदमुम = परमपद, कूपिदु केत्कुम इदमुम = तिरुपार्कदल, कुधिता इदमुम = अवतार जैसे राम, कृष्ण आदि जैसे शामील; वलैता इदमुम = अंतर्यामित्वम (वह गुण जिससे भगवान हम सब के अंदर स्पष्ट रहते हैं); ऊतुं इदमुम = मन्दिर जहां भगवान स्वयं को अर्चा रूप में प्रत्यक्ष करते हैं; एल्लां एनृ इरुक्का कदवन = यह पाँचो के साथ इस तरह व्यवहार करना; वगुता इदमे = आचार्य के चरण कमल || एक अच्छे शिष्य के यही लक्षण हैं कि वह उपर बताये हुए पाँच भगवान के स्वरूप को पकड़कर अपने आचार्य को हीं उपाय समझे । इसलिये हम सब को अपने आचार्य को भगवान का हीं स्थान देना चाहिये। यह बात श्रीरामानुजनूत्तंदादि के पाशुर #१०५ में देखा जा सकता हैं।

इरुप्पिडम वैहुंदम वेंगडम मालिरूम शोलैयेन्नुम
पोरुप्पिडम मायनुक्केंबर नल्लोर अवैतन्नोडुमवन्दु
इरुप्पिडम माय निरामानुजन मनत्तु इन्न्वन वन्दु
इरुप्पिडम एनतनिदयत्तुल्ले तनक्किंबुरवे

हिन्दी अनुवादक – केशव रामानुज दासन्

Source:  http://divyaprabandham.koyil.org/index.php/2015/03/gyana-saram-36-villar-manikozhikkum/

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