ज्ञान सारं – पासुर (श्लोक) ३५

श्री:
श्रीमते शठकोपाय नम:
श्रीमते रामानुजाय नम:
श्रीमत् वरवरमुनये नम:

ज्ञान सारं

ज्ञान सारं – पासुर (श्लोक) ३४                                                             ज्ञान सारं – पासुर (श्लोक) ३६

पाशुर-३५:

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एन्रुम अनैत्तुयिर्क्कुम ईरञ्सेय नारणनुम
अन्रुम तन आरियन पाल अन्बोलियिल – निन्र
पुनल पिरिन्द पङ्गयत्तैप पोङ्गु सुडर वेय्योन
अनल उमिलन्दु तान उलर्त्तियट्रु

प्रस्तावना:

आखरि दो पाशुर में स्वामीजी श्री देवराज मुनि लोगों के मूर्ख कार्य को समझाते हैं वह जो अपने आचार्य का अनादर करते हैं और खुद हीं जिसे उन्होंने देखा भी नहीं हैं, दूर रहते हैं ऐसे भगवान कि हमें उनकी शरण मिलेगी इस आशा के साथ उनको प्राप्त करने कि कोशिश करते हैं। ३३वें और ३४वें पाशुर (पट्रु गुरूवैप और एट्ट इरुन्द) विशेष समानताओं के साथ उपाय किया हैं। इस पाशुर में स्वामीजी श्री देवराज मुनि इस तथ्य को समझाते हैं कि जिस मनुष्य को अपने आचार्य में प्रेम न हो ऐसे मनुष्य की भगवान भी कोई मदद नहीं करेंगे बल्कि उसके मूर्ख कार्यों के लिये उसे दण्ड ही देंगे।

अर्थ:

पङ्गयत्तैप – एक कमल का पुष्प अगर वों | पिरिन्द –बिछड़ जाता हैं उसके | निन्र पुनल – घर के पानी से जो कि उसके लिए पोषक हैं तब | वेय्योन – सूर्य उसके | पोङ्गु सुडर – तेज जलती किरणों से | तान – वहीं सूर्य जो एक समय उस कमल को खिलने में मदद किया था वह अब | अनल उमिलन्दु – अग्नि के गेंद उस पर फेंकेगा | उलर्त्तियट्रु – और उस कमल का अस्तित्व तबाह कर देगा। उसी तरह वह जो | एन्रुम – हमेशा | ईरञ्सेय – वह जो अनगिनत दया दिखाता हैं | अनैत्तुयिर्क्कुम – जीवन के प्रति | नारणनुम – और वह जिसे श्रीमन्नारायण भी कहते हैं | तन आरियन पाल – अगर भगवान यह देखते हैं कि उस व्यक्ति को अपने आचार्य के प्रति कोई लगाव / मेल नहीं हैं | अन्बोलियिल – और अपने आचार्य के प्रति पूर्ण भक्ति खो देता हैं | अन्रुम – तब उन्हें (श्रीमन्नारायण) क्रोध आता हैं और उस व्यक्ति को नष्ट कर देता हैं।

स्पष्टीकरण:

एन्रुम: इस पद का अर्थ “नित्य” / “सदैव” हैं जिसमे भूत, वर्तमान और भविष्य शामिल हैं।

अनैत्तुयिर्क्कुम: सभी जीवात्माओं

ईरञ्सेय नारणनुम: भगवान नारायण हर समय सभी जीवात्माओं पर कृपालु हैं। “नारायण” शब्द भगवान और जीवात्मा के बिचमें न टुटने वाला स्वभाव को वर्णन करता हैं। “नार” शब्द में सभी जीवित और निर्जीव दोनों जीवात्मा शामील हैं। “अयणम” शब्द नारायण में भगवान श्रीमन्नारायण सभी जीवात्माओं के जीवन को दर्शाता हैं। इनके बिना किसी के भी अस्तित्व होने का कोई सवाल हीं नहीं होता। भगवान मे हीं सब के पीछे पालन पोषण करने का और सब के जीवन को चलाने का बल हैं। यह मतलब “नारायण” शब्द में बताया हुआ एक मुख्य मतलब हैं जिसे “नार” और “आयण” में अलग किया गया हैं। यह बात श्रीआण्डाल ने तिरुप्पावै के २८वें पाशुर में कहा हैं “उन्तन्नोडु उरवेल् नमक्कु इङ्गोलिक्कवोलियादु”। श्रीभक्तिसार स्वामीजी भी अपने पाशुर में यह समझाये हैं “नां उन्नै अंरी इलेन कंडाई नारणने!!! न्ल एन्नै अंरी इलै”। अत: हम यह देख सकते हैं की वह श्रीमन्नारायण हीं हैं दोनों शुद्ध और अशुद्ध स्थिति में और वहीं यह हम सब कि ताकत हैं जो हमारे पिछे ड़ी हैं। इसलिये क्योंकि भगवान हर छोटे काम में भी प्रवेश करते हैं वह उनके अनगिनत गलतियाँ जो वह करते हैं उसे देखते हैं परंतु वह उन्हें दोष न देखकर उसे आशीर्वाद मानते हैं। यह गुण को वात्सल्य कहते हैं जो की “नारायण” शब्द का अत्यंत प्रचलित और अंतिम निर्णय है। इसलिये वह भगवान हैं जो अपनी अनगिनत दया और करुणा सभी जीवित और निर्जीव वस्तु पर हमेशा के लिये और हर वक्त बरसाते हैं ।

एन्रुम: “एन्रुम” क्रिया का अर्थ क्रोधित होना हैं। इस प्रसङ्ग इसका यह मतलब हैं कि भगवान श्रीमन्नारायण गुस्सा होंगे। भगवान का गुस्सा होना हीं दण्ड हैं और उनका खुश होना आशीर्वाद हैं। यह समान शब्द पेरिया तिरुमोझि के पाशुर के पद में देखा जा सकता हैं “अंरिया वाणं” जिसका भी वही अर्थ हैं। इस पाशुर के दूसरे भाग में यह समझाया गया हैं कि किस परिस्थिति में दयालु श्रीमन्नारायण गुस्सा होते हैं।

तन आरियन पाल अन्बोलियिल: जो पिछले खंड में परिस्थिति बताई गई हैं वह तब हैं जब किसी व्यक्ति को अपने आचार्य के प्रति बिल्कुल भी भक्ति नहीं होती हैं। पिछले दो पाशुर में जो समझाया गया हैं (“एट्टा इरुन्धा गुरूवै और पट्रु गुरूवै”) कि अगर कोई व्यक्ति अपने आचार्य को एक इन्सान समझता हैं और उनका अनादर करता हैं जैसे कि वह नश्वर हैं ऐसे अनादर करके और यह सोचकर कि वह भगवान नहीं हैं तो वह कार्य सबसे बड़ी मूर्खता हैं। इस खयाल पर आगे बढ़ते हुए अगर कोई व्यक्ति अपने आचार्य का एक मनुष्य के तरह निरादर और तिरस्कार करता हैं और उनके प्रति थोडी भी भक्ति न हो तो भगवान श्रीमन्नारायण भी उस व्यक्ति पर क्रोधित होंगे। इस बात को एक विशेष समानता के साथ समझाया गया हैं जिसे आगे देखेंगे।

निन्र पुनल पिरिन्द पङ्गयत्तैप: यह समानता एक सुन्दर कमल पुष्प कि दि गयी हैं जो तालाब, झील आदि में बसता हैं। अगर ऐसा कमल पुष्प जल के बाहर रहता हैं तब उसके पिछे होने वाली घटना को समझाया गया हैं।

पोङ्गु सुडर वेय्योन: सूर्य जैसे कि हम सब जानते हैं कि बहुत तत्प, चमकीला और अपने चमक से सबको चकित करता हैं। जैसे श्री कुलशेखर आल्वार यह बताते हैं “सेंगमलं अंधरं सेर वेंगधिरोर्क्कू अल्लाल”, एक कमल पुष्प सूर्य के सिवाय किसीसे भी नहीं खिलता। अगर कोई अप्राकृतिक तरिके से रोशनी उत्पन्न करके उस कमल पुष्प को खिलाना चाहता हैं तो वह बुरी तरह नाकाम हो जायेगी क्योंकि कमल पुष्प केवल प्राकृतिक सूर्य कि रोशनी से हीं खिलता हैं। जब वह कमल जल के अन्दर हैं तो सूर्य उसकी हमेशा खिलाने में मदद करता हैं।

अनल उमिलन्दु तान उलर्त्तियट्रु: अगर कमल पुष्प जल से बाहर हैं और सूर्य आग के गोले उगलेगा तो वह उस कमल का जीवन खत्म कर देगा । अत: हम यह देख सकते हैं कि वह सूर्य जो एक कमल पुष्प जो जल में हैं उसके खिलाने में सहायक हैं वहीं सूर्य उस कमल पुष्प अगर वह जल के बाहर हैं तो उसका विनाश कर देगा । उसी तरह अगर एक व्यक्ति में आचार्य भक्ति, प्रेम और अच्छा अनुभव हैं तो भगवान श्रीमन्नारायण उस पर कृपा / आशीर्वाद देंगे। परन्तु अगर वहीं व्यक्ति अपने आचार्य का “कोई नहीं” ऐसा अनादर करता हैं तो भगवान उसे अपने गुस्से से तबाह कर देंगे। इस प्रसङ्ग में हमें यह समझना हैं कि “कृपा” और “संहार” क्या हैं। आशीर्वाद का अर्थ हैं कि श्रीमन्नारायण उस व्यक्ति जिसे आचार्य भक्ति हैं उसके ज्ञान को यशस्वी बनायेंगे। वह यह ध्यान रखेंगे कि उस व्यक्ति का ज्ञान सहीं दिशा कि ओर बढ़ रहा हैं की नहीं। विपरीत में, दण्ड / संहार इस प्रसङ्ग में उस व्यक्ति के ज्ञान को घटा देगा और उसे अज्ञानी (मूर्ख) बना देगा। इसलिये अगर कोई व्यक्ति अपने आचार्य का अनादर करता हैं जिन्होंने उसे “मंत्रं” का ध्यान कराया तो भगवान श्रीमन्नारायण जो कि सबसे बड़े दयावान हैं उन्हें भी क्रोध आयेगा और वह विरोध करेंगे। यह उसी तरह हैं जैसे सूर्य जो कमल पुष्प जल में रहने से उसको खिलाता हैं और अगर वहीं पुष्प जल के बाहर आगया तो उसे नष्ट कर देता हैं। खुद भगवान श्रीमन्नारायण हीं हर व्यक्ति के जीवन के तत्व विचार समझाने के जिम्मेदार हैं परन्तु अगर उस व्यक्ति जिसकी आचार्य भक्ति खत्म होने लग गयी है उनका नाश कर देंगे । वह उस व्यक्ति के ज्ञान के अंधेरे को मिटा देंगे जो उसे उसके अंतिम प्रारब्ध कि और ले जायेगा। इसका अर्थ हैं उस व्यक्ति के पास ज्ञान हैं परन्तु वह ज्ञान दीप्तिमान नहीं अदृश्य हैं। जैसे श्री तिरुवल्लूवरजी कहते “उलरेनिनुं इल्लारोड़ोप्पर” वह यह कहते हैं कि हमें अपने आचार्य का अनादर नहीं करना चाहिये। यह विचार श्रीवचन भूषण कि चूर्णिकै में समझाया गया हैं “तामरैयै अलर्था कड़वा आदित्यन ताने, न्ल्रईप पिरिंधाल अथतै उलर्थुमापोले स्वरूप विकासतै पण्णूं ईश्वरं ताने संबंधं कुलैंधाल अथथै वादप पण्णूं”। (श्रीवचन भूषण चूर्णिकै #४३९)

हिन्दी अनुवादक – केशव रामानुज दासन्

Source:  http://divyaprabandham.koyil.org/index.php/2015/02/gyana-saram-35-enrum-anaithuyirkum/

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