ज्ञान सारं – पासुर (श्लोक) ३३

श्री:
श्रीमते शठकोपाय नम:
श्रीमते रामानुजाय नम:
श्रीमत् वरवरमुनये नम:

ज्ञान सारं

ज्ञान सारं – पासुर (श्लोक) ३२                                                            ज्ञान सारं – पासुर (श्लोक) ३४

पाशुर-३३

एट्ट इरुन्द गुरुवै इवै अन्रेन्रु
विट्टोर परनै विरुप्पुरुदल – पोट्टनेत्तन
कण सेम्पलित्तिरुन्दु कैत्तुरुत्ति नीर तूवि
अम्पुदत्तैप पार्त्तिरुप्पानट्रु

प्रस्तावना: इस पाशुर में यह समझाया गया है की कैसे एक व्यक्ति बुद्धिहीन है जो अपने आचार्य में मनुष्य भाव रखता है। इसके अलावा वह एक कदम आगे बढ़कर और भगवान श्रीमन्नारायण जो बहुत दूर हैं उनके पास पहुँचने की इच्छा करता है और यह सोचता है कि भगवान उसकी जरूरत के समय आकर उसकी मदद करेंगे। यह व्यक्ति मुर्खता कर रहा है और इसे एक समानता से दर्शाया गया है।

अर्थ:

एट्ट इरुन्द: (अगर कोई व्यक्ति अनादर करता है) जो बहुत करीब है | गुरुवै : यानि आचार्य | इवै अन्रेन्रु: और यह सोचता है कि वह उसका गुरू नहीं है | विट्टो: और उन्हें अस्वीकार करता है | र परनै: और उसके पास बाहर जाता हैं जो बहुत दूर है और आसानी से प्राप्त नहीं होता है (श्रीमन्नारायण) | विरुप्पुरुदल: और उसके पास पहुँचने कि इच्छा करता हो। यह कार्य उस व्यक्ति के कार्य के समान हैं जो | पोट्टनेत्तन: तुरन्त | सेम्पलित्तिरुन्दु: बन्द करता हैं (कि जल्द क्या होने वाला हैं यह जाने बिना) | तन कण: अपनी आँखे | तूवि: और जमीन पर रो पड़ता हैं | कैत्तुरुत्ति नीर: वह जल जो कि एक हाथ के घड़े में जमा कर लेते हैं और | अम्पुदत्तैप: बादल में जो जल हैं उसे ढुँढते हैं | पार्त्तिरुप्पानट्रु: और उसके पास पहुँचने का तरीका तलाश करते हैं (यह उसी के तरह मूर्खता हैं जैसे)
 

स्पष्टीकरण:

एट्ट इरुन्द गुरुवै: “एत्तुधल” शब्द का अर्थ पकड़ना है और इसलिये भाव “नजदिक” या “निकटवर्ती” से बतलाया गया हैं । इस प्रसङ्ग मे एक आचार्य जो एक व्यक्ति के इतना नजदिक हैं उसे समझाया गया हैं। भौगोलिक निकटता के अलावा आचार्य से निकटता कुछ इस तरह भी वर्णन करेंगे कि, वह जिसे हम अपने खुले नेत्र से भी देख सकेंगे (असमान भगवान), वह जो जब हमें रक्षा कि जरूरत हैं हमारी रक्षा करेंगे, वह जो बहुत प्रिय हैं, वह जो हमेशा हम जीव के कल्याण हेतु मदद करते रहते हैं और अन्त में वह जिससे हम बात कर सकते हैं और मिल सकते हैं। वह सब जीवों के बहुत नजदिक हैं।

इवै अन्रेन्रु विट्टो: यह अपने आचार्य को दूसरा इन्सान समझना यह त्याग करना या अस्वीकार करना। श्री देवराज मुनिजी एक ऐसे व्यक्ति के बारे में वर्णन करते है जो अपने आचार्य को अस्वीकार करते है और उन्हे अपने गुरु के रूप मे स्वीकार नहीं करते। उस पर दृढ़ रहने के अलावा “शरणागति तन्द तन इरै वन ताले (३१वें पाशुर में), इसका मतलब आचार्य के चरण कमलों को एकबार सबकुछ मानना, या उस व्यक्ति द्वारा उनके आचार्य का पूर्णत: अनादर करना और उनको जो उन्हे रोज मिलते है ऐसे अनेक अनगिनत व्यक्तियों मे से एक ही समझना। इसी वजह से वह उन्हें अपने आचार्य की तरह नहीं समझता।

र परनै विरुप्पुरुदल: वह व्यक्ति जो अपने आचार्य का अनादर करता हैं वह भगवान श्रीमन्नारायण को पाने को देखता हैं जो किसी के भी पहुँच के कही बाहर हैं। वह भगवान जिन्हे कोई भी याने शास्त्र भी पूर्णत: नहीं समझा है थोड़ी तो दूरी है, और किसी के भी पहोच से दूर है। वह व्यक्ति ऐसे भगवान से मिलने की इच्छा करता है, इसी सोच के साथ की वही रक्षक है और उससे बहोत नर्म है। श्री देवराज मुनिजी इसी कार्य की तुलना एक सुंदर उपमा से करते हैं।

पोट्टनेत्तन: इसका अर्थ हैं “तुरन्त” यानि बिना परिणाम के बारें में सोचे वह कार्य करना

तन कण सेम्पलित्तिरुन्दु: इसका मतलब हैं आँखे बन्ध करना जैसे कि एक व्यक्ति आराम कर रहा है बिना यह जाने उसका परिणाम क्या होगा।

कैत्तुरुत्ति नीर तूवि: जब कोई प्यासा हो तो वह व्यक्ति अपने पास जो कटोरा उससे पानी पी लेगा। वह उसे पहिले हीं भर कर रख लेगा। परन्तु अगर वह व्यक्ति प्यासा हैं तो वह पानी जमीन पर फेंख देगा।

अम्पुदत्तैप पार्त्तिरुप्पानट्रु: कटोरे से पानी बाहर फेकने के बाद वह व्यक्ति ऊपर आसमान में बादलों कि तरफ देखेगा और यह ईच्छा करेगा कि बादलों में जो जल है उसे बारिश के रूप में मिल जायें। वह यह सोचता हैं कि बादलों में जो बारीश का पानी हैं वह सबसे आसानी से उसे प्राप्त हो जायेगा और जो प्यास का अनुभव अभी वह कर रहा है उसे मिटा देगा। यह उसी के समान हैं जब एक व्यक्ति यह सोचता है कि भगवान श्रीमन्नारायण उसे आसानी से प्राप्त हो जाते हैं और जो इतने आसानी से हमारे लिये तत्पर हैं ऐसे अपने आचार्य कि तरफ वह ध्यान नहीं देता है। यह सादृश्य के कार्य को “तोझिल उवमं” (सादृश्य से कार्य करना) कहते हैं। इस पाशुर के तथ्य को श्रीवचन भूषण के चूर्निकै में समझाया गया हैं “विदाइ पिरंधपोधु करस्थमाना उधगतै उपेक्षितु ज्ल्मूत जलतयुं, सागरा सलिलतयुं, सरित सलिलतयुं वापि कूपा पयसुकलयुं वंजीक्का कदवन अल्लन (श्रीवचन भूषण #४४९)

हिन्दी अनुवादक – केशव रामानुज दासन्

Source:  http://divyaprabandham.koyil.org/index.php/2015/02/gyana-saram-33-etta-irundha-guruvai/

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