ज्ञान सारं – पासुर (श्लोक) २८

श्री:
श्रीमते शठकोपाय नम:
श्रीमते रामानुजाय नम:
श्रीमत् वरवरमुनये नम:

ज्ञान सारं

ज्ञान सारं – पासुर (श्लोक) २७                                                        ज्ञान सारं – पासुर (श्लोक) २९

पाशुर-२८ 

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शरणागति मट्रोर् सादनत्तैप पर्रिल
अरण आगादु अञ्जनै तन सेयै
मुरण अलियक कट्टियदु वेरोर कयिरु कोण्डु आर्पदन मुन
विट्ट पडै पोल विडुम

सारांश

पिछले पाशुर “तप्पिल गुरू अरूलाल” में स्वामीजी श्री देवराज मुनि ने अपने आचार्य द्वारा बताई गयी “शरणगति” का अर्थ समझ पाये हैं उनके बारे में बतलाया हैं। वह कहते हैं कि ऐसे लोग निश्चित हीं परमपद पहुँचेंगे। उसके अगले पाशुर “नेरि अरियादारूम” में जो लोग अपने आचार्य द्वारा बताया हुआ शरणागति का अर्थ नहीं समझ सके और जिन्हें भगवान कृष्ण द्वारा हीं उपदेश करने पर भी शरणगति पर थोड़ा भी विश्वास नहीं हैं उनके बारे में बताया हैं। उन्होंने यह कह कर समाप्त किया कि ऐसे लोगों को कभी भी परमपद नहीं मिलेगा। इस पाशुर में शरणागति की कुछ सत्य बातें बताई हैं। शरणागति कुछ और नहीं परन्तु भगवान के चरण कमलों के शरण होना हैं और “केवल आपके चरण कमल हीं मेरे उपाय हैं। मेरे पास और कोई दूसरी राह नहीं हैं”। शरणागति के कुछ अर्थ २३वें पाशुर में भी बताये गये थे (ऊलि विनैक कुरूम्बर)। अगर किसी के मन में यह अस्थिर बात आ जाती हैं कि केवल भगवान के चरण कमलों के शरण होने से हमें मोक्ष प्राप्त हो जायेगा या कुछ पुण्य काम करना पड़ेगा तो भगवान श्रीमन्नारायण उसे शरणागति नहीं देंगे जो उन्होंने उसे पहिले दिया था। उसकी शरणागति व्यर्थ हो जायेगी। शरणागति के इस सुन्दर बात को इस पाशुर में समझाया गया हैं।

अर्थ:

सरणागति: शरणागति जो कि भगवान श्रीमन्नारायण के पूर्ण तरह से उनके चरणों के शरण होना। उसके कुछ लक्षण हैं  जैसे | ट्रोर् सादनत्तैप: अगर कोई व्यक्ति शरणागति में विश्वास खो जाने के पश्चात अपने आप को दूसरे कार्य में लगाता हैं | पर्रिल: अगर वह इसे कार्य समझता हैं जो उसे अच्छा कर्म प्रधान करेगी | अरण आगादु: उसके पश्चात वह शरणागति जो इस व्यक्ति ने कि हैं उसे बचा नहीं सकती बल्कि उसके और उसके शरणागति के कार्य को निश्फल बना देगी | अञ्जनै तन सेयै: यह उसी तरह हैं कि हनुमानजी अंजाना देवी के पुत्र हैं | मुरण अलियक: उनके बड़े सहास से हीं नष्ट हो गये | कट्टियदु: और रावण के पुत्र राक्षस इंद्रजीत के ब्रम्हास्त्र से बन्ध गये थे। वेरोर कयिरु कोण्डु: इंद्रजीत ने ब्रम्हास्त्र पर विश्वास नहीं किया और उन्हें तुच्छ रस्सीयों से बांधने लगा और ब्रम्हास्त्र के योग्यता पर भरोसा न रहा | र्पदन मुन: जिसने ब्रम्हास्त्र को एक ही क्षण में अपने आप ही खोल दिया |

विट्ट पडै पोल: उसी तरह जैसे ब्रम्हास्त्र ने हनुमानजी को छुटकारा दिया | विडुम: शरणागति किसी को कभी मुक्त नहीं करेगी बल्कि उसे पूरी तरह निश्फल कर देगी

स्पष्टीकरण:

शरणागति: भगवान श्रीमन्नारायण के शरण होने के लिए शास्त्र में कई अच्छी राह और कर्म बताये हैं। उसमे शरणागति हीं सबसे उत्तम राह हैं। कारण कि जब कोई दूसरी राह / कर्म करता हैं तो उसे पहिले स्थान पर करता हैं। अगर कोई व्यक्ति यह कर्म नहीं करता हैं तो यह राह उसके लिए उत्पन न होगी। शरणागति दूसरी राह जैसे नहीं हैं वह एक क्षण में तो हो जाती हैं और दूसरे हीं पल खो भी जाती हैं। शरणागति हमेशा के लिए होती हैं और जो कोई भी उसे पालन कर सकता वह उसका पालन करता हैं । शरणागति या शरण होने कि राह और कोई नहीं स्वयं भगवान श्रीमन्नारायण हीं भगवान स्पष्ट रूप से इसी राह को “पूर्ण शरणागति” कहते हैं। । यह लक्षण विशेष गुण अन्यथा किसी और कार्य मे नहीं हैं । क्योंकि यह शरणागति अच्छे गुण / कर्म (जिसे पुण्य भी कहते हैं) से समझाया गया हैं इसे “शास्त्र” भी कहते हैं।जो भगवान श्रीमन्नारायण के चरणों के शरण होता हैं (जिसे शरणागति भी कहते हैं) भगवान उसके अच्छे कार्य के लिये उसकी सेवा भी करते हैं और उस पर कृपा भी करते हैं। अत: शरणागति और कुछ नहीं भगवान श्रीमन्नारायण के चरणों के शरण होना हैं और यह कहना “केवल आप हीं मेरे रक्षक हैं और मेरा और कोई भी नहीं और मैं और कोई भी स्थान में भी नहीं जा सकता हूँ”। इस तरह कि “शरणागति” के लिए अति मुख्य और अति प्रामाणिक वस्तु जो चाहिये वह पूर्ण विश्वास जिसका शास्त्र के अनुसार नाम हो जैसे “महा विश्वास” और “अध्यावसायं” । अगर कोई यह विश्वास खो देता हैं तो भगवान श्रीमन्नारायण कभी अच्छा परिणाम नहीं देंगे। इसके अलावा वह जिसने शरणागति कि हो वह यह कण मात्र भी नहीं सोचना चाहिये कि उसी ने शरणागति कि हैं। उसे यह “अहंकार” (में, मेरा इत्यादि) और “ममकार” (मेरा आदि) नहीं आना चाहिये। वह इस तरह का व्यक्ति होना चाहिये जो भगवान श्रीमन्नारायण के चरण कमलों को छोड़कर और कोई स्थान में नहीं जा सके। ऐसे व्यक्ति को हीं शरणागति कि आवश्यकता हैं। इस विचार को आल्वार इस तरह दर्शाते हैं “पुगल ओंरीला आडिएन”। अगर कोई व्यक्ति इस सांसारिक जीवन से घृणा करके पूर्णत: भगवान के चरण कमलों के पास पहुँचना चाहता हो तो भगवान यह निश्चित करते हैं कि वह तुरन्त उसके पास पहुँच जाये। यह शरणागति के साहित्य में समझाया गया हैं।

मटोर् सादनत्तैप पर्रिल: किसी को भी शरणागति का अर्थ और अभिप्राय मालुम होना चाहिये। एक बार भगवान श्रीमन्नारायण के चरण कमलों के शरण होने के पश्चात कोई भी इस शरणागति के राह से दूर नहीं जाना चाहिये और अपने आप को भी बचाने के लिये दूसरे कार्य खुद हीं शुरू नहीं करना चाहिये । अगर कोई कारण से वह यह करता भी हैं तो शरणागति कभी उस व्यक्ति का उपाय नहीं होगी। जो शरणागति उसने कि वह उसको मदद नहीं करेगी बल्कि उसको हमेशा के लिये छोड़ देगी। अत: हर व्यक्ति को पूरे निरंतर विश्वास के साथ अपने तरफ पकड़ के रखता हैं और शरणागति पर संशय नहीं करता हैं परंतु खुद को बचाने के खुद हीं सभी कार्य लिये करने लगता हैं। अगर वह करता हैं तो शरणागति पूरी तरह टूट जायेगी। इसे एक कहानी के जरिये समझाया गया हैं।

अञ्जनै तन सेयै: अंजना का पुत्र, हनुमान हैं

मुरण अलियक कट्टियदु: मुरण ताकत या बल / साहस को दर्शाता हैं और इसलिये यह पद का अर्थ “उस ताकत को ब्रह्मास्त्र के जरिये निष्प्रभाव करना ”।

वेरोर कयिरु कोण्डु आर्प्पदन मुन: वह क्षण जब कोई ब्रह्मास्त्र पर विश्वास न रखकर दूसरे छोटी रस्सीयों पर विश्वास रखकर हनुमानजी को बाँधता हैं। (अर्थल का मतलब बाँधने कि क्रिया)

विट्ट पडै पोल: शरणागति उसी तरह निष्फल हो जायेगी जैसे ब्रह्मास्त्र भी दूसरे छोटी रस्सी के संयोग में आने से निष्फल हो जाती हैं।

रक्का: रामायण में जब श्रीहनुमानजी श्रीलंका में सन्देश लेकर आते हैं तब वें पूरी तरह अशोक वाटीका को नष्ट कर देते हैं। इन्द्रजीत जो रावण का पुत्र था हनुमानजी से युद्ध कर उनको ब्रम्हास्त्र से बांध दिया। फिर भी हनुमानजी ने जो क्रोध लंका पे किया वह याद कर इन्द्रजीत ने उन्हें ब्रम्हास्त्र को आधार देंगी यह सोचकर दूसरी और छोटी रस्सीयों से बांधा । वह मन में यह सोचा कि, “क्या यह ब्रम्हास्त्र हनुमान जैसे योद्धा को बाँधने के लिये काफी हैं” और ब्रम्हास्त्र के शक्ति पर शंका करने लगा । अत: एव उसने एक कदम आगे बढ़कर और छोटी रस्सीयों लाकर हनुमान को बांध दिया। इन्द्रजीत का यह बुद्धिहीन कार्य देखकर ब्रम्हास्त्र ने हनुमान को उनके गांठ से मुक्त कर दिया। उसी तरह किसी को भी शरणागति छोड़ और कोई कार्य में लगना हो तो उसको शरणागति का कभी भी परिणाम नहीं मिलेगा और उस व्यक्ति को हमेशा के लिये मुश्किल में रख देगी। शरणागति की ब्रम्हास्त्र के साथ तुलना कि गई हैं और बाकि अच्छे कर्मों की उन तुच्छ रस्सीयों के साथ तुलना कि गई हैं।

हिन्दी अनुवादक – केशव रामानुज दासन्

Source: http://divyaprabandham.koyil.org/index.php/2015/02/gyana-saram-28-sharanagathi-marror/
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