ज्ञान सारं – पासुर (श्लोक) २२

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श्री:
श्रीमते शठकोपाय नम:
श्रीमते रामानुजाय नम:
श्रीमत् वरवरमुनये नम:

ज्ञान सारं

ज्ञान सारं – पासुर (श्लोक) २१                                                            ज्ञान सारं – पासुर (श्लोक) २३

पासुर – २२

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उडैमै नान् एन्रुम् उडैयान् उयिरै
वडमदुरै वन्दुदित्तान् एन्रुम् – तिडमाग
अरिन्दवन् तन् ताळिल् अडैन्दवर्क्कुम् उण्डो
पिरन्दु पडु नीळ् तुयरम् पिन्

सार:

सभी को अपने कर्मों का फल भोगना पड़ता हैं,चाहे वह अच्छा हो या बुरा | कोई भी उससे बच नही सकता | निधि नूल कहते हैं “उरऱ्पाल नीक्कल् उऱुवर्कुम् आगा” | इसका अर्थ हैं की देवता भी बुरे कर्मों को नहीं रोक सकते हैं | इसी तरह अच्छे कर्मों को भी नहीं रोक सकते हैं | अगर वर्षा नहीं हो रहीं हैं तो और कोई भी वर्षा नहीं दे सकता | इसी तरह अगर वर्षा अधिक हो रही हैं तो कोई उसे रोक भी नहीं सकता | इससे हम कर्म के प्रभाव को समझ सकते हैं,चाहे वह अच्छे हो या बुरे,व्यक्ति को भुगतना ही पड़ेगा | यह नियम श्रीमन्नारयण भगवान के द्वारा सारे भ्रमांड के लिए स्थापित किया गया हैं | पिछले जन्म मैं किए गये कर्मों का फल हमें इस जन्म मैं जोखिम या पुरस्कार के रूप मैं मिल सकता हैं | इस जन्म मैं किए गये कर्मों का फल हमें अगले आने वाले जन्मों मैं जोखिम या पुरस्कार के रूप मैं मिल सकता हैं | यह एक चक्कर के तरह चलते ही रहता हैं | क्या इस कर्मों के चक्कर मैं फसे जीवात्मा को कभी मुक्ति मिलेंगी ? यह पाशुर इस प्रश्न का उत्तर देता हैं | अगर कोई कर्म ही नही रहेगा ,तो क्या पुनः जन्म लेगा और क्या पुनः किसी किसी कर्मों का दुख या सुख भोगना पडेग? नहीं | तमिळ वेद कहता हैं की यह उपर बताए गये कर्म ऐसे नष्ट हो जाते हैं जैसे कपास आग से नष्ट होता हैं | और कोई दूसरा जन्म नहीं होगा |

शब्दशः अर्थ

उडैमै नान् एन्रुम् उडैयान् उयिरै– श्रीमन्नारायण भगवान आत्मा के मालिक  हैं वडमदुरै वन्दुदित्तान् एन्रुम् – और उत्तरीय मधुरै मैं अवतरित हुए | तिडमाग अरिन्दवन् – जो सुनिश्चित ही यह जानता हैं | तन् ताळिल् अडैन्दवर्क्कुम् उण्डो? – की श्रीमन्नारायण भगवान ही सभी के मालिक हैं और उनके कमल चरणों का एकमात्र आश्रय लेगा  उसे पुनः जन्म लेकर कर्मों के अनुसार सुख / दुख भोगने की चिंता नही रहेगी |पिरन्दु पडु नीळ् तुयरम् पिन्  – क्यूंकी उनके कर्म इसी जन्म मैं नष्ट हो जाएँगे जैसे कपास अग्नि मैं नष्ट हो जाता हैं |

स्पष्टीकरण :

उडैमै नान् एन्रुम् : हमें पता होना चाहिए की यह आत्मा श्रीमन्नारायण भगवान की संपत्ति हैं |शास्त्र जैसे वेदों मैं यह स्‍पष्ट बताया गया हैं की आत्मा श्रीमन्नारयण भगवान की संपत्ति हैं | हम सभी को शस्त्रों से यह बात समझ लेनी चाहिए | किसी व्यक्ति के जान लेने से भी बात वही ख़त्म नही हो जाती | बल्कि उसे तदनुसार आचरण भी करना चाहिए|

उडैयान् उयिरै वडमदुरै वन्दुदित्तान् एन्रुम् :  हमें पता होना चाहिए ऐसे श्रीमन्नारायण, जो हमारे आत्मा के मालिक हैं जिसे हम अपने आप को पहचानते हैं | हमे उनकी पहचान मथुरा मे अवतरित कृष्‍ण के रूप मैं होनी चाहिए | हमे पता होना चाहिए की वे,कृष्‍ण जिन्होने हमें भगवद् गीता प्रदान की,वे कहते हैं वे सर्वोच्च हैं,वे इस पूरे ब्रह्मांड में सभी के मालिक है | हमे पता होना चाहिए की कृष्‍ण ही हैं जिन्होने कहा था की जो व्यक्ति उनके कमल चरणों की शरण लेगा उनका कभी पुनर्जन्म नहीं होगा और वे कर्मों के फल स्वरूप सभी दुखों से मुक्त हो जाएँगे | वे उन्हे सभी बंधनों से मुक्त कर देंगे |

तिडमाग अरिन्द : यह वाक्यांश का अर्थ हैं “वस्तुतः बहुत स्पष्ट रूप से / यह पता होना चाहिए” | अगर हम शस्त्रों पर ध्यान केंद्रित करेंगे तो हम खुद यह देख सकते हैं की किसी की संपत्ति होने की क्षमता सारे जीवात्मा के लिए आरक्षित हैं और किसी का मालिक होने की क्षमता मात्र श्रीमन्नारयण भगवान के लिए ही आरक्षित हैं | इसलिए, इस पाशूर मैं शास्त्रों के अनुसार “उडमै” नाम जीवात्मा को दिया गया हैं और “उडैयान” नाम श्रीमन्नारयण भगवान को दिया गया हैं | तो,स्वामी ही उस जगह आर आयेगे जहा पर उनकी संपत्ति हैं और फिर उसे वे खुद अपने उपर लेलेंगे | वे ही आकर जीवात्मा तक पहुँचते हैं,और उनतक पहुँचने के खुद ही साधन बनाते हैं, और उनतक पहुँचने के बाद वे ही अपनी संपत्ति के वापिस मिल जाने से प्रसन्न होते हैं | यह संबंध,दास-स्वामी हमे बहुत स्पष्ट रूप से बिना कोई भ्रम के हमारे मन (तिडमाग) मै समझ लेना चाहिए |

अवन तन् ताळिल् अडैन्दवर्क्कुम् : यह वाक्यांश उन सभी को संबोधित करता हैं जिन्होने यह समझ लिया हैं की वे दास हैं और वे अपने स्वामी,श्रीमन्नारायण के चरण कमलों मैं उनकी पत्नी “पिराट्टि”(श्री लक्ष्मीजी)के पुरुष्कार द्वारा शरण लेते हैं | दूसरे शब्दों मैं ,वे लोग वह हैं जो द्वय के पहले भाग मैं बताए गये अनुसार शरणागती करते हैं |

उण्डो पिरन्दु पडु नीळ् तुयरम् पिन् : “नीळ् तुयरम्” उन सारे कर्मों को बताता हैं जो कई जन्मों से हमारे पीछे पड़े हैं | कर्म ही भविष्य के जन्मों के लिए कारण हैं | हालाँकि यदि कोई शरणागती करता हैं तो क्या उसको फिर से जन्म लेना पड़ेगा ? उनका कोई जन्म नहीं होगा क्यूंकी कोई कर्म ही नहीं रहेंगे | सभी कर्म पूरी तरह से नष्ट हो जाएँगे |

शठकोप स्वामीजी अपने पेरिया तिरुवन्दादि(पाशूर ५४) मैं कहते हैं की

“वानो मरि कडलो मारुदमो तीयगमो
कानो ओरुङ्गिट्रुम् कण्डिल माल् आन् ईन्र
कन्रुयर त्ताम् एरिन्दु काय् उदिर्त्तार् ताळ् पणिन्दोम्
वन् तुयरै आवा ! मरुङ्गु

इसका मतलब यह हैं की यह कर्म इस प्रकार नष्ट हो जाएँगे की कीसो को पता ही न लगे की एकदम से ये कहा चले गये | इस प्रकार यदि किसी व्यक्ति ने शरणागती की हो तो क्या उसे फिर से जन्म लेने होगा जिसमे उसे कर्मों के परिणामों को भोगना पड़े ? जिन्हे शरणागती करते ही मुक्ति चाहिए,उन्हे तभी मुक्ति मिलेंगी | पर ऐसे कई लोग हैं जिनको उस जन्म के अन्त मैं मुक्ति चाहिए जिस जन्म मैं उन्होने शरणागती की हैं | उनकी इच्छा भी सच हो जाएँगी | यह साबित करता हैं की शरणागती के बाद वैसे भी कोई जन्म नहीं होगा | अरुळाळ पेरुमळ एम्बेरूमानार स्वामीजी कहते हैं की यह कोई संभावना नहीं, बल्कि निरपेक्ष निश्चितता हैं |

अडियेन् केशव रामानुज दासन्

Source: http://divyaprabandham.koyil.org/index.php/2015/02/gyana-saram-22-udaimai-nan/
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