ज्ञान सारं – पासुर (श्लोक) २१

श्री:
श्रीमते शठकोपाय नम:
श्रीमते रामानुजाय नम:
श्रीमत् वरवरमुनये नम:

ज्ञान सारं

ज्ञान सारं – पासुर (श्लोक) २०                                                             ज्ञान सारं – पासुर (श्लोक) २२

पासुर२१

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आरप पेरुन्तुयरे सेय्दिडिनुम अन्बर पाल
वेरिच्चरोरूगै कोन मेय्न्नलमाम् – तेरिल
पोरुत्तरकु अरीदु एनिनुम मैंदन उडर पुण्णै
अरुत्तरकु इसै तादै अट्र्र्रु

सार:  श्रीमन्नारायण, जो की पेरिया पिरट्टी (लक्ष्मी अम्माजी) के पति हैं वह अपने भक्तों को बहोत सारी पीड़ा दे सकते हैं। हालकी अपने भक्तों को वो पीड़ा देने का सच्चा कारण शुद्ध प्रेम हैं। यह इस पाशुर में उदाहरण के साथ प्रस्तुत किया हैं।

शब्दशः अर्थ

आरप पेरुन्तुयरे सेय्दिडिनुम अन्बर पाल ऐसा प्रतित होता हैं कि एक भक्त को बहुत पीड़ा दि गयी हैं | वेरिच्चरोरूगै कोन – अम्माजी के स्वामी भगवान श्रीमन्नारायण से | मेय्न्नलमाम् तेरिल पोरुत्तरकु अरीदु एनिनुम – लेकिन पुन: विचार करने से यह पुरि तरह स्पष्ट   हो गया कि यह पीड़ा तो भगवान श्रीमन्नारायण के हमारे प्रति प्रेम के कारण हैं जैसे | मैंदन उडर पुण्णै अरुत्तरकु इसै तादै अट्र्र्रु – एक पीता अपने पुत्र के चोट के इलाज के लिए एक कष्टकर शल्य वैध्यक (surgery) कराता हैं। | आरप पेरुन्तुयरे: तुयर” एक पीड़ा या दु:ख हैं; पेरुन्तुयरे – बड़ी पीड़ा; “आरप पेरुन्तुयरे” – बहुत बड़ी पीड़ा। स्वामीजी श्री देवराज मुनि “ई”(एवकारम) का प्रयोग यह समझाने के लिए किया कि यह दु:ख केवल पीड़ा के कारण से ही हुवा हैं। उसमे एक कण मात्र भी खुशी नहीं हैं और इसका मतलब “सिर्फ और सिर्फ दु:ख ही हैं”। सेय्दिडिनुम: “सेय्दिडिनुम” शब्द उस दशा को संबोधित करता हैं कि  हालकि भगवान बहुत बड़ी पीड़ा देते हैं। भगवान उस जीव को उसके सब कर्म का फल भी देते हैं जो वह जीव अपने जीवन काल में जोड़ता हैं। समयानुसार कर्मों कि घडी को तीन भागों में बाटा गया हैं। पिछले कर्म को “पोया पिझै” से जाना जाता हैं, भविष्य कर्म को “पुगुतरु वान” से जाना जाता हैं और वर्तमान कर्म को वह जब आत्मा उस शरीर में उपस्थित हैं। यह सब तीनों कर्मों को तो भगवान श्रीमन्नारायण ही विनाश कर सकते हैं। अत: जो जीव सबसे बड़ी पीड़ा से गुजरता उसको भी नष्ट करना भगवान के लिए नामुमकिन नहीं हैं। अगर भगवान चाहे तो वह कर सकते हैं। परन्तु अपने भक्तों के अधिक लाभ / उद्धार के कारण भगवान चाहते हैं कि उसके भक्त अपने कर्मों के फलनुसार उस पीड़ा को भोगे। इसका कारण यह हैं कि भगवान चाहते हैं कि उसके भक्त इस संसार बन्धन से छुट जाये। यह तथ्य “किट्टाधायिं वेट्टेन मारा” इस गाथा में दर्शाया  गया हैं  ।

यह एक तिरुकुरल से लिया गया हैं:

इयाल्बागवुम नोन्बिर्कु ओनृ इनमै उदमै
मयलागम मर्रूं पेयर्तु

उपर बताये गये तिरुकुरल का मतलब यह हैं कि हर एक को अपने पूर्व संसार बन्धन के अनुसार सब कुछ छोड़ना हैं। अगर कोई व्यक्ति एक तुच्छ वस्तु के लिए सब कुछ छोड़ता हैं तो यह बहुत आपत्ति जनक हो सकता हैं क्योकिं वह एक तुच्छ वस्तु धीमे से ओर धीरे-धीरे बाकि सभी वस्तु जो वह छोड़ा हैं उस पर केन्द्रित करता हैं। यह सब श्री परिमेल अझगरजी ने समझाया हैं।  तिरुकुरल  का पहिले जिक्र किया हुआ मतलब है की,एक जो अगर वह श्रीमन्नारायण भगवान के चरण कमलों को प्राप्त करके अपने अध्यात्मिक खोज को बढ़ाना चाहता है तो सांसरिक वस्तुओं को  भूतकाल से पकड़े हुवे है उन सबको पहिले ही छोड़ दे। अगर कोई व्यक्ति लगभग सब कुछ छोड़ देता है परंतु एक छोटी वस्तु के लिए, फिर वह बहुत आपत्तिजनक हो सकता है क्योंकि वह छोटीसी वस्तु धीरेसे और धीरे धीरेसे सभी वस्तुओं पर जो वह व्यक्ति छोड़ने के लिए केन्द्रित कर रहा हैं उसपर आ जाता हैं । इसीलिए एक व्यक्ति को सारी वस्तुए छोड़ना आवश्यक  है। यह विश्लेषण  श्री परिमेल अझगरजी के द्वारा कहा गया हैं।

वेरिच्चरोरूगै कोन: वेरि का अर्थ सुगन्ध हैं और “चरोरुगम” का अर्थ कमल हैं। इसलिए यह शब्द “वेरिच्छरोरुगम” शब्द पूर्ण तरह सुगन्धित कमल को संबोधित करता हैं। अत: “वेरिच्छरोरुगै” शब्द सुगन्धित कमल पर बैठने वाले को संबोधित करता हैं।

“चरोरुगै कोन”: “कोन” का अर्थ सामान्यत: राजा हैं। इदर उसका अर्थ “स्वामी” हैं। वह “चरोरुगै” के साथ चलता हैं इसलिए वह भगवान श्रीमन्नारायण जो अम्माजी (परिया पिराट्टी) के स्वामी हैं उनको संबोधित करता हैं। यहाँ अम्माजी का भी नाम इसलिए लिया गया हैं क्योकिं जब भगवान अपने भक्तों सबसे बड़ी पीड़ा देते हैं तब वे अकेले यह पीड़ा नहीं देते हैं। अम्माजी के जानकारी से और उनको शामिल कर के किया गया हैं। क्योकिं हम यह देखते हैं कि भगवान जो पीड़ा देते हैं वह वक्त के साथ हितकारी है यह साबित होता है और अम्माजी के उपस्थिती बिना कुछ भी ज्यादा हितकारी नहीं होता हैं। इसीलिए जब भी भगवान बहुत बड़ी पीड़ा देंगे तो अम्माजी हमेशा मौजूद रहेगी।

मेय्न्नलमाम् – इसका अर्थ सच्चा प्रेम / सच्चा चिन्तन करना।

तेरिल – यह उस क्रिया के अनुसन्धान को संबोधित करता हैं जहाँ भगवान किसी मनुष्य को सबसे पहिले दु:ख क्यों देता हैं। अन्बर पाल। अत: इस पाशुर में शब्द रचना इस ढंग से हो “वेरिच्चरोरूगै कोन अन्बर पाल आरप पेरुन्तुयरे सेय्दिडिनुम तेरिल मेय्न्नलमाम्”। यह एक उदाहरण के साथ समझाया गया हैं।

पोरुत्तरकु अरीदु एनिनुम मैंदन उडर पुण्णै अरुत्तरकु इसै तादै अट्र्र्रु: एक बालक को उसके शरीर में चोट लगी हैं। उसके पिता उसको अस्पताल में भर्ति कराते हैं जहाँ डॉक्टर उसके शरीर पर इलाज करता हैं। यह प्रक्रिया से उस बालक को बहुत दर्द होता हैं क्योंकि शायद उसके शरीर पर चीर-फाड़ करना हैं। उसके पिता इसके लिए राजी हो जाते हैं क्योंकि उन्हें पता हैं की इसका परिणाम अच्छा हैं। इस उदाहरण में पिता भगवान के जैसे हैं जो अपने भक्तों को उनके कर्म नष्ट होने के लिए बहुत ज्यादा पीड़ा देते हैं। यह एक भगवान का हमारे प्रति प्रेम हैं। इस प्रक्रिया में अम्माजी भी भगवान के साथ मिलकर भक्तों को संपूर्णत: चिरकाल मार्ग के लिए सहन करती हैं।

अडियेन् केशव रामानुज दासन्

Source: http://divyaprabandham.koyil.org/index.php/2015/02/gyana-saram-21-arap-perunthuyare/
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