ज्ञान सारं – पासुर (श्लोक) १९

श्री:
श्रीमते शठकोपाय नम:
श्रीमते रामानुजाय नम:
श्रीमत् वरवरमुनये नम:

ज्ञान सारं

ज्ञान सारं – पासुर (श्लोक) १८                                                               ज्ञान सारं – पासुर (श्लोक) २० 

पाशूर १९

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नल्ल पुदल्वर् मनैयाळ् नवैयिळ् किळै
इल्लम् निलम् माडु इवै अनैत्तुम् – अल्लल् एनत्
तोट्रि एरी तीयिर् सुडु मेल् अवर्क्कु एळिदाम्
एट्ररुम् वैगुन्दत्तु इरुप्पु

सार

अरुळाळ पेरुमाळ एम्बेरुमानार् स्वामीजी इस पाशूर मैं कहते हैं की जिन लोगों को अच्छे बच्चों, पत्नी ,संबंधियों ,घर ,ज़मीन को जलन के दर्द के समान लगता हैं,उन लोगों के लिए परमपाद का उच्चतम् निवास पाना बहुत ही सुलभ हैं |

शब्दशः अर्थ :

नल्ल पुदल्वर् – वह जिसके पास महान बेटा | मनैयाळ् नवैयिळ् किळै – पत्नी,अच्छे सम्बन्धि,| इल्लम् – परिपूर्ण घर | निलम् -समृद्ध और उपजा भूमि | माडु  – बहुत दूध देने वाली गाये हो |इवै अनैत्तुम्अल्लल् एनत् तोट्रि – लेकिन फिर भी इन सब बातों के साथ जिसे कोई अहंकार या लगाव न हो और वह अपने अन्तरंग हृदय से यह जनता हो की ये सब दर्द और पीड़ा के स्रोत हैं एरी तीयिर् सुडु मेल् अवर्क्कु एळिदाम् – और, धधकते आग में इन सब को छोड देता है एट्ररुम् वैगुन्दत्तु इरुप्पु – वही एक हैं जो कालातीत परमपद जाकर श्रीमन्नारायण भगवान के दूसरे भक्तों के साथ रहने का अधिकारी हैं ,वो भी अती सुलभता से | क्यूंकी यह कार्य तो अपने खुद के प्रयासों से प्राप्त करना असंभव हैं |

स्पष्टीकरण :

नल्ल पुदल्वर्: कुछ बच्चों की प्रशंसा हर कोई करता हैं क्यूंकी वे अच्छे गुणों से भरे होते हैं (सद्गुणि) | ये बच्चे उन बच्चों से बिल्कुल अलग हैं जिन्हे बुरी आदतें हैं और जो हर समय अपने माता पिता के मुसीबत के कारण बनाते हैं | यहाँ “नल्ल पुदल्वर्” पहले समूह के बच्चों को संबोधित करता हैं जो सद्गुणि हो |

मनैयाळ् : यह विशेषण “नल्ल” यहाँ पर “मनैयाळ्” शब्द से जोड़ा जा रहा हैं | यह अच्छे गुणों वाली पत्नी को संबोधित करता हैं | तिरुवळ्ळुवर् कहते हैं “मनैतक्क माण्बुदयळागि तऱ्कोन्डान् वळतक्काळ् .वाळ्कैतुणै” | शिलपधिगारम् कहते हैं “अट्रवोर्कु अळितलुम्, अन्धणर् ओम्बलुम्, तुट्रन्दोर्कु एदिर्तलुम् , थोल्वोर् मरबिल् विरुन्धेदिर् कोडलुम्” | यहाँ पर उन अच्छे गुणों के बारे मैं बताया गया हैं जो एक औरत मैं होने चाहिए जैसे की महात्माओं का सम्मान करना, सभी की अच्छे तरह से देखबाल करना और ज़रूरतमंदों की मदद करना | इसके अलावा एक औरत को पता होना चाहिए की एक अच्छा जीवन बिताने के लिए क्या अच्छा हैं | यह बात यहाँ पर ख़त्म नहीं होती, उन्होने जो सीखा हैं उसका पालन भी करना होगा, भोजन बनाने के अलावा ग़रीबों को दान देना और अपने पति की मन को जानकर उनके कहे अनुसार ही रहना |

नवैयिळ् किळै : “नवै” का मतलब ग़ल्तियाँ | “इल्” का मतलब कमी | “किळै” संबंधो को दर्शाता हैं | इसलिए “नवैयिल् किळै” का मतलब हुआ की वो सारे संबंध जो बेदाग और जिसमे कोई दोष नहीं हैं | ये संबंधी उन संबंधियों की तरह नहीं हैं जो सिर्फ़ नाम के लिए संबंधी हो लिकिन असल मे वे दुश्मन की तरह बर्ताव करते हैं | अरुळाळ पेरुमाळ् एम्बेरुमानार् स्वामीजी “नवैयिल् किळै” कहते हुए उन संबंधियों को सम्बोधित करते हैं जिनके साथ हर कोई संपर्क मे रहना चाहता हैं और अच्छे तरह से व्यवहार करना चाहता हैं |

इल्लम्जैसे की उपर कहा गया हैं की “नल्ल” विशेषण सभी सज्ञाओं से पहले लगाना चाहिए | इसलिए “नल्ल इल्लम्” का मतलब होगा बहुत सुंदर घर | घर जो जीर्ण न हुआ हो और जिसमे लोग रहते हों | इसके बजाय इसका मतलब यह भी है, सुंदर घर जिसमे बहुत से स्तरों, कई परतों और छज्जे है |

निलम् : एसी कई जगह हैं जहाँ बहुत से जंगली घास उगी हों | वह बंजर ज़मीन हैं और वहाँ कोई वनस्पति नहीं उग सकती हैं | “नल्ल निलम्” का मतलब उसके विपरीत हैं जिसका मतलब हैं वह ज़मीन जहाँ बिना कोई खाद के फसल उग रही हों | फसल इस वृद्धि से उग रहा हैं की जो बोया हुआ था उससे १० गुना ज़्यादा उपज हो |  अगर कोई सुबह बीज बोता हैं तो श्याम को घर लौटते वक्त लंबे उगे हुए पेड़ों को देखने के लिए उसे अपने हाथों को अपनी आखों के उपर रखकर उपर देखना पड़े |एक तरफ़ के पौधे इस तरह से सम्रुध हो कर बडते हैं की वे सारे क्षेत्र आर कब्जा कर लेते हैं | यह खेत एसए होते हैं जहाँ धान के खेत गन्ने जैसे लंबे बडते हैं |

माडु : “नल्ल माडु” का अर्थ हैं अच्छी गायें ।  वे उन क्रूर गायों जैसे नहीं हैं जिन्हे पकड़ना और नियंत्रित करना न हो | यह बुरी गाएँ अपने रास्ते मैं जो भी आएँ उसे नष्ट करके अपने पड़ोसियों के घर मैं और खेतों मैं कहर मचा देती हैं | अरुळाळ पेरुमाळ एम्बेरुमनार् स्वामीजी एसी बुरी गायों के बारे मैं नहीं बोल रहें हैं बल्कि उन अच्छी गायों को संबोधित करते हैं जो बच्‍चों के छोटे से गुच्छे से भी बँध जाएँ | यह गाय इन बच्चों को ही प्राप्त हो जाती हैं और इन बच्चों की भी आज्ञाकारी होकर और इनसे भी अच्छा व्यवहार करेगी | ये दूध भी बहुत अधिक मात्रा मैं देती हैं |

अल्लल् एनत् तोट्रि : अरुळाळ पेरुमाळ एम्बेरुमनार् स्वामीजी कहते हैं की हमें एसा सोचना चाहिए की यह सारी उपर बताई गयी विलासिता दुख और दर्द का कारण हैं | भले ही अल्लल् का मतलब दुख या दर्द हैं लेकिन इस सन्दर्भ मैं हमे इसका मतलब कुछ इस तरह लेना चाहिए की जो खुद मैं दर्द न हो बल्कि दुख और दर्द को लाता हैं | वे उनके एक अप्रत्यक्ष स्रोत हैं |

एरी तीयिर् सुडु मेल् : चमकदार आग जो ठाठ से जलती हैं | इन विलासिता से अगर किसी को धकधकाती आग के गर्मी के समान कष्ट हो तो वह व्यक्ति आगामी अनुच्छेद में वर्णित फल का पात्र है |

अवर्क्कु एळिदाम् एट्ररुम् वैगुन्दत्तु इरुप्पु : अगर कोई व्यक्ति यह महसूस कर रहा हैं की इस दुनिया के विलासिता आग के गर्मी के कष्ट के समान हैं तो वह एक अच्छी तरह से परिपक्व व्यक्ति है | ऐसे व्यक्ति को भगवान ऐसी चीज़ देते हैं जो उसे खुद अपने प्रयासों से नहीं मिल सकती | भगवान  ऐसे व्यक्ति को परमपद देते हैं जहाँ पर वह भगवान के दूसरे दासों के साथ मिलकर नित्य भगवान का कैन्कर्य सेवा करे |

 

अडियेन् केशव रामानुज दासन्

Source: http://divyaprabandham.koyil.org/index.php/2015/02/gyana-saram-19-nalla-pudhalvar/
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