ज्ञान सारं – पासुर (श्लोक) १८

श्री:
श्रीमते शठकोपाय नम:
श्रीमते रामानुजाय नम:
श्रीमत् वरवरमुनये नम:

ज्ञान सारं

ज्ञान सारं – पासुर (श्लोक) १७                                                                 ज्ञान सारं – पासुर (श्लोक) १९

पाशूर १८

Dhruva-Vishnu-and-Garuda-thumb

 

ईनमिला अन्बर् एन्रालुम् एय्दिला
मानिडरै .एल्लावणत्तालुम् – तान् अरिय
विट्टार्कु एळियन् विडादार्क्कु अरिवरियन्
मट्टार् तुळाय् अलङ्गल् माल्

शब्दशः अर्थ :

ईनमिला अन्बर् एन्रालुम् एय्दिला  – श्रीमन्नारायण भगवान के चरण कमलों के दास जो दोषों से रहित और भक्ति से भरे हो उन्हे इस तरह रहना चाहिए  |मानिडरै .एल्लावणत्तालुम् – वे इस अनित्य और संसारी लोगों से किसी भी तरह की बातचीत और संबंध जारी नहीं रखते | तान् अरिय – साथ ही भगवान को पता हैं की वे अब किसी के साथ संबंध नहीं रखते | विट्टार्कु एळियन् विडादार्क्कु अरिवरियन् मट्टार् तुळाय् अलङ्गल् माल् वह जिन्होने इस अनित्य संसारी संबंध त्याग दिया है , उन के लिए उसे प्राप्त करना जिसके पास पवित्र तुलसी(तिरुतुळाय्) हैं जिससे शहद बहता हैं,बहुत ही सुलभ हैं लेकिन बहुत कठिन हैं उन के लिए जिन्होने संसारी संबंधों का त्याग नहीं किया |

स्पष्टीकरण :

ईनमिला अन्बर् एन्रालुम् : “ईनम्” दुष्टता को दर्शाता है | यह शब्द “पोल्ला अरक्कनै” कहते समय आमतौर आर रावण जैसे लोगों को संबोधित करते हुए कहते हैं | परकाल स्वामीजी(तिरुमङ्गै आळ्वार्) “मुन्पोला रावणन्” कहते हैं | विष्णुचित्त स्वामीजी(पेरियाळ्वार्)कम्स की दुष्टता दिखाने लिए उसे “तीय पुन्डि कंजन” कहते हैं | इसीलिए रावण और कम्स जैसे लोगों के कृत्यों को “पोल्लांगू” के  कृत्य कहते हैं |  तो, ईनमिल् का मतलब हैं एसे दुष्टता के बिना | एसे लोग श्रीमन्नारायण भगवान के चरण कमलों में निष्काम भक्ति से परिपुर्ण होते हैं | भगवद् गीता मैं कृष्णजी बताते हैं की जिनके पास उन्हे छोड़कर दूसरा कुछ नहीं हैं उनके लिए वे ही अंतिम लक्ष हैं | इसलिए इस तरह की निष्टा और भक्ति रहने वाले भक्तों को “ईनमिला अन्बर्” कहा गया हैं |

एय्दिला मानिडरै : लोग जिन्हें कभी श्रीमन्नारायण भगवान की तरफ झुकाव नहीं था ।  आद्यात्म की ओर बडकर सदा के लिए श्रीमन्नारायण भगवान के साथ रहना ही इस मनुष्य जन्म का एकमात्र फल है । जो लोग ऐसा नहीं करते वे “विलन्गोडु मक्कळ् अनयर्” के अनुसार चलते फिरते जानवर हैं । यह बात कुछ आळ्वारों द्वारा बतायी गयी हैं । परकाल स्वामीजी(तिरुमंगै आळ्वार) कहते हैं “आन्वीडैयेळ अन्रू अडर्तार्कु आळानार अल्लाधर मानिडवर अल्लर् ” । भुतयोगी स्वामीजी कहते हैं “चेन्णगण माल् नामम् मारनधारै मानिडमावयेन्” । इससे हमे यह पता चलता हैं की वे लोग जो “श्रीमन्नारायण” को भुल जाते है वे मनुष्य ही नहीं हैं । आळ्वार जिन्हें साक्षात श्रीमन्नारायण भगवान द्वारा ही परम ज्ञान और भक्ति प्रदान की गयी थी, वे भी ऐसे लोगों की निन्दा करते हैं और उनसे दुर ही रहते हैं । ऐसे लोग श्रीमन्नारायण भगवान का अपमान करते हैं और उनसे दुर रहते हैं । ऐसे लोगों को ही “एय्दिला मानिडरै” कहा गया हैं । वे बहुत ही तुछ और पापी लोग हैं ।

ऐसे नासमझ लोगों के लिए शठकोप स्वामीजी कहते हैं “याधानुम् पट्रि नीनगुम् विरधमुडयार्”।दो अलग मतों पर आधारित अगर हम “एय्दिला” के जगह पर “एय्दिलारम्” शब्द का प्रयोग करे तो इसका मतलब होगा वह लोग जो श्रीमन्नारायण भगवान के दुश्मन हैं | तीरुवळ्ळुवर् इस बारे में यह कहते हैं “एय्दिलार् कुट्रम् पोला “। “एय्दिलार्” का अर्थ है दुष्मन ।

एल्लावणत्तालुम् : इसका मतलब हैं सभी तरह के सम्बन्ध जैसे उनके साथ रहना, चीजों का लेनदेन करना, बातचीत करना और दुसरे सभी लौकिक आदतें ।

तान् अरिय विट्टार्कु एळियन् :  लोग जिन्हें  “एय्दिला मानिडरै ” कहा गया है ऐसे लोगों से हमें सारे उपर बताये गये सम्बन्धों को छोड़ देना चाहिए । हमें इन सम्बन्धो को इस तरह छोड़ देना चाहिए की ना सीर्फ हमें और हमारे आसपास रहने वाले लोगों को पता हो बल्कि हमारे अंदर रहने वाले भगवान को भी पता हो की हमने पुरी तरह से इमानदारी के साथ ऐसे लोगों से सारे सम्बन्ध छोड़ दिये हैं । जिन्होंने इस तरह के सारे सम्बन्धो का त्याग कर दिया हैं उनके लिए भगवान बहुत ही सुलभ हो जाते हैं । भगवान को ही उळ्ळुवार् उळ्ळितेल्लाम् उडनिरुन्धु ” कहा गया है, मतलब वे ही एक हैं जो हम सभी में हैं, और इतनाही नहीं वे हमारे गहरे से गहरे विचार मे भी हैं । इसलिए, यह त्यागने की बात वहाँ तक पता होना चाहिए जबतक ये भगवान इस बात की मोहर लगादे की हाँ हमने “सही में छोड़ दीया हैं ।” इस जगह पर वरवरमुनी स्वामीजी(स्वामी मणवाळ मामुनी) कहते हैं की श्रीवैष्णवम् वह हैं जो इस बात मे सीमित न हो की किसी व्यक्ति को क्या पता हैं या संसार को क्या पता हैं । जो प्रधान हैं वह तो यह हैं की श्रीमन्नारायण भगवान को क्या पता हैं ।

श्री पेरिय आच्चान पिळ्ळै स्वामीजी इसको तमिळ मैं इस तरह कहते हैं “तान अऱिन्ध वैणवत्वमुम् वैणवत्वम् अल्ला,नडरिन्ध वैणवत्वमुम् वैणवत्वम् अल्ला,नारायणन् अरिन्ध वैणवत्वमे वैणवत्वम् | ”

विडादार्क्कु अरिवरियन् : उन लोगों को जिन्होने ऐसे “एय्दिला मानिडर्” को नहीं छोड़ा हैं,भगवान कभी प्राप्य न होंगे वे कभी भगवान तक नहीं पहुँचा सकते | शठकोप स्वामीजी कहते हैं “अडियार्कु एळियवन् ,पिरर्गळुक्कु अरीय वित्तगन्” | तो ,ऐसे सांसारिक लोगों के साथ जो “एय्दिला मानिडर्” की श्रेणि मैं आते हैं उन लोगों के साथ भक्तों को कोई भी सम्बन्ध नहीं रखना चाहिए |

मट्टार् तुळाय् अलङ्गल् माल् : भगवान श्रीमन्नारयण वे हैं जिनके सिर पर और कंधों पर तुलसी माला सजी हों | क्यूंकी इस तुलसी माला को भगवान के दिव्य शरीर का स्पर्श होता हैं,यह सुंदर हो जाती हैं और इससे शहद बहने लगता हैं | तुलसी माला भगवान की श्रेष्ठता का वर्णन करती हैं | कुल मिलाकर, अर्थ के संदर्भ में इस पाशूर को हमें इस तरह पड़ना चाहिये “मट्टार् तुळाय् अलङ्गल् माल्,ईनमिला अन्बर् एन्रालुम् एय्दिला मानिडरै एल्लावणत्तालुम् – तान् अरिय विट्टार्कु एळियन् विडादार्क्कु अरिवरियन् “|

 

अडियेन् केशव रामानुज दासन्

Source: http://divyaprabandham.koyil.org/index.php/2015/02/gyana-saram-18-inamila-anbar/
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