ज्ञान सारं – पासुर (श्लोक) १५

श्री:
श्रीमते शठकोपाय नम:
श्रीमते रामानुजाय नम:
श्रीमत् वरवरमुनये नम:

ज्ञान सारं

ज्ञान सारं – पासुर (श्लोक) १४                                                                          ज्ञान सारं – पासुर (श्लोक) १६

पाशूर १५

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कुडियुम् कुलमुम् एल्लाम् कोकनगैक् केळ्वन्
अडियार्क्कु अवन् अडिये आगुम्पडियिन्
मेल् नीर् केळुवुमारुगळिन् पेरुम् निरमुम्
एल्लाम् आर् कलियैच् सेर्न्दिड माय्न्दट्रु

अर्थ

कुडियुम् कुलमुम् एल्लाम्  – जन्म स्थान, लिंग, गोत्रम् और जन्म के समय के अन्य सभी पहचान व्यर्थ बताये गये हैं | कोकनगैक् केळ्वन् अडियार्क्कु अवन् अडिये आगुम् – श्रियःपति के चरण पहुँचने पर और उनके दास बनकर और बिना कोई अंतर के उन्ही की तरह स्वरूप मिलनेकेबाद | पडियिन् मेल् नीर् केळुवुमारुगळिन् – इन दासों की अवस्था वैसे ही है जैसे इस धरती पर पानी से भरी बहती नदियों की | पेरुम् निरमुम् एल्लाम् – जो अलग अलग नामों से और रंगों से जैसे लाल,सफेद,काली आदि और भी कई व्यत्यासों से पहचानी जाती हैं |आर् कलियैच् सेर्न्दिड माय्न्दट्रु – लिकिन जब वे समुद्र से मिलती है तब सभी व्यत्यासों का नष्ट हो जाता है और वे एक हो जाती हैं |

प्रस्तावना

पिछले पाशूर मै अरुळाळ पेरुमळ् एम्बेरुमानार् स्वामीजी “एव्वुयिर्क्कुम् इन्दिरै कोन् तन्नडिये तानुम् सरण्” कहते हैं | इस पाशूर मै स्वामीजी कहते हैं की श्रीमन्नारायण भगवान के चरण कमल ही हम सभी के शरण्य हैं | श्रीमन्नारायण भगवान के दासों को “तिरुमगळ् मणाळनुक्कु अडियार्”(उन भगवान[पेरुमाळ्] के दास जो श्री महालक्ष्मीजी[पिराट्टि] के पती है)| यह सब दास(भक्त) अपने सच्चे स्वरूप को जानने के पहले कई लौकिक चीज़ो से पहचाने जाते थे जैसे उनके नाम के साथ उनका जन्म स्थान, उनके नाम के साथ उनका वर्ण और कई ऐसे दूसरे लौकिक संबंध | लेकिन उनको जब(आचार्य और दिव्य दंपत्ति श्री लक्ष्मीनारायण भगवान की निर्हेतुक कृपा से )अपने सच्चे स्वरूप का ज्ञान हो जाता है तब वे उनके लौकिक संबंधो जैसे जन्म स्थान,वर्ण आदि से नहीं पहचाने जाते | उनकी एक मात्र पहचान श्रीमन्नारायण भगवान के चरण कमाल ही हो जाती है और दूसरा कुछ नहीं |

स्पष्टीकरण

कुडियुम् कुलमुम् एल्लाम् – इस वाक्य का अर्थ जानने के लिए निम्नलिखित तीन अंशों का अर्थ समझना होगा | वे इस प्रकार हैं :

“सोण्णाट्टु पून्जाट्रुर् पार्पान गौणियन् विण्णतायन्” – पुरनानोरु

वेग्ङण् मा कळिरुन्दि वेण्णियेट्र
विरल् मन्नर् तिरल् अळिय वेम्मा उय्त्त
शेग्ङणान् को च्चोळन्  – पेरीय तिरुमोळि (६.६.४)

इरुक्किलङ्गु तिरुमोळि वाय् एण् तोळ् ईशर्कु
एळिल् माडम् एळुपदु शेय्दुलगम् आण्ड तिरुक्कुलत्तु वळ च्चोळन्  – पेरीय तिरुमोळि (६.६.८)

इन तीन उदाहरणों मै हम देख सकते है की लेखक ने अपने जन्म स्थान(कुडि),वर्ण(कुलम्),गोत्र और कई जन्म की पहचानों(एल्लाम्) का उल्लेख करते हैं |

कोकनगैक् केळ्वन् अडियार्क्कु – “कोकनगम्” का मतलब है कमल,इसतरह “कोकनगै” उनको संबोधित करता है जो कमल पर बिराजमान हो, मतलब श्री महालक्ष्मीजी(अम्माजी या पिराट्टि)| “केळ्वन्” का मतलब है नायक और इसतरह “कोकनगैक् केळ्वन्” वाक्य “श्रीमन्नारायण भगवान” को संबोधित करता है जो श्री अम्माजी के नायक हैं | “अडियार्” शब्द उन भगवद् दासों को संबोधित करता है जो श्री अम्माजी के नायक श्रीमन्नारायण भगवान के कमल चरणों के नीचे रहते हैं | श्रीमन्नारायण भगवान के कमल चरणों के नीचे रहना ही इनकी पहचान हैं |

अवन् अडिये आगुम् – इसका मतलब है यहाँ उपर बताए गये भक्त जो अपने जन्म,वर्ण,गोत्र आदि चिन्हों से पहचाने जाते है उनका अब इन चिन्हों से कोई सम्बन्ध न रहेगा जब वे एक बार श्रीमन्नारयण भगवान के दास बन जाएँगे | उनके सारे पहले के पहचान चिन्ह नष्ट हो जाते हैं और उस पल से उनकी पहचान श्रीमन्नारयण भगवान के दास के रूप मैं होती हैं | श्रीमन्नारायण भगवान के साथ उनका संबंध ही उनकी पहचान बन जाती हैं | इसलिए उनको “तिरुमाल अडियार्” कहा गया हैं | अरुळाळ पेरुमाळ् एम्बेरुमानार् स्वामीजी उदाहण के साथ पाशूर के दूसरे आधे हिस्से मे बताया हैं |

पडियिन् मेल् – धरती के उपर |

नीर् केळुवुमारुगळिन् पेरुम् निरमुम् एल्लाम् – नदियों में बहुत पानी भरा होता हैं | और नदियों के अलग अलग नाम होते है जैसे गंगा,यमुना आदि और अलग अलग रंगों मे आते है जैसे लाल,कला,सफेद आदि |

माय्न्दट्रु – उसी तरह नष्ट होते है (जैसे नदियाँ समुद्र से मिलने पर अपनी सारी पहचान खो देती हैं)|

निष्कर्ष : श्रीमन्नरायण भगवान के दास हो जाने के बाद उनकी सारी पहले की पहचान नष्ट हो जाती हैं | यह उसी तरह विनाश होते हैं जैसे नदियों की पहचान का विनाश होता है, समुद्र से मिलने पर | नदियाँ अपना नाम,रंग आदि खो देती हैं | इसलिए हमें लौकिक और अनित्य कारक(चिन्ह) जैसे वर्ण आदि को महत्व नहीं देना चाहिए और केवल नित्य वास्तु जिसे हम “अडियराम् तन्मै” कहते है उसी को महत्व देना चाहिए | इसका मतलब और कुछ नहीं बल्कि यहीं हैं की हमेशा सर्वत्र श्री अम्माजी(पिराट्टि) और श्री नारायण भगवान(पेरुमळ्) के दास बनकर रहे | श्री अम्माजी और श्री नारयण भगवान के दास बनने का यह गुण सिर्फ़ एक या दो चुने हुए जीवात्माओं के लिए नही है बल्कि हर एक के लिए हैं | इस तरह यह अनित्य कारणों से उत्पन्न सारें मतभेदों को दूर करेगा और सभी जीवात्माओं को “तिरुमाल अडियार्” नामक एक ही छतरी के नीचे एकजुट ले आएँगा |

अडियेन् केशव रामानुज दासन्

Source: 
http://divyaprabandham.koyil.org/index.php/2015/02/gyana-saram-15-kudiyum-kulamum/
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