Daily Archives: July 18, 2015

తిరుప్పళ్ళి యెళిచ్చి – 2 – కొళుంగొడి

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శ్రీ:
శ్రీమతే శఠకోపాయ నమ:
శ్రీమతే రామానుజాయ నమ:
శ్రీమద్వరవరమునయే నమ:

gajendramoksham

తిరుపళ్లి యెళిచ్చి

1వ పాశురం

పాశుర అవతారిక

కొళుంగొడి ముల్లైయిన్ కొళు మలరణవి
కూరన్దదు కుణతిశై మారుదం ఇదువో
ఎళుందన మలర్  అణై ప్పళ్ళికొళ్ అన్నం
ఈన్బని ననైంద తంఇరుం జిఱగుదఱి
విళుంగియ ముదలైయిన్ పిలం పురై పేళ్వాయ్
వెళ్ళెయిరుర అదన్ విడత్తినుక్కనుంగి
అళుంగియ ఆనైయిన్ అరుందుయర్కెడుత్త
అరంగత్తమ్మా! పళ్ళియెళుందరుళాయే

కుణతిశై మారుదం = తూర్పు నుండి వీచు వాయువు.
కొళుంగొడి = బాగా వికసించిన  తీగ
ముల్లైయిన్ = మల్లె తీగ
కొళు మలర్=  అందమైన పుష్పములు
అణవి= స్పర్శ
ఇదువో= ఈ
కూరన్దదు= వీచు
మలర్  అణై = పుష్పపానుపు
ప్పళ్ళికొళ్= శయనించుట
అన్నం= హంసలు
ఈన్బని ననైంద= మంచు కురుయుట వలన తడిసిన
తం= వారి
ఇరుం జిఱగుదఱి= అందమైన రెక్కలు గల
ఉదఱి = వణుకుచున్న
ఎళుందన = మేల్కోనుట
విళుంగియ= మ్రింగిన/పట్టుకొనిన(ఏనుగు యొక్క కాళ్ళను)
ముదలైయిన్ = మకరం(మొసలి)
పిలం పురై  = గుహ వలె
పేళ్వాయ్= పెద్దని నోరు
వెళ్ళెయిరుర = తెల్లని/పదునైన దంతములతో కరచిన/గాయపరచిన
అదన్ = ఆ ఏనుగు
విడత్తినుక్క= ఆ హానికి(ఆ దంత క్షతం వలన)
అనుంగి అళుంగియ=  విపరీతమైన నొప్పితో బాధపడుతున్న
ఆనైయిన్ = ఆ ఏనుగుయొక్క(గజేంద్రాళ్వాన్)
అరుందుయర్ = చాలా బాధపడుచున్నవి
కెడుత్త= పోగొట్టు
అరంగత్తమ్మా! = శ్రీరంగమున పవళించిన దేవాదిదేవా!
పళ్ళియెళుందరులాయే= (కావున) మీరు కృపతో   మేల్కొని మమ్ము కటాక్షించుము

సంక్షిప్త అనువాదం :

తూర్పు పవనములు(మలయ మారుతములు) బాగా వికసించిన మల్లె తీగలను క్రమంగా తగులుతూ వీస్తున్నవి. పూలపాన్పుపై శయనించిన  హంసలు పొగమంచుచే తడిసిన తమ రెక్కలను మరియు ఈకలను విదిలించుచూ లేస్తున్నవి.  తన గుహలాంటి పెద్దని నోరుతో మరియు వాడియైన విషదంతములచే  ఆ మకరము, గజేంద్రాళ్వాన్ పాదములను పట్టుకొని మ్రింగప్రయత్నించగా  భరించలేని ఆ బాధను పోగొట్టగల గొప్పసామర్థ్యం కలవాడవు నీవు మాత్రమే. కావున   శ్రీరంగమున పవళించిన దేవాదిదేవా!  మీరు కృపతో   మేల్కొని మమ్ము కటాక్షించుము.

 నఙ్ఞీయర్ వ్యాఖ్యానములోని విశేషములు 

  • పెరియ తిరుమొళి 4.7.3 లో  భగవానుడు తాను హంసావతారంలో వేదములను వెల్లడించాడు “అన్నమాయ్ అన్ఱు అంగరు మఱై  పయందాన్ అరంగమా నగర్ అమరన్దానే” కాన ఆ హంసలు మేల్కొన్నాయి, శ్రీరంగనాథ మీరు కూడ అలానే మేల్కొనుము అని ఆళ్వార్ అభ్యర్థిస్తున్నారు.
  • “పరమాపదం ఆపన్న” అని విష్ణుధర్మం- గజేంద్రాళ్వాన్  పెద్దఅపాయముతో చిక్కుకున్నాడు. కాన ఎంపెరుమాన్ అక్కడకు చేరుకొని   గజేంద్రాళ్వాన్ అపాయమును తొలగించి వానిచే తామరపుష్పమును( గజేంద్రాళ్వాన్ తాను ఎంపెరుమాన్ కై పట్టుకొన్నది)  తన పాదముల యందు సమర్పింప చేసుకొన్నాడు.
  • ఇదే భగవంతుడి యొక్క అనుగ్రహం. అదే విధంగా తాను సంసారులను(విభవ అవతార అనంతరం ఉన్న)   ఉజ్జీవింపచేయుటకు  శ్రీరంగమున అర్చారూపి శ్రీరంగనాథుడిగా అవతరించాడు. తమ కోరికలను తీర్చి కటాక్షించుమని ఆళ్వార్ ప్రార్థిస్తున్నారు. ( గజేంద్రాళ్వాన్ యొక్క ఆపదను తొలగించినటుల)

పెరియవాచ్చాన్ పిళ్ళై వ్యాఖ్యానములోని విశేషములు:

  • ఆళ్వార్ “పళ్ళికొళ్ అన్నమ్”అంటున్నారు- దివ్యదేశములలో(భగవానునకు చాలా ప్రీతి అయిన)అన్నింటికి -అనగా హంసలు కూడ గౌరవించబడతాయి. ఎంపెరుమానార్ తిరువేంకటమ్(తిరుమల)ని దర్శించడానికి వెళ్ళినప్పుడు తన మేనమామ మరియు ఆచార్యులైన  పెరియ తిరుమలనంబి తానే స్వయంగా వారిని ఆహ్వానించడానికి ఎదురుగా వెళ్ళారు.
  • అప్పుడు ఎంపెరుమానార్ వారితో ‘మమ్ములను ఆహ్వానించుటకు మీరెందుకు వచ్చారు ఎవరినైన చిన్నవారిని (స్థాయిలో) పంపవచ్చును కదా?’అని అన్నారు. దానికి  పెరియ తిరుమలనంబి ” నమ్మిల్  శిఱియారిల్లై ఇంగు వత్తిప్పారిల్” (తిరుమల లో నివసించేవారిలో మా కన్నా చిన్నావారు (స్థాయిలో) ఎవరునూ లేరు)అని అన్నారు- ఇది అతని వినయానికి తార్కాణం.
  • (నఙ్ఞీయర్ వ్యాఖ్యానము వలె) కావున ఆ హంసలు మేల్కొన్నవి, అలాగే ఆ హంస వలె  ఉన్న ఎంపెరుమాన్  మీరు కూడ  మేల్కొనుము.
  • ఇక్కడ ఆళ్వార్” విళుంగియ” (పట్టుకొనబడిన)అని అంటున్నారు, ఆ మకరం బిగుతుగా/గట్టిగా  గజేంద్రుని కాళ్ళను గాయపరచి పట్టుకున్నాడు. ఒక తల్లి తన పిల్లవాడు నూతి గోడపై అపాయంగా కూర్చున్నపుడు భయంతో ” అయ్యో పిల్లాడు ” అని గాబరాగా అరుస్తుందో అలా ఉన్నది ఈ స్థితి.
  • “అరుమ్ తుయర్” – ఈ అపాయము చాలా క్లిష్ఠమైనది కావున పెరుమాళ్ ,  గజేంద్రాళ్వాన్ ను రక్షించడానికి నేరుగా పరమపదం  నుండి దిగాడు.
  • సముద్రమను ఈ సంసారమున మకరము వంటి ఐదు ఇంద్రియములచే మ్రింగివేయబడుచున్న మమ్ములను కాపాడుటకు లేచిరాక ఇంకా శయనించితివి  ఏలా?

అడియేన్ నల్లా శశిధర్ రామానుజదాస

Source: http://divyaprabandham.koyil.org/index.php/2014/12/thiruppalliyezhuchchi-2-kozhungodi/

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ज्ञान सारं – पासुर (श्लोक) २५

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श्री:
श्रीमते शठकोपाय नम:
श्रीमते रामानुजाय नम:
श्रीमत् वरवरमुनये नम:

ज्ञान सारं

ज्ञान सारं – पासुर (श्लोक) २४                                                           ज्ञान सारं – पासुर (श्लोक) २६

पासुर – २५

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अट्रम उरैक्किल अडैन्दवर पाल अम्बुयैकोन
कुट्रम उणर्न्दिगलुम कोलगैयनो – एट्रे
कनिर् न उडम्बिन वलुवनोर् कादलिप्पदु
अनर् दनै ईनर् गन्द आ

सार : पिछले पाशुर में श्री देवराज स्वामीजी ने यह समझाया कि कैसे भगवान अपने भक्तों कि गलतियों पर ध्यान नहीं देते हैं। अगर कोई व्यक्ति उन गलतियों कि तरफ बतलाता भी हैं तो भगवान उसे दोष नहीं मानते हैं। बजाए उसे भगवान आनन्द का खजाना सोचेंगे। इसका कारण यह हैं कि भगवान में मुख्य गुण हैं जिसे “वात्सल्य” कहते हैं। इस गुण के कारण उन्हें “वत्सलन” कहते हैं। इस गुण के कारण ही वह दोषों को कृपा के जैसे वर्णन करते हैं। वह किसी व्यक्ति के पिछले गलतियों / दोषों को खजाने ने कि तरह रखते हैं जिससे उनको बहुत आनन्द आता हैं। इसलिए कोई अगर भगवान के विरुध्द तर्क-वितर्क करना भी चाहता हैं तो कुछ गलतियों पर जिसे उन्हें ध्यान देना चाहिये भगवान उन दोषों कि तरफ ध्यान न देकर उसे “कृपा” समझते हैं और किसी को इससे अपने पिछले कर्मों के लिए डरने कि भी जरूरत नहीं हैं। यहीं इस पाशुर में दर्शाया गया हैं।

शब्दशः अर्थ :

अट्रम उरैक्किल अडैन्दवर पाल अम्बुयैकोन- अगर कोई निसंदेह रूप से कहना चाहता हैं कि जो भी भगवान के चरणों के शरण हुआ हैं वह जो कमल पुष्प के उपर विराजमान उनके स्वामी हैं,

कुट्रम उणर्न्दिगलुम कोलगैयनो? – अपने भक्तों कि गलतियों को देखते हैं और उसरे पसन्द भी नहीं करते, क्या यह सत्य हो सकता हैं?

एट्रे कनिर् न उडम्बिन वलुवनोर् कादलिप्पदु-  नहीं! वैसे ही जैसे गौ माता खुशी से अपने बछड़े के शरीर से गंदगी साफ करती हैं।

अनर् दनै ईनर् गन्द आ– तुरन्त बछड़े को जन्म देने के पश्चात

अट्रम उरैक्किल: इस पद का मतलब हैं कि “अगर कोई निश्चित रूप से कहता हैं”, यानि अगर कोई निश्चित रूप से इसे दृढ़ और अन्त समझता हैं, वह इधर ही हैं।

अडैन्दवर पाल: श्री देवराज स्वामीजी भागवान श्रीमन्नारायण के भक्तों को प्रार्थना करते हैं जिनके प्रति भगवान का अलग ही व्यवहार हैं जिसे आनेवाले पद में बताया गया हैं।

अम्बुयैकोन: भागवान श्रीमन्नारायण को बहुत से विशेषण से संबोधित करते हैं जैसे माता लक्ष्मीजी के स्वामी, श्रीलक्ष्मणजी के बड़े भाई आदि। “पाल” शब्द तमिल में दशा का अन्त हैं जिसका मतलब है “समीप”। अत: इदर “अम्बुयैकोन” यानि अगर भक्त अम्माजी के पुरुषकार से भगवान के पास जाते हैं तो भगवान उन्हें जरूर अपनाते हैं। भगवान उनके भक्तों को अपनाते हैं क्योंकि भक्त उनके शरण में अम्माजी के पुरुषकार से आते हैं तो भगवान उनके गलतियों कि तरफ ध्यान नहीं देते हैं। क्योंकि यह अम्माजी का स्वाभाविक गुण हैं। किसी को अपनाने के बाद अम्माजी यह देखती हैं कि भगवान उन्हें मन से अपनाया हैं कि केवल उनका मन रखने के लिए। भगवान भक्तों को उनके पापों के लिए उसे अस्वीकार करते हैं क्या यह देखने के लिए कि वह भगवान से उस भक्त के सारे पापों के बारें में बात करती हैं। परन्तु भगवान कभी भी ऐसा नहीं करेंगे। वह अम्माजी को यह उत्तर देंगे “एं आडियार अधु सेय्यार” (मेरे भक्त ऐसी गलतियाँ कर सकते है क्या)। इसका यहीं अर्थ हैं कि भगवान उसे पूरी हार्दिकता से अपनाते हैं और उसे कभी नहीं छोड़ेंगे क्योंकि वह अम्माजी के पुरुषकार के जरिए आये हैं। वह एक कदम आगे बढ़कर यह कहते हैं कि “अगर वह गलती करता भी हैं जैसे आप ने बताया हैं तो भी वह एक बड़े और अच्छे कार्य के लिए होगा। अत: में उसे शुरू में गलती न समझुंगा क्योंकि अंत में वह एक अच्छे कार्य के लिए समाप्त हुआ हैं”। यह भगवान और अम्माजी के बीच में संवाद हैं जीसे श्री विष्णुचित्त स्वामीजी के तिरुमोझी पाशुर ४.१०.२ में कहा गया हैं।

कुट्रम उणर्न्दिगलुम कोलगैयनो?: श्रीदेवराजमुनि स्वामीजी प्रश्न पुछकर कुछ बात कि जाँच करते हैं। वह यह पुँछते हैं कि क्या भगवान एसे हैं कि जो अपने भक्तों को उनके अनगिनत गलतियों के लिए उनसे घृणा करेंगे? पहिले यह प्रश्न पुँछने का कारण हैं कि पाठक गण यह जान ले कि यह पुछकर इसमें नि:संदेह अस्वीकारनिय हैं। “कोलगैय” भगवान का खुद का स्वभाव हैं कि अपने भक्तों को स्वीकार करें क्योंकि यह अम्माजी की सिफारीश हैं। वह अपने भक्तों के दोषों को कभी नहीं जानते हैं। अगर अम्माजी खुद भी कहे कि उसे जांचले फिर भी भगवान नहीं जाँचते यहीं कहेंगे कि यह गलतियाँ तो आनन्द की वस्तु हैं। वह कभी भी उस व्यक्ति से उसकी गलतियों के कारण नफरत कि भावना नहीं रखेंगे। यह उनका स्वाभाविक गुण हैं और इसी “वात्सल्यं” गुण के कारण ही उन्हें “वत्सलन” कहा जाता हैं। दोषों को उपाय करके कृपा करना “वात्सल्यं” हैं। “वत्सम” एक बछड़े कि तरह हैं जिसने अभि जन्म लिया हैं और उसकी माँ का उसके प्रति प्रेम हीं “वात्सल्यं” कहा जाता हैं। भगवान को “वत्सलन” कहते हैं और उनके इसी गुण के कारण जिसे आगे एक उदाहरण के साथ हम देखेंगे। यहाँ श्री देवराज मुनि स्वामीजी सभी प्रश्नों के उत्तर देते हैं कि इस गुण को उन्होंने लौकिक जगत में कहाँ देखा हैं।

एट्रे कनिर् न उडम्बिन वलुवनोर् कादलिप्पदु अनर् दनै ईनर् गन्द आ: “एर्रे” चिल्लाहट हैं। जिन्हें “वात्सल्यं” गुण के बारें में पता नहीं होता हैं वह यह समझते हैं कि भगवान जो दोषी होते हैं उनके प्रति घृणा भावना रखते हैं। अरुळाळ पेरुमळ एम्बेरुमानार् स्वामीजी बहुत ही विस्मय से यह पूछते हैं की पहले तो क्या कोई ऐसा मौजूद हैं जिसे उसके(भगवान) के वात्सल्य के बारे मैं न पता हो ? “वात्सल्यं” गुण के स्वभाव को एक उदाहरण के जरिए समझाया गया हैं। एक गाय कभी भी मैला घास का सेवन नहीं करती हैं यानि वह घास जिसे किसीने कुचला हो। परन्तु जब उसने एक बछड़े को जन्म दिया हो तब वह अपने बछड़े के शरीर में सब मैला चाट डालती हैं और मजेसे चाटती हैं। जैसे सब कहते हैं “इंरा पोझुदिन पेरिढुवक्कुम” एक गाय माता अपने बछड़े पर पूर्ण प्रेम बरसाती हैं उसी तरह भगवान भी अपने भक्तों के अनगिनत दोषों को खुशी कि वस्तु कि तरह समझते हैं। जैसे एक गाय अपने बछड़े पर घृणा नहीं करती हैं वैसे ही वह कभी भी उन पर घृणा नहीं करेंगे। जब भी हमारे पूर्वाचार्य भगवान के इस गुण के बारें में बात करते हैं वह यह गाय का उदाहरण के बारें में बात करते हैं। “वात्सल्यं” बछड़े कि तरह हैं और जैसे पहिले देखा गया हैं उस गाय का उसके प्रति प्रेम को “वात्सल्यं” जानते हैं। यह गुण केवल भगवान में देखा जा सकता हैं और किसी में नहीं। इसलिए यह गुण को भगवान का ऐसा कहा जाता हैं। श्रीदेवराज मुनि स्वामीजी इस गुण से बहुत प्रभावित हुए इसलिए उन्होंने “एर्रे” यानि चिल्लाहट का प्रयोग किया।

हिन्दी अनुवादक – केशव रामानुज दासन्

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ज्ञान सारं – पासुर (श्लोक) २४

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श्रीमते रामानुजाय नम:
श्रीमत् वरवरमुनये नम:

ज्ञान सारं

ज्ञान सारं – पासुर (श्लोक) २३                                                      ज्ञान सारं – पासुर (श्लोक) २५

पासुर – २४

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वण्डु पडि तुलब मार्बीनिडैच् सेय्द पिलै
उण्डु पल एन्रु उलम तलरेल – तोण्डर सेयुम
पल्लायिरम पिलैगल पार्त्तिरुन्दुम काणुम कण
इल्लादवन काण इरै

सार :

जब शास्त्र कर्मों के प्रकार के बारें में बातें करता हैं तो वह उसे तीन अलग श्रेणी में बाटता हैं। पूर्व कर्म, वर्तमान कर्म और भविष्यत कर्म। २३वें पाशुर में स्वामीजी देवराज मुनि ने पूर्व कर्मों के उपर केंद्रीत किया था। हालाकि इस पाशुर में वह वर्तमान कर्मों के बारें में बात कर रहे हैं।क्योकिं  हृदय को बहुत से कर्म करने के कारण बहुत दु:ख हैं इसीलिए वह सान्तवना देते हैं। वह और भी एक बात कहते हैं कि भगवान श्रीमन्नारायण जो उनके सच्चे भक्त बिना उनके विवेक के पालन करेंगे ऐसे कर्मों का खयाल नहीं करेंगे । भगवान उन कर्मों को देखेंगे लेकिन उसे ऐसे अंदेखा कर देंगे कि उन्होंने कुछ देखा ही नहीं हैं।

शब्दशः अर्थ :

वण्डु पडि तुलब मार्बीनिडै– कर्म जो हम भगवान के विरुद्ध करते हैं जिनके वक्षस्थल पर तुलसी (तिरुतुळाय्) की पुष्प माला हैं जो पूरी तरह कलियों से घीरा हैं, और जो मधु मख्खीयों से भरा हैं

चसेय्द पिलै उण्डु पल एन्रु उलम तलरेल – वह अनगिनत हैं जिससे हम डर भी सकते हैं परन्तु डरना नहीं है |

तोण्डर सेयुम पल्लायिरम पिलैगल पार्त्तिरुन्दुम – क्योंकि भगवान श्रीमन्नारायण ऐसे कौन से  भी कर्मों पर ध्यान नहीं देते हैं जो उनके सच्चे भक्त जन बिना ज्ञानता(अनजाने में) के करते हैं।

 काणुम कण इल्लादवन काण इरै – और ध्यान  भी  नहीं  देते  हैं जैसे  कि उन्होंने  कुछ  देखा ही नहीं जैसे कि एक अन्धा जिसे कुछ नहीं दिखाता।

वण्डु पडि तुलब मार्बीनिडैच् सेय्द पिलै: बुरे कर्म जो भागवान श्रीमन्नारायण कि और किया गया हैं जिन्होंने सुन्दर तुलसी (तिरुतुळाय्) की माला धारण कि हैं जो अनगिनत मख्खीयों को आकर्षित करती हैं और उसमें जो अमृत हैं वों पीने आते हैं। यहा हमारे मन में एक प्रश्न आता हैं कि क्यों स्वामी देवराज मुनि ने भागवान श्रीमन्नारायण को एक सुन्दर तुलसी की माला के साथ समझाया हैं। इसका कारण यह हैं कि भगवान हमेशा अपने आपको उस तरह सुन्दर बताते हैं जो उनके चरणों के शरण हुवें हैं। वें सब उनकी सुन्दरता में हमेशा के लिए डुब जाना चाहते हैं। एक बार वें सब भगवान शरण में हो गये फिर वें कभी भी वह कुछ भी नहीं करेंगे जो हम सोचे कि “बुरा” हैं। अगर उन्होंने उसे अनजाने में भी किया हो तो भी भगवान उसे नजर अंदाज कर देंगे। भगवान चाहते हैं कि एक बार हम उनकी शरण में हो गये उसके बाद हम उनकी सुंदरता का आनन्द ले। यह तथ्य समझाने के लिए ही भगवान अपने आप तुलसी की माला को सुन्दरता से धारण करते हैं।

उण्डु पल एन्रु  कोई भी भागवान श्रीमन्नारायण के पूरी तरह शरण हुआ हो, क्योंकि उसका शरीर पाँच इंद्रीयों द्वारा पूरी तरह नियंत्रण किया गया हैं उसे गलतीया करने का बहुत ज्यादा अवसर हैं। तिरुकुरल में कहा गया हैं कि “उरण एंड्रूम टोटियाल ओर ऐंधूम काप्पाण”। यह एक तुलना हैं जहाँ पाँच इंद्रियाँ को एक हाथी से और मन को नियंत्रण करनेवाली छड़ी से तुलना कि गयी हैं। इंद्रियों को नियंत्रण में करना बहुत कठीन हैं। आल्वार श्रीपरकाल स्वामीजी कहते हैं, “ऐवर अरुथु ठिंदृदा अंजी निं अंदैंधेन”। श्री शठकोप स्वामीजी कहते हैं, “उण्णिलाविय ऐवराल कुमैथ्ल्तृ”। क्योंकि यह इंद्रिया इस शरीर से जुडी हुई हैं इसिलीए शरणागति होने के पश्चात हम यह समझ सकते हैं कि किसी एक को गलति करने के लिए  इन पाँच इंद्रियों से अनगिनत मौके मिल सकते है। जब यह होता हैं तब उस व्यक्ति का मन उन गंभीर गलतीयों  के लिए जो उसने कि हैं कांपने लगाता हैं ।

उलम तलरेल:  इस तरह के मन के लिए यह पद इस तरह सान्त्वना देता हैं “हैं मन! चिंता मत करो ना ही कांपना!!! तमिल व्याकरण के अनुसार “उलम” शब्द “उल्लामे” का भाषान्तर हैं “मकरा लृ विलि वेतृमै” ।

तोण्डर सेयुम: तोण्डर भागवान श्रीमन्नारायण के भक्तों को संबोधित करता हैं। यहाँ इसका एक और भी मतलब हैं कि जो इंद्रियों के नियंत्रण और बंदुक कि नोक पर हैं और वह जो अब भी भागवान श्रीमन्नारायण के चरणों के शरण हैं। एक मतलब यह भी हैं कि वह जो भागवान श्रीमन्नारायण का दास हैं। अत: “तोण्डर सेयुम” पद उन सब भगवान श्रीमन्नारायण के भक्तों को संबोधित करता हैं जो अपने आप को भागवान श्रीमन्नारायण के ही दास समझते हैं।

पल्लायिरम पिलैगल:  इसका मतलब “अनगिनत गलतियाँ” हैं। अगर हमें यह गलतियाँ का कारण पहचानना हैं तो हम यह देख सकते हैं कि वह इस शरीर के कारण से हैं जो तीन प्रकार के गुणों से बाध्य हैं “सत्व गुण”, “रजो गुण” और “तमो गुण”।  यह तीन गुण मनुष्य में पवित्रता, ग़ुस्सा/क्रियाशीलता और निद्रा गुण बताता हैं। अविवेकता के कारण मनुष्य इसके प्रभाव और मेलजोल के वजह से रोजाना अनगिनत गलतियाँ करता हैं। “पिझै” का मतलब “पाप” या गलति हैं। अगर कोई व्यक्ति एक क्षण में कोई गलती करता हैं तो उस पाप को मिटाने के लिए हजारों और हजारों ब्रह्म वर्ष लग जाते हैं। यह जानना बहुत जरूरी है एक ब्रह्म वर्ष यानि मनुष्यों के अनेक महासंख वर्ष। अत: हम यह देख सकते हैं कि हमारे एक छोटी सी गलती का परिणाम मिटाना लगभग नामुमकिन हैं । जो कुछ गलतियाँ यहा बताई गयी हैं, वह कार्य करना जिसको शास्त्र ने  दोषयुक्त बताया है जैसे की, दूसरों को तकलीफ देना, दूसरों कि बढ़ाई करना, परस्त्री कि चाहना करना, दूसरों के धन की चाहना करना, झूठ बोलना और वह खाना जो हमारे लिए निषेध हैं। दूसरे वर्ग कि गलतियाँ जो नहीं करना हैं जिसे शास्त्र में बताया हैं, वह हैं भगवत अपचार करना यानि भगवान श्रीमन्नारायण की अन्य देवी-देवताओं के साथ तुलना करना, भगवान के अवतारों में दोष देखना, भगवान का विग्रह किस धातु से बना हैं इसकी खोज करना, अधुरी पुजा, पुजा के पात्र चुराना, जो चोरी कर रहा हैं उसकी मदद करना, चुराई हुई वस्तु को माँग कर या धमका कर लेना, आदि। अगर कोई भागवत अपचार करता हैं तो वह भी गलतीयों में गिना जायेगा।

 इरै पार्त्तिरुन्दुम काणुम कण:  भागवान श्रीमन्नारायण वह हैं जो सब में हैं और जो कुछ भी हो रहा हैं वह सब कुछ जानते भी हैं। ऐसे भागवान श्रीमन्नारायण हैं जो अपने सच्चे भक्तों के उनकी पूर्णता शरणागति होने पर उनके अनगिनत दोषों को नहीं देखते हैं जो उन्होंने किया हैं, वह ऐसे रहते हैं जैसे कि उन्होंने कुछ देखा ही नहीं। यहाँ “कण” का मतलब ज्ञान हैं।

इल्लादवन काण : जैसे हमने पहिले देखा कि “कण” का मतलब ज्ञान हैं और यहां इसका मतलब “वह जिसको कोई ज्ञान नहीं हैं”। इसलिए भागवान श्रीमन्नारायण अपने भक्तों के ज्ञान के बारें में सतर्क रहते हैं। पिछले प्रकरण में “इरै” का मतलब “एक छोटी संख्या” भी हैं। इससे यह पता चलता हैं कि भगवान अपने भक्तों कि गलतियाँ के उपर थोड़ा सा भी ध्यान नहीं देते हैं। वह उनकी गलतियों को पूरी तरह नजर अंदाज़ कर देते हैं। यह विष्णु सहस्त्र नाम स्तोत्र में इस श्लोक में समझाया गया हैं “अविज्ञात”। इस पासुर का अर्थ है कि हमें शरणागति ग्रहण करने के बाद डरने कि कोई भी जरूरत नहीं है | भगवान् श्रीमन्नारायण इन गलतियों / कार्यों पर अनभिज्ञता नहीं दिकायेंगे अर्थात् इन पर ज्यादा ध्यान नहीं देंगे

हिन्दी अनुवादक – केशव रामानुज दासन्

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thiruvAimozhi – 1.4.4 – en nIrmai

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krishna-gopis

Introduction for this pAsuram

Highlights from thirukkurukaippirAn piLLAn‘s introduction

No specific introduction.

Highlights from nanjIyar‘s introduction

In this fourth pAsuram, AzhwAr feeling dejected “How can I inform emperumAn who left me even after knowing my nature?”, again out of hope/desire, requests some maganRil birds (a species of love birds where the male and female of the species will not separate from each other) “Would you go and tell him about me or not?”.

Highlights from vAdhi kEsari azhagiya maNavALa jIyar‘s introduction

Subsequently, parAngusa nAyagi desiring to send a messenger to dark-cloud hued emperumAn, speaks towards beautifully (similarly) coloured maganRils (love birds).

Highlights from periyavAchchAn piLLai‘s introduction

Similar to nanjIyar‘s introduction.

Highlights from nampiLLai‘s introduction as documented by vadakkuth thiruvIdhip piLLai

Fourth pAsuram – Previously parAngusa nAyagi stated “My sins are so much that they cannot be exhausted by enjoying the fruits of the same” in 2nd pAsuram. Did she experience any suffering? Yes – When emperumAn turned his face away from her for a moment – she experienced great suffering (thereby exhausting the accumulated sins). At that time, she assumes that some love birds who came near her were asking her “how can he help you?”. She feels dejected and tells them “Even after seeing my pitiful state – he left me. What can I tell him?” But out of desire, as if telling to someone who does not listen, she asks them “will you go and tell him about my situation or not?”

pAsuram

என் நீர்மை கண்டு இரங்கி இது தகாது என்னாத
என் நீல முகில் வண்ணார்க்கு என் சொல்(ல்)லி யான் சொல்லுகேனோ
நன்நீர்மை இனி அவர் காண் தங்காது என்று ஒருவாய்ச் சொல்
நன்னீல மகன்றில்காள். நல்குதிரோ நல்கீரோ?

en nIrmai kaNdu irangi idhu thagAdhu ennAdha
en neela mugil vaNNarkku en sol(l)i yAn sollugEnO
nannIrmai ini avar kaN thangAdhu enRu oruvAych chol
nanneela maganRilkAL nalgudhirO nalgIrO

Word-by-Word meanings (based on vAdhi kEsari azhagiya maNavALa jIyar‘s 12000 padi)

en nIrmai – (while being together) my inability to cope with separation
kaNdu – seen (while observing changes in my body during our embrace, etc)
irangi – having compassion (considering she is very tender natured)
idhu thagAdhu ennAdha – not understanding/saying that this separation is unbearable
en neela mugil vaNNArkku – to the one who is having dark-cloud hued  form (but not showing compassion like such dark-clouds which rain water)
en solli – saying what words
yAn – me
sollugEnO – can tell? (still)
nal – venerable
nIrmai – her sustenance
ini – now onwards
avar kaN – to him
thangAdhu – will not be sustained
oru vAych chol – saying a word
nanneela maganRilkAL – beautifully blue colored love birds
nalgudhirO – will you help?
nalgIrO – will you not help?

Simple transalation (based on vAdhi kEsari azhagiya maNavALa jIyar‘s 12000 padi)

While being together, emperumAn has seen my inability to cope with separation by observing my bodily changes during his embrace etc., and what words can be said to that dark-cloud hued emperumAn? Still, oh beautifully blue colored love birds! Can you tell him or not that I cannot sustain myself in separation? Here “avar” is used as parAngusa nAyagi‘s venerable way of calling emperumAn. In this pAsuram, the beautiful form of the gataka (AchArya) is also highlighted.

vyAkyAnams (commentaries)

Highlights from thirukkurukaippirAn piLLAn‘s vyAkyAnam

Similar to vAdhi kEsari azhagiya maNavALa jIyar‘s translation.

Highlights from nanjIyar‘s vyAkyAnam

Similar to piLLAn‘s vyAkyAnam.

Highlights from periyavAchchAn piLLai‘s vyAkyAnam

Similar to nampiLLai‘s vyAkyAnam.

Highlights from nampiLLai‘s vyAkyAnam as documented by vadakkuth thiruvIdhip piLLai

  • en nIrmai – my nature, my tender form/heart.
  • kaNdu irangi idhu thagAdhu ennAdha – Instead of showing compassion on seeing my suffering, he left. Here a thamizh scholar asks bhattar “Should it not be ‘kEttu irangi‘ (having compassion on hearing my suffering) instead of ‘kaNdu irangi‘ (having compassion on seeing my suffering)?” bhattar (being an expert in thamizh grammar and literature) replies “When he relaxes the embrace, her body becomes pale out of separation”. The scholar again asks “Is it even possible?”.bhattar asks “Don’t you know thirukkuRaL 1187 ‘pullik kidandhEn‘  and kuRundhogai 399 ‘kAdhalar thoduvuzhi‘? Is that not sufficient reference?” [The scholar’s question is – since parAngusa nAyagi is singing in separation, emperumAn cannot see her suffering – but only can hear about her suffering. bhattar says that though the current situation is in separation, parAngusa nAyagi reminds him of the time when they were together when he was observing her suffering in a moment of separation].
  • en neela mugil vaNNarkku en solli yAn sollugenOemperumAn was so attached to her that even in separation she says “ennudaiyavan” (mine – owned by me). She says “What can I say to the one who left me?” When asked “Why are you saying like this?”,parAngusa nAyagi says “He did not show compassion even after seeing my sufferings. How do I expect him to show compassion on hearing my sufferings now?” When asked “When did he see your suffering?” parAnkusa nAyaki replies “While being together, when he takes his hand away from me, that part of my body will become pale out of sufferings in separation”.
  • kaNdirangi – Should he not know that I cannot sustain myself as he has seen me losing consciousness as soon as saying “eththiRam” ? [as in thiruvAimozhi pAsuram 1.3.1]
  • idhu – this state of mine – even she herself cannot fully express her state (which is beyond words).
  • en neela mugilvaNNarkku – one who has a dark-bluish complexion like a cloud. He showed his beauty and got me to become fully dependent on him. But this radiance is not seen in his heart [comparison with cloud is done for both bodily beauty and the generosity of cloud which rains over everywhere – here, parAngusa nAyagi says that emperumAn has beauty like cloud but does not have the compassion towards her]. AzhwAr himself says in thiruvAimozhi 8.9.5 “yAmudai Ayan than manam kal” (our cow-herd boy’s heart is made of stone). Initially giving up thinking “if he can leave me even after seeing my suffering, what is the use of sending a message?” later out of hope/desire, she starts sending the messenger again. This is like the behaviour of gOpikAs towards krishNa as explained in srI vishNu purANam 5.24.15 “athavA kim thadhAlAbhai: parA kriyathAm kathA | apyasau mAtharam dhrashtum sakrudhapyAgamishyathi ||” (If there is no use of speaking about him, let other matters be discussed. Would this krishNa not come to visit his mother at least once?) – here the gOpikAs are first saying he does not need us (so won’t talk about him, then out of hope expects his visit saying), but he would need his mother.
  • avar kaN thangAdhu – My life will only be sustained on/by you (who is my master). nampiLLai explains a similar conversation from srI rAmAyaNam between sIthA pirAtti and hanumAn (who is the messenger from srI rAma). sIthA pirAtti is upset with srI rAma for not rescuing her quickly. At that time hanumAn asks “But, if you are so attached to srI rAma, how have you sustained yourself thus far instead of immediately giving up your life?”.sIthA pirAtti replies as in srI rAmAyaNam sundhara kANdam 36.30 “na chAsya mAthA…“. nampiLLai explains this slOkam – perumAL showed all his love (like towards his father, mother et al) towards me. While he is searching for me if he finds me dead, he will be heart-broken like a thirsty person finding a broken pot (without water). That is why I sustained myself to protect him.
  • oru vAych chol – Just one word/phrase is sufficient. Like sIthA pirAtti said to hanumAn in srI rAmAyaNam sundhara kANdam 39.10 “…vAchA dharmamavApnuhi” (by conveying the message using the appropriate words to the illustrious srI rAma, so that he can console me while I am surviving, you become virtuous through speech).
  • nanneela maganRilgAL nalgudhirO nalgIrO – Both perumAL and you have dark-complexion. So, are the actions also similar (both trying to not help me)? Out of sorrow, she asks “will you help or not?”.

In the next article we will enjoy the next pAsuram.

adiyen sarathy ramanuja dasan

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