Daily Archives: July 5, 2015

ज्ञान सारं – पासुर (श्लोक) २३

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ज्ञान सारं

ज्ञान सारं – पासुर (श्लोक) २२                                                        ज्ञान सारं – पासुर (श्लोक) २४

पासुर – २३

reclinevishnu

ऊळि विनैक् कुरुम्बर् ओट्टरुवर् एन्रञ्जि
एळै मनमे इनित् तळरेल् – आळि वण्णन्
तन्नडिक् किळ् वीळ्न्दु सरण् एन्रु .इरन्दोरुकाल्
सोन्नदर् पिन् उण्डो तुयर्

सार : यह पाशूर उन सभी को शान्त करता हैं जो यह सोच कर घबराते हैं की उनके कर्मों का फल उनका पीछा कभी नहीं छोड़ेगा और उन्हे सदा कष्ट पहुँचाएगा | यह पाशूर इस तथ्य पर ज़ोर देता हैं की सम्पुर्ण आत्मसमर्पण(शरणागती) करने के बाद, अतीत में हमारे कर्म के कारण कोई कष्ट नहीं सहना पड़ता |

शब्दशः अर्थ:

ऊळि विनैक् कुरुम्बर् ओट्टरुवर् एन्रञ्जि – पिछले कर्म आपको कष्ट पहुंचाएँगे और भयभीत करेंगे एळै मनमे इनित् तळरेल् -– परंतु बिना ज्ञान वाला हृदय, घबराता नहीं हैं | आळि वण्णन् तन्नडिक् किळ् वीळ्न्दु सरण् एन्रु .इरन्दोरुकाल् – क्यूंकी हम उनके चरणों मे गिर सकते हैं जो समुद्र के रंग वाले हैं और उन्हे कह सकते हैं की सिर्फ़ वे ही हमारे उद्धारकर्ता है| सोन्नदर् पिन् उण्डो तुयर् – उन्हे अपना उद्धारकर्ता कहने के बाद,क्या आप वास्तव में कर्म या किसी भी जुड़े पीड़ा के बारे में चिंता कर सकते हैं? ना!

स्पष्टीकरण:

ऊळि विनैक् कुरुम्बर्: यहाँ पर पिछले कर्मों को रूप और आकार दिया जा रहा हैं | उन्हे एक दुष्ट व्यक्ति के रूप मे देखा जा रहा हैं और “कुरुम्बर” नाम दिया जा रहा हैं | “ऊळ” का अर्थ हैं “पुराना” और “ऊळ विन” का अर्थ हैं पुराने कर्म | अतीत के कर्मों को व्यक्ति के रूप मैं देखने का कारण हैं की वे जिस प्रकार का बुरा प्रभाव व्यक्ति पर डालते हैं,जैसे कहते हैं “अळुगाऱु एन ओरू पावी” | जब भौतिक चीज़ों के अत्याचारों को एक जीवित व्यक्ति के समान देखते हैं तो कहते हैं “कयमै एन्नुम् पण्बुचोल” | अत्याचार इतने अधिक हैं की कई व्यक्तियों के समूह की तुलना की जा सकती हैं |

इसी तरह, एसे लोगों का समूह हैं(कुरुम्बर)जो बहुत शक्तिशाली हैं | अपने बल के प्रयोग से वे पूरे देश को अपना गुलाम बना सकते हैं,अपने मन के अनुसार शासन कर सकते हैं | इसी तरह “कुरुम्बर” नाम का यह व्यक्ति जो पुराने कर्मों का समूह हैं,वे अपने अनुसार व्यक्ति को चलाते हैं | इस तुलना का और एक साक्षी हैं “कन्गुल कुरुम्बर” | यहाँ कांगुल (रात्रि) कुरुम्बर की भूमिका निभा रही हैं | और एक वाक्य होगा “ऐवर” जहाँ पाँच इंद्रियों की तुलना की गई हैं |

ओट्टरुवर् एन्रञ्जि : कुरुम्बर हमारे पीठ पीछे दौड़ते रहता हैं और हमे सताने के लिए | कुरुम्बर हमारे पीठ पीछे दौड़ते रहता हैं और हमे सताने के लिए | “ओट्टरुवर्” शब्द यह सम्बोधित करता हैं की हमारे पुराने कर्मा बहुत तेज़ी से आते हैं जितना के हम सोच भी नहीं सकते |

एळै मनमे : ओह मेरे मूर्ख हृदय !! अरुळाळ पेरुमाळ एम्बेरूमानार स्वामीजी अपने हृदय को मूर्ख इसलिए बोल रहे हैं क्यूंकी उसे नहीं पता (१) की भगवान(पेरुमाळ)कभी भी अपने उन आश्रितों को नहीं त्यागाते जिन्होने केवल उनके चरण कमलों का आश्रय लिया हो(वे अपने हस्त से बताते हैं की “तुम मत डरो”) (२)शरणागती पथ की महानता जो हमे दोष रहित श्रीवैकुण्ठ तक पहुँचाती हैं | (३) शरणागती करने वाले व्यक्ति को जो लाभ होते हैं | इस मूर्ख और दयनीय हृदय को देखते हुए,कुछ सांत्वना पाशूर के अगले वाक्यों मैं दी गई हैं |

इनित् तळरेल् : भले ही किसी को शरणागती करने से पहीले कितना भी भय हो,परंतु शरणागती करने के बाद बिल्कुल भी भयभीत होने की अवष्यकता नहीं हैं | क्यूंकी शरणागती की महानता इतनी हैं की अरुळाळ पेरुमाळ एम्बेरूमानार स्वामीजी अपने हृदय को सांत्वना देते हैं | यह उसी तरह हैं जैसे कृष्‍ण अर्जुन को शांत करते हुए कहते हैं की “भयभीत न हो,मै तुम्हारे लिए यहाँ हूँ” | “इनी” शब्द का अर्थ हैं अब से ,अर्थात शरणागती के बाद वाला समय |

आळि वण्णन् : वह जो सागर की तरह हैं | वह सागर की तरह हैं जिसकी चरित्र की अधिक गहराई हो | वे उस नीले रंग के सागर की तरह हैं जो उन सभी के दुखों को हर लेता हैं जो उसे देखता हैं |

तन्नडिक् किळ् वीळ्न्दु : इस वाक्यांश का अर्थ होगा की “सागर के रंग वाले भगवान के कमल चरणों पर गिरना” | यह उसी तरह हैं जैसे तिरुमन्गै आळ्वार कहते हैं “आळी वण्णन निन अडियिनै अडैन्धेन् ” |

सरण् एन्रु .इरन्दोरुकाल् सोन्नदर् पिन् : शरणागती करने के बाद यह कहते हुए की,”आप एकमात्र शरण हो”,हमे कोई भय नहीं होना चाहिए | यह वाक्य केवल एक बार ही बोलना चाहिए | शरणागती एक से अधिक बार करने की बिल्कुल भी ज़रूरत नहीं हैं | यह अपने मुख्य उदेश्य और विषय को ही धरा का धरा कर देता हैं | एसलिए इस तथ्य को हमे जानना ही चाहिए शरणागती एक और ठीक एक बार ही करना चाहिए जहाँ पर व्यक्ति भगवान से प्रार्थना करता हैं की उनके चरण कमाल ही उसके एकमात्र शरण हैं |

उण्डो तुयर् : इस तरह शरणागती के बाद कोई रास्ता हैं की पिछले कर्म हमारे पीछे आए और हमे सताए ? कभी नहीं | जिस समय व्यक्ति भगवान के चरणों का आश्रय ले लेता हैं उसी समय उसके सारे पिछले कर्म और भविष्य के कर्म नष्ट हो जाते हैं जैसे की शास्त्रों मैं बताया गया हैं (गोदम्माजि कहते है”पोय पिळयुम् पुहुधरूवान निन्रवनुम्”) | इस प्रकार पाशूर का सार हैं की उन सभी के लिए जिन्होने शरणागती की हैं ,उनके सारे कर्म उसी प्रकार नष्ट हो जाते हैं जैसे अग्नि से कपास | इस प्रकार व्यक्ति के पिछले कर्म अब होंगे ही नही उसे सताने के लिए | इसलिए शरणागती के बाद अपने अतीत के कर्मों से भयभीत होने की कोई अवष्यकता नहीं हैं |

अडियेन् केशव रामानुज दासन्

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ज्ञान सारं – पासुर (श्लोक) २२

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ज्ञान सारं

ज्ञान सारं – पासुर (श्लोक) २१                                                            ज्ञान सारं – पासुर (श्लोक) २३

पासुर – २२

paramapadhanathan

उडैमै नान् एन्रुम् उडैयान् उयिरै
वडमदुरै वन्दुदित्तान् एन्रुम् – तिडमाग
अरिन्दवन् तन् ताळिल् अडैन्दवर्क्कुम् उण्डो
पिरन्दु पडु नीळ् तुयरम् पिन्

सार:

सभी को अपने कर्मों का फल भोगना पड़ता हैं,चाहे वह अच्छा हो या बुरा | कोई भी उससे बच नही सकता | निधि नूल कहते हैं “उरऱ्पाल नीक्कल् उऱुवर्कुम् आगा” | इसका अर्थ हैं की देवता भी बुरे कर्मों को नहीं रोक सकते हैं | इसी तरह अच्छे कर्मों को भी नहीं रोक सकते हैं | अगर वर्षा नहीं हो रहीं हैं तो और कोई भी वर्षा नहीं दे सकता | इसी तरह अगर वर्षा अधिक हो रही हैं तो कोई उसे रोक भी नहीं सकता | इससे हम कर्म के प्रभाव को समझ सकते हैं,चाहे वह अच्छे हो या बुरे,व्यक्ति को भुगतना ही पड़ेगा | यह नियम श्रीमन्नारयण भगवान के द्वारा सारे भ्रमांड के लिए स्थापित किया गया हैं | पिछले जन्म मैं किए गये कर्मों का फल हमें इस जन्म मैं जोखिम या पुरस्कार के रूप मैं मिल सकता हैं | इस जन्म मैं किए गये कर्मों का फल हमें अगले आने वाले जन्मों मैं जोखिम या पुरस्कार के रूप मैं मिल सकता हैं | यह एक चक्कर के तरह चलते ही रहता हैं | क्या इस कर्मों के चक्कर मैं फसे जीवात्मा को कभी मुक्ति मिलेंगी ? यह पाशुर इस प्रश्न का उत्तर देता हैं | अगर कोई कर्म ही नही रहेगा ,तो क्या पुनः जन्म लेगा और क्या पुनः किसी किसी कर्मों का दुख या सुख भोगना पडेग? नहीं | तमिळ वेद कहता हैं की यह उपर बताए गये कर्म ऐसे नष्ट हो जाते हैं जैसे कपास आग से नष्ट होता हैं | और कोई दूसरा जन्म नहीं होगा |

शब्दशः अर्थ

उडैमै नान् एन्रुम् उडैयान् उयिरै– श्रीमन्नारायण भगवान आत्मा के मालिक  हैं वडमदुरै वन्दुदित्तान् एन्रुम् – और उत्तरीय मधुरै मैं अवतरित हुए | तिडमाग अरिन्दवन् – जो सुनिश्चित ही यह जानता हैं | तन् ताळिल् अडैन्दवर्क्कुम् उण्डो? – की श्रीमन्नारायण भगवान ही सभी के मालिक हैं और उनके कमल चरणों का एकमात्र आश्रय लेगा  उसे पुनः जन्म लेकर कर्मों के अनुसार सुख / दुख भोगने की चिंता नही रहेगी |पिरन्दु पडु नीळ् तुयरम् पिन्  – क्यूंकी उनके कर्म इसी जन्म मैं नष्ट हो जाएँगे जैसे कपास अग्नि मैं नष्ट हो जाता हैं |

स्पष्टीकरण :

उडैमै नान् एन्रुम् : हमें पता होना चाहिए की यह आत्मा श्रीमन्नारायण भगवान की संपत्ति हैं |शास्त्र जैसे वेदों मैं यह स्‍पष्ट बताया गया हैं की आत्मा श्रीमन्नारयण भगवान की संपत्ति हैं | हम सभी को शस्त्रों से यह बात समझ लेनी चाहिए | किसी व्यक्ति के जान लेने से भी बात वही ख़त्म नही हो जाती | बल्कि उसे तदनुसार आचरण भी करना चाहिए|

उडैयान् उयिरै वडमदुरै वन्दुदित्तान् एन्रुम् :  हमें पता होना चाहिए ऐसे श्रीमन्नारायण, जो हमारे आत्मा के मालिक हैं जिसे हम अपने आप को पहचानते हैं | हमे उनकी पहचान मथुरा मे अवतरित कृष्‍ण के रूप मैं होनी चाहिए | हमे पता होना चाहिए की वे,कृष्‍ण जिन्होने हमें भगवद् गीता प्रदान की,वे कहते हैं वे सर्वोच्च हैं,वे इस पूरे ब्रह्मांड में सभी के मालिक है | हमे पता होना चाहिए की कृष्‍ण ही हैं जिन्होने कहा था की जो व्यक्ति उनके कमल चरणों की शरण लेगा उनका कभी पुनर्जन्म नहीं होगा और वे कर्मों के फल स्वरूप सभी दुखों से मुक्त हो जाएँगे | वे उन्हे सभी बंधनों से मुक्त कर देंगे |

तिडमाग अरिन्द : यह वाक्यांश का अर्थ हैं “वस्तुतः बहुत स्पष्ट रूप से / यह पता होना चाहिए” | अगर हम शस्त्रों पर ध्यान केंद्रित करेंगे तो हम खुद यह देख सकते हैं की किसी की संपत्ति होने की क्षमता सारे जीवात्मा के लिए आरक्षित हैं और किसी का मालिक होने की क्षमता मात्र श्रीमन्नारयण भगवान के लिए ही आरक्षित हैं | इसलिए, इस पाशूर मैं शास्त्रों के अनुसार “उडमै” नाम जीवात्मा को दिया गया हैं और “उडैयान” नाम श्रीमन्नारयण भगवान को दिया गया हैं | तो,स्वामी ही उस जगह आर आयेगे जहा पर उनकी संपत्ति हैं और फिर उसे वे खुद अपने उपर लेलेंगे | वे ही आकर जीवात्मा तक पहुँचते हैं,और उनतक पहुँचने के खुद ही साधन बनाते हैं, और उनतक पहुँचने के बाद वे ही अपनी संपत्ति के वापिस मिल जाने से प्रसन्न होते हैं | यह संबंध,दास-स्वामी हमे बहुत स्पष्ट रूप से बिना कोई भ्रम के हमारे मन (तिडमाग) मै समझ लेना चाहिए |

अवन तन् ताळिल् अडैन्दवर्क्कुम् : यह वाक्यांश उन सभी को संबोधित करता हैं जिन्होने यह समझ लिया हैं की वे दास हैं और वे अपने स्वामी,श्रीमन्नारायण के चरण कमलों मैं उनकी पत्नी “पिराट्टि”(श्री लक्ष्मीजी)के पुरुष्कार द्वारा शरण लेते हैं | दूसरे शब्दों मैं ,वे लोग वह हैं जो द्वय के पहले भाग मैं बताए गये अनुसार शरणागती करते हैं |

उण्डो पिरन्दु पडु नीळ् तुयरम् पिन् : “नीळ् तुयरम्” उन सारे कर्मों को बताता हैं जो कई जन्मों से हमारे पीछे पड़े हैं | कर्म ही भविष्य के जन्मों के लिए कारण हैं | हालाँकि यदि कोई शरणागती करता हैं तो क्या उसको फिर से जन्म लेना पड़ेगा ? उनका कोई जन्म नहीं होगा क्यूंकी कोई कर्म ही नहीं रहेंगे | सभी कर्म पूरी तरह से नष्ट हो जाएँगे |

शठकोप स्वामीजी अपने पेरिया तिरुवन्दादि(पाशूर ५४) मैं कहते हैं की

“वानो मरि कडलो मारुदमो तीयगमो
कानो ओरुङ्गिट्रुम् कण्डिल माल् आन् ईन्र
कन्रुयर त्ताम् एरिन्दु काय् उदिर्त्तार् ताळ् पणिन्दोम्
वन् तुयरै आवा ! मरुङ्गु

इसका मतलब यह हैं की यह कर्म इस प्रकार नष्ट हो जाएँगे की कीसो को पता ही न लगे की एकदम से ये कहा चले गये | इस प्रकार यदि किसी व्यक्ति ने शरणागती की हो तो क्या उसे फिर से जन्म लेने होगा जिसमे उसे कर्मों के परिणामों को भोगना पड़े ? जिन्हे शरणागती करते ही मुक्ति चाहिए,उन्हे तभी मुक्ति मिलेंगी | पर ऐसे कई लोग हैं जिनको उस जन्म के अन्त मैं मुक्ति चाहिए जिस जन्म मैं उन्होने शरणागती की हैं | उनकी इच्छा भी सच हो जाएँगी | यह साबित करता हैं की शरणागती के बाद वैसे भी कोई जन्म नहीं होगा | अरुळाळ पेरुमळ एम्बेरूमानार स्वामीजी कहते हैं की यह कोई संभावना नहीं, बल्कि निरपेक्ष निश्चितता हैं |

अडियेन् केशव रामानुज दासन्

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ज्ञान सारं – पासुर (श्लोक) २१

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ज्ञान सारं

ज्ञान सारं – पासुर (श्लोक) २०                                                             ज्ञान सारं – पासुर (श्लोक) २२

पासुर२१

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आरप पेरुन्तुयरे सेय्दिडिनुम अन्बर पाल
वेरिच्चरोरूगै कोन मेय्न्नलमाम् – तेरिल
पोरुत्तरकु अरीदु एनिनुम मैंदन उडर पुण्णै
अरुत्तरकु इसै तादै अट्र्र्रु

सार:  श्रीमन्नारायण, जो की पेरिया पिरट्टी (लक्ष्मी अम्माजी) के पति हैं वह अपने भक्तों को बहोत सारी पीड़ा दे सकते हैं। हालकी अपने भक्तों को वो पीड़ा देने का सच्चा कारण शुद्ध प्रेम हैं। यह इस पाशुर में उदाहरण के साथ प्रस्तुत किया हैं।

शब्दशः अर्थ

आरप पेरुन्तुयरे सेय्दिडिनुम अन्बर पाल ऐसा प्रतित होता हैं कि एक भक्त को बहुत पीड़ा दि गयी हैं | वेरिच्चरोरूगै कोन – अम्माजी के स्वामी भगवान श्रीमन्नारायण से | मेय्न्नलमाम् तेरिल पोरुत्तरकु अरीदु एनिनुम – लेकिन पुन: विचार करने से यह पुरि तरह स्पष्ट   हो गया कि यह पीड़ा तो भगवान श्रीमन्नारायण के हमारे प्रति प्रेम के कारण हैं जैसे | मैंदन उडर पुण्णै अरुत्तरकु इसै तादै अट्र्र्रु – एक पीता अपने पुत्र के चोट के इलाज के लिए एक कष्टकर शल्य वैध्यक (surgery) कराता हैं। | आरप पेरुन्तुयरे: तुयर” एक पीड़ा या दु:ख हैं; पेरुन्तुयरे – बड़ी पीड़ा; “आरप पेरुन्तुयरे” – बहुत बड़ी पीड़ा। स्वामीजी श्री देवराज मुनि “ई”(एवकारम) का प्रयोग यह समझाने के लिए किया कि यह दु:ख केवल पीड़ा के कारण से ही हुवा हैं। उसमे एक कण मात्र भी खुशी नहीं हैं और इसका मतलब “सिर्फ और सिर्फ दु:ख ही हैं”। सेय्दिडिनुम: “सेय्दिडिनुम” शब्द उस दशा को संबोधित करता हैं कि  हालकि भगवान बहुत बड़ी पीड़ा देते हैं। भगवान उस जीव को उसके सब कर्म का फल भी देते हैं जो वह जीव अपने जीवन काल में जोड़ता हैं। समयानुसार कर्मों कि घडी को तीन भागों में बाटा गया हैं। पिछले कर्म को “पोया पिझै” से जाना जाता हैं, भविष्य कर्म को “पुगुतरु वान” से जाना जाता हैं और वर्तमान कर्म को वह जब आत्मा उस शरीर में उपस्थित हैं। यह सब तीनों कर्मों को तो भगवान श्रीमन्नारायण ही विनाश कर सकते हैं। अत: जो जीव सबसे बड़ी पीड़ा से गुजरता उसको भी नष्ट करना भगवान के लिए नामुमकिन नहीं हैं। अगर भगवान चाहे तो वह कर सकते हैं। परन्तु अपने भक्तों के अधिक लाभ / उद्धार के कारण भगवान चाहते हैं कि उसके भक्त अपने कर्मों के फलनुसार उस पीड़ा को भोगे। इसका कारण यह हैं कि भगवान चाहते हैं कि उसके भक्त इस संसार बन्धन से छुट जाये। यह तथ्य “किट्टाधायिं वेट्टेन मारा” इस गाथा में दर्शाया  गया हैं  ।

यह एक तिरुकुरल से लिया गया हैं:

इयाल्बागवुम नोन्बिर्कु ओनृ इनमै उदमै
मयलागम मर्रूं पेयर्तु

उपर बताये गये तिरुकुरल का मतलब यह हैं कि हर एक को अपने पूर्व संसार बन्धन के अनुसार सब कुछ छोड़ना हैं। अगर कोई व्यक्ति एक तुच्छ वस्तु के लिए सब कुछ छोड़ता हैं तो यह बहुत आपत्ति जनक हो सकता हैं क्योकिं वह एक तुच्छ वस्तु धीमे से ओर धीरे-धीरे बाकि सभी वस्तु जो वह छोड़ा हैं उस पर केन्द्रित करता हैं। यह सब श्री परिमेल अझगरजी ने समझाया हैं।  तिरुकुरल  का पहिले जिक्र किया हुआ मतलब है की,एक जो अगर वह श्रीमन्नारायण भगवान के चरण कमलों को प्राप्त करके अपने अध्यात्मिक खोज को बढ़ाना चाहता है तो सांसरिक वस्तुओं को  भूतकाल से पकड़े हुवे है उन सबको पहिले ही छोड़ दे। अगर कोई व्यक्ति लगभग सब कुछ छोड़ देता है परंतु एक छोटी वस्तु के लिए, फिर वह बहुत आपत्तिजनक हो सकता है क्योंकि वह छोटीसी वस्तु धीरेसे और धीरे धीरेसे सभी वस्तुओं पर जो वह व्यक्ति छोड़ने के लिए केन्द्रित कर रहा हैं उसपर आ जाता हैं । इसीलिए एक व्यक्ति को सारी वस्तुए छोड़ना आवश्यक  है। यह विश्लेषण  श्री परिमेल अझगरजी के द्वारा कहा गया हैं।

वेरिच्चरोरूगै कोन: वेरि का अर्थ सुगन्ध हैं और “चरोरुगम” का अर्थ कमल हैं। इसलिए यह शब्द “वेरिच्छरोरुगम” शब्द पूर्ण तरह सुगन्धित कमल को संबोधित करता हैं। अत: “वेरिच्छरोरुगै” शब्द सुगन्धित कमल पर बैठने वाले को संबोधित करता हैं।

“चरोरुगै कोन”: “कोन” का अर्थ सामान्यत: राजा हैं। इदर उसका अर्थ “स्वामी” हैं। वह “चरोरुगै” के साथ चलता हैं इसलिए वह भगवान श्रीमन्नारायण जो अम्माजी (परिया पिराट्टी) के स्वामी हैं उनको संबोधित करता हैं। यहाँ अम्माजी का भी नाम इसलिए लिया गया हैं क्योकिं जब भगवान अपने भक्तों सबसे बड़ी पीड़ा देते हैं तब वे अकेले यह पीड़ा नहीं देते हैं। अम्माजी के जानकारी से और उनको शामिल कर के किया गया हैं। क्योकिं हम यह देखते हैं कि भगवान जो पीड़ा देते हैं वह वक्त के साथ हितकारी है यह साबित होता है और अम्माजी के उपस्थिती बिना कुछ भी ज्यादा हितकारी नहीं होता हैं। इसीलिए जब भी भगवान बहुत बड़ी पीड़ा देंगे तो अम्माजी हमेशा मौजूद रहेगी।

मेय्न्नलमाम् – इसका अर्थ सच्चा प्रेम / सच्चा चिन्तन करना।

तेरिल – यह उस क्रिया के अनुसन्धान को संबोधित करता हैं जहाँ भगवान किसी मनुष्य को सबसे पहिले दु:ख क्यों देता हैं। अन्बर पाल। अत: इस पाशुर में शब्द रचना इस ढंग से हो “वेरिच्चरोरूगै कोन अन्बर पाल आरप पेरुन्तुयरे सेय्दिडिनुम तेरिल मेय्न्नलमाम्”। यह एक उदाहरण के साथ समझाया गया हैं।

पोरुत्तरकु अरीदु एनिनुम मैंदन उडर पुण्णै अरुत्तरकु इसै तादै अट्र्र्रु: एक बालक को उसके शरीर में चोट लगी हैं। उसके पिता उसको अस्पताल में भर्ति कराते हैं जहाँ डॉक्टर उसके शरीर पर इलाज करता हैं। यह प्रक्रिया से उस बालक को बहुत दर्द होता हैं क्योंकि शायद उसके शरीर पर चीर-फाड़ करना हैं। उसके पिता इसके लिए राजी हो जाते हैं क्योंकि उन्हें पता हैं की इसका परिणाम अच्छा हैं। इस उदाहरण में पिता भगवान के जैसे हैं जो अपने भक्तों को उनके कर्म नष्ट होने के लिए बहुत ज्यादा पीड़ा देते हैं। यह एक भगवान का हमारे प्रति प्रेम हैं। इस प्रक्रिया में अम्माजी भी भगवान के साथ मिलकर भक्तों को संपूर्णत: चिरकाल मार्ग के लिए सहन करती हैं।

अडियेन् केशव रामानुज दासन्

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ज्ञान सारं – पासुर (श्लोक) २०

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ज्ञान सारं

ज्ञान सारं – पासुर (श्लोक) १९                                                              ज्ञान सारं – पासुर (श्लोक) २१ 

पाशुर २०

paramapadhanathan-2

 विरुप्पुरिनुम् तोण्डर्क्कु वेण्डुम् इदम् अल्लाल्
तिरुप्पोलिन्द मार्बन अरुल सेय्यान – नेरुप्पै
विडादे कुलवि विल वरुन्दिनालुम
तडादे ओलियुमे ताय?

शब्दशः अर्थ

विरुप्पुरिनुम् तोण्डर्क्कु वेण्डुम् इदम् अल्लाल् – एक भक्त उसकी अच्छाई की खातिर   निरर्थक वस्तू कि लालसा करता हैं फिर भी | तिरुप्पोलिन्द मार्बन – वह जिसके छाती पर पेरिया पिराट्टी (लक्ष्मी अम्माजी) हैं। अरुल सेय्यान – इन अनावश्यक वस्तु नहीं देते, इसके समान की  | नेरुप्पै विडादे कुलवि विल वरुन्दिनालुम – वह बच्चा जो अग्नि के चमक के कारण उसे छुना चाहता हैं और उसके दुष्परिणाम जाने बगैर वह रोता हैं कि वह उस अग्नि को पकड़ नहीं सकता, क्योकिं| तडादे ओलियुमे ताय? एक माता (भगवान श्रीमन्नारायण के जैसे) बच्चे को अग्नि से दूर ही ढकलेगी। हैं ना?

संक्षेप :

इस पाशुर में श्री देवराज मुनि स्वामीजी एक तथ्य के दृष्टान्त को एक उदाहरण के साथ बताते हैं। वह कहते हैं भगवान श्रीमन्नारायण अपने भक्तों को वह सभी वस्तु नहीं देंगे जो वह मांगते हैं। वह अपने भक्तों को कभी भी वह कौन सी भी वस्तु नहीं देंगे जो उसके लिए हानिकारक हैं। वें सब उस वस्तु को ही अच्छा समझकर उसी की चाहना करेंगे। यद्यपि भगवान श्रीमन्नारायण जो उन वस्तुओं के दुष्परिणामों को जानते हैं वह उस वस्तु को उनको नहीं देंगे। यह तथ्य इस पाशुर में एक उदाहरण के साथ समर्थन किया गया है।

अर्थ :

विरुप्पुरिनुम्: भगवान श्रीमन्नारायण के भक्त जन जीवन में कुछ ऐसी वस्तुओं कि चाहना करते हैं जो निरर्थक / तुच्छ हैं। अगर यह सब वस्तुए वह नहीं देंगे तो उनके लिये बड़ा दु:खदाई होगा यह जानते हुए भी कि वें सभी भगवान से यह सभी वस्तुओं को बड़ी मेहनत से मांगते हैं। “विरुप्पुरिनुम्” शब्द यह वर्णन करता हैं कि भगवान के भक्त किस अधिकतम परिणाम तक प्रतिपादन कर सकते हैं।

तोण्डर्क्कु: एक समूह कि प्रजा जो भगवान श्रीमन्नारायण के सच्चे भक्त हैं। “तोण्डु” शब्द का दोनो अर्थ हो सकता हैं “दास” और “सेवा-भाव”। इधर तो केवल सेवा-भाव ही दर्शाता हैं। जिन्हें सेवा भाव में रुचि हैं वहीं “भक्त” कहलाते हैं। अत: जिन्हें भगवान श्रीमन्नारायण कि सेवा करने में रुचि हो उन्हेंही “तोण्डर” कहकर बुलाते हैं।

वेण्डुम् इदम् अल्लाल्: “इदम्” यह तमिल शब्द संस्कृत पद “हितम” का समानान्तर हैं। इसका मतलब यह हैं कि उपर बताये गये सभी एक भक्त के लिए आवश्यक हैं। भक्त जन जो चाहते हैं उन्हें दो वर्ग में किया जा सकता हैं अर्थात वह जो उन्हें सब कुछ पसन्द हो और वह जिसकी उसे आवश्यकता हैं। “इदम्” पिछले को दर्शाता हैं। अत: यह पद “वेण्डुम् इदम् अल्लाल्” यह संबोधीत करता हैं कि वह जो उनके उच्च जीवन के लिए अनावश्यक हैं। “अल्लाल्” यह एक अस्वीकार सूचक हैं और अत: वह यह सब बतलाता हैं जो भक्तों के उच्च जीवन के लिए जरूरी नहीं हैं।

तिरुप्पोलिन्द मार्बन: यह उसको संबोधीत करता हैं जिसके पास प्रकाशमान और चमकीला वक्षस्थल हो क्योकिं अम्माजी वहाँ विराजमान हैं। भगवान श्रीमन्नारायण के वक्षस्थल को चमक / रौनक अम्माजी के साथ जुड़े रहने के कारण ही मिली हैं। आल्वार कहते हैं “करुमाणिक्क कुन्द्रतु तामरै पोल तिरुमार्बु, काल, कन, कै, चेवाई उंधियाने” और “करुमाणिक्क मलई मेल, मणि तदन्तामरै कादुगल पोल, तिरुमार्बु वाई कण कै उन्धि काल उदयादैगल सेय्यपिरान”। इस पाशुर में यह देखा जा सकता हैं कि भगवान के अन्य अंगो कि तरह, उनका वक्षस्थल भी बहुत चमकीला और जगमगाता हैं। यह एक बहुत अच्छी देखने लायक बात हैं कि सूची में उनके  वक्षस्थल (तिरुमार्बु) का सबसे पहिले वर्णन किया गया हैं। श्री शठकोप स्वामीजी कहते हैं “अलर मेल मन्गै उरयुम मार्बु”, अत: क्योकिं पेरिया पिराट्टी (अम्माजी) भगवान के वक्षस्थल  पर विराजमान हैं, उनके दिव्य चमक भगवान के पूरे वक्षस्थल पर फैली हैं और इसीलीए वह बहुत सुन्दर और चमकीली दिखती हैं।

“मैयार करुंगण्ण्ल कमला मलार मेल
चेय्याल तिरुमार्विनिल सेर तिरुमाले
वेय्यार चुदराझी संगमेन्धुम
कैय्या! उन्नै काणा करुधुम एन कण्णे!!!” – (तिरुवैमोझि ९,४,१)

इस पाशुर में भगवान के वक्षस्थल  को अम्माजी के साथ होने के कारण चमक का मूल ऐसा समझाया गया हैं। अत: “तिरुवाल पोलिन्ध मार्बन” भगवान के वक्षस्थल कि सुन्दरता को दर्शाया गया हैं। यह अम्माजी का संग भी समझाया हैं। अत: जो सच्चाई यहा समझाई गयी हैं कि दोनों (भगवान और अम्माजी) हमेशा एक साथ ही रहते हैं और वें हमेशा अपने भक्तों पर कृपा करने के लिए तत्पर हैं।

अरुल सेय्यान: भक्त जन कुछ वस्तु के लिए भगवान के पास उसका प्रतिपादन करते हैं परन्तु भगवान उन्हें वह नहीं देंगे। कारण कि भगवान जानते हैं कि वह वस्तु उन सब के कुछ भी काम कि नहीं हैं। तथापि भक्त जन अपने सीमित सोच के कारण यह करते हैं और कुछ वस्तु मांग भी लेते हैं जो कि वें सोचते हैं कि उनके लिए अच्छा हैं। यह तो भगवान कि निर्हेतुक कृपा हम सब पर हैं कि वह हमारी यह प्रार्थना उस समय अस्वीकार कर देते हैं और इसलिए भगवान हम जो मांगते हैं वह वस्तु अस्वीकार कर देते हैं।

अरुलुधल: इस का अर्थ हैं देना। भगवान के भक्त कितना भी प्रार्थना करें परन्तु भगवान उनकी प्रार्थना अस्वीकार कर देते हैं वह उनकी प्रार्थना स्वीकार नहीं करते क्योकिं भगवान इसका दुष्परिणाम जानते हैं। इस तथ्य को एक उदाहरण के साथ आगे समझाया गया हैं:

नेरुप्पै विडादे कुलवि विल वरुन्दिनालुम तडादे ओलियुमे ताय?: एक खेलता हुआ बालक हैं। वह थोड़ी दूर पर अग्नि देखता हैं और उसकि रोशनी और चमक देखकर आश्चर्यचकित हो जाता हैं। वह यह नहीं जानता कि अग्नि उसके शरीर को नुकसान पहुचाने वाली हैं। तथापि अग्नि कि चमक से आकर्षक होकर वह उसके तरफ जाता हैं और वह उसे हाथ में लेकर खेलना चाहता हैं। उस बालक कि माँ उसके पास हैं और उस पर कड़ी नजर रखी हैं। क्या वह माँ उस बालक को उस अग्नि के पास जाकर उसके साथ खेलने देगी जब कि वह बालक उस अग्नि के पास आगे बढ़ रहा हैं? निसंदेह वह उस बालक को जाने से रोकेगी। उसी तरह भगवान श्रीमन्नारायण जो सब का परिणाम जानते हैं अपने भक्त को वह सब कुछ नहीं देंगे जो वे उनसे मांगते हैं। कितना भी वह भक्त जन कोशीश कर ले परन्तु भगवान का स्पष्ट उत्तर रहेगा “नहीं”।

 

अडियेन् केशव रामानुज दासन्

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ज्ञान सारं – पासुर (श्लोक) १९

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ज्ञान सारं – पासुर (श्लोक) १८                                                               ज्ञान सारं – पासुर (श्लोक) २० 

पाशूर १९

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नल्ल पुदल्वर् मनैयाळ् नवैयिळ् किळै
इल्लम् निलम् माडु इवै अनैत्तुम् – अल्लल् एनत्
तोट्रि एरी तीयिर् सुडु मेल् अवर्क्कु एळिदाम्
एट्ररुम् वैगुन्दत्तु इरुप्पु

सार

अरुळाळ पेरुमाळ एम्बेरुमानार् स्वामीजी इस पाशूर मैं कहते हैं की जिन लोगों को अच्छे बच्चों, पत्नी ,संबंधियों ,घर ,ज़मीन को जलन के दर्द के समान लगता हैं,उन लोगों के लिए परमपाद का उच्चतम् निवास पाना बहुत ही सुलभ हैं |

शब्दशः अर्थ :

नल्ल पुदल्वर् – वह जिसके पास महान बेटा | मनैयाळ् नवैयिळ् किळै – पत्नी,अच्छे सम्बन्धि,| इल्लम् – परिपूर्ण घर | निलम् -समृद्ध और उपजा भूमि | माडु  – बहुत दूध देने वाली गाये हो |इवै अनैत्तुम्अल्लल् एनत् तोट्रि – लेकिन फिर भी इन सब बातों के साथ जिसे कोई अहंकार या लगाव न हो और वह अपने अन्तरंग हृदय से यह जनता हो की ये सब दर्द और पीड़ा के स्रोत हैं एरी तीयिर् सुडु मेल् अवर्क्कु एळिदाम् – और, धधकते आग में इन सब को छोड देता है एट्ररुम् वैगुन्दत्तु इरुप्पु – वही एक हैं जो कालातीत परमपद जाकर श्रीमन्नारायण भगवान के दूसरे भक्तों के साथ रहने का अधिकारी हैं ,वो भी अती सुलभता से | क्यूंकी यह कार्य तो अपने खुद के प्रयासों से प्राप्त करना असंभव हैं |

स्पष्टीकरण :

नल्ल पुदल्वर्: कुछ बच्चों की प्रशंसा हर कोई करता हैं क्यूंकी वे अच्छे गुणों से भरे होते हैं (सद्गुणि) | ये बच्चे उन बच्चों से बिल्कुल अलग हैं जिन्हे बुरी आदतें हैं और जो हर समय अपने माता पिता के मुसीबत के कारण बनाते हैं | यहाँ “नल्ल पुदल्वर्” पहले समूह के बच्चों को संबोधित करता हैं जो सद्गुणि हो |

मनैयाळ् : यह विशेषण “नल्ल” यहाँ पर “मनैयाळ्” शब्द से जोड़ा जा रहा हैं | यह अच्छे गुणों वाली पत्नी को संबोधित करता हैं | तिरुवळ्ळुवर् कहते हैं “मनैतक्क माण्बुदयळागि तऱ्कोन्डान् वळतक्काळ् .वाळ्कैतुणै” | शिलपधिगारम् कहते हैं “अट्रवोर्कु अळितलुम्, अन्धणर् ओम्बलुम्, तुट्रन्दोर्कु एदिर्तलुम् , थोल्वोर् मरबिल् विरुन्धेदिर् कोडलुम्” | यहाँ पर उन अच्छे गुणों के बारे मैं बताया गया हैं जो एक औरत मैं होने चाहिए जैसे की महात्माओं का सम्मान करना, सभी की अच्छे तरह से देखबाल करना और ज़रूरतमंदों की मदद करना | इसके अलावा एक औरत को पता होना चाहिए की एक अच्छा जीवन बिताने के लिए क्या अच्छा हैं | यह बात यहाँ पर ख़त्म नहीं होती, उन्होने जो सीखा हैं उसका पालन भी करना होगा, भोजन बनाने के अलावा ग़रीबों को दान देना और अपने पति की मन को जानकर उनके कहे अनुसार ही रहना |

नवैयिळ् किळै : “नवै” का मतलब ग़ल्तियाँ | “इल्” का मतलब कमी | “किळै” संबंधो को दर्शाता हैं | इसलिए “नवैयिल् किळै” का मतलब हुआ की वो सारे संबंध जो बेदाग और जिसमे कोई दोष नहीं हैं | ये संबंधी उन संबंधियों की तरह नहीं हैं जो सिर्फ़ नाम के लिए संबंधी हो लिकिन असल मे वे दुश्मन की तरह बर्ताव करते हैं | अरुळाळ पेरुमाळ् एम्बेरुमानार् स्वामीजी “नवैयिल् किळै” कहते हुए उन संबंधियों को सम्बोधित करते हैं जिनके साथ हर कोई संपर्क मे रहना चाहता हैं और अच्छे तरह से व्यवहार करना चाहता हैं |

इल्लम्जैसे की उपर कहा गया हैं की “नल्ल” विशेषण सभी सज्ञाओं से पहले लगाना चाहिए | इसलिए “नल्ल इल्लम्” का मतलब होगा बहुत सुंदर घर | घर जो जीर्ण न हुआ हो और जिसमे लोग रहते हों | इसके बजाय इसका मतलब यह भी है, सुंदर घर जिसमे बहुत से स्तरों, कई परतों और छज्जे है |

निलम् : एसी कई जगह हैं जहाँ बहुत से जंगली घास उगी हों | वह बंजर ज़मीन हैं और वहाँ कोई वनस्पति नहीं उग सकती हैं | “नल्ल निलम्” का मतलब उसके विपरीत हैं जिसका मतलब हैं वह ज़मीन जहाँ बिना कोई खाद के फसल उग रही हों | फसल इस वृद्धि से उग रहा हैं की जो बोया हुआ था उससे १० गुना ज़्यादा उपज हो |  अगर कोई सुबह बीज बोता हैं तो श्याम को घर लौटते वक्त लंबे उगे हुए पेड़ों को देखने के लिए उसे अपने हाथों को अपनी आखों के उपर रखकर उपर देखना पड़े |एक तरफ़ के पौधे इस तरह से सम्रुध हो कर बडते हैं की वे सारे क्षेत्र आर कब्जा कर लेते हैं | यह खेत एसए होते हैं जहाँ धान के खेत गन्ने जैसे लंबे बडते हैं |

माडु : “नल्ल माडु” का अर्थ हैं अच्छी गायें ।  वे उन क्रूर गायों जैसे नहीं हैं जिन्हे पकड़ना और नियंत्रित करना न हो | यह बुरी गाएँ अपने रास्ते मैं जो भी आएँ उसे नष्ट करके अपने पड़ोसियों के घर मैं और खेतों मैं कहर मचा देती हैं | अरुळाळ पेरुमाळ एम्बेरुमनार् स्वामीजी एसी बुरी गायों के बारे मैं नहीं बोल रहें हैं बल्कि उन अच्छी गायों को संबोधित करते हैं जो बच्‍चों के छोटे से गुच्छे से भी बँध जाएँ | यह गाय इन बच्चों को ही प्राप्त हो जाती हैं और इन बच्चों की भी आज्ञाकारी होकर और इनसे भी अच्छा व्यवहार करेगी | ये दूध भी बहुत अधिक मात्रा मैं देती हैं |

अल्लल् एनत् तोट्रि : अरुळाळ पेरुमाळ एम्बेरुमनार् स्वामीजी कहते हैं की हमें एसा सोचना चाहिए की यह सारी उपर बताई गयी विलासिता दुख और दर्द का कारण हैं | भले ही अल्लल् का मतलब दुख या दर्द हैं लेकिन इस सन्दर्भ मैं हमे इसका मतलब कुछ इस तरह लेना चाहिए की जो खुद मैं दर्द न हो बल्कि दुख और दर्द को लाता हैं | वे उनके एक अप्रत्यक्ष स्रोत हैं |

एरी तीयिर् सुडु मेल् : चमकदार आग जो ठाठ से जलती हैं | इन विलासिता से अगर किसी को धकधकाती आग के गर्मी के समान कष्ट हो तो वह व्यक्ति आगामी अनुच्छेद में वर्णित फल का पात्र है |

अवर्क्कु एळिदाम् एट्ररुम् वैगुन्दत्तु इरुप्पु : अगर कोई व्यक्ति यह महसूस कर रहा हैं की इस दुनिया के विलासिता आग के गर्मी के कष्ट के समान हैं तो वह एक अच्छी तरह से परिपक्व व्यक्ति है | ऐसे व्यक्ति को भगवान ऐसी चीज़ देते हैं जो उसे खुद अपने प्रयासों से नहीं मिल सकती | भगवान  ऐसे व्यक्ति को परमपद देते हैं जहाँ पर वह भगवान के दूसरे दासों के साथ मिलकर नित्य भगवान का कैन्कर्य सेवा करे |

 

अडियेन् केशव रामानुज दासन्

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ज्ञान सारं – पासुर (श्लोक) १८

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ज्ञान सारं – पासुर (श्लोक) १७                                                                 ज्ञान सारं – पासुर (श्लोक) १९

पाशूर १८

Dhruva-Vishnu-and-Garuda-thumb

 

ईनमिला अन्बर् एन्रालुम् एय्दिला
मानिडरै .एल्लावणत्तालुम् – तान् अरिय
विट्टार्कु एळियन् विडादार्क्कु अरिवरियन्
मट्टार् तुळाय् अलङ्गल् माल्

शब्दशः अर्थ :

ईनमिला अन्बर् एन्रालुम् एय्दिला  – श्रीमन्नारायण भगवान के चरण कमलों के दास जो दोषों से रहित और भक्ति से भरे हो उन्हे इस तरह रहना चाहिए  |मानिडरै .एल्लावणत्तालुम् – वे इस अनित्य और संसारी लोगों से किसी भी तरह की बातचीत और संबंध जारी नहीं रखते | तान् अरिय – साथ ही भगवान को पता हैं की वे अब किसी के साथ संबंध नहीं रखते | विट्टार्कु एळियन् विडादार्क्कु अरिवरियन् मट्टार् तुळाय् अलङ्गल् माल् वह जिन्होने इस अनित्य संसारी संबंध त्याग दिया है , उन के लिए उसे प्राप्त करना जिसके पास पवित्र तुलसी(तिरुतुळाय्) हैं जिससे शहद बहता हैं,बहुत ही सुलभ हैं लेकिन बहुत कठिन हैं उन के लिए जिन्होने संसारी संबंधों का त्याग नहीं किया |

स्पष्टीकरण :

ईनमिला अन्बर् एन्रालुम् : “ईनम्” दुष्टता को दर्शाता है | यह शब्द “पोल्ला अरक्कनै” कहते समय आमतौर आर रावण जैसे लोगों को संबोधित करते हुए कहते हैं | परकाल स्वामीजी(तिरुमङ्गै आळ्वार्) “मुन्पोला रावणन्” कहते हैं | विष्णुचित्त स्वामीजी(पेरियाळ्वार्)कम्स की दुष्टता दिखाने लिए उसे “तीय पुन्डि कंजन” कहते हैं | इसीलिए रावण और कम्स जैसे लोगों के कृत्यों को “पोल्लांगू” के  कृत्य कहते हैं |  तो, ईनमिल् का मतलब हैं एसे दुष्टता के बिना | एसे लोग श्रीमन्नारायण भगवान के चरण कमलों में निष्काम भक्ति से परिपुर्ण होते हैं | भगवद् गीता मैं कृष्णजी बताते हैं की जिनके पास उन्हे छोड़कर दूसरा कुछ नहीं हैं उनके लिए वे ही अंतिम लक्ष हैं | इसलिए इस तरह की निष्टा और भक्ति रहने वाले भक्तों को “ईनमिला अन्बर्” कहा गया हैं |

एय्दिला मानिडरै : लोग जिन्हें कभी श्रीमन्नारायण भगवान की तरफ झुकाव नहीं था ।  आद्यात्म की ओर बडकर सदा के लिए श्रीमन्नारायण भगवान के साथ रहना ही इस मनुष्य जन्म का एकमात्र फल है । जो लोग ऐसा नहीं करते वे “विलन्गोडु मक्कळ् अनयर्” के अनुसार चलते फिरते जानवर हैं । यह बात कुछ आळ्वारों द्वारा बतायी गयी हैं । परकाल स्वामीजी(तिरुमंगै आळ्वार) कहते हैं “आन्वीडैयेळ अन्रू अडर्तार्कु आळानार अल्लाधर मानिडवर अल्लर् ” । भुतयोगी स्वामीजी कहते हैं “चेन्णगण माल् नामम् मारनधारै मानिडमावयेन्” । इससे हमे यह पता चलता हैं की वे लोग जो “श्रीमन्नारायण” को भुल जाते है वे मनुष्य ही नहीं हैं । आळ्वार जिन्हें साक्षात श्रीमन्नारायण भगवान द्वारा ही परम ज्ञान और भक्ति प्रदान की गयी थी, वे भी ऐसे लोगों की निन्दा करते हैं और उनसे दुर ही रहते हैं । ऐसे लोग श्रीमन्नारायण भगवान का अपमान करते हैं और उनसे दुर रहते हैं । ऐसे लोगों को ही “एय्दिला मानिडरै” कहा गया हैं । वे बहुत ही तुछ और पापी लोग हैं ।

ऐसे नासमझ लोगों के लिए शठकोप स्वामीजी कहते हैं “याधानुम् पट्रि नीनगुम् विरधमुडयार्”।दो अलग मतों पर आधारित अगर हम “एय्दिला” के जगह पर “एय्दिलारम्” शब्द का प्रयोग करे तो इसका मतलब होगा वह लोग जो श्रीमन्नारायण भगवान के दुश्मन हैं | तीरुवळ्ळुवर् इस बारे में यह कहते हैं “एय्दिलार् कुट्रम् पोला “। “एय्दिलार्” का अर्थ है दुष्मन ।

एल्लावणत्तालुम् : इसका मतलब हैं सभी तरह के सम्बन्ध जैसे उनके साथ रहना, चीजों का लेनदेन करना, बातचीत करना और दुसरे सभी लौकिक आदतें ।

तान् अरिय विट्टार्कु एळियन् :  लोग जिन्हें  “एय्दिला मानिडरै ” कहा गया है ऐसे लोगों से हमें सारे उपर बताये गये सम्बन्धों को छोड़ देना चाहिए । हमें इन सम्बन्धो को इस तरह छोड़ देना चाहिए की ना सीर्फ हमें और हमारे आसपास रहने वाले लोगों को पता हो बल्कि हमारे अंदर रहने वाले भगवान को भी पता हो की हमने पुरी तरह से इमानदारी के साथ ऐसे लोगों से सारे सम्बन्ध छोड़ दिये हैं । जिन्होंने इस तरह के सारे सम्बन्धो का त्याग कर दिया हैं उनके लिए भगवान बहुत ही सुलभ हो जाते हैं । भगवान को ही उळ्ळुवार् उळ्ळितेल्लाम् उडनिरुन्धु ” कहा गया है, मतलब वे ही एक हैं जो हम सभी में हैं, और इतनाही नहीं वे हमारे गहरे से गहरे विचार मे भी हैं । इसलिए, यह त्यागने की बात वहाँ तक पता होना चाहिए जबतक ये भगवान इस बात की मोहर लगादे की हाँ हमने “सही में छोड़ दीया हैं ।” इस जगह पर वरवरमुनी स्वामीजी(स्वामी मणवाळ मामुनी) कहते हैं की श्रीवैष्णवम् वह हैं जो इस बात मे सीमित न हो की किसी व्यक्ति को क्या पता हैं या संसार को क्या पता हैं । जो प्रधान हैं वह तो यह हैं की श्रीमन्नारायण भगवान को क्या पता हैं ।

श्री पेरिय आच्चान पिळ्ळै स्वामीजी इसको तमिळ मैं इस तरह कहते हैं “तान अऱिन्ध वैणवत्वमुम् वैणवत्वम् अल्ला,नडरिन्ध वैणवत्वमुम् वैणवत्वम् अल्ला,नारायणन् अरिन्ध वैणवत्वमे वैणवत्वम् | ”

विडादार्क्कु अरिवरियन् : उन लोगों को जिन्होने ऐसे “एय्दिला मानिडर्” को नहीं छोड़ा हैं,भगवान कभी प्राप्य न होंगे वे कभी भगवान तक नहीं पहुँचा सकते | शठकोप स्वामीजी कहते हैं “अडियार्कु एळियवन् ,पिरर्गळुक्कु अरीय वित्तगन्” | तो ,ऐसे सांसारिक लोगों के साथ जो “एय्दिला मानिडर्” की श्रेणि मैं आते हैं उन लोगों के साथ भक्तों को कोई भी सम्बन्ध नहीं रखना चाहिए |

मट्टार् तुळाय् अलङ्गल् माल् : भगवान श्रीमन्नारयण वे हैं जिनके सिर पर और कंधों पर तुलसी माला सजी हों | क्यूंकी इस तुलसी माला को भगवान के दिव्य शरीर का स्पर्श होता हैं,यह सुंदर हो जाती हैं और इससे शहद बहने लगता हैं | तुलसी माला भगवान की श्रेष्ठता का वर्णन करती हैं | कुल मिलाकर, अर्थ के संदर्भ में इस पाशूर को हमें इस तरह पड़ना चाहिये “मट्टार् तुळाय् अलङ्गल् माल्,ईनमिला अन्बर् एन्रालुम् एय्दिला मानिडरै एल्लावणत्तालुम् – तान् अरिय विट्टार्कु एळियन् विडादार्क्कु अरिवरियन् “|

 

अडियेन् केशव रामानुज दासन्

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ज्ञान सारं – पासुर (श्लोक) १७

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पाशूर १७

indra-worships-krishna

ओर्निडुग विण्णवर् कोन् सेल्वमोलिंदडुग
एंरूम इरवादिरुन्दिडुग – इन्रे
इरक्कक कलिप्पुम कवर्वुम इवट्राल
पिरुक्कुमो? तट्रेलिन्द पिन

प्रस्तावना:

पिछले पाशुर में श्री देवराज मुनि उस मनुष्य के बारे में बताते है जिन्हे जीवात्मा के असली स्वरूप के बारे में समझ आ गया हैं। उन्हें वह कुछ इस तरह प्रस्तुत करते हैं की एक ऐसा जो हमेशा परमात्मा श्रीमन्नारायण का दास हैं किसी और का नहीं उसे आत्मा का असली स्वभाव मालूम है । श्री देवराज मुनि आगे बढ़ते है और उदाहरण देकर शरण हुई आत्मा अपने असली स्वभाव के बारे में सोचते हैं यही समझाते है। इस पाशुर में वह एक व्यक्ति जो आत्मा के असली स्वभाव के बारे में नहीं जानता उसके बारे में बताते हैं। ऐसे मनुष्यों के लिए, धन का बहोत प्रवाह, तुरंत उसका कम होना, ज्यादा जीवन जीने की योग्यता या ज्यादा जीवन जीने की अयोग्यता, यह सब सुख और दु:ख पर स्थापित हैं। इसीलिए जो व्यक्ति सच में परमात्मा श्रीमन्नारायण के शरण हैं और किसी के नहीं ,वहा धन का कम या ज्यादा प्रवाह, कम या ज्यादा जीवन इन के कारण से लौकिक सुख और दु:ख का उतार चढ़ाव नहीं होता। यह उच्च विचार क्या हैं वह इस पाशूर में वर्णित हैं।

अर्थ:

ओर्निडुग विण्णवर् कोन् सेल्व मोलिंदडुग – इस संसार में बहोत सारा धन हैं, जैसे देवताओं के पास (इन्द्र आदि), जो की किसी भी वक्त आता और जाता रहेगा और हमेशा एक सा नहीं रहेगा। एंरूम इरवादिरुन्दिडुग – इन्रे इरक्कक और जीवन का वैसे ही है, हमेशा के लिए नहीं हैं और कोई भी अचानक मर सकता हैं। कलिप्पुम कवर्वुम इवट्राल पिरुक्कुमो? तट्रेलिन्द पिन –परन्तु आत्मा के स्वभाव को जानने के बाद और समझने के बाद | एक प्रपन्न के लिए जिसे जीवात्मा का स्वभाव समझ में आ गया है, उसे धन के सम्बन्ध में वह मिल रहा है या छूट रहा है या दीर्घायु उसके पास है या नहीं हैं इस बाबत कोई सुख या दु:ख नहीं होता। ओर्निडुग विण्णवर् कोन् सेल्व: “सेल्व” इन्द्र जो सभी देवताओं का राजा हैं उसके अधिक धन को संबोधित करता हैं। वह धन जिससे कोई भी तीनों लोकों भूलोक, भुवर लोक और स्वर्ग लोक के उपर शासन कर सकता हैं। ऐसा धन अगर मनुष्य न चाहे तो भी उसके पास आ सकता हैं। मोलिंदडुग:  ऐसा धन उस व्यक्ति के पास से कुछ इस तरह नष्ट हो जाये की उसे वापिस कमाना या सौभाग्य से मिलना संभव न हो। एंरूम इरवादिरुन्दिडुग: और किसी भी समय वह व्यक्ति मृत्यु के बिना सदा चिरकाल जीवित रहे। इन्रे इरक्कक: पहिले कहे हुये चिरकाल जीवन के बिना वह व्यक्ति तत्काल मर जाये | कलिप्पुम कवर्वुम इवट्राल पिरुक्कुमो? सांसारिक मनुष्य सुख का अनुभव करता हैं क्योंकि वे या तो धन पाते हैं या चिरकाल जीवन। वे लगातार आने वाले धन की हानी या प्रत्यक्ष रूप से अचानक आने वाली मृत्यु के कारण चिरकाल जीवन की कमी इस वजह से दु:ख का अनुभव करते हैं। तट्रेलिन्द पिन: यह उस अवस्था को संबोधित करता हैं जहाँ कोई अपने आप को, मतलब जीवात्मा के सच्चे स्वभाव को जान सकता हैं जो यही हैं कि जीवात्मा भगवान श्रीमन्नारायण का ही दास हैं और किसी का नहीं।

 

अडियेन् केशव रामानुज दासन्

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ज्ञान सारं – पासुर (श्लोक) १६

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पासुर-१६

I_Intro2

 

देवर मनिसार तिरियक्कुत तावरमान
यावैयुम अल्लन इलगुम उयिर-पूविन मिसै
आरणङ्गिन केलवन अमलन अरिवे वङिवाम
नारनण ताट्के अडिमै नान

प्रस्तावना:

श्री देवराज मुनि यह समझाते हैं कि किस तरह सत्य जीवात्मा जो कि जीवात्मा के सत्य स्वभाव को जानते हैं और अपने स्वभाव के स्थिर दशा के बारें में सोचते हैं। सभी जीवात्मा भगवान श्रीमन्नारायण के ही दास हैं और यहीं दासत्व इन जीवात्माओं का स्वभाव हैं। यहीं इस पाशुर में समझाया गया हैं।

अर्थ:

देवर मनिसार तिरियक्कुत तावरमान – देवता इन्द्र के जैसे और मनुष्य जैसे ब्राह्मण या राजा, गाय, पक्षीयाँ, पेड़, पौदे और जड़ी-बुटी को सम्मिलित करना। यावैयुम अल्लन इलगुम उयिर – और इस जगत में अन्य कोई भी वस्तु का कोई शाश्वत नाम नहीं हैं और नाहीं ऐसे नाम से जाना जायेगा। पूविन मिसै आरणङ्गिन केलवन – अस्तु सभी वस्तु और सभी लोग कमल पुष्प पर विराजमान माता लक्ष्मी के पति के दास हैं। अमलन – नाहीं किसी दोष से और |अरिवे वङिवाम नारनण ताट्के अडिमै नान – जिसे जीवात्मा की पहचान हो गयी और यह ज्ञान हो गया की वह भगवान श्रीमन्नारायण के ही दास हैं।

स्पष्टीकरण:

देवर मनिसार तिरियक्कुत तावरमान: जीवात्मा को कोई विशेष नाम नहीं होता हैं जैसे देवता, मनुष्य, जानवर, पेड़, पौदे और जड़ी-बुटी आदि। इनमें से कोई एक प्रकार की भी जीवात्मा नहीं हैं। उनके अच्छे और बुरे कर्मों के अनुसार उनके पिछले अंगिनत जन्मों के हिसाब से एक जीवात्मा एक शरीर को धारण करती हैं जैसे मनुष्य, जानवर, पक्षी, पेड़, आदि । यह थिरुकुरल आदि में पाया जा सकता हैं। वह इस प्रकार है:

“ऊर्व पधिनोंराम, ओंबधू मानिदम, न्ल्र, परवै नालकाल, ऑर पप्पथु, स्ल्रिया बंधमान्धेवर पधिनालु, अंधमिल स्ल्र थावरम नालैधु। मक्कल, विलंगु परवै, ऊर्वना, न्लृंथीरिवना, परूपधाम एनविवै येझु पिरापागुमेंबा”। शरीर के कर्मों के आधार पर आत्मा किस शरीर में जायेगा यह यहाँ समझाया गया हैं। यह इसलिए कि जीवात्मा अपने आप को अनगणित शरीर में कल्पों से रहता हैं और जब वह जीवात्मा एक विशेष शरीर में विशेष समय में मौजूद हैं तब वह जीवात्मा सोचता हैं कि “मैं देवता हूँ”, “मैं मनुष्य हूँ”, “मैं जानवर हूँ”, “मैं पेड़ हूँ”। यहाँ “मैं” शब्द से अभिमान दिखाता हैं। हालाकि यह जीवात्मा कि दशा तब तक ही हैं जब उसे यह मालुम नहीं पड़ता कि यहीं उसका सत्य स्वभाव हैं। जीवात्मा के सत्य स्वभाव से यह जान सकते हैं कि भगवान श्रीमन्नारायण के लिए जीवात्मा नाहीं पेड़ हैं नाहीं पौधें,न जानवर, न देवता और नाहीं कुछ और। जीवात्मा केवल यही सोचता हैं कि वह भगवान श्रीमन्नारायण का हीं दास हैं और किसी का नहीं।

इलगुम उयिर नान: पाशुर के अन्त में “नान” को यहां पर जोड़ना चाहिए। यहाँ “नान” का मतलब हैं कि जीवात्मा कभी नहीं मरते नाहीं उसे नष्ट किया जा सकता हैं। पहिले आनेवाला विशेषण “इलगुम उयिर” हमें यह समझाता की शास्त्रों में स्थापित लक्षण किस तरह हमारे उपयोगी हैं। “उयिर” (जीवात्मा) ज्ञानी ठहराना, आनन्द ठहराना और बुद्धिमान ठहराना। यह जीवात्मा को अन्य निर्जीव तत्त्वों से अलग करता हैं क्योकिं वह ज्ञान प्राप्त करता हैं जो कि निर्जीव तत्त्वों के पास किसी भी समय में नहीं रहता हैं। हमें इस बात का ध्यान रखना चाहिए जो स्वामी पिल्लै लोकाचार्यजी ने अपने “तत्त्व त्रय” (चित प्रकरणम) में कहा हैं।   “आत्म स्वरूपं सेंरू सेंरू परमपरमै एंगिरापदिए धेहेंद्रिय मनः प्राण बुध्धी विलक्षणामी, अजदमै, आनान्धा, रूपमै, नित्यमै, अणुवै, अव्यक्थामै, अचिंथ्यमै, निरवयमै, निर्विकारमै, ज्ञानाश्रयमै, ईश्वरनुकु नियाम्यमै, धार्यमै, सेशमायिरुकुम”।

पूविन मिसै यावैयुम अल्लन आरणङ्गिन केलवन: श्री शठकोप स्वामीजी (नम्माल्वार) के तिरुवैमोझि ४.५.२ “मलर मेल उरैवाल” के अनुसार, इसका मतलब हैं की वह जो किसी का स्वामी हैं जो सुन्दर कमल पुष्प पर विराजमान हैं। आणंगु परिया पिराट्टि को संबोधीत करता हैं जिसमे पूरी तरह भगवान के गुण हैं, जिसमें भगवान का सबसे ज्यादा सुन्दरता भी गुण हैं। “केल्वन” पति (स्वामी) को संभोधीत करता हैं और इस प्रसङ्ग में भगवान श्रीमन्नारायण हैं।

अमलन: वह जो बुरें स्वभाव के बिल्कुल विपरित हैं।

अरिवे वङिवाम नारनण: भगवान श्रीमन्नारायण जिनमें “ज्ञानी ठहराना” और “आनन्द ठहराना” यह गुण हैं।

ताट्के अडिमै: जीवात्मा केवल भगवान श्रीमन्नारायण का ही दास हैं और किसी का नहीं।

“नारायण” नाम का मतलब यह हैं कि वह जिसमे खुद को जैसे उसके शरीर छोड़कर सब कुछ हैं और एक वही जगह हैं जहाँ सब अंग रह सकते हैं। ऐसे ही “नारायण” खुद को छोड़कर सब के लिए जीवन (उयिर) हैं। यह जो अलग पदार्थ हैं वह उनके शरीर के अंग हैं जिसे वह अपने पास अपने शरीर में रखते हैं।

संदेश:- जीवात्मा को पूर्ण ज्ञानी, पूरा आनंदित, जो नाहीं देवता हैं न मनुष्य, नाहीं जानवर, न पेड़, पौदे और न जड़ी बूटी ऐसे वर्णित किया गया हैं। जीवात्मा भगवान श्रीमन्नारायण का दास हैं, सुन्दर पेरिया पीरट्टि (लक्ष्मी अम्माजी) के स्वामी हैं जो सुन्दर कमल पुष्प पर विराजमान हैं ऐसे वर्णन किया गया हैं। ऐसे भगवान श्रीमन्नारायण सभी बुरे स्वभाव से बिल्कुल विरुद्ध हैं और इस पूरे संसार के सभी जीव और निर्जीव प्राणियों के जीवन दाता हैं।

अडियेन् केशव रामानुज दासन्

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ज्ञान सारं – पासुर (श्लोक) १५

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श्री:
श्रीमते शठकोपाय नम:
श्रीमते रामानुजाय नम:
श्रीमत् वरवरमुनये नम:

ज्ञान सारं

ज्ञान सारं – पासुर (श्लोक) १४                                                                          ज्ञान सारं – पासुर (श्लोक) १६

पाशूर १५

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कुडियुम् कुलमुम् एल्लाम् कोकनगैक् केळ्वन्
अडियार्क्कु अवन् अडिये आगुम्पडियिन्
मेल् नीर् केळुवुमारुगळिन् पेरुम् निरमुम्
एल्लाम् आर् कलियैच् सेर्न्दिड माय्न्दट्रु

अर्थ

कुडियुम् कुलमुम् एल्लाम्  – जन्म स्थान, लिंग, गोत्रम् और जन्म के समय के अन्य सभी पहचान व्यर्थ बताये गये हैं | कोकनगैक् केळ्वन् अडियार्क्कु अवन् अडिये आगुम् – श्रियःपति के चरण पहुँचने पर और उनके दास बनकर और बिना कोई अंतर के उन्ही की तरह स्वरूप मिलनेकेबाद | पडियिन् मेल् नीर् केळुवुमारुगळिन् – इन दासों की अवस्था वैसे ही है जैसे इस धरती पर पानी से भरी बहती नदियों की | पेरुम् निरमुम् एल्लाम् – जो अलग अलग नामों से और रंगों से जैसे लाल,सफेद,काली आदि और भी कई व्यत्यासों से पहचानी जाती हैं |आर् कलियैच् सेर्न्दिड माय्न्दट्रु – लिकिन जब वे समुद्र से मिलती है तब सभी व्यत्यासों का नष्ट हो जाता है और वे एक हो जाती हैं |

प्रस्तावना

पिछले पाशूर मै अरुळाळ पेरुमळ् एम्बेरुमानार् स्वामीजी “एव्वुयिर्क्कुम् इन्दिरै कोन् तन्नडिये तानुम् सरण्” कहते हैं | इस पाशूर मै स्वामीजी कहते हैं की श्रीमन्नारायण भगवान के चरण कमल ही हम सभी के शरण्य हैं | श्रीमन्नारायण भगवान के दासों को “तिरुमगळ् मणाळनुक्कु अडियार्”(उन भगवान[पेरुमाळ्] के दास जो श्री महालक्ष्मीजी[पिराट्टि] के पती है)| यह सब दास(भक्त) अपने सच्चे स्वरूप को जानने के पहले कई लौकिक चीज़ो से पहचाने जाते थे जैसे उनके नाम के साथ उनका जन्म स्थान, उनके नाम के साथ उनका वर्ण और कई ऐसे दूसरे लौकिक संबंध | लेकिन उनको जब(आचार्य और दिव्य दंपत्ति श्री लक्ष्मीनारायण भगवान की निर्हेतुक कृपा से )अपने सच्चे स्वरूप का ज्ञान हो जाता है तब वे उनके लौकिक संबंधो जैसे जन्म स्थान,वर्ण आदि से नहीं पहचाने जाते | उनकी एक मात्र पहचान श्रीमन्नारायण भगवान के चरण कमाल ही हो जाती है और दूसरा कुछ नहीं |

स्पष्टीकरण

कुडियुम् कुलमुम् एल्लाम् – इस वाक्य का अर्थ जानने के लिए निम्नलिखित तीन अंशों का अर्थ समझना होगा | वे इस प्रकार हैं :

“सोण्णाट्टु पून्जाट्रुर् पार्पान गौणियन् विण्णतायन्” – पुरनानोरु

वेग्ङण् मा कळिरुन्दि वेण्णियेट्र
विरल् मन्नर् तिरल् अळिय वेम्मा उय्त्त
शेग्ङणान् को च्चोळन्  – पेरीय तिरुमोळि (६.६.४)

इरुक्किलङ्गु तिरुमोळि वाय् एण् तोळ् ईशर्कु
एळिल् माडम् एळुपदु शेय्दुलगम् आण्ड तिरुक्कुलत्तु वळ च्चोळन्  – पेरीय तिरुमोळि (६.६.८)

इन तीन उदाहरणों मै हम देख सकते है की लेखक ने अपने जन्म स्थान(कुडि),वर्ण(कुलम्),गोत्र और कई जन्म की पहचानों(एल्लाम्) का उल्लेख करते हैं |

कोकनगैक् केळ्वन् अडियार्क्कु – “कोकनगम्” का मतलब है कमल,इसतरह “कोकनगै” उनको संबोधित करता है जो कमल पर बिराजमान हो, मतलब श्री महालक्ष्मीजी(अम्माजी या पिराट्टि)| “केळ्वन्” का मतलब है नायक और इसतरह “कोकनगैक् केळ्वन्” वाक्य “श्रीमन्नारायण भगवान” को संबोधित करता है जो श्री अम्माजी के नायक हैं | “अडियार्” शब्द उन भगवद् दासों को संबोधित करता है जो श्री अम्माजी के नायक श्रीमन्नारायण भगवान के कमल चरणों के नीचे रहते हैं | श्रीमन्नारायण भगवान के कमल चरणों के नीचे रहना ही इनकी पहचान हैं |

अवन् अडिये आगुम् – इसका मतलब है यहाँ उपर बताए गये भक्त जो अपने जन्म,वर्ण,गोत्र आदि चिन्हों से पहचाने जाते है उनका अब इन चिन्हों से कोई सम्बन्ध न रहेगा जब वे एक बार श्रीमन्नारयण भगवान के दास बन जाएँगे | उनके सारे पहले के पहचान चिन्ह नष्ट हो जाते हैं और उस पल से उनकी पहचान श्रीमन्नारयण भगवान के दास के रूप मैं होती हैं | श्रीमन्नारायण भगवान के साथ उनका संबंध ही उनकी पहचान बन जाती हैं | इसलिए उनको “तिरुमाल अडियार्” कहा गया हैं | अरुळाळ पेरुमाळ् एम्बेरुमानार् स्वामीजी उदाहण के साथ पाशूर के दूसरे आधे हिस्से मे बताया हैं |

पडियिन् मेल् – धरती के उपर |

नीर् केळुवुमारुगळिन् पेरुम् निरमुम् एल्लाम् – नदियों में बहुत पानी भरा होता हैं | और नदियों के अलग अलग नाम होते है जैसे गंगा,यमुना आदि और अलग अलग रंगों मे आते है जैसे लाल,कला,सफेद आदि |

माय्न्दट्रु – उसी तरह नष्ट होते है (जैसे नदियाँ समुद्र से मिलने पर अपनी सारी पहचान खो देती हैं)|

निष्कर्ष : श्रीमन्नरायण भगवान के दास हो जाने के बाद उनकी सारी पहले की पहचान नष्ट हो जाती हैं | यह उसी तरह विनाश होते हैं जैसे नदियों की पहचान का विनाश होता है, समुद्र से मिलने पर | नदियाँ अपना नाम,रंग आदि खो देती हैं | इसलिए हमें लौकिक और अनित्य कारक(चिन्ह) जैसे वर्ण आदि को महत्व नहीं देना चाहिए और केवल नित्य वास्तु जिसे हम “अडियराम् तन्मै” कहते है उसी को महत्व देना चाहिए | इसका मतलब और कुछ नहीं बल्कि यहीं हैं की हमेशा सर्वत्र श्री अम्माजी(पिराट्टि) और श्री नारायण भगवान(पेरुमळ्) के दास बनकर रहे | श्री अम्माजी और श्री नारयण भगवान के दास बनने का यह गुण सिर्फ़ एक या दो चुने हुए जीवात्माओं के लिए नही है बल्कि हर एक के लिए हैं | इस तरह यह अनित्य कारणों से उत्पन्न सारें मतभेदों को दूर करेगा और सभी जीवात्माओं को “तिरुमाल अडियार्” नामक एक ही छतरी के नीचे एकजुट ले आएँगा |

अडियेन् केशव रामानुज दासन्

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