ज्ञान सारं – पासुर (श्लोक) ६

श्री:
श्रीमते शठकोपाय नम:
श्रीमते रामानुजाय नम:
श्रीमत् वरवरमुनये नम:

 ज्ञान सारं

ज्ञान सारं – पासुर (श्लोक) ५                                                                   ज्ञान सारं – पासुर (श्लोक) ७

पासुर ६

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पुण्डरीगै केळ्वन् अडियार् अपूमिसैयोन्
अण्डम् ओरु पोरुळा आदरियार् – मण्डि
मलन्ग ओरु मीन् पुरण्ड मातिरताल् आर्तु
कलन्गिडुओ मुनीर् कडल्

शब्दार्थ :

अडियार् = भक्त, पुण्डरीगै = कमलपुष्प में अवतार लेने वाली श्रीलक्ष्मीअम्माजी, केळ्वन्  = श्रिय:पति भगवान, आदरियार् = की तरफ ध्यान नहीं देंगे, अण्डम् = ब्रह्माण्ड, अपूमिसैयोन् = श्री विष्णु भगवान के नाभी कमल में जन्म लेनेवाले ब्रह्माजी, ओरु पोरुळा = जैसे कीमती, ओरु मीन् = मछली जैसे, मण्डि = पूर्ण शक्ति के साथ, पुरण्ड मातिरताल् = दायें बाएँ हिलाने-डुलानेसे (नही), मलन्ग = बदलाव करेगा, आर्तु = विनाश करेगा, कलन्गिडुओ = अथवा सर्प मुनीर् कडल् = तीन प्रकार के जल से युक्त सागर (अ) आट्रू नीर – नदी का जल (ब) उट्रू नीर – भूमिजल और (क) वेट्रू नीर – वर्षा का जल

प्रस्तावना

भगवत्प्राप्ति के अनेक मार्ग हैं। इनमें कर्म योग, भक्ति योग और ज्ञान योग हैं। यह मार्ग हमारे उपयोग के नहीं और दुष्कर भी हैं। मुख्यत: उनका जीवात्मा के मूल स्वरूप (भगवान तो दास का स्वरूप) से विरोधाभास है। इन उपयोंमें अनेक कष्ट होने के कारण, उनका जड़ मूल से त्याग करना अत्यंत आवश्यक है। यह उपाय कष्टमय होने के कारण और परिपूर्ण नहीं होने के कारण, इनका अवलंब करके जीव कभी भी परमात्मा की प्राप्ति नहीं कर सकता। इसी कारण भगवान के श्री चरणारविंदोंमें शरणागति करना एकमेव उपाय ही नहीं बल्कि अंतिम लक्ष्य भी है। परंतु यह जीवात्मा जो अनंत युगोंसे ५ इंद्रियोंके अधीन रहता आया है और अभी शरणागति किया है, क्या वो सांसारिक सुख भोगोंसे (जिनका हमारे शास्त्रोंने निषेध किया है) आकर्षित होगा? क्या वो लौकिक धन संपत्ति उसे लुभाएगी नहीं? अगर किसिकों यह प्रश्न है तो उसका उत्तर इस पाशूरमें है।  इसमे मुख्य संदेश यही है की जिन्होंने भगवान का कैंकर्य किया है और जिनको इस कैंकर्य का महत्त्व पता है, वो ईतर सभी लौकिक धन संपत्ति का त्याग करेंगे, भलेही वो विश्व की सबसे बड़ी संपत्ति ब्रह्मलोक ही क्यों ना हो। उनके लिए ब्रह्मलोक भी संपूर्णत: गौण होगा यही श्री देवराजमुनी स्वामीजी यहाँ बता रहे हैं। उदाहरण के लिए यहाँ पर श्री रामायण की सरभंग मुनी की कथा का दृष्टांत दिया गया है।

भगवान श्री राम दण्डकारण्य में श्री सरभंग मुनी के आश्रम में पधारें। उस समय श्री सरभंग मुनी से बात करके इन्द्र निकले और श्री राम भगवान ने श्री लक्ष्मण जी के साथ आश्रम में प्रवेश कर रहे थे। भगवान श्री राम पधारने से पूर्व ही श्री शरभंग मुनी को उनके दिव्य दृष्टि से भगवान के आगमन का पता चल गया था। जब मुनी ने भगवान को प्रत्यक्ष अपने सामने देखा तो अति प्रसन्नता पूर्वक निवेदन किया, “इन्दिरन् अरुळिनान् इरुदि सेइ पगल वन्दनन्, मरुवुदि मलर् अयन् उलगम् तन्दनन्”, एन्, उरवोय्! अन्दमिल् उयर्पदम् अडैदलै मुयल्वेन्”। अर्थात, ओ सुंदर नेत्र वाले श्री रामजी, ब्रह्माजी ने ब्रह्मलोक का सुख उपभोगने के लिए वहाँ बुलानेके लिए इन्द्र को भेजा था। मैंने कहा मैं नहीं आऊंगा। मुनी आगे कहते हैं, “नी इवन् वरुद” एनुम् निनैवु उडैयॅ, इनि ओरु विनै इलै, विरलोय्”. अर्थात “मैं बहोत समय से इस आश्रम में श्री राम भगवान के आगमन की प्रतीक्षा कर रहा हूँ। मैं श्री भगवान के चरणारविंद रूपी इस यह संपत्ति के लिए तरसता हूँ। ओ श्री राम, ऐसी संपत्ति की चाहना करनेवाले मुझे संसार की कोई भी संपत्ति, भले ही वो चक्रवर्ती राजा की संपत्ति हो अथवा ब्रह्मलोक हो, मुझे आपके चरणरविंद रूपी मेरे लक्ष्य से विचलित करेगी? मैंने इन्द्र से कहा, नहीं, मुझे ऐसे तथाकथिक सुख संपत्ति भोग नहीं चाहिए। मुझे तो सभी संपत्तियोंसे भी श्रेष्ठ संपत्ति चाहिए, जो और कोई नहीं बल्कि भगवान श्री राम का दासत्त्व है।” इस प्रकार, शरणागत के लिए कोई भी भगवान को प्राप्त होने की प्रबल इच्छा को नहीं बदल सकता।यही इस पाशूर का भाव है।

स्पष्टीकरण

श्री शठकोप स्वामीजी कहते हैं, “पन्डै नाळले निन्ड्रिरुवरुळुम् पन्कयताळ् तिरुवरुळुम् कोन्डु” (सहस्रगिती ९,२,१). जीवात्मा ने श्री अम्माजी और श्री भगवान की निर्हेतुक कृपा होने से पूर्वमें अनेक पाप संचित किए हैं. कृपा होनेपर, उसके सभी पाप अग्नि में कपास जैसे जल गए हैं। श्री शठकोप स्वामीजी गाते हैं, “याने एन्नै अरियगिलादे, याने एन्देनदे एन्ड्रिरुन्दॅ, याने नी एन् उडैमयुम् नीये”. अर्थात, “मैं” (अहंकार) और “मेरा” (ममकार) ही जीव के लिए दिव्य दंपति की कृपा होने से पूर्व सबकुछ था। परंतु कृपा होने पर जीव को सच्चा स्वरूप समझ आता है और जच जाता है की वो खुद और उसका तथाकथित जो कुछ भी है, वो यथार्थ में उसका नहीं है अपितु, दिव्य दंपति का ही है। इस प्रकार, शरणागत कैंकर्य की संपत्ति को ही सच्ची संपत्ति समझ कर उसकी संसार के और किसी भी वस्तु से ज्यादा कीमत करेंगे और दासत्त्व के अभिमान सहित एवं अति आनंद से नित्य के लिए कैंकर्य करेगा। इसआनंद से कभी भी कोई भी कीमत पर बाहर नहीं आएंगे।

अपूमिसैयोन् अण्डम् ओरु पोरुळा आदरियार्: हमे यह समझना जरूरी है की किस प्रकार की संपत्तिका यह शरणागत लोग तुच्छ समझकर त्याग कर रहे हैं। यह वह स्थान है जिसे शास्त्रोंमें सर्वोच्च स्थान बताया गया है जहां चतुर्मुख बब्रह्माजी बिराजमान हैं, और जिसे ब्रह्मलोक नाम से जाना जाता है। ब्रह्माजी का जन्म श्री विष्णु भगवान के नाभिकमल में हुआ। यह संपत्ति में सम्पूर्ण १४ लोक सहित ब्रह्माण्ड है। यह विशाल संपत्ति ब्रह्माजी के लिए सुख का स्रोत है। अब अगर कोई ब्रह्माजी के यह विशाल संपत्ति लेकर किसी शरणागत को देता है, जैसे शरभंग मुनी को दी थी, वो इस तुच्छ समझकर अस्वीकार कर देगा। कारण यह है की उसे जो शरणागति करके जो मिलनेवाला है असिमीत है और ब्रह्मलोक के यह सब सुख सिमीत हैं। परंतु श्री भगवान का, श्री अम्माजी का, उनके आश्रितोंका कैंकर्य की कोई गिनती कर सकता है? और तो और, ब्रह्मलोक आदि स्थान काल के प्रभाव में हैं, अपितु कैंकर्य पर नहीं। कैंकर्य को कोई समय सीमा नहीं। श्री वैकुंठ धाम पर काल का प्रभाव नहीं।

सामन्यत: आज लोग समझते हैं को जीवात्मा और शरीर में कोई अंतर नहीं है। उनके लिए शरीर ही सबकुछ है और वो जो कुछ करते हैं उनको जो ठीक लगता है उस आधार पर करते हैं। अगर उनको शरीर और जीवात्मा का अंतर नहीं समझमें आया तो वे कभी भी “में भगवान का दास हूँ” ऐसा सोचने के स्तर तक ऊपर उठ नहीं सकते। वो केवल “मैं” और “मेरा” इन दो पहलू से विचार करते हैं और सोचते हैं की वो स्वतंत्र हैं और अपनी गतिविधियोंपर उनका अपना नियंत्रण है। ऐसे मूर्ख लोगोंको ब्रह्मलोक जैसी संपत्ति अवश्य ही लुभाएगी और वो उसे ही अपना अंतिम लक्ष्य मान लेंगे क्योंकि उन्हे भगवान का दास बनकर रहनेका जो उपहार है उसकी कीमत पता नहीं। शरणागत, जीन्हे जीवात्मा का सच्चा स्वरूप पता नहीं है, वे इस संपत्ति को अस्वीकार तो करेंगे ही और इसका तिरस्कार भी करेंगे। वो कभी भी इस संपत्ति से लुभाए नहीं जा सकतें। यह समझाने के लिए श्री देवराजमुनी स्वामीजी एक मछली की उपमा देते हैं। एक मछली विशाल महासागर में रहती है और वो कितनी भी हिले डुले तो भी उस महासागर को हिला नहीं सकती अथवा बदल नहीं सकती। कितने भी प्रयत्न से वो महासागर को बदल नहीं सकती। मछली के यह प्रयत्न ब्रह्मलोक के सुख के समान हैं और महासागर भगवत-अम्माजी-भागवतोंके कैंकर्य के समान है।

Source: http://divyaprabandham.koyil.org/index.php/2015/02/gyana-saram-6-pundarigai-kelvan/

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