ज्ञान सारं – तनियन (ध्यान श्लोक)

श्री:
श्रीमते शठकोपाय नम:
श्रीमते रामानुजाय नम:
श्रीमत् वरवरमुनये नम:

ज्ञान सारं                                                                                                                   प्रस्तावना

(तनियन)
(ध्यान श्लोक)
कार्तिकेभरणी जातं यतीन्द्राश्रयमाश्रये।
ज्ञानप्रमेयसारभि: वक्तारं वरदं मुनिम्॥

विश्लेषण: जिनका अवतार कार्तिक मासमें भरणी नक्षत्र में हुआ है, जो श्री रामानुज स्वामीजी जो यतीन्द्र हैं उनके शरणागत हैं, जिन्होने अपने ज्ञानसारम् प्रमेयसारम्ग्रन्थों में आचार्य महिमा का वर्णन किया हैऐसेश्री देवराजमुनी स्वामीजी की मैं शरण ग्रहण करता हूँ।

रामानुज सच्छिष्यं वेद शास्त्रार्थ संपतम्।
चतुर्थाश्रम संपन्नं देवराजमुनिं भजे॥

श्री रामानुज स्वामीजी के सत्-शिष्य, जो वेदशास्त्रार्थ में पारंगत हैं, जो सन्यासाश्रम से सम्पन्न हैं ऐसे (रामानुज सच्छिष्यं): अपनेप्राथमिक नाम “यज्ञमूर्ति” से उन्होने श्री रामानुज स्वामीजी के साथ १८ दिनोंतक वेदान्त के विषयपर तर्क-वितर्क केआधारपर वाद विवाद किया। इससेश्री रामानुज स्वामीजी संप्रदाय के रक्षा के विषयमें बहोत चिंतित होगाए। श्री वरदराज भगवान श्री रामानुज स्वामीजी के स्वप्नमें दर्शन देकर कहे की “हेरामानुज, कृपया निराश न होइए। मैं तुम्हे मैंने बनाया हुआ एक प्रतिभावान शिष्य दे रहा हूँ। आप उनपर जरूर विजय प्राप्त करेंगे।”

(वेद शास्त्रार्थ संपतं):
उन्होने१८ दिनोंतक श्री रामानुज स्वामीजी सेशास्त्रार्थ किया इससेहम उनके शास्त्रों के गहरे ज्ञान का अनुमान लगा सकते हैं। उन्होने समस्त शास्त्रोंका सार अपने ज्ञानसारम्प्रमेयसारम् के माध्यम से हमे तमिल वेन्पा शैली के सुंदर पाशूरों द्वारा प्रदान किया है।

(देवराज मुनी)
श्री वरदराज भगवान (श्री देवराज भगवान/श्री अरूलाल भगवान) केकृपा केकारण उनका श्री रामानुज स्वामीजी का शिष्य बनना यह उनकी महानता है। उनकी महानता का कारण और भी है की उनकी ज्ञान, भक्ति, वैराग्य श्री रामानुज स्वामीजी केसमान थी। हम समझ सकतेहैं की इसी कारण वे अरूलालमुनी इस श्रीनाम सेभी जाने जाते हैं।

सुरुळार्करुङ्गकुलल तोगैयर्वेल्विलियिल्तुवळुम्

मरुळाम्विनैकेडुम्मार्क्कम्पेर्रेन्मरैनान्गुम् – सोन्न
पोरुळ्ग्यान सारत्तैप्पुन्दियिल्तन्दवन्पोङ्गोळिसेर्
अरुळाळ ममुनि-अम्पोर्कलल्गल्अडैन्द पिन्ने

भावार्थ: श्री अरूलालमुनी केदिव्य श्री चरणोंका आश्रित होने के बाद दास को अनादि काल से संचित कर्मोंका नाश करने का मार्ग मिल गया है। श्री स्वामीजी नेअपनेज्ञानसारम प्रमेयसारम ग्रंथ से चारो वेदोंकेगूढ़ार्थ का और तिरुमंत्र केयथार्थ भाव का हमेपान कराया है। श्री स्वामीजी ज्ञान के तनियन का अर्थ है: हमारेसंचित कर्मोंकेकारण हमारेसत्य की स्पष्टता घटती है। यह घटनेकेकारण हमारा स्त्रियोंकेओर आकर्षण बढ़ता है। इसी कारण हमारा मन उनकेघुंगरालेकालेकेश और सुरेख नयनोंपर मोहित हो जाता है। मगर श्री देवराजमुनी केदिव्य श्री चरणोंमेंसमर्पण करनेकेबाद मुझेसमझमेंआया की में कैसे इस काम और काम से संबन्धित अपचारों से दूर रह सकता हूँ। मेरे आचार्य श्री देवराजमुनी को शरण होने के बाद, और यह ज्ञानसारम प्रमेयसारम का अध्ययन करने के बाद मेरे मन को यथार्थ बात समझ में आई है। इसी कारण मुझे स्त्रियों के सुंदर केश तथा भाले के नौक के समान सुंदर नेत्र को देखने का कार्य करानेवाए मेरे बुरे कर्मोंका विनाश करनेका मार्ग समझ में आगया है।

स्त्रियोकी केतरफ आकर्षण केसाथ हमारेइतर अपचार जैसेक्रोध, लोभ, अज्ञान, मत्सर, द्वेष, मिथ्या अभिमान इत्यादी भी नष्ट हो जाते हैं। इसीका अर्थ यह भी है की जो अपचार मनुष्य के संस्कृति का नाश करते है, वो आचार्य कृपा कटाक्ष से दूर हो सकते हैं। आचार्य की महानता पे इस तनियन से प्रकाश डाला गया है।

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