ज्ञान सारं – पासुर (श्लोक) १

श्री:
श्रीमते शठकोपाय नम:
श्रीमते रामानुजाय नम:
श्रीमत् वरवरमुनये नम:

ज्ञान सारं

प्रस्तावना                                                                                                                    ज्ञान सारं – पासुर (श्लोक) २

पाशूर १. प्रस्तावना 

एक जीवात्मा को परम आनंद कहीं मिलता है तो वो है मोक्ष धाम । मोक्ष मिलने के लिए हमे अपने आचार्य से मूल मंत्र, द्वय महामंत्र, और चरमश्लोक के रहस्यमय गहरे अर्थोंकों जानना जरूरी है । यह तीन मंत्रों कों रहस्य कहा जाता है ।हमारे शास्त्र यह आज्ञा करते हैं की यह रहस्य केवल उनको बताया जाय जो इनको जाननेकी प्रब इच्छा रखते हैं । और लोगों के साथ नहीं । चुंकी वो अत्यंत सावधानी के साथ सुरकक्षित रक्खे गए हैं, उन्हे रहस्य कहा जाता है । तीनों कों साथमें रहस्यत्रय कहा जाता है, और श्रीवैष्णव संप्रदाय के अनुसार वो वेदान्तों के सबसे महत्त्वपूर्ण अंग माने जाते हैं । वो भगवान का यथार्थ स्वरूप जैसे के तैसे समझाते हैं । वें परमात्मा भगवान तक पहुँचने के मार्ग पर और वहाँ पहुंचने पर जीवात्मा को होने वाले परम आनंद पर प्रकाश डालते हैं । कभी नहीं रुकने वाले जन्म मरण चक्र से और उससे संबन्धित जीवन के चढ़ाव उतार के कारण अनंत काल से पीड़ित जीवों के लिए ही यह तीनों रहस्य श्री भगवान ने ही निवेदन किए हुये हैं । रहस्यत्रय इस प्रकार प्रतिपादित किया गया था । श्रीमान्नारायण भगवान ने नारायण (आचार्य) का अवतार लिया और प्रथम रहस्य जो मूलमंत्र हैं उसे नर (शिष्य) को बद्रिकाश्रम में विस्तार रूप से समझाया । भगवान ने द्वय महामंत्र का अपने दिव्य सहचारिणी श्री महालक्ष्मीजी को श्रीवैकुंठ में उपदेश दिया । अंतत: भगवान ने श्रीकृष्ण अवतार लेकर कुरुक्षेत्र के रणभूमी में महाभारत के महायुद्ध में अपने परम मित्र अर्जुन का सारथ्य किया । इसी समय उन्होने भगवद गीता के अंतिम अध्याय में चरम श्लोक को प्रतिपादित किया । येही तीन रहस्य श्रीवैष्णव परंपरा से हमारे तक चले आए हैं । श्री वैष्णव संप्रदाय के पूर्वाचार्य, जिनको परमसत्य का दर्शन हो चुका है तथा जिनहोने भगवान तक पहुँचनेका अचूक और सुलभ मार्ग दर्शाया है, ने इन तीन रहस्योंकों अत्यंत सावधानी के साथ संभाल केरक्खा है । (यह तीन रहस्य कोई लौकिक धन की तरह नहीं हैं, जो किसी तिजोरी में बिना किसी उपयोग किए रक्खा जाता है । यह उतनाही उपयोगी है जितना मूल्यवान।) हमारे पूर्वाचार्यों ने इस धन का नित्य अपने जीवन में उपयोग किया । इन रहस्यों की ये ही महानता है ।

तीनों रहस्यों में प्रथम है “मूलमन्त्र”। यह प्रथम रहस्य कहा जाता है जिसमे ३ विभाग हैं । वो हैं  “ॐ”, “नम:”, और “नारायणाय”। प्रथम विभाग “ॐ” यह “प्रणव” नाम से जाना जाता है । द्वितीय भाग “नम:” और तृतीय भाग “नारायणाय” ये प्रणव का विस्तार हैं । (वो जीवात्मा और परमात्मा के गुणोंकों बताते हैं, परमात्मा और जीवात्मा के शेषी-शेष संबंध को समझाते हैं। यह संबंध अनादि काल से है जिसका कोई प्रारम्भ या अंत नहीं । जीवात्मा का और कोई शेषी नहीं है।)

द्वय महामंत्र, जो “मंत्र रत्न” के रूप में माना जाता है, उसमे २ पंक्तियाँ हैं । प्रथम पंक्ति मूलमंत्र के “नम:” का गूढ़ार्थ बताती है तो द्वितीय पंक्ति मूलमंत्र के “नारायणाय” का विश्लेषण करती है । इसमे २ पंक्तियाँ होने के कारण यह द्वय नाम से जाना जाता है । द्वय मंत्र की प्रथम पंक्तिमें भगवान के दिव्य श्री चरणारविन्दोंमें शरण होना बताया है । जब कोई जीव भगवान के चरणकमलोंको पकड़ लेता है तो उसे इतर सभी उपायोंका त्याग करना चाहिए । यह इस तरह करना चाहिए की उस जीव में पूर्व के इतर उपायोंका लवलेश भी नहीं रहना चाहिए । और तो और, उसको तो यह भी विचार का त्याग करना चाहिए की “मैंने भगवान के चरण पकड़े हैं और यह मेरा कार्य मेरा उद्धारक होगा”। (इसका कारण यह है की अगर जीव नेइस तरह सोचा तो इसका अर्थ यह हुआ की भगवान की छोडकर इतर कोई चीज, जैसे स्वप्रयत्न, मोक्ष को प्राप्त करा सकता है”। परंतु वो भी कभी मोक्ष नहीं दिलवा सकते इसलिए इस विचार से भी हमेपूर्णत: दूर रहना चाहिए) । इसका अर्थ यह हुआ की भगवान केचरण कमल ही शरण जाने योग्य हैं, और कुछ नहीं । और यह मूल सिद्धान्त हमारेमन में दृढ़तापूर्वक ठस जाना चाहिए । भगवान केव्यतिरिक्त स्वप्रयत्न सहित इतर सभी उपायन्तारोंका त्याग करके भगवान के शरण होने के बाद उसका फल क्या होना चाहिए इसका विवरण द्वय महामंत्र की द्वितीय पंक्तिमें किया गया है । श्री अम्माजी सहित श्री भगवान की और उनके सभी शरणागतों की नित्य सेवा की सुवर्णसंधि मिलना येही फल है । इसका आदर्श उदाहरण है श्री रामायण में श्री लक्ष्मण जी को श्री रामचन्द्र भगवान और श्रीसीता अम्माजी की सेवा प्राप्त हुयी थी । परंतु, ऐसा सुनहरा अवसर प्राप्त होने के लिए हमारे पूर्व कर्मों के कारण जो भी सभी पाप संचित हुये हैं उनका विनाश होना आवश्यक है । द्वय मंत्र की विस्तार से व्याख्या तृतीय रहस्य चरमश्लोक में की गयी है । इस प्रकार चरमश्लोक द्वय मंत्र पर आधारित है । द्वय मंत्र मूलमंत्र और चरमश्लोक के मध्यमें विराजमान है ।द्वय मंत्रमें मूलमंत्र के “नम:” और “नारायणाय” का विशेष रूप से विस्तार किया गया है । यह चरमश्लोक के भाव के लिये एक आधार भी बन जाता है । मूलमंत्र और चरमश्लोक में “श्री” का उल्लेख अंतर्निहित है। केवल द्वय में “श्री” का उल्लेख सुस्पष्ट रूप सेकिया गया है । इस प्रकार, इन तीनों रहस्योंमें हमारेपूर्वाचार्योंनेद्वय को अधिकतम महत्त्वपूर्ण बताया है। जैसा की पहले कहा गया है, जीव का सभी उपायोंका त्याग करके श्री भगवान के चरण कमलों को ही उपाय मानना ऐसे द्वय के प्रथम पंक्ति में वर्णित है । इसीको शरणागति कहते हैं । शरणागति (प्रपत्ति) २ प्रकार की होती है।प्रथम प्रकार है जिसमेत्वरा में जीव कहता है “मुझेभगवान का विरह एक क्षण केलिए भी सहा नहीं जाता । मुझेभगवान से मिलने की त्वरा हो रही है और में अभी के अभी किसी विलंब के बिना उनसे मिलना चाहता हूँ । “दूसरेप्रकार में जीव स्वरूपानुरूप अनुष्ठान करता हुआ भगवान का नित्य कैंकर्य करता रहता है और कहता है, “हे ! मेरे भगवान, जब आप उचित समझें, मुझेमोक्ष प्रदान कर देना । “इन दोनों प्रकारों मे से प्रथम प्रकार की प्रपत्ति श्रेष्ठ है । (प्रथम प्रकार की प्रपत्ति को आर्त प्रपत्ति कहते हैं और द्वितीय प्रकार की प्रपत्ति को “दृप्त प्रपत्ति” कहते हैं) । ज्ञानसारम्केप्रथम पाशूरमें “आर्त प्रपत्ति” का वर्णन है ।

पाशूर १

pattabhishekam
ऊन उडल् सिरै नीतु ओण् कमलै केळ्वनडि
तेन नुगरुम् आसै मिगु सिन्दैयराय्
ताने लुत्ताल् विल्लुम् कनि पोल् पट्रट्रु वीलुम्
विलुकाडे तान् अरुळुम् वीडु

अर्थ 
आसै मिगु सिन्दैयराय् = जब लोग अपने हृदय में गहरी इच्छा धारण करते हुये , नीतु = से छुटकारा पाने के लिए , उडल = यह शरीर जो, सिरै = कारागृह, ऊन = हाड़मांस का बना, और नुगरुम् = आनंद प्राप्त करना, अडि तेन = चरण कमल रूपी अमृत की मिठास, केळ्वन् = की पत्नी, ओण् = सुंदर, कमलै = श्री अम्माजी जो सुंदर कमलपुष्प पर बिराजमान हैं, पट्रट्रु = किसी इतर इच्छा से रहित, वीलुम् = शरणागति करना, कनि पोल् = जैसे एक फल पलुत्ताल् = जो अगर पकता है, ताने विल्लुम् = अपने आप गिर जाएगा, विलुकाडे तान् = वही शरणागति, वीडु अरुळुम् = मोक्ष प्रदान करेगा

स्पष्टीकरण

हमारा यह शरीर के हाड़मांस से बना है। यह त्वचा, नसें, मांस, हड्डियाँ, मलमूत्र, आदि सभी अशुद्ध चीजोंसे बना हुआ है।कहीं छोटी सी मधुमक्खी के पंख के आकार की भी त्वचा फट जाती है तो विविध मक्खियाँ, कीडे, चिटियाँ, कौवे आदि मांस खाने के लिए जम जाते हैं। (नालदियार तुरवरवियल – तूय्तन्मै) । अगर शरीर का भीतरी भाग खुलजाता है तो उसे खाने के लिए आए हुये कौवोंकों हटाना दूरपास्त होजाता है।जिनको यह बात समझ जाती है, उसे अपने शरीर के प्रति ग्लानि निर्माण होजाती है और वो सदैव इस शरीर के भीतर के आत्मा का दर्शन करता है, ना की शरीर का । और तो और, इस जीवात्मा का इस शरीर में वास एक कैदी को जेल में बंदी बनाकर रखनेके रूप माना जाता है । जीवात्मा, अपने आप में, ज्ञानप्रकाश से साथ चमकता है, परंतु इस शरीर के भीतर यह जीवात्मा के ऊपर अज्ञान के मेघ छा जाते हैं। एक चमकिले हीरे की चमक को जैसे एक अपारदर्शी आवरण ढक देता है इस उदाहरण से भी हम उपरोक्त बात समझ सकते हैं। जीवात्मा को इस शरीर के भीतर रहनेकी भगवान की तरफ से सबसे बडा दण्ड है । जो लोग यह शरीर एक कारागृह है यह ना समझते हुये सांसार में आनन्द लेने का प्रयत्न करते हैं, वो मानसिक विकलाङ्ग की तरह हैं।जो सच्चे ज्ञानी हैं केवल वो ही इस कारागृह के जंजीरोंकों तोड़कर इससे मुक्त होने की इच्छा करेगा।सच्चे ज्ञानी को यह ज्ञान है की भगवान की शरणागति ही इस कारागृह से निकलनेका एकमात्र उपाय है, और कोई भी हमे इस से नहीं निकाल सकता । भगवान श्रीक़ृष्ण भागवत गीता मैं कहते हैं की केवल वो ही शरीर रूपी कारागृह से जीव को निकाल सकते हैं।जीवात्मा के कर्म ही इस शरीर में बंदी बननेका कारण हैं।शरणागति से अतिरिक्त और कोई उपाय इन कर्म के बंधनोंकों तोड़ नहीं सकता।श्रीक़ृष्ण भगवान बार बार यह कहते हैं “अगर कोई जीव मेरे चरणोंमें शरण लेता है, तो मैं निश्चित उसे इस कारागृह से मुक्त करता हूँ।

एक सामान्य व्यक्ति की शक्ति इतनी भी नहीं है की वोह एक चिड़िया के घौसले के बंध को खोल सके। तो फिर वो भगवान द्वारा संकल्पित कर्म बंधन को कैसे खोल सकता है ? कोई धनवान व्यक्ति को अगर जेल भेजा जाय तो वो पहले जेल से छूटकर उसके बाद बाहर के दुनिया की विलासिता आनन्द लेना चाहेगा। इसी तरह, आत्मा के लिए प्रथम कर्तव्य यह है कि इस “शरीर” कहे जाने वाले कारागृह से छुटकारा हो। इस कारागृह से बाहर निकलनेका एक मात्र उपाय है शरणागति।श्री लक्ष्मी अम्माजी के पुरुषकार से श्रीमन्नारायण भगवान को पूर्णत: समर्पण करना येही द्वय मंत्र द्वारा दिया गया शरणगति का उचित मार्ग है।अपने आप को पूर्ण रूप से भगवान को समर्पित करना और उनके चरणोंका आश्रय लेना यह उतना मीठा है जितना की शहद।जिनको इस शहद का आस्वाद मिल गया है वो निरंतर भगवान और उनकी मिठास का ही चिंतन करेगा।वह हमेशा उस आनंद का अनुभव करना चाहेगा। एक भूखा बालक जैसे अपने माँ के दूध के लिए तरसता है, वाइसेही एक शरणागत भगवान के चरण कमल का मीठा अमृत प्राप्त करनेके लिए तरसता है।जब वो भगवान सम्पूर्ण शरणागति करता है, उसका अर्थ यह है की वो इतर सभी उपाय, साधनोंका त्याग करता है जिन्हे वो शरणागति करनेके पहले साधन मानता था और संसार की लौकिक चीजोंमें रुचि लेता था। एक बार वो शरणागत होने के लिए तैय्यार हो जाता है तो अपने आप वो सब इतर उपाय और इतर विषय हवा में अदृश्य हो जाते हैं।येही इस पाशूर का सार है।

श्री देवराज मुनी स्वामीजी एक सुंदर उदाहरण देते हैं। जैसे एक पूरी तरह से पका हुआ फल अपनेआप पेड़ से गिरता है और उस वृक्ष के साथ के उसके सभी संबंध टूट जाते हैं, वैसेही जब कोई जीव शरणागति करता है, तो यह निश्चित है की उसके पीछले कोई भी संबंध उसके और भगवान के संबंध में कोई बाधा नहीं डाल सकते। यह सबकुछ जीव के शरणागति करनेके बाद अपने आप हो जाता है।कोई भी जीव जब शरणागति करता है और भगवान के श्री चरण कमलोंके मधुर अमृत का अनुभव और आनंद लेने की इच्छा करता है, तो उसी क्षण भगवान अति प्रसन्न होते हैं।भगवान तुरंत उसकी इच्छा पूर्ण करते हैं। दूसरी ओर, जो जीव शरणागति तो करता है परंतु, भगवान की इच्छा अनुसार मोक्ष मिलने के लिए प्रतीक्षा करता है, वो भी मुक्त तो होता है और भगवान के चरण कमलोंका मधुर अमृत का अधिकारी होता है, परंतु यह शरीर के अंत में।

जब जीव समझ लेता है की यह शरीर एक क़ैदख़ाना है और संसार के सभी बंधन तोड़कर भगवान का दिव्य और निरंतर आनंद प्राप्त करनेकी इच्छा करता है, और श्री अम्माजी का पुरुषकार प्राप्त कर भगवान की शरणागति करता है, तब भगवान अति दया पूर्वक उसे मोक्ष दे देंगे।मोक्ष मिलनेकी त्वरा में की हुयी शरणागति उसे त्वरित मोक्ष प्रदान करेगी। येही इस पाशूर का महत्त्व है। मुक्त होना यह एक सांसरिक कष्टोंसे भरे हुये एक बड़े महासागर को पार करके दूसरे किनारे पर भगवान को मिलना है।श्री विष्णुचित्त स्वामीजी कहते हैं, “अक्करै एन्नुम् अनतक् कडलुळ् अलुन्दि इक्करै येरि इळैतिरुन्देन्” – (पेरियालवार तिरुमोली ५-३-७) यहाँ एक दार्शनिक प्रश्न उठता है।अगर भगवान मोक्ष प्रदान कराते हैं तो फिर शरणगति मोक्ष प्रदान करती है यह विरोधाभास नहीं होगा क्या?शरणागति तो केवल एक कृति है और उसमे चेतना नहीं है।अगर एक अचेतन कृतिमें मोक्ष देनेकी क्षमता है तो फिर “केवल भगवान को परिपूर्ण ज्ञान है और मोक्ष देनेकी क्षमता है” इस बात से असंगति नहीं होगी क्या?यह कुछ प्रश्न यहाँ पर उठते हैं।इनका उत्तर इस प्रकार है।

कोई भी जीव जो भी कृति करेगा जैसे शरणागति, भक्ति, तप, इत्यादि, वो उसे केवल मोक्ष के “योग्य” बनाते हैं।उन कृतियोंमें मोक्ष देने की क्षमता नहीं है परंतु उस जीव को मोक्ष के लिए वो तैय्यार करते हैं।हमारे ग्रंथ इसे “अधिकारी विशेषणम्” कहते हैं। केवल भगवान इस शरणागति तो देखकर दया करके मोक्ष प्रदान कर सकते हैं। इसके लिए एक सुंदर उदाहरण है। जमीन सरोवर बनाने के लिए एक बहोत बड़ा गड्डा खोदकर बरसात का पानी रुकने के लिए जगह बनाई जाती है।उद्देश्य यह है की जब बरसात हो तो बरसात का पानी इस में जमा हो।परंतु, केवल एक बड़ा गड्डा बनाया इससे यह आश्वासन नहीं दे सकते की बरसात होगी।और कभी बरसात हो भी जाये और पानी जमा करनेके लिए गड्डा नहीं है तो पानी जमा नहीं होगा और पानी संचय करनेका उद्देश्य की पूर्ति भी नहीं होगी। वैसेही, एक जीव शरणागति करता है तो उसे अपने आप मोक्ष नहीं मी जाएगा। वो केवल उस जीव को भगवान की कृपा और वात्सल्य से मोक्ष मिलने के योग्य बनाएगी।भगवान की दया स्वतंत्र है। यह किसी पर निर्भर नहीं है।भगवान को हमपर उनका प्रेम का वर्षाव करने के लिए किसी कारण की आवश्यकता नहीं।तो, जब भगवान की कृपा बहने को तैय्यार हो तो हम उसे प्राप्त करने के लिए योग्य होने चाहिए।यह अपने आप को तैयार करके भगवान की दया को प्राप्त करने के योग्य बनना ही श्रणगति कहलाती है।यह श्री भूतयोगी स्वामीजी द्वारा स्पष्ट किया गया है। “वनतिदरै एरि आम् वण्णम् इयट्रुम् इदुवल्लाल् मारि यार् पेय्गिर्पार्?मद्रु”।तो हम यह सत्य समझ सकते हैं की केवल भगवान ही मोक्ष दे सकते है और हमारी कृतियाँ केवल हमे पात्र बनाती हैं की जब भगवान अपनी निर्हेतुक और स्वतंत्र कृपा का वर्षाव करने लगते हैं तो हमे उस कृपा के पात्र बनाती हैं।हमे समझना चाहिए की यह मांस का बना शरीर एक वास्तविक कारागृह है और इसलिए इससे त्वरित मुक्त होने की इच्छा हममे बननी चाहिए। वो भगवान के श्री चरणोंका मधुर अमृत का अनुभव करनेके लिए उत्सुक होना चाहिए।यह शरणागति कहलाती है जैसे पहले के सभी संबंध सदा के लिए समाप्त हो जाते हैं और भगवान के श्री चरणोंमें समर्पण करना जैसे एक पका हुआ फल वृक्ष से गिरकर जमीन पर गिरता है। शरीर मोक्ष मिलने के लिए हमारा शत्रु है।इस शत्रु पर विजय प्राप्त करनेके लिए शरणागति नामक शस्त्र हमारे पास है।यह समझने के लिए हम भरतजी और बिभीषणजी की श्री रामचन्द्र भगवान के चरणोंमें की हुयी शरणागति का अवलोकन कर सकते हैं।श्री भरतजी ने अपने माँ के कारण कष्ट सहा, श्री बिभीषणजी ने अपने भ्राता के कारण कष्ट सहा। परंतु शरणागति करने के बाद कोई कष्ट नहीं बचा।

तोलुदु उयर् कैयिनन्, तुवण्ड मेनियन्,
अलुदु अज़्हि कण्णिनन्, “अवलम् ईदु” एन
एलुडीय पडिवम् ओत्तु एइदुवान् ‘भरतनुम्
तोलुदु तोन्ड्रिनान्’ मलर् अडि वन्दु वील्न्दनन्”

     – (कम्ब रामायण, अयोध्या काण्ड, तिरुवड़ी चूट्टू पदलम् – ४९)

यह श्री भरतजी की शरणागति है। यह “अधिकारी विशेषण है” जिनपर भगवान अपनी अथाह कृपा दर्शाते हैं।

अब हम श्री विभीषणजी की स्थिति पर एक नजर डालते हैं:

“करन्गळ् मीच्चुमन्दु सेल्लुम् कदिर् मणि मुडियन्, कल्लुम्
मरन्गळुम् उरुग नोक्कुम् कादलन्, करुणै वळ्ळल्
इरन्गिनन् नोक्कुम् तोलुम्, इरुनिलतु इरैन्जुगिन्ड्रान्
वरन्गळिन् वारि अन्न.ताळ् इणैवन्दु वील्न्दान्”

        – (कम्बा रामायण, युद्ध काण्ड, वीडणन् अडैकल पडलम – १३७)

उपरोक्त दो श्लोक जीवात्मा को शरीर के अंदर होनेवाली पीड़ा दर्शाते हैं और उस जीवात्माकी भगवान के शरणागर होकर इस शरीर से निकलनेकी त्वरा को दर्शाते हैं।इसीलिए ये दोनों शरणागति हैं। भलेही वो श्री भरतजी का अपने माँ के कारण का कष्ट हो, श्री विभीषणजी का अपने भ्राता के कारण का कष्ट हो, अथवा जीवात्मा का शरीर के कारण का कष्ट हो, कष्ट से मुक्ति का केवल एकही मार्ग श्री भगवान के चरणोंकी शरणागति है। श्री भरतजी और श्री विभीषणजी दोनोंकी आर्त प्रपत्ति थी। उसी तरह आत्मा भी इस शरीर से निकलने के लिए शरणागति करता है।

उण्डु कोल् उयिर्?” एन ओडुन्गिनान् उरुक्कण्डनन्, निन्ड्रनन्
कण्णन् कण् एनुम् पुण्डरीकम् पोलि पुनल्
अवन् सडा मण्डलम् निरैन्दु पोइ वलिन्दु सोर्वे

अब हम श्री राम भगवान के भरतजी पर और विभीषण जी पर के उनके अनुकंपा कैसी है वो देखेंगे। प्रथमत:

श्री भरतजी का उदाहरण लेवें –

अयावुयिर्तु, अलुगणीर् अरुवि मार्बिडै
उयर्वुर, तिरुवुळम् उरुग, पुल्लिनान्
नियायम् अत्तनैक्कुम् ओर् निलै आयिनन्
दया मुदल् अरतिनै तली इयदु एन्नवे

       – (कम्बा रामायण, अयोध्या काण्ड तिरुवड़ी चूट्टू पदलम् – ५५)

अब हम श्री विभीषण पर हुयी अनुकंपा को देखते हैं।

गुगनोडुम् ऐवर् आनोम् मुन्बु पिन् कुन्ड्रु सूज़्ह्वान्
मगनोडुम् अरुवर् आनोम्, एम् मुज़्है अन्बु वन्द
अगन् अमर् कादल् अय्य! निन्नोडुम् एज़्हुवर् आनोम्
पुगल् अरुन्गानम् तन्दु पुदल्वराल् पोलिन्दान् – नुन्दै”

          – (कम्बा रामायण, युद्ध काण्ड, विडणन आदेक्काला पदलम् – १४३)

तिरुवडि मुडियिन् सूडि, सेन्गदिर् उचि सेर्न्द
अरुवरै एन्न, निन्ड्र अरकर्-तम् अरसै नोक्कि
इरुवरुम् उवगै कूर्न्दार्, यावरुम् इन्बम् उट्रार्
पोरु अरुम् अमरर् वालित, पूमलै पोलिवदानार्

            – (कम्बा रामायण, युद्ध काण्ड, वीडणन् अडैक्कल पडलम् – १४५)

तिरुवडि मुडियिन् सूडि, सेन्गदिर् उचि सेर्न्द
अरुवरै एन्न, निन्ड्र अरकर्-तम् अरसै नोक्कि
इरुवरुम् उवगै कूर्न्दार्, यावरुम् इन्बम् उट्रार्
पोरु अरुम् अमरर् वालित, पूमलै पोलिवदानार्

             — (कम्बा रामायण, युद्ध काण्ड, वीडणन् अडैक्कल पडलम् – १४५ )

तेडुवार् तेडनिन्ड्र सेवडि, तानुम् तेडि
नाडुवान् अन्ड्रु कण्ड नान्मुगन् कली इय नल्नीर्
आडुवार् पावम् ऐन्दुम् नीन्गि, मेल् अमरर् आवार्
चूडुवार् येइदुम् तम्मै सोल्वार् यावर्? सोल्लीर्”

           — (कम्बा रामायण, युद्ध काण्ड, वीडणन् अडैक्कल पडलम् – १५०)

तो, खूब चिंता शोक डर युक्त जीव शरणागति करता है तो भगवान अपनी कृपा से उसे मोक्ष दे देते हैं। (उपाय का अर्थ साधन होता है और उपेय का अर्थ फल होता है।) हमारे पूर्वाचार्य इस “भगवान की कृपा ही उपाय और भगवान की सेवा ही उपेय” ऐसे कहते हैं।  श्री भरत जी की और श्री विभीषण जी की शरणागति में हम देख सकते हैं की श्री विभीषणजी की शरणागति सफा हुयी और श्री भरतजी की नहीं। (श्री भरतजी की शरणागति सफल क्यों नहीं हुयी यह एक अलग विषय है।मुख्य बात यह है की श्री भरतजी को फल देने के लिए श्री रामजी को वो उचित समय नहीं लगा। उनको १४ वर्ष के संकल्पोंकों पूर्ण करना था।उनकी विशेष योजना थी की श्री भरतजी आगये। श्री भरत जी को शरणागति को सफल करनेके लिए १४ वर्ष प्रतीक्षा करनी पड़ी।इससे यह सत्य भी पता चलता है की भगवान स्वतंत्र हैं और वो निर्णय ले सकते हैं की शरणागति का फल कब देना है। हमने पूर्व में जो बरसात का दृष्टांत देखा था उसके अनुसार, भरतजी के संदर्भ में गड्डा खोदा हुआ तैय्यार तो था, पर बरसात का समय नहीं आया था।)

श्री वचनभूषण में श्री पिल्लै लोकाचार्य स्वामीजी कहते हैं, “भरतनुक्कु नन्मै ताने तीमै आयिट्रु”। इसका अर्थ यह हुआ की शरणागति की कृति केवल योग्य बनाती है (अधिकारी विशेषणम्) परंतु मोक्ष नहीं दे सकती। तो जब यह पाशूर कहता है की शरणागति मोक्ष देती है तो समझना चाहिए की अगर जीव को तुरंत मोक्ष चाहिये तो शरणागति मोक्ष मिलने की रुकावटें दूर करती है। परंतु पाशूर कभी भी यह नहीं कहता की शरणागति खुद मोक्ष देती है।यह ठीक तरह से समझना चाहिए की शरणागति संबन्धित सभी सत्य सिद्धान्त श्री वरवरमुनी स्वामीजी अपने विश्लेषण में प्रकाशित करते हैं।

Source: http://divyaprabandham.koyil.org/index.php/2014/11/gyana-saram-1-una-udal/

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