Monthly Archives: November 2014

ज्ञान सारं – पासुर (श्लोक) ४

श्री:
श्रीमते शठकोपाय नम:
श्रीमते रामानुजाय नम:
श्रीमत् वरवरमुनये नम:

 ज्ञान सारं

ज्ञान सारं – पासुर (श्लोक) ३                                                                ज्ञान सारं – पासुर (श्लोक) ५

पासुर ४

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मट्रोन्ड्ऱै एण्णादे मादवनुक्कु आट्चेयले
उट्रदु इदुवेन्ड्रु उळम् तेळिन्दु – पेट्र
पेरुम् पेट्रीन् मेल् उळदो पेरु एन्ड्रु इरुप्पार्
अरुम् पेरु वानत्तवर्क्कु

शब्दार्थ:
एण्णादे: वह जो ध्यान नहीं देता अथवा गौर नहीं करता, मट्रोन्ड्ऱै = सांसारिक/भौतिक ईच्छा, एन्ड्रु उळम् तेळिन्दु = स्पष्ट रूप से सोचते हैं, एन्ड्रु इरुप्पार् = निर्धारपूर्वक रहता है, आट्चेयले = सेवा करने के लिए, मादवनुक्कु: श्री लक्ष्मी अम्माजी सहित भगवान माधव, इदु उट्रदु = उपयुक्त बात है, पेरु मेल् उळदो: और इससे और उत्तम कोई फल नहीं, पेट्र पेरुम् पेट्रीन् = भगवान की सेवा करनेका आभ मिल गया हो, अरुम् पेरु = ऐसे महात्मा अतिशय कीमती और दुर्लभ दासानुदास माने जाते हैं, वानत्तवर्क्कु = नित्यसूरियोंद्वारा

प्रस्तावना:

प्रथम तीन पाशुरोंका संक्षेपमें भाव: प्रथम पाशूर में (ऊन उड़ल), द्वय महामंत्र के प्रथम खण्ड में वर्णित शरणागति का हत्त्व प्रतिपादित किया है।’ जीव के शरणागति करनेका कारण है संसार बंधन से होनेवाले अपार दु:ख। ऐसे दु:ख का वर्णन परभक्ति के आधार पर द्वितीय पाशूर (नरागमुम सुवरगमुम) में किया गया है।तृतीय पाशूरमें “परम-भक्ति” की अवस्था बताई गई है जिसमें भगवान से विलग होनेपर प्राण निकलनेकी अवस्था हो जाती है (अनै इडर कड़िन्द) (गजेंद्र)। अब इस चतुर्थ पाशूर में श्री देवराजमुनी स्वामीजी उनका वैभव गाते हैं जिनको अपने जीवन का अंतिम लक्ष्य भगवान, श्री लक्ष्मी अम्माजी और उनके आश्रितोंका केंकर्य है ऐसा जंच गया है जो श्री द्वया महामंत्र के द्वितीय खण्ड में वर्णित है। जिन्होनें इतर फल से अपना संबंध नष्ट कर दिया है, और जिन्होंने परम निर्धार पूर्वक जीवात्मा के स्वरूपनुरूप केंकर्यमें अपने आप को लगा दिया है।

स्पष्टीकरण:

मट्रोन्ड्ऱै एण्णादे: इसका अर्थ है (अपने सांसारिक भौतिक इच्छाओंकी ओर गौर ना करते हुये) भगवान को आनंद मिले ऐसा कार्य कैंकर्य कहलाता है। यही हमारे जीवन का एकमात्र परम उद्देश्य है। इस से बढ़कर नहीं है| ऐसे कैंकर्य छोडकर इतर विषय पर ध्यान नहीं देना यही इस पद का अर्थ है।वो इतर विषय हैं: संसार, स्वर्ग आदि में रुचि होना, कैवल्य (आत्मानुभव) में रुचि होना; यह कैंकर्य से संबन्धित नहीं हैं। कोई कैवल्य को ही मोक्ष समझते हैं। परंतु, यह हमें भगवत भागवत आचार्य कैंकर्य में कोई सहायता नहीं करता इसलिए श्री देवराज मुनी स्वामीजी ने इसे “इतर विषय” ऐसे संबोधित किया है।कैंकर्य में बाधक इन विषयोंका विचार भी श्री स्वामीजी नहीं करना चाहते हैं, इसलिए उन्होनें इसे “इतर” कहकर छोडदिया है। और तो और, वो “इतर विषयोंकि इच्छा नहीं करना” इससे भी बढ़कर कहते हैं, “इतर विषयोंके संदर्भ में विचार भी नहीं करना”।इसका कारण है, ऐसा व्यक्ति इन विषयोंका विचार भी नहीं करेगा, इच्छा करनेकी तो बात ही दूर है। अत: उन विषयोंकि कोई पात्रता ना समझते हुये वो व्यक्ति उन विषयोंका विचार भी नहीं करता है।जिन्हे भगवत भागवत आचार्य केंकर्य करनेकी मिठास नहीं मालूम हैं, वो सर्वदा उपरोक्त वर्णित इतर विषयोंमें और उनमें सुख ढूंड़नेमें लगे हुये रहते हैं।जिनको सच्चे कैंकर्य की कीमत पता है, वो इतर विषयोंकों लवण युक्त जल के समान त्याज्य समझेंगे अथवा अपने जीवन में कोई स्थान भी नहीं देंगे।

मादवनुक्कु आट्चेयले: श्री लक्ष्मी अम्माजी सहित भगवान की सेवा करना यही हमारा उद्देश्य है। श्री द्वय महामन्त्र के उत्तर खंड के प्रथम पद “श्रीमते” में यह वर्णित है। श्री मूलमंत्र (ॐ नमो नारायणाय) में भी तृतीय पद “नारायणाय” से युगल जोड़ी का कैंकर्य करनेका ही भाव है। श्री मूलमंत्र में जो भाव है, वही श्री द्वय मंत्र में वर्णित है।  श्री स्वामीजी पिल्लै लोकचार्य ने मुमुक्षुपड़ी ग्रंथ में द्वय प्रकरण में १६८ क्रमाक चूर्णिका में यह विस्तार से समझाया है।इस प्रकार, श्री मूलमंत्र और श्री द्वय महामन्त्र दोनोंमें जीव का एकमात्र उद्देश्य कैंकर्य है यही भाव है। श्री शठकोप स्वामीजी ने भी यह श्री सहस्रगिती (३,१,१) में प्रतिपादित किया है।

इदु उट्रदुवेंड्रू: यह पद का भाव है, “यही जीवन का अन्तिम लक्ष्य है।” “उट्रदु” का अर्थ है वह जो जीवात्मा के लिये सर्वोच्च रूप से उपयुक्त है।इसका अर्थ है, इतर चीजें जीवात्मा के शेषत्व का वर्णन करनेके लिए उपयुक्त/योग्य नहीं हैं।इसलिए वो आत्मा के लिए उचित नहीं हैं।अत: “मादवनुक्कु” और “आट्चेयले” से हम समझते हैं वेदान्त का निर्णय यही है की जीवात्मा श्री लक्ष्मी अम्माजी और श्री भगवान दोनोंका दास है और इन दिव्य दंपति का कैंकर्य करना यही इसका अन्तिम लक्ष्य है और अन्तिम फल भी।इसका दिव्य प्रबंधोमें अनेक जगह पर संदर्भ मिलता है।चूंकि यह जीवात्मा का स्वरूप कैंकर्य बताते हैं, यह जीवात्मा का बड़प्पन भी बताता है। जीवात्मा की सेवा करनेकी क्षमता यही उसका बड़प्पन है।

उळम् तेळिन्दु: “तेळिन्दु” का अर्थ है, संशय भ्रम से रहित होकर कोई एक चीज पर दृढ परिस्थिति करना। यहाँ श्री स्वामीजी का कहना है की जैसे पहले देख चुके हैं, कैंकर्य ही हमारा अन्तिम लक्ष्य है इस बात पर हमारी संशय भ्रम रहित दृढ़ परिस्थिति होनी चाहिये।”में” और “मेरे लिए” यह भाव हमे छोड़ना पड़ेगा, क्योंकि यह भाव हमे भगवान से अनावश्यक चीजें मांगनेपर मजबूर करता है। कैंकर्य उनकी खुशी के लिए किया जाना चाहिए। इस प्रकार मन में स्पष्ट रूप से परिस्थिति करके अन्तिम लक्ष्य समझके कैंकर्य करना चाहिए। इसका संदर्भ द्वय महामंत्र के द्वितीय खंड के “नम:” पद में है। “श्रीमते नारायणाय नम:” का भाव है, जीवात्मा दिव्य दंपति का नित्य कैंकर्य उनके आनंद के लिए ही करेगा, ना की अपनी संतुष्टी के लिए। जब श्री अम्माजी समेत श्री भगवान आनंदित होते हैं, तब उनके मुखारविन्द पर आनंद देखकर जीवात्मा को आनंद होता है।

पेट्र पेरुम् पेट्रीन् मेल् उळदो पेरु एन्ड्रु इरुप्पार्: यह उन लोगोंके लिए है, जिनको कैंकर्य करनेका सुअवसर प्राप्त होता है तो उनको पता चलता अधहै की इस से बढ़कर और कुछ नहीं है।परमपद यह एक शाश्वत धाम है, जो कभी नहीं बदलता, और सदैव शुद्ध सत्त्व में रहनेवाला श्रीमान्नारायण भगवान का दिव्य निवास स्थान है। यह दिव्य ज्ञान और आनन्द का उगमस्थान है।इसलिए, हम यहांपर कोई रुकावट के बिना कैंकर्य कर सकते हैं।ऐसे दिव्य ज्ञान युक्त जीव ऐसे कैंकर्य की इच्छा रखते हैं।तो यह है कि वे इस कैंकर्य से अधिक कुछ नहीं कहना है कि वहाँ कोई आश्चर्य नहीं है. इसका अर्थ है की वो ऐसे उच्च स्तर के कैंकर्य के मिलने के लिए दृढ़ हैं।

अरुम् पेरु वानत्तवर्क्कु: ऐसे जीव अपने आप को स्वरूपत: भगवान के परिचारक मानते हैं।वे सदैव भगवत कैंकर्य में निरत रहते हैं। वो भगवान को ही परम आनंद मानते हैं।ऐसे लोग इस जगत में दुर्लभ हैं। जब वे परमपद में प्रवेश करते हैं, तो वहाँके नित्य, मुक्त जीव ऐसे दुर्लभता से प्राप्त जीव के आगमन का उत्सव मनाते हैं।श्री देवराज मुनी स्वामीजी कहते हैं, उन नित्य मूक्त गण भी (जिनको परमपद का नित्य दिव्य आनंद प्राप्त है) ऐसे कैंकर्यनिष्ठ महात्माओंकी दर्शन, सेवा को भगवान की सेवा से भी उच्च मानते हैं।

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ज्ञान सारं – पासुर (श्लोक) ३

श्री:
श्रीमते शठकोपाय नम:
श्रीमते रामानुजाय नम:
श्रीमत् वरवरमुनये नम:

 ज्ञान सारं

ज्ञान सारं – पासुर (श्लोक) २                                                ज्ञान सारं – पासुर (श्लोक) ४

पाशूर ३

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आनै इदर कड़िन्द अलियाङ्कै अंबुयथ्थाल
कोने विदिल नीरिल कुतिथेलुन्द मीन एनवे
अक्कै मुदियूम पड़ी पिरतल अन्नवन थाल
नीक्कमिला अन्बर निलै

अर्थ

विदिल: अगर कोई उनसे अलग हो जाता है,  अंबुयथ्थाल कोनै: कमल पर बिराजमान श्री लक्ष्मीजी के पति श्री भगवान , आनै इदर कड़िन्द: गजेंद्र का दु:ख दूर करनेवाले, अलियाङ्कै: जो अपने कर कमलोंमें श्री चक्रराज धारण करते हैं, मीन एनवे: मछली के तरह, कुतिथेलुन्द: जो कूदकर बाहर आगयी, नीरिल: पानी, मुदियूम पड़ी पिरतल: वो मरणासन्न हो जाएँगे , निलै: ऐसी परिस्थिती है, अन्बर: दासजन (आश्रित जन) , अन्नवन थाल: ऐसे श्रीमन्नारायण भगवान के चरण कमल से, नीक्कमिला: जो कभी विलग नहीं होना चाहते |

प्रस्तावना

पिछले पाशूर में श्री देवराजमुनी स्वामीजी भक्ति की एक स्थिती “पराभक्ति” का वर्णन करते हैं, जिसमे जीव को भगवान से विलग होनेके विचार से ही अत्यंत कष्ट होता है और जब वो भगवान के समीप होता है तो निश्चिंत होता है। इस पाशूर में श्री स्वामीजी उससे भी विशेष “परम भक्ति” का वर्णन करते हैं।इसमे, जब कोई भगवान से विलग होता है तो अब कष्ट नहीं होगा, वो सीधे मरण के परिस्थिती में होजायेगा। श्री स्वामीजी इस पाशूर में एक दृष्टांत के साथ यह समझाते हैं।

स्पष्टीकरण:

श्री गजेन्द्र हाथी की कथाका उल्लेख पुराणोंमें और आलवारोंके पाशूरोंमें और आल्वारोंके पशूरोंमें अनेकों बार आता है। श्री गजेन्द्र हाथी भगवान को अर्पण करने हेतु सरोवर से कमल पुष्प लेकर किनारे की तरफ आ रहे थे। एक मगरमच्छ अपने शाप को उतारने के लिये एक हाथी के तलाश में था। उसने गजेन्द्र का पैर पकड़ लिया।गजेन्द्र अपने पैर जमीन की ओर खींचता था तो मगरमच्छ पानी की ओर। यह क्रम देवताओंके १,००० वर्ष (मनुष्य के ३,६०,००० वर्ष) तक चला। मगरमच्छ और भी बलवान हो रहा था क्योंकि पानी उसका अधिकार क्षेत्र था और उसकी इच्छा भी पूर्ण हो रही थी। हाथी की शक्ति क्षीण हो रही थी क्योंकी पानी उसका अधिकार क्षेत्र नहीं था और उसके इच्छा भी पूर्ण नहीं हो रही थी। गजेन्द्र ने अपनी सब आशा छोड़ दी थी क्योंकि केवल उसकी सूँडही पानी के बाहर बची थी। उसको ज्ञात हुवा की इससे बड़ी कोई आपत्ति नहीं हो सकती और सोचा, “जो आश्रितोंके सभी कष्ट दूर करता है वो हमारा रक्षक है” और पुकारा,”नारायणा!!! ओ मणिवण्ण!!! नागणैयाई!!! वारै एन अरिडारै नीक्काई”(श्री परकाल स्वामीजी विरचित सीरिया तिरुमडल से)।श्री भगवान त्वरित पधारे और गजेन्द्र का दु:ख दूर किया। गजेन्द्र को मगरमच्छ के द्वारा अपने शरीर का नाश होने की चिंता नहीं थी। उनको अपने सूंड में जो कमलपुष्प था उसको बिना बिगाड़े भगवान के चरण कमलोंतक पहुंचाना था। भगवन्निष्ठ श्री गजेन्द्र के इस प्रकार के भयको दूर करने के लिए भगवान शीघ्र पधारें।यह इस पाशूर में वर्णित है।

अलियाङ्कै: सुंदर श्रीहस्त जो श्री चक्रराज को धारण किए हैं। यह इस वाक्य का अर्थ है। गजेन्द्र को उसके शत्रु मगरमच्छ से छुड़ाने के लिए भगवान ने श्रीहस्त में श्री चक्र को धारण किया। – यही इस वाक्य का अर्थ है।

श्री शठकोप स्वामीजी अपनी सहस्रगिती ३.१.९ में कहते हैं:

मलुंगाद वैन्नुदीय चक्कर नल वलथैयाय-थ
तोलुम कादल कलिरालिप्पान पुल ऊर्न्दु तोंद्रिनैये

यह बात स्पष्ट है की भगवान हाथी की रक्षा करने के लिए त्वरा किए। श्री पराशर भट्टर स्वामीजी भगवान के इस त्वरा-वेग को प्रणाम करते हैं।भगवान अपने धाम से प्रस्थान किए और उनको यह भी याद नहीं रहा की वो सदैव अपना सुदर्शन चक्र दाहिने हस्त में धारण करते हैं।अगर उनको यह स्मरण होता तो उन्होने वो जहां हैं वहांसे ही वह चलादिया होता और चक्रराज ने अपना कार्य कर दिया होता।अथवा, वो चक्रराज नित्य धारण करते हैं यह स्मरण होकर भी उन्होने हाथी के पास स्वयं जाकर चक्रराज का उपयोग किया।कारण यह है की, श्री शठकोप स्वामीजी के पाशूर अनुसार गजेन्द्र का भगवान के प्रति निष्कलंक प्रेम के कारण “कादल कलिरू” नाम प्रसिद्ध है। गजेन्द्र को सुदर्शन चक्र धारी भगवान के सौन्दर्य का आनन्द प्राप्त करके कमलपपुष्प उनके श्री चरणोंमें समर्पित करनेकी अभिलाषा थी।इस कारण भगवान अपनी जगह से यह कार्य करना छोडकर कमल सरोवर पर गए। इसका भावार्थ है की भगवान अपने आप को अपने आश्रित के मन मुजब अपने आप को भी देते हैं।श्री महाद्योगी स्वामीजी अपने मुंद्राम तिरुवंदादी में ९९वे पाशूर में गान करते हैं, “कुत्तत्तु कॉल मुदलै तुंजा कुरित्तेरिंद चक्करत्तान”.

अंबुयत्ताल कोनै: कमल पुष्प पर बिराजमान श्री लक्ष्मीजी के नायक श्री भगवान के संदर्भ में यह वर्णन है। पुराणोंमें वर्णन है की जब श्री भगवान क्षीरसागर में आदिशेष शैय्या पर लेटे हुये थे, श्री भूदेवी और श्री नीलादेवी चरणसेवा कर रही थी, और श्रीदेवी वक्षस्थल में बिराजमान थीं और उनको गजेन्द्र की पुकार सुनाये दी। श्री भगवान ने अपने चरण कमल हल्के से श्री भूदेवी और श्री नीलादेवी की सेवा से दूर किए, शेष शैय्या पर उठकर बैठगये, पलकें खोलीं, आसपास देखा, और धीरेसे श्रीदेवी के आलिंगन से भी दूर होगये। उसके बादही श्री भगवान तुरंत श्री गरुड वाहन पर बिराजमान होकर गजेन्द्र की ओर तीव्रता से बढ़े और गजेन्द्र का दु:ख दूर किया।जैसे प्रजा के रक्षण करनेवाले राजा को देखकर प्रजा की माँ प्रसन्न होती है, वैसेही श्री लक्ष्मी अम्माजी भी भगवान को अपने भक्तोंका दु:ख दूर करते देख प्रसन्न होती हैं।इसी कारण श्री भगवान श्री लक्ष्मी अम्माजी के संदर्भ से जाने जाते हैं और “अंबुयत्ताल कोनै” नाम से संबोधित होते हैं।यह पाशूर वर्णन करता है की श्री भगवान अपने शरणागत जीव के पास उनका कष्ट दूर करने जाते हैं। वो यह नही सोचते की “मैंने अश्रितोंके लिए यह किया”, बल्कि यह सोचते हैं की, “मेंने यह मेरे अपने लिए किया”) और ऐसे भगवान श्री लक्ष्मीजी के पति हैं।

विदिल: ऐसे परम प्रेम करनेवाले श्री भगवान से कोई जीव अलग हो जानेकी परिस्थिती आजाती है तो

नीरिल कुतिथेलुन्द मीन एनवे: ऐसे होजाएगा जैसे एक मछली कूदकर जल से बाहर आगयी हो;

अक्कै मुदियूम पड़ी पिरतल: ऐसा आश्रित मरणासन्न परिस्थिती में पहुंचजाएगा”पराभक्ति” में रहनेवाले आश्रितोंकी यही परिस्थिती होती है, “भगवान के साथ होते हैं तो आनंद, दूर हैं तो दु:ख”। परमभक्ति का स्तर इससे भी उच्च है जिसमे भगवान से दूर होनेपर आश्रित मरणासन्न परिस्थिति में पहुँच जाता है। ऐसी भक्ति की यह महिमा है यह इस पाशूर में वर्णित है।जल से अलग होने पर एक मछली की परिस्थिती के उदाहरण के साथ यह समझाया गया है।

अन्नवन: का अर्थ है “ऐसे भगवान”। प्रथम भगवान को श्री लक्ष्मीजी के पति ऐसे संबोधित किया गया। यहाँ कहा गया है की “ऐसे भगवान”जो यह दर्शाता है की “ऐसे भगवान जो परमभक्ति वाले आश्रित का जीवन है, जैसे मछली के लिए जल जीवन है।

थाल नीक्कमिला अन्बर निलै: “थाल” का अर्थ है भगवान के चरण कमल, और “नीक्कमिला” का अर्थ है विलग होना। प्रेम जो भगवान के चरण कमल से दूरी नहीं सहन करता, ऐसे प्रेम धारण करनेवाले आश्रित भगवान के चरणकमल से ऐसे आकर्षित होते हैं की अगर उनसे दूर होना पड़ा तो वो एक क्षण भी जीवित नहीं रह सकते, जैसे एक मछली जल के बिना जीवित नहीं रह सकती।इस पाशूर में परम भक्ति की ऐसी अवस्था का वर्णन है।

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ज्ञान सारं – पासुर (श्लोक) २

श्री:
श्रीमते शठकोपाय नम:
श्रीमते रामानुजाय नम:
श्रीमत् वरवरमुनये नम:

ज्ञान सारं

ज्ञान सारं – पासुर (श्लोक) १                                                                  ज्ञान सारं – पासुर (श्लोक) ३

पाशूर २

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नरगुं सुवरगमुं नाण् मलराल कोनै
पिरुवुं पिर्यामैयुमाय-तुरिसतृ
साधगं पोल नाधन् थनधरुले पार्थिरुथल्
कोधिलदियार गुणं

अर्थ
नरगुं – कष्ट (शब्दश: अर्थ ‘नरक’ है) , सुवर्गमुं– और खुशी (शब्दश: अर्थ स्वर्ग है) , पिरीवुं – से विलग और , पिर्यामैयुमाय – से संयुक्त , नाण् मलराल कोनै – श्रिय:पति , पोल – के सदृश , तुरिसतृ – निर्दोष , साधगं – चातक पक्षी जो स्वाति की बरसात की बूंद सीधे पीता है और कोई भी जल नहीं पीता है। अगर स्वाति की बूंद नहीं मिले तो और कोई जल पिये बिना मर भी जाता है। गुणं – की प्रकृति, कोधिलदियार = निर्दोष आश्रित जन, पार्थिरुथल् = आशा करना , नाधन् थनधरुले – केवल भगवान की करुणा

स्पष्टीकरण

नरगुं सुवरगमुं – नरक और स्वर्ग ये अनुक्रम से कष्ट और खुशी को दर्शाते हैं।सहस्रगिती ३.१०.७ (तुंबमुम इंबमुम) में श्री शठकोप स्वामीजी बताते नरक को तुंबमुम (दु:ख) और स्वर्ग को इंबमुम (सुख) बताते हैं।

इस संदर्भमें जो पराभक्ति में हैं उनके लिए सुख और दु:ख क्या है?यह और ‘पराभक्ति’ का अर्थ आगे समझाया गया है।भगवान जो श्रिय:पति हैं उनका विरह नरक के समान है।और उनका सामीप्य सच्चा सुख है।परभक्ति का सार यह है की जब कोई जीव भगवान से दूर रहता है तो वो जी नहीं सकता।वह जब भगवान के साथ रहता है, तब ही जीवित रह सकता है। ऐसे जीव के इस परिस्थिति को समझाने के लिए एक दृष्टांत दिया जा रहा है।

श्री रामायण में भगवान श्रीराम जब वनवास के लिए प्रस्थान कर रहे थे तो श्री सीता अममाजी उनके साथ चलना चाहती थीं। भगवान ने उनको वनवास के खतरोंका और राजमहल के सुख का वर्णन करके समझाने का प्रयत्न किया। उन्होने श्री अम्माजी को यह समझाने का प्रयत्न किया की उनके साथ वनवास में चलना दु:ख है और राजमहलमें रहना सुख है। सुख दु:ख की ऐसी परिभाषा सुनकर श्री अम्माजी ने भगवान की बात को ठीक किया। श्री अम्माजी ने बताया, “सुख और दु:ख की जो आपने की वो परिभाषा सही नहीं है।इसकी परिभाषा अलग अलग लोगोंके लिए अलग अलग होगी।(दासी लिए) आप के साथ रहना सुख है और आपके बिना इस राजमहल में रहना दु:ख है। अगर श्रीमान को यह परिभाषा विदित नहीं है तो कृपया दासी से सीखलें। अगर हमे कोई बात पता नहीं है तो वो औरोंसे सीखना अनुचित है है। आपका प्रेम मर्यादित और परिमित है, जबकि दासी का आपके लिए असिमीत प्रेम है।” ध्यान से सुनने के पश्चात श्री भगवान ने कहा, ” ठीक है, आपको मेरे प्रति अनंत प्रेम है ऐसा आपने कहा। अब मुझे क्या करना चाहिए?” तत्परता से श्री सीता अम्माजी ने कहा, “मैं नेतृत्व करूंगी। आपको बस मेरा अनुगमन करना है।” यह श्री पेरियावाचान पिल्लै स्वामीजी का व्याख्यान है।

यहाँ एक वेदांतिक प्रश्न उठता है। सीताजी ने कहा की श्रीराम भगवान के साथ सुख है और उनके बिना दु:ख है। इस परिस्थिति के लिए यह ठीक हो सकता है। परंतु क्या अन्य लोगोंका ऐसाही भाव होना चाहिए?इसका उत्तर है, “नहीं”। कारण, श्री अम्माजी और हम सामान्य जीवोंमें अंतर है।जब हम भगवान और अम्माजी की युगल जोड़ी से विलग होते हैं तो वो दु:ख होता है और साथ रहते हैं तो वो सुख होता है। श्री अम्माजी के लिए यह भाव केवल भगवान अकेले के लिए है। अत: श्री अम्माजी को “एकायनै” संबोधित करते हैं, और हम जीव “मिथुनायर” कहके संबोधित होते हैं। एकायनै वो है जिनके लिए केवल भगवान ही निर्वाहक हैं, और मिथुनायर वो हैं जिनके लिए भगवान और अम्माजी की युगल जोड़ी निर्वाहक है। मिथुन का अर्थ है भगवान की और अम्माजी की जोड़ी।

मलराल कोनै पिरुवुं पिर्यामैयुमाय: जब कोई भगवान और श्री अम्माजी से दूर रहता है तो वह दु:ख की स्थिति है और जब वह उनसे दूर नहीं रहता है तो वो सुख है। श्री लक्ष्मणजी भी बताते हैं, “जैसे श्री सीता अम्माजी आपके बिना नहीं रह सकती, वैसेही में भी आपके बिना नहीं रह सकता।” श्री सीता अम्माजी और श्री लक्ष्मणजी दोनोंको भगवान का विरह असह्य है।

यहाँ ऐसा नहीं समझना चाहिए की श्री लक्ष्मण जी का सुख श्री रामजी के साथ में रहनेमें है।बल्कि ऐसे समझना चाहिए की श्री लक्ष्मणजी का सुख श्री रामजी और श्री सीताजी दोनोंके साथमें रहने का है।इसीलिए, वन के लिए प्रस्थान करते समय श्री लक्ष्मणजी कहते हैं, “जब आप और अम्माजी वन में पहाड़ोंमें विचरेंगे, आप के सोते जागते में आप दोनोंकी सभी प्रकार के सेवा करना चाहता हूँ। कृपया मुझे केवल इसी कारण के लिए साथ ले चलिये।”सो, जीवात्मा के लिए भी केवल भगवान और अम्माजी की युगल जोड़ी (दिव्य दंपति) की ही सेवा करना विधान है।

तुरिसतृ – निर्दोष

भक्ति को भगवत्प्राप्ति का साधन मानना ही दोष (गलती) है। यहां भक्ति का अर्थ है की भगवान और अम्माजी से विरह में दु:ख होना और समीप रहनेपर सुख होना। भक्ति को अधिकारी विशेषण समझना चाहिए – भक्ति भगवान के सामीप्य का आनंद प्राप्त करनेके योग्य बनाती है ऐसे मानना चाहिए। जैसे खानेके लिए भूखा होना जरूरी है, वैसेही, भगवान का आनंद प्राप्त करनेके लिए भक्ति होना जरूरी है। यह भक्ति उपाय/साधन नहीं बनेगी। केवल उपासक भक्त हे भक्ति को साधन मानते हैं, शरणागत नहीं।भक्ति को साधन मानना ये गलती/दोष है।तुरिसतृ का अर्थ है, वो जिनमे भक्ति को उपाय माननेका दोष नहीं है।

साधगं पोल नाधन् थनधरुले पार्थिरुथल्: चातक एक ऐसा पक्षी है जो स्वाती के बरसात की बून्दोंके व्यतिरिक्त और कोई भी जल नहीं पीते। भलेही उनका मूंह सूख गया हो, तो भी वो स्वाति के बरसात की प्रतीक्षा ही करेगा। इसी प्रकार शुद्ध (निर्दोष) आश्रितोंका यह स्वभाव है की वो भगवान की प्राप्ति के लिए भगवान की कृपा को ही उपाय मानते हैं। हम श्री परकाल स्वामीजी के “तुणिएन इनी निन अरुल अल्लादु (पेरिया तिरुमोलि ११.८.८)” और श्री विष्णुचित्त स्वामीजी के चेन्नियोंगु पादिगम: “निन अरुले पूरिन्दीरुंदेन (पेरियालवार तिरुमोली ५-४-१) में यही बात अनुभव कर सकते हैं।

कोधिलदियार गुणम्: आश्रित वो हैं जिनमे भगवान व्यतिरिक्त कोई दूसरा उपाय नहीं है और दूसरा कोई फल भी नहीं है।एक सच्चा आश्रित इसी भाव के साथ जीवन व्यतीत करता है की “प्राप्तवुम प्रापकनुम प्राप्तिक्क उगपानुम अवने” (प्राप्त का अर्थ है अंतिम लक्ष्य, साध्य अथवा उपेय। प्रापकन का अर्थ है वह लक्ष्य की प्राप्ति का साधन अथवा उपाय। इस उपाय से इच्छित उपेय की प्राप्ति को प्रपत्ति कहते हैं। श्री वचनभूषण के अनुसार ऐसा आश्रित यह अनुसंधान करता रहता है की “मेरे उपाय और उपेय दोनों एकही भगवान हैं और हमे प्राप्त करनेके बाद वो आनंदित होंगे।” प्रपन्न जीव भगवान की वस्तु होने से जब भगवान की वस्तु शरणगति के माध्यम से भगवान तक पहुंचती है तो भगवान आनंदित होंगे, ना की वह वस्तु।जब जीव भगवान के पास पहुंचता हैं तो सभी जीवोंके मालिक भगवान ही ज्यादा आनंदित होते हैं।भगवान का आनंद देखकर जीव भी आनंदित होता है और जीव के लिए इसके अतिरिक्त कोई आनन्द नहीं है।श्री देवराजमुनी स्वामीजी ने इस पाशूर के प्रथम खण्ड में बताया है की “भगवान छोडकर और कोई फल नहीं है”, और द्वितीय खण्ड में बताया है की भगवान छोडकर इतर कोई उपाय नहीं है। “सियाराम ही उपाय सियाराम ही उपेय”। एक निर्दोष आश्रित का यही स्वरूप है।

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ज्ञान सारं – पासुर (श्लोक) १

श्री:
श्रीमते शठकोपाय नम:
श्रीमते रामानुजाय नम:
श्रीमत् वरवरमुनये नम:

ज्ञान सारं

प्रस्तावना                                                                                                                    ज्ञान सारं – पासुर (श्लोक) २

पाशूर १. प्रस्तावना 

एक जीवात्मा को परम आनंद कहीं मिलता है तो वो है मोक्ष धाम । मोक्ष मिलने के लिए हमे अपने आचार्य से मूल मंत्र, द्वय महामंत्र, और चरमश्लोक के रहस्यमय गहरे अर्थोंकों जानना जरूरी है । यह तीन मंत्रों कों रहस्य कहा जाता है ।हमारे शास्त्र यह आज्ञा करते हैं की यह रहस्य केवल उनको बताया जाय जो इनको जाननेकी प्रब इच्छा रखते हैं । और लोगों के साथ नहीं । चुंकी वो अत्यंत सावधानी के साथ सुरकक्षित रक्खे गए हैं, उन्हे रहस्य कहा जाता है । तीनों कों साथमें रहस्यत्रय कहा जाता है, और श्रीवैष्णव संप्रदाय के अनुसार वो वेदान्तों के सबसे महत्त्वपूर्ण अंग माने जाते हैं । वो भगवान का यथार्थ स्वरूप जैसे के तैसे समझाते हैं । वें परमात्मा भगवान तक पहुँचने के मार्ग पर और वहाँ पहुंचने पर जीवात्मा को होने वाले परम आनंद पर प्रकाश डालते हैं । कभी नहीं रुकने वाले जन्म मरण चक्र से और उससे संबन्धित जीवन के चढ़ाव उतार के कारण अनंत काल से पीड़ित जीवों के लिए ही यह तीनों रहस्य श्री भगवान ने ही निवेदन किए हुये हैं । रहस्यत्रय इस प्रकार प्रतिपादित किया गया था । श्रीमान्नारायण भगवान ने नारायण (आचार्य) का अवतार लिया और प्रथम रहस्य जो मूलमंत्र हैं उसे नर (शिष्य) को बद्रिकाश्रम में विस्तार रूप से समझाया । भगवान ने द्वय महामंत्र का अपने दिव्य सहचारिणी श्री महालक्ष्मीजी को श्रीवैकुंठ में उपदेश दिया । अंतत: भगवान ने श्रीकृष्ण अवतार लेकर कुरुक्षेत्र के रणभूमी में महाभारत के महायुद्ध में अपने परम मित्र अर्जुन का सारथ्य किया । इसी समय उन्होने भगवद गीता के अंतिम अध्याय में चरम श्लोक को प्रतिपादित किया । येही तीन रहस्य श्रीवैष्णव परंपरा से हमारे तक चले आए हैं । श्री वैष्णव संप्रदाय के पूर्वाचार्य, जिनको परमसत्य का दर्शन हो चुका है तथा जिनहोने भगवान तक पहुँचनेका अचूक और सुलभ मार्ग दर्शाया है, ने इन तीन रहस्योंकों अत्यंत सावधानी के साथ संभाल केरक्खा है । (यह तीन रहस्य कोई लौकिक धन की तरह नहीं हैं, जो किसी तिजोरी में बिना किसी उपयोग किए रक्खा जाता है । यह उतनाही उपयोगी है जितना मूल्यवान।) हमारे पूर्वाचार्यों ने इस धन का नित्य अपने जीवन में उपयोग किया । इन रहस्यों की ये ही महानता है ।

तीनों रहस्यों में प्रथम है “मूलमन्त्र”। यह प्रथम रहस्य कहा जाता है जिसमे ३ विभाग हैं । वो हैं  “ॐ”, “नम:”, और “नारायणाय”। प्रथम विभाग “ॐ” यह “प्रणव” नाम से जाना जाता है । द्वितीय भाग “नम:” और तृतीय भाग “नारायणाय” ये प्रणव का विस्तार हैं । (वो जीवात्मा और परमात्मा के गुणोंकों बताते हैं, परमात्मा और जीवात्मा के शेषी-शेष संबंध को समझाते हैं। यह संबंध अनादि काल से है जिसका कोई प्रारम्भ या अंत नहीं । जीवात्मा का और कोई शेषी नहीं है।)

द्वय महामंत्र, जो “मंत्र रत्न” के रूप में माना जाता है, उसमे २ पंक्तियाँ हैं । प्रथम पंक्ति मूलमंत्र के “नम:” का गूढ़ार्थ बताती है तो द्वितीय पंक्ति मूलमंत्र के “नारायणाय” का विश्लेषण करती है । इसमे २ पंक्तियाँ होने के कारण यह द्वय नाम से जाना जाता है । द्वय मंत्र की प्रथम पंक्तिमें भगवान के दिव्य श्री चरणारविन्दोंमें शरण होना बताया है । जब कोई जीव भगवान के चरणकमलोंको पकड़ लेता है तो उसे इतर सभी उपायोंका त्याग करना चाहिए । यह इस तरह करना चाहिए की उस जीव में पूर्व के इतर उपायोंका लवलेश भी नहीं रहना चाहिए । और तो और, उसको तो यह भी विचार का त्याग करना चाहिए की “मैंने भगवान के चरण पकड़े हैं और यह मेरा कार्य मेरा उद्धारक होगा”। (इसका कारण यह है की अगर जीव नेइस तरह सोचा तो इसका अर्थ यह हुआ की भगवान की छोडकर इतर कोई चीज, जैसे स्वप्रयत्न, मोक्ष को प्राप्त करा सकता है”। परंतु वो भी कभी मोक्ष नहीं दिलवा सकते इसलिए इस विचार से भी हमेपूर्णत: दूर रहना चाहिए) । इसका अर्थ यह हुआ की भगवान केचरण कमल ही शरण जाने योग्य हैं, और कुछ नहीं । और यह मूल सिद्धान्त हमारेमन में दृढ़तापूर्वक ठस जाना चाहिए । भगवान केव्यतिरिक्त स्वप्रयत्न सहित इतर सभी उपायन्तारोंका त्याग करके भगवान के शरण होने के बाद उसका फल क्या होना चाहिए इसका विवरण द्वय महामंत्र की द्वितीय पंक्तिमें किया गया है । श्री अम्माजी सहित श्री भगवान की और उनके सभी शरणागतों की नित्य सेवा की सुवर्णसंधि मिलना येही फल है । इसका आदर्श उदाहरण है श्री रामायण में श्री लक्ष्मण जी को श्री रामचन्द्र भगवान और श्रीसीता अम्माजी की सेवा प्राप्त हुयी थी । परंतु, ऐसा सुनहरा अवसर प्राप्त होने के लिए हमारे पूर्व कर्मों के कारण जो भी सभी पाप संचित हुये हैं उनका विनाश होना आवश्यक है । द्वय मंत्र की विस्तार से व्याख्या तृतीय रहस्य चरमश्लोक में की गयी है । इस प्रकार चरमश्लोक द्वय मंत्र पर आधारित है । द्वय मंत्र मूलमंत्र और चरमश्लोक के मध्यमें विराजमान है ।द्वय मंत्रमें मूलमंत्र के “नम:” और “नारायणाय” का विशेष रूप से विस्तार किया गया है । यह चरमश्लोक के भाव के लिये एक आधार भी बन जाता है । मूलमंत्र और चरमश्लोक में “श्री” का उल्लेख अंतर्निहित है। केवल द्वय में “श्री” का उल्लेख सुस्पष्ट रूप सेकिया गया है । इस प्रकार, इन तीनों रहस्योंमें हमारेपूर्वाचार्योंनेद्वय को अधिकतम महत्त्वपूर्ण बताया है। जैसा की पहले कहा गया है, जीव का सभी उपायोंका त्याग करके श्री भगवान के चरण कमलों को ही उपाय मानना ऐसे द्वय के प्रथम पंक्ति में वर्णित है । इसीको शरणागति कहते हैं । शरणागति (प्रपत्ति) २ प्रकार की होती है।प्रथम प्रकार है जिसमेत्वरा में जीव कहता है “मुझेभगवान का विरह एक क्षण केलिए भी सहा नहीं जाता । मुझेभगवान से मिलने की त्वरा हो रही है और में अभी के अभी किसी विलंब के बिना उनसे मिलना चाहता हूँ । “दूसरेप्रकार में जीव स्वरूपानुरूप अनुष्ठान करता हुआ भगवान का नित्य कैंकर्य करता रहता है और कहता है, “हे ! मेरे भगवान, जब आप उचित समझें, मुझेमोक्ष प्रदान कर देना । “इन दोनों प्रकारों मे से प्रथम प्रकार की प्रपत्ति श्रेष्ठ है । (प्रथम प्रकार की प्रपत्ति को आर्त प्रपत्ति कहते हैं और द्वितीय प्रकार की प्रपत्ति को “दृप्त प्रपत्ति” कहते हैं) । ज्ञानसारम्केप्रथम पाशूरमें “आर्त प्रपत्ति” का वर्णन है ।

पाशूर १

pattabhishekam
ऊन उडल् सिरै नीतु ओण् कमलै केळ्वनडि
तेन नुगरुम् आसै मिगु सिन्दैयराय्
ताने लुत्ताल् विल्लुम् कनि पोल् पट्रट्रु वीलुम्
विलुकाडे तान् अरुळुम् वीडु

अर्थ 
आसै मिगु सिन्दैयराय् = जब लोग अपने हृदय में गहरी इच्छा धारण करते हुये , नीतु = से छुटकारा पाने के लिए , उडल = यह शरीर जो, सिरै = कारागृह, ऊन = हाड़मांस का बना, और नुगरुम् = आनंद प्राप्त करना, अडि तेन = चरण कमल रूपी अमृत की मिठास, केळ्वन् = की पत्नी, ओण् = सुंदर, कमलै = श्री अम्माजी जो सुंदर कमलपुष्प पर बिराजमान हैं, पट्रट्रु = किसी इतर इच्छा से रहित, वीलुम् = शरणागति करना, कनि पोल् = जैसे एक फल पलुत्ताल् = जो अगर पकता है, ताने विल्लुम् = अपने आप गिर जाएगा, विलुकाडे तान् = वही शरणागति, वीडु अरुळुम् = मोक्ष प्रदान करेगा

स्पष्टीकरण

हमारा यह शरीर के हाड़मांस से बना है। यह त्वचा, नसें, मांस, हड्डियाँ, मलमूत्र, आदि सभी अशुद्ध चीजोंसे बना हुआ है।कहीं छोटी सी मधुमक्खी के पंख के आकार की भी त्वचा फट जाती है तो विविध मक्खियाँ, कीडे, चिटियाँ, कौवे आदि मांस खाने के लिए जम जाते हैं। (नालदियार तुरवरवियल – तूय्तन्मै) । अगर शरीर का भीतरी भाग खुलजाता है तो उसे खाने के लिए आए हुये कौवोंकों हटाना दूरपास्त होजाता है।जिनको यह बात समझ जाती है, उसे अपने शरीर के प्रति ग्लानि निर्माण होजाती है और वो सदैव इस शरीर के भीतर के आत्मा का दर्शन करता है, ना की शरीर का । और तो और, इस जीवात्मा का इस शरीर में वास एक कैदी को जेल में बंदी बनाकर रखनेके रूप माना जाता है । जीवात्मा, अपने आप में, ज्ञानप्रकाश से साथ चमकता है, परंतु इस शरीर के भीतर यह जीवात्मा के ऊपर अज्ञान के मेघ छा जाते हैं। एक चमकिले हीरे की चमक को जैसे एक अपारदर्शी आवरण ढक देता है इस उदाहरण से भी हम उपरोक्त बात समझ सकते हैं। जीवात्मा को इस शरीर के भीतर रहनेकी भगवान की तरफ से सबसे बडा दण्ड है । जो लोग यह शरीर एक कारागृह है यह ना समझते हुये सांसार में आनन्द लेने का प्रयत्न करते हैं, वो मानसिक विकलाङ्ग की तरह हैं।जो सच्चे ज्ञानी हैं केवल वो ही इस कारागृह के जंजीरोंकों तोड़कर इससे मुक्त होने की इच्छा करेगा।सच्चे ज्ञानी को यह ज्ञान है की भगवान की शरणागति ही इस कारागृह से निकलनेका एकमात्र उपाय है, और कोई भी हमे इस से नहीं निकाल सकता । भगवान श्रीक़ृष्ण भागवत गीता मैं कहते हैं की केवल वो ही शरीर रूपी कारागृह से जीव को निकाल सकते हैं।जीवात्मा के कर्म ही इस शरीर में बंदी बननेका कारण हैं।शरणागति से अतिरिक्त और कोई उपाय इन कर्म के बंधनोंकों तोड़ नहीं सकता।श्रीक़ृष्ण भगवान बार बार यह कहते हैं “अगर कोई जीव मेरे चरणोंमें शरण लेता है, तो मैं निश्चित उसे इस कारागृह से मुक्त करता हूँ।

एक सामान्य व्यक्ति की शक्ति इतनी भी नहीं है की वोह एक चिड़िया के घौसले के बंध को खोल सके। तो फिर वो भगवान द्वारा संकल्पित कर्म बंधन को कैसे खोल सकता है ? कोई धनवान व्यक्ति को अगर जेल भेजा जाय तो वो पहले जेल से छूटकर उसके बाद बाहर के दुनिया की विलासिता आनन्द लेना चाहेगा। इसी तरह, आत्मा के लिए प्रथम कर्तव्य यह है कि इस “शरीर” कहे जाने वाले कारागृह से छुटकारा हो। इस कारागृह से बाहर निकलनेका एक मात्र उपाय है शरणागति।श्री लक्ष्मी अम्माजी के पुरुषकार से श्रीमन्नारायण भगवान को पूर्णत: समर्पण करना येही द्वय मंत्र द्वारा दिया गया शरणगति का उचित मार्ग है।अपने आप को पूर्ण रूप से भगवान को समर्पित करना और उनके चरणोंका आश्रय लेना यह उतना मीठा है जितना की शहद।जिनको इस शहद का आस्वाद मिल गया है वो निरंतर भगवान और उनकी मिठास का ही चिंतन करेगा।वह हमेशा उस आनंद का अनुभव करना चाहेगा। एक भूखा बालक जैसे अपने माँ के दूध के लिए तरसता है, वाइसेही एक शरणागत भगवान के चरण कमल का मीठा अमृत प्राप्त करनेके लिए तरसता है।जब वो भगवान सम्पूर्ण शरणागति करता है, उसका अर्थ यह है की वो इतर सभी उपाय, साधनोंका त्याग करता है जिन्हे वो शरणागति करनेके पहले साधन मानता था और संसार की लौकिक चीजोंमें रुचि लेता था। एक बार वो शरणागत होने के लिए तैय्यार हो जाता है तो अपने आप वो सब इतर उपाय और इतर विषय हवा में अदृश्य हो जाते हैं।येही इस पाशूर का सार है।

श्री देवराज मुनी स्वामीजी एक सुंदर उदाहरण देते हैं। जैसे एक पूरी तरह से पका हुआ फल अपनेआप पेड़ से गिरता है और उस वृक्ष के साथ के उसके सभी संबंध टूट जाते हैं, वैसेही जब कोई जीव शरणागति करता है, तो यह निश्चित है की उसके पीछले कोई भी संबंध उसके और भगवान के संबंध में कोई बाधा नहीं डाल सकते। यह सबकुछ जीव के शरणागति करनेके बाद अपने आप हो जाता है।कोई भी जीव जब शरणागति करता है और भगवान के श्री चरण कमलोंके मधुर अमृत का अनुभव और आनंद लेने की इच्छा करता है, तो उसी क्षण भगवान अति प्रसन्न होते हैं।भगवान तुरंत उसकी इच्छा पूर्ण करते हैं। दूसरी ओर, जो जीव शरणागति तो करता है परंतु, भगवान की इच्छा अनुसार मोक्ष मिलने के लिए प्रतीक्षा करता है, वो भी मुक्त तो होता है और भगवान के चरण कमलोंका मधुर अमृत का अधिकारी होता है, परंतु यह शरीर के अंत में।

जब जीव समझ लेता है की यह शरीर एक क़ैदख़ाना है और संसार के सभी बंधन तोड़कर भगवान का दिव्य और निरंतर आनंद प्राप्त करनेकी इच्छा करता है, और श्री अम्माजी का पुरुषकार प्राप्त कर भगवान की शरणागति करता है, तब भगवान अति दया पूर्वक उसे मोक्ष दे देंगे।मोक्ष मिलनेकी त्वरा में की हुयी शरणागति उसे त्वरित मोक्ष प्रदान करेगी। येही इस पाशूर का महत्त्व है। मुक्त होना यह एक सांसरिक कष्टोंसे भरे हुये एक बड़े महासागर को पार करके दूसरे किनारे पर भगवान को मिलना है।श्री विष्णुचित्त स्वामीजी कहते हैं, “अक्करै एन्नुम् अनतक् कडलुळ् अलुन्दि इक्करै येरि इळैतिरुन्देन्” – (पेरियालवार तिरुमोली ५-३-७) यहाँ एक दार्शनिक प्रश्न उठता है।अगर भगवान मोक्ष प्रदान कराते हैं तो फिर शरणगति मोक्ष प्रदान करती है यह विरोधाभास नहीं होगा क्या?शरणागति तो केवल एक कृति है और उसमे चेतना नहीं है।अगर एक अचेतन कृतिमें मोक्ष देनेकी क्षमता है तो फिर “केवल भगवान को परिपूर्ण ज्ञान है और मोक्ष देनेकी क्षमता है” इस बात से असंगति नहीं होगी क्या?यह कुछ प्रश्न यहाँ पर उठते हैं।इनका उत्तर इस प्रकार है।

कोई भी जीव जो भी कृति करेगा जैसे शरणागति, भक्ति, तप, इत्यादि, वो उसे केवल मोक्ष के “योग्य” बनाते हैं।उन कृतियोंमें मोक्ष देने की क्षमता नहीं है परंतु उस जीव को मोक्ष के लिए वो तैय्यार करते हैं।हमारे ग्रंथ इसे “अधिकारी विशेषणम्” कहते हैं। केवल भगवान इस शरणागति तो देखकर दया करके मोक्ष प्रदान कर सकते हैं। इसके लिए एक सुंदर उदाहरण है। जमीन सरोवर बनाने के लिए एक बहोत बड़ा गड्डा खोदकर बरसात का पानी रुकने के लिए जगह बनाई जाती है।उद्देश्य यह है की जब बरसात हो तो बरसात का पानी इस में जमा हो।परंतु, केवल एक बड़ा गड्डा बनाया इससे यह आश्वासन नहीं दे सकते की बरसात होगी।और कभी बरसात हो भी जाये और पानी जमा करनेके लिए गड्डा नहीं है तो पानी जमा नहीं होगा और पानी संचय करनेका उद्देश्य की पूर्ति भी नहीं होगी। वैसेही, एक जीव शरणागति करता है तो उसे अपने आप मोक्ष नहीं मी जाएगा। वो केवल उस जीव को भगवान की कृपा और वात्सल्य से मोक्ष मिलने के योग्य बनाएगी।भगवान की दया स्वतंत्र है। यह किसी पर निर्भर नहीं है।भगवान को हमपर उनका प्रेम का वर्षाव करने के लिए किसी कारण की आवश्यकता नहीं।तो, जब भगवान की कृपा बहने को तैय्यार हो तो हम उसे प्राप्त करने के लिए योग्य होने चाहिए।यह अपने आप को तैयार करके भगवान की दया को प्राप्त करने के योग्य बनना ही श्रणगति कहलाती है।यह श्री भूतयोगी स्वामीजी द्वारा स्पष्ट किया गया है। “वनतिदरै एरि आम् वण्णम् इयट्रुम् इदुवल्लाल् मारि यार् पेय्गिर्पार्?मद्रु”।तो हम यह सत्य समझ सकते हैं की केवल भगवान ही मोक्ष दे सकते है और हमारी कृतियाँ केवल हमे पात्र बनाती हैं की जब भगवान अपनी निर्हेतुक और स्वतंत्र कृपा का वर्षाव करने लगते हैं तो हमे उस कृपा के पात्र बनाती हैं।हमे समझना चाहिए की यह मांस का बना शरीर एक वास्तविक कारागृह है और इसलिए इससे त्वरित मुक्त होने की इच्छा हममे बननी चाहिए। वो भगवान के श्री चरणोंका मधुर अमृत का अनुभव करनेके लिए उत्सुक होना चाहिए।यह शरणागति कहलाती है जैसे पहले के सभी संबंध सदा के लिए समाप्त हो जाते हैं और भगवान के श्री चरणोंमें समर्पण करना जैसे एक पका हुआ फल वृक्ष से गिरकर जमीन पर गिरता है। शरीर मोक्ष मिलने के लिए हमारा शत्रु है।इस शत्रु पर विजय प्राप्त करनेके लिए शरणागति नामक शस्त्र हमारे पास है।यह समझने के लिए हम भरतजी और बिभीषणजी की श्री रामचन्द्र भगवान के चरणोंमें की हुयी शरणागति का अवलोकन कर सकते हैं।श्री भरतजी ने अपने माँ के कारण कष्ट सहा, श्री बिभीषणजी ने अपने भ्राता के कारण कष्ट सहा। परंतु शरणागति करने के बाद कोई कष्ट नहीं बचा।

तोलुदु उयर् कैयिनन्, तुवण्ड मेनियन्,
अलुदु अज़्हि कण्णिनन्, “अवलम् ईदु” एन
एलुडीय पडिवम् ओत्तु एइदुवान् ‘भरतनुम्
तोलुदु तोन्ड्रिनान्’ मलर् अडि वन्दु वील्न्दनन्”

     – (कम्ब रामायण, अयोध्या काण्ड, तिरुवड़ी चूट्टू पदलम् – ४९)

यह श्री भरतजी की शरणागति है। यह “अधिकारी विशेषण है” जिनपर भगवान अपनी अथाह कृपा दर्शाते हैं।

अब हम श्री विभीषणजी की स्थिति पर एक नजर डालते हैं:

“करन्गळ् मीच्चुमन्दु सेल्लुम् कदिर् मणि मुडियन्, कल्लुम्
मरन्गळुम् उरुग नोक्कुम् कादलन्, करुणै वळ्ळल्
इरन्गिनन् नोक्कुम् तोलुम्, इरुनिलतु इरैन्जुगिन्ड्रान्
वरन्गळिन् वारि अन्न.ताळ् इणैवन्दु वील्न्दान्”

        – (कम्बा रामायण, युद्ध काण्ड, वीडणन् अडैकल पडलम – १३७)

उपरोक्त दो श्लोक जीवात्मा को शरीर के अंदर होनेवाली पीड़ा दर्शाते हैं और उस जीवात्माकी भगवान के शरणागर होकर इस शरीर से निकलनेकी त्वरा को दर्शाते हैं।इसीलिए ये दोनों शरणागति हैं। भलेही वो श्री भरतजी का अपने माँ के कारण का कष्ट हो, श्री विभीषणजी का अपने भ्राता के कारण का कष्ट हो, अथवा जीवात्मा का शरीर के कारण का कष्ट हो, कष्ट से मुक्ति का केवल एकही मार्ग श्री भगवान के चरणोंकी शरणागति है। श्री भरतजी और श्री विभीषणजी दोनोंकी आर्त प्रपत्ति थी। उसी तरह आत्मा भी इस शरीर से निकलने के लिए शरणागति करता है।

उण्डु कोल् उयिर्?” एन ओडुन्गिनान् उरुक्कण्डनन्, निन्ड्रनन्
कण्णन् कण् एनुम् पुण्डरीकम् पोलि पुनल्
अवन् सडा मण्डलम् निरैन्दु पोइ वलिन्दु सोर्वे

अब हम श्री राम भगवान के भरतजी पर और विभीषण जी पर के उनके अनुकंपा कैसी है वो देखेंगे। प्रथमत:

श्री भरतजी का उदाहरण लेवें –

अयावुयिर्तु, अलुगणीर् अरुवि मार्बिडै
उयर्वुर, तिरुवुळम् उरुग, पुल्लिनान्
नियायम् अत्तनैक्कुम् ओर् निलै आयिनन्
दया मुदल् अरतिनै तली इयदु एन्नवे

       – (कम्बा रामायण, अयोध्या काण्ड तिरुवड़ी चूट्टू पदलम् – ५५)

अब हम श्री विभीषण पर हुयी अनुकंपा को देखते हैं।

गुगनोडुम् ऐवर् आनोम् मुन्बु पिन् कुन्ड्रु सूज़्ह्वान्
मगनोडुम् अरुवर् आनोम्, एम् मुज़्है अन्बु वन्द
अगन् अमर् कादल् अय्य! निन्नोडुम् एज़्हुवर् आनोम्
पुगल् अरुन्गानम् तन्दु पुदल्वराल् पोलिन्दान् – नुन्दै”

          – (कम्बा रामायण, युद्ध काण्ड, विडणन आदेक्काला पदलम् – १४३)

तिरुवडि मुडियिन् सूडि, सेन्गदिर् उचि सेर्न्द
अरुवरै एन्न, निन्ड्र अरकर्-तम् अरसै नोक्कि
इरुवरुम् उवगै कूर्न्दार्, यावरुम् इन्बम् उट्रार्
पोरु अरुम् अमरर् वालित, पूमलै पोलिवदानार्

            – (कम्बा रामायण, युद्ध काण्ड, वीडणन् अडैक्कल पडलम् – १४५)

तिरुवडि मुडियिन् सूडि, सेन्गदिर् उचि सेर्न्द
अरुवरै एन्न, निन्ड्र अरकर्-तम् अरसै नोक्कि
इरुवरुम् उवगै कूर्न्दार्, यावरुम् इन्बम् उट्रार्
पोरु अरुम् अमरर् वालित, पूमलै पोलिवदानार्

             — (कम्बा रामायण, युद्ध काण्ड, वीडणन् अडैक्कल पडलम् – १४५ )

तेडुवार् तेडनिन्ड्र सेवडि, तानुम् तेडि
नाडुवान् अन्ड्रु कण्ड नान्मुगन् कली इय नल्नीर्
आडुवार् पावम् ऐन्दुम् नीन्गि, मेल् अमरर् आवार्
चूडुवार् येइदुम् तम्मै सोल्वार् यावर्? सोल्लीर्”

           — (कम्बा रामायण, युद्ध काण्ड, वीडणन् अडैक्कल पडलम् – १५०)

तो, खूब चिंता शोक डर युक्त जीव शरणागति करता है तो भगवान अपनी कृपा से उसे मोक्ष दे देते हैं। (उपाय का अर्थ साधन होता है और उपेय का अर्थ फल होता है।) हमारे पूर्वाचार्य इस “भगवान की कृपा ही उपाय और भगवान की सेवा ही उपेय” ऐसे कहते हैं।  श्री भरत जी की और श्री विभीषण जी की शरणागति में हम देख सकते हैं की श्री विभीषणजी की शरणागति सफा हुयी और श्री भरतजी की नहीं। (श्री भरतजी की शरणागति सफल क्यों नहीं हुयी यह एक अलग विषय है।मुख्य बात यह है की श्री भरतजी को फल देने के लिए श्री रामजी को वो उचित समय नहीं लगा। उनको १४ वर्ष के संकल्पोंकों पूर्ण करना था।उनकी विशेष योजना थी की श्री भरतजी आगये। श्री भरत जी को शरणागति को सफल करनेके लिए १४ वर्ष प्रतीक्षा करनी पड़ी।इससे यह सत्य भी पता चलता है की भगवान स्वतंत्र हैं और वो निर्णय ले सकते हैं की शरणागति का फल कब देना है। हमने पूर्व में जो बरसात का दृष्टांत देखा था उसके अनुसार, भरतजी के संदर्भ में गड्डा खोदा हुआ तैय्यार तो था, पर बरसात का समय नहीं आया था।)

श्री वचनभूषण में श्री पिल्लै लोकाचार्य स्वामीजी कहते हैं, “भरतनुक्कु नन्मै ताने तीमै आयिट्रु”। इसका अर्थ यह हुआ की शरणागति की कृति केवल योग्य बनाती है (अधिकारी विशेषणम्) परंतु मोक्ष नहीं दे सकती। तो जब यह पाशूर कहता है की शरणागति मोक्ष देती है तो समझना चाहिए की अगर जीव को तुरंत मोक्ष चाहिये तो शरणागति मोक्ष मिलने की रुकावटें दूर करती है। परंतु पाशूर कभी भी यह नहीं कहता की शरणागति खुद मोक्ष देती है।यह ठीक तरह से समझना चाहिए की शरणागति संबन्धित सभी सत्य सिद्धान्त श्री वरवरमुनी स्वामीजी अपने विश्लेषण में प्रकाशित करते हैं।

Source: http://divyaprabandham.koyil.org/index.php/2014/11/gyana-saram-1-una-udal/

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ज्ञान सारं – प्रस्तावना

श्री:
श्रीमते शठकोपाय नम:
श्रीमते रामानुजाय नम:
श्रीमत् वरवरमुनये नम:

ज्ञान सारं

तनियन्                                                                                                   ज्ञान सारं – पासुर (श्लोक) १

 

श्री देवराजमुनी श्री रामानुज स्वामीजी के शिष्य थे और उन्होने अपने आचार्य के दिव्य श्री चरणोंमें शरणगति की। उन्होने समस्त वेद और शास्त्रों कों अपने आचार्य से सीखा और समझा। इसी कारण उन्हे परम तत्त्व भगवान तक पहुँचने का और परम आनंद प्राप्त करने का मूलभूत रहस्य अच्छी तरह से समझ गया था । वो नित्य अपने आचार्य श्री रामानुज स्वामीजी के श्री चरणों के निकट अपने आचार्य के सुख केलिए सभी केंकर्य कराते हुये बिराजे। ऐसी विशेष गुरुनिष्ठा युक्त श्री देवराजमुनी, अपनी विशाल दया के कारण यह चाहते थे उन्होने जो तत्त्व अपने आचार्य से सुने उनका सभी जीवों कों विशेष लाभ मिले। अत: श्री रामानुज स्वामीजी के निर्देशों के आधार पर उन्होने ‘ज्ञानसारम्’ यह सरल स्पष्ट तमिल भाषा में तमिल वेन्पा शैली में और सब कोई समझ सकें ऐसा लिखा और भगवान के यथार्थ स्परूप, भगवान तक पहुँचने का मार्ग, और भगवान से मिलनेपर होने वले परमानंद को हमे प्रदान किया।

ज्ञान सारं – तनियन (ध्यान श्लोक)

श्री:
श्रीमते शठकोपाय नम:
श्रीमते रामानुजाय नम:
श्रीमत् वरवरमुनये नम:

ज्ञान सारं                                                                                                                   प्रस्तावना

(तनियन)
(ध्यान श्लोक)
कार्तिकेभरणी जातं यतीन्द्राश्रयमाश्रये।
ज्ञानप्रमेयसारभि: वक्तारं वरदं मुनिम्॥

विश्लेषण: जिनका अवतार कार्तिक मासमें भरणी नक्षत्र में हुआ है, जो श्री रामानुज स्वामीजी जो यतीन्द्र हैं उनके शरणागत हैं, जिन्होने अपने ज्ञानसारम् प्रमेयसारम्ग्रन्थों में आचार्य महिमा का वर्णन किया हैऐसेश्री देवराजमुनी स्वामीजी की मैं शरण ग्रहण करता हूँ।

रामानुज सच्छिष्यं वेद शास्त्रार्थ संपतम्।
चतुर्थाश्रम संपन्नं देवराजमुनिं भजे॥

श्री रामानुज स्वामीजी के सत्-शिष्य, जो वेदशास्त्रार्थ में पारंगत हैं, जो सन्यासाश्रम से सम्पन्न हैं ऐसे (रामानुज सच्छिष्यं): अपनेप्राथमिक नाम “यज्ञमूर्ति” से उन्होने श्री रामानुज स्वामीजी के साथ १८ दिनोंतक वेदान्त के विषयपर तर्क-वितर्क केआधारपर वाद विवाद किया। इससेश्री रामानुज स्वामीजी संप्रदाय के रक्षा के विषयमें बहोत चिंतित होगाए। श्री वरदराज भगवान श्री रामानुज स्वामीजी के स्वप्नमें दर्शन देकर कहे की “हेरामानुज, कृपया निराश न होइए। मैं तुम्हे मैंने बनाया हुआ एक प्रतिभावान शिष्य दे रहा हूँ। आप उनपर जरूर विजय प्राप्त करेंगे।”

(वेद शास्त्रार्थ संपतं):
उन्होने१८ दिनोंतक श्री रामानुज स्वामीजी सेशास्त्रार्थ किया इससेहम उनके शास्त्रों के गहरे ज्ञान का अनुमान लगा सकते हैं। उन्होने समस्त शास्त्रोंका सार अपने ज्ञानसारम्प्रमेयसारम् के माध्यम से हमे तमिल वेन्पा शैली के सुंदर पाशूरों द्वारा प्रदान किया है।

(देवराज मुनी)
श्री वरदराज भगवान (श्री देवराज भगवान/श्री अरूलाल भगवान) केकृपा केकारण उनका श्री रामानुज स्वामीजी का शिष्य बनना यह उनकी महानता है। उनकी महानता का कारण और भी है की उनकी ज्ञान, भक्ति, वैराग्य श्री रामानुज स्वामीजी केसमान थी। हम समझ सकतेहैं की इसी कारण वे अरूलालमुनी इस श्रीनाम सेभी जाने जाते हैं।

सुरुळार्करुङ्गकुलल तोगैयर्वेल्विलियिल्तुवळुम्

मरुळाम्विनैकेडुम्मार्क्कम्पेर्रेन्मरैनान्गुम् – सोन्न
पोरुळ्ग्यान सारत्तैप्पुन्दियिल्तन्दवन्पोङ्गोळिसेर्
अरुळाळ ममुनि-अम्पोर्कलल्गल्अडैन्द पिन्ने

भावार्थ: श्री अरूलालमुनी केदिव्य श्री चरणोंका आश्रित होने के बाद दास को अनादि काल से संचित कर्मोंका नाश करने का मार्ग मिल गया है। श्री स्वामीजी नेअपनेज्ञानसारम प्रमेयसारम ग्रंथ से चारो वेदोंकेगूढ़ार्थ का और तिरुमंत्र केयथार्थ भाव का हमेपान कराया है। श्री स्वामीजी ज्ञान के तनियन का अर्थ है: हमारेसंचित कर्मोंकेकारण हमारेसत्य की स्पष्टता घटती है। यह घटनेकेकारण हमारा स्त्रियोंकेओर आकर्षण बढ़ता है। इसी कारण हमारा मन उनकेघुंगरालेकालेकेश और सुरेख नयनोंपर मोहित हो जाता है। मगर श्री देवराजमुनी केदिव्य श्री चरणोंमेंसमर्पण करनेकेबाद मुझेसमझमेंआया की में कैसे इस काम और काम से संबन्धित अपचारों से दूर रह सकता हूँ। मेरे आचार्य श्री देवराजमुनी को शरण होने के बाद, और यह ज्ञानसारम प्रमेयसारम का अध्ययन करने के बाद मेरे मन को यथार्थ बात समझ में आई है। इसी कारण मुझे स्त्रियों के सुंदर केश तथा भाले के नौक के समान सुंदर नेत्र को देखने का कार्य करानेवाए मेरे बुरे कर्मोंका विनाश करनेका मार्ग समझ में आगया है।

स्त्रियोकी केतरफ आकर्षण केसाथ हमारेइतर अपचार जैसेक्रोध, लोभ, अज्ञान, मत्सर, द्वेष, मिथ्या अभिमान इत्यादी भी नष्ट हो जाते हैं। इसीका अर्थ यह भी है की जो अपचार मनुष्य के संस्कृति का नाश करते है, वो आचार्य कृपा कटाक्ष से दूर हो सकते हैं। आचार्य की महानता पे इस तनियन से प्रकाश डाला गया है।

gyAna sAram 2 – naragum suvargamum

gyAna sAram

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                                                                          2nd pAsuram

srI:
srImathE satakOpAya nama:
srImathE rAmAnujAya nama:
srImadh varavaramunayE nama:

R

thamizh: 

“நரகும் சுவர்க்கமும் நாண் மலராள் கோனைப் 
பிரிவும் பிரியாமையுமாய்த் – துரிசற்றுச் 
சாதகம் போல் நாதன் தனதருளே பார்த்திருத்தல் 
கோதிலடியார் குணம் “

 

English:  

“naragum suvargamum nAN malarAL kOnai 
piruvum piryAmaiyumAy – thurisatRu 
sAdhagam pOl nAdhan thanadharuLE pArthiruthal 
kOdhiladiyAr guNam”

 

Phrasal Meaning:

Naragum                                             –                      sufferings (literal meaning is ‘hell’)
suvargamum                                       –                      and happiness (literal meaning is heaven)
pirivum                                                –                      (are respectively when) separated from and
piriyAmaiyumAi                                  –                      united with
nANmalarAL kOnai                            –                      the consort (husband) of srI mahAlakshmI (nAN
malarAL – one who sits on Lotus flower and
her kOn is her ruler).
pol                                                       –                      like / similar to

thurisatRu                                            –                      the unblemished(thurisu is blemish/mistake and
atru is without it)
sAdhagam                                           –                      “sAdhagam” bird that just looks out for rain water
and drinks it directly when the rain pours,(If there is
no rain, it does not drink any other water and
dies off.)
gunam                                                 –                      the character/nature of
kodhiladiyar                                        –                      unblemished devotees
paarthuiruthal                                     –                      is to expect
arulE                                                   –                      compassion (karunai) of ONLY the
naadhan thanadhu                              –                      emperumAn.

Explanation :

Naragum Suvargamum: The phrase “naragum suvargamum” refers to pain/sadness and happiness/pleasure. In thiruvAimozhi 3.10.7 (thunbamum inbamum) too, swAmi nammAzhwAr says “inbamil ven naragAgi iniya nalvAn suvarkkangaLumAi”.Here the vyAkyAnam explains narakam(hell) and suvarkkam (heaven) to mean thunbam (sufferings), and inbam (happiness) in the context of the pAsuram.

With that being said, what constitutes happiness and sadness for those having parabhakthi? This (and the meaning of ‘parabhakthi’) is explained as follows.It is like hell when when such a personis separated from the Lord who is the divine consort of the one who is seated on the lotus flower (sri mahA Lakshmi – periya pirAttiAr). When he is not separated, then that is happiness for such a person. The very substance of parabhakthi is that when one is not able to survive when he is away from emperumAn. When he is in unison with the Lord, he is able to survive. There is an example given to this condition of such a person.

In srIrAmAyaNam, when perumAL (rAma)was leaving the kingdom to go to forest,pirAtti (wife, sIta) wanted to accompany him in the forest. He tried to convince her by explaining about the dangers of the forest and the comforts here,and so he made his point that the going with Him to the forest would be suffering, and staying back in the kingdom would be pleasure/happiness. After listening to such a definition, pirAtti corrected emperumAn. She replied “Happiness and sadness are not defined in the way you explained. It would be different from the perspective of different people.(For me) being with you is happiness, and being separated from you in the palace is sadness; if devareer do not know this true definition please learn it from adiyen; it is not wrong to learn from others about what we do not know; unlike you whose love is limited and measured, adiyen have unlimited love for you”. After carefully listening to her retort, Rama asked her “Ok. You said that you have got an infinite amount of love towards me. What should I do now?” Sita was quick to add “I shall lead, and all You have got to do is just follow me”. This is periyavAchAn piLLai’s vyAkyAnam (explanation/exposition).

There is a Vedanthic question that may be raised here. Sita said that it is happiness when she is with Rama and it is sadness when she is not. This may be acceptable for her situation. But can other people feel the same about the Lord, that is, can somebody go to the Lord (only) and say “If I am being separated from You, it is hell and if I am not, only then it is heaven? The answer is “No” because there is a difference between pirAtti (who incarnated as Sita) and other souls like us. For us, the state of heaven and hell is when we think we are separated from BOTH the Lord and His divine consort pirAtti whereas for pirAtti, the separation limits only to the Lord. She is being referred as “EkAyaNai” and we jIvAthmAs are termed as “midhunAyars”. “EkAyaNai is the one who has only One as her sustainer, whereas “midhunAyars” have both “pirAtti and the Lord” as their sustainer. “Mithunam” refers to perumAn and pirAtti’s togetherness, duality.

naaN malarAL kOnai pirivum piriyAmaiyumAi:  The state of mind when one is separated from Perumal and Pirati, is being referred to as sadness; and when one is not separated from them, then it is happiness for him.iLaiya perumAL (Lakshamana)also said, making himself equal to sItAjust only in the context of not being able to bear the separation, that “Just like how Sita cannot live without You, I cannot also live without You”.

This should not be understood as iLaiya perumAL (Lakshmana)is being similar to Sita whose happiness is to be Only with Rama. It should be understood that for iLaiya perumAL, happiness is being with the togetherness of “Rama and Sita”.That is why when leaving for the forest, iLaiya perumAL (Lakshmana) said “I want to do all the services to You and Sita when you both roam in the valleys of the forest, near the mountains, when you both sleep, and when you both are awake. Please take me with you for this reason only”. So for jIvAthmAs too it is acceptable to do service only to bothpirAtti and emperumAn together, the divine couple.

thurisatRu:Here thurisu -mistake. atRu – not having that (mistake).

Mistake is to use bhakthi as a means of attaining him.The bhakthi here is about suffering when separated from emperumAn and pirAtti, and being happy when being together with them. One should consider this bhakthi as adhikAri visEshaNam – that is, consider bhakthi as making them ready/eligible to receive and enjoy emperumAn’s union. Like how it is important to be hungry in order to eat food, one should have bhakthi in order to enjoy the lord. This bhakthi would not become a means/upAyam. Only bhakthi upaskAs would consider it as a means; saraNagathas would not consider it as a means to attain Him. To consider bhakthi as a means is a mistake/blemish in a person. Thurisu-atRu – refers to those who are Not having the mistake of thinking of their bhakthi as a means.

sAdhagam pOl nAdhan thanadharuLe pArthiruthal:  “chAtaka” is a bird that drinks no water other than the rain water; even if its mouth goes very dry it would keep looking for rain water. Similarly, it is the nature of pure (blemishless) adiyArs to keep looking for His grace/krupai as the means for attaining Him. We can see the same meanings in thirumangai AzhvAr’s: “thuNiyEn ini ninaruL alladhu(periya thirumozhi 11-8-8)”,and in periyAzhvAr’s chenniyOngu padhigam: “nin aruLE purindhirundhEn (periyAzhvAr thirumozhi 5-4-1)”.

kOdhiladiyAr guNam:   adiyAr (devotees) are those who do not have the blemish of using other means and seeking other benefits. A devotee is a true servant who lives with the thought “prApthAvum prApakanum prApthikkugapAnum avanE”(Note: “prApthA” is the One who is to be attained (ultimate objective), “prApakan” is the way/means to attain that ultimate destination; and this act of attaining the desired is known as “prapAthi”. So the srI vachana bhUshaNam phrase says that such a devotee performs with the thought that “My prApathA, prApakan both are same, that is Him, and it is He who would be happy when He gets us”. Since the prapannan is a property (note this english word rhymes with prapathi) of the owner (perumAL), when the Lord’s property reaches Him eventually by way of prapathi, it is the Lord who becomes happy and not vice-versa. As the only Owner of all souls, it is the Lord who enjoys when a prapannan reaches Him. Seeing the happiness on the Lord’s face, a soul can feel happy and there is nothing called a happiness of the soul for itself for us). As we reach Him it is the truth that he is the head/owner of all ofu s. Thus, in the first half of this pAsuram, swAmi aruLALa perumAl emperumAnAr talked that “benefit is none other than perumAL” and in the latter half, he described that “the means is none other than perumaLHimself”. One should realize that this is the nature/state of “kOdhiladiyAr (devotees without blemishes)”.

gyAna sAram 1- Una udal

srI:
srImathE satakOpAya nama:
srImathE rAmAnujAya nama:
srImadh varavaramunayE nama:

gyAna sAram

Introduction

                                                                              1st pAsuram

What gives ultimate happiness to a soul (jIvAthmA) is the liberation (mOksham). In order to get liberated, one should know the inner meanings and deeper purports of (i) thirumanthram (ii) dwaya mahAmanthram and (iii) charamaslOkam from his own guru (AchAryan). These three manthrAs are termed as “rahasyam” (secrets). Our shAstrAs proscribe that these can be shared only with ardent seekers who have the insatiable desire to learn them and not with others. Since they are preserved with utmost care, they are called as “rahasyam”. These three that are collectively known as “rahasya thrayam”, are the crux of vedAnta as expressed by our srIvaishNava sampradhAyam. They also specify the Supreme Lord’s true nature as is. They elaborate the path to reach that Absolute Supreme, the subsequent enjoyment of a jIvAthmA after reaching Him (paramAthmA). All the three rahasyams were uttered by the Supreme God himself, in order to exalt the down-trodden people of this universe who are suffering in this place for eons together from the never ending cycle of birth and death and the associated ups The rahasya thrayam was enunciated thus. Bhagawan srIman nArAyaNA took the incarnation of NArAyaNA (AchAryan) and elaborated the first rahasyam – Thirumanthram, to Nara (sishyan) at badarikAshramam. Bhagawan told the “Dwaya mahAmanthiram” to His divine consort Sri mahAlakshmi (periya pirAtti) in Srivaikuntam. Finally, Bhagawan incarnated as Krishna and steered the chariot and served as the charioteer for HIS friend arjunA during the battlefield of kurukshEtra (the battle of Mahabharatha). It is during this time that He enunciated the “Charama SlOkam” towards the end of “Bhagavath  Geetha”. These three rahasyAs are being passed along the srIvaishNava Guruparampara lineage. The ancestors of SrIvaishNava lineage who have realized the Supreme and have adeptly pointed out the infallible yet easy path to reach the Supreme, have treasured these three rahasyams with utmost care. (These three are not similar to any earthly treasure that is kept in a locker without any usage. It is as usable as it is treasured). Our ancestors have always used them in every walk of their lives. Such is the greatness of these rahasyams.

Out of the three rahasyams, the first is the “Thirumanthram”. It is called as the “First Rahasyam” that has 3 parts to it. They are (a) Om (b) Namaha and (c) nArAyaNAya. The first part (Om) is referred to as “praNavam”. The second part (namaha) and the third part (nArAyaNAya) elaborate the praNavam. (They explain about the qualities of paramAthmA and jIvAthmA, the master-servant relationship, the time this relationship started, the time up to which it will last, and if there are any other persons to which the jIvAthmA serves as a servant.)

The “Dwaya Mahamanthram”, celebrated as the “jewel of all manthrams”, has two lines in it. The first line elaborates the inner meanings of the “namaha” part of thirumanthram, and the second line clarifies and details out the “NArAyaNAya” part of thirumanthram. Since it has two lines in it, it is being referred as “Dwayam”. The first line in Dwayam talks about the different ways to take refuge at the Lotus Feet of Bhagawan. When a person catches hold of Bhagawan’s feet, he should do so by renouncing all other means that he had earlier undertaken, in order to reach Him. The person should do so in such a way that there should not be any iota of earlier paths’s thoughts left in him. Moreover, he should also renounce the lingering fact in his mind that         “I have caught the Lotus feet of Bhagavan, and this act of mine will definitely take me to HIS Protective Lotus Feet”. (The reason he is expected to leave that thought as well, is because if he does not, then it appears that something apart from Bhagawan’s Feet, i.e., one’s own effort of submission, can fetch mOksham.  It cannot fetch mOksham at any cost and so should be completely gotten rid of.)   Hence, the only refuge is Bhagawan’s Lotus feet and nothing else and one should be very determined in this basic principle. The second line in Dwayam talks about the benefit to such a person who had renounced all his own efforts. The benefit is the golden opportunity to do eternal service to the Lord together with HIS consort (pirAtti) (and to HIS devotees).

This is like the service that lakshmanA rendered to Lord rAmA and sIta in srIrAmayaNam.  However, this kind of an opportunity (doing eternal service to the Divine consort and their devotees) comes only after all the sins, that have been accrued due to karma, have been annihilated. Dwayam that comprises of two lines is being expounded in detail by the third rahasyam known as the CharamaslOkam. Thus CharamaslOkam is based off of Dwayam.

Dwayam is juxtaposed between Thirumanthram and CharamaslOkam. (Dwayam explains in detail the “namaha” and “NArAyaNAya” part of Thirumanthram. It also creates a platform upon which CharamslOkam thrives by answering certain implied meanings of Dwayam. Even though Thirumanthiram and CharamaslOkam have connections with “srI”, (srI sambandham), Dwayam is the only “rahasyam“ that has “Sri” spelt out explicitly. Thus, of all these three rahasyams, it is the Dwayam that our ancestors have regarded as the most important and significant. As stated  earlier, the first line of Dwayam talks about a jIvAthmA that renounces all his efforts, and recognizes and takes Bhagawan’s Lotus Feet as his last and only frontier. This is essentially known as “saraNAgathi”. The saraNAgathi is of two types. The first type is that doing it with an urgency like “I can no longer be in this world, not even for a split second more. I have realized about the “Supreme You” and would like to reach You right away without any delay”. The second type is doing it with the thought that “Oh! My Supreme Lord! You bestow upon me mOksham whenever You deem is the right moment”. Out of these two types of prapathi, the former is always greater than the latter. (The former is known as “Aartha prapathi” and the latter “Druptha praparthi”) The first pasuram of Gyana Saram talks in detail about “Aartha prapathi”, the ‘urgent’ type.

pattabhishekam

thamizh:

“ஊன உடல் சிறை நீத்து ஒண் கமலை கேள்வனடித்
தேன் நுகரும் ஆசை மிகு சிந்தையராய்த் – தானே
பழுத்தால் விழும் கனி போல் பற்றற்று வீழும்
விழுக்காடே தான் அருளும் வீடு”

 

English: 

“Una udal sirai neethu oN kamalai kELvanadi
thEn nugarum Asai migu sindhaiyarAy thAnE
pazhuththAl vizhum kani pOl patratru vIzhum
vizhukAdE thAn aruLum vIdu”

 

Phrasal Meaning:

aasai migu sindhayaraay = When people, with a deep desire in their hearts

neethu = to get rid of

udal = the body that is

sirai = a prison

Oona = made of flesh, and

nugarum = to enjoy

adi thEn = the sweetness of the Lotus feet (literally, “thEn” is nectar and “adi” is feet)

kelvan = of the consort of

onn = the beautiful

kamalai = pirAtti who sits on the beautiful lotus,

patrartru = without any hold to other desires or ways

veezhum = perform sarangathi

kani pol = like how a fruit

pazhuthaal = which if ripens

thaane vizhum = would fall automatically,

vizhukaade thaane = that very saraNAgathi

veedu arulum = will liberate and grant mOksham.

Explanation:

This body of ours is made of flesh. It is made of impure stuff like skin, nerves, muscles, bones, excreta, so on and so forth. It is been regarded as “PuNNAr Akkai”. That is, if the skin is torn and even if a small amount the size of a small bee’s wing is exposed, then various flies, insects, ants, crows, etc., would surround it to eat the flesh, etc. (Taken from nAladiyAr’s thuravaraviyal,(regarding sainthood), first poem namely “thUythanmai”). If the inner parts of the body are exposed, then one would not find enough time to ward off the crows trying to eat them. Those who realize this would develop a natural grudge on this body and would always see the soul inside the body than the body per se. On top of it, the stay of the soul inside the body is perceived just as a prisoner held captive in a jail. The soul, by itself, is resplendent with knowledge but it is being clouded by a layer of ignorance when it is kept inside the body. This is similar to how a sparkling piece of diamond is kept inside a pot that inhibits the diamond from showing its radiance as long as it is under its wraps. The very fact that the soul is so immersed and invisible in the body is its greatest punishment / sentence given by the Supreme Lord. The acts of those who do not realize that it is a jail and continue to enjoy the mundane stuff are akin to one of a mentally challenged. Those that have the cognizance (gyAnis) will try to break these shackles of the prison and would want to escape from it forever. They (gyAnis) know that doing saraNAgathi towards the Supreme Lord is the only way to get out of such prison and that nothing else can salvage them. Krishna in His Bhagavath gIthai has told that it is HE who can make a person come out of the bonded prison. The reason a soul is being held captive in the body is due to its karmic effects. Nothing other than saraNAgathi can nullify these karmic effects. Krishna has told time and again that “If a person surrenders at MY feet, I will ensure that the AthmA is freed from such a prison”.

A common man’s power is not much – he cannot even untie the locks of a sparrow’s nest. With this being the case, can he ever untie his body from the locks of karma, that has been cast upon him by the Supreme? A wealthy person who has been imprisoned would want to get relieved from the jail first than enjoying the luxuries of the outside world. Similarly, the first thing to do for the soul is to get rid of this jail called “body”. Since the jail is such an inferior place, the only way out is saraNAgathi. The way to do saraNAgathi is to completely surrender unto the Lotus feet of Sriman NArAyaNan through His consort periya pirAtti as specified in dwayam. The act of giving oneself up completely and falling under HIS feet is as sweet as having a sweet honey. Those who got an opportunity to taste it will always think about HIM and HIS sweetness forever. He will always want to enjoy that experience. Like how a hungry child yearns for his / her mother’s milk, the one who does saraNAgathi (saranAgathan) would always yearn for the sweet nectar of the Supreme Lord’s Lotus feet. When he surrenders to the Lord, it is a complete surrender, meaning the person relinquishes all other ways that he thought would take him to the Supreme, and all his interests in other worldly things. Those ways and things that he liked earlier to saraNAgathi will automatically vanish into thin air, once he sets in for surrender. This is the essence of this pAsuram.

To give an example to it, Swami aruLALa perumAL emperumAnAr says that just like how a fully ripened fruit falls automatically from the tree thereby breaking all the connections it had with the tree before, a saraNAgathan, when he does saraNAgathi, is assured that all his previous practices, norms and ways go away and bear no connection in the relationship between him and the Lord. This act of breaking the previously established connections happen automatically when the saraNAgathan performs total surrender. When the person does saraNAgathi and yearns to experience and enjoy the sweet nectar of the Lord’s feet from the very next second, it pleases the Lord immensely. He grants him his wish immediately.  On the other hand, he who do surrenders but is willing to wait for the Lord to grant mOksham as per HIS wish, will also be liberated and assured of enjoying Lord’s sweet nectar, after his body falls down at the time of his death.

When one realizes that this body is a prison, and yearns for the divine enjoyment with the Lord forever, and performs saraNAgathi to HIM with the help of Periya Pirati, after breaking the shackles that he had with the external world, when he performs such a saraNAgathi, bhagawan would be kind to that person and give mOksham. So, saraNAgathi done with urgency to go to mOksham would immediately give him mOksham is the significance of this pAsuram.

Getting liberated (mOksham) is like crossing a big ocean of worldly sufferings andreaching Bhagawan at the other side of the shore. Periyazhwar says “akkarai ennum anatha-k kadaluL azhundhi ikkarai yEri iLaithirundhEn” – (Periyazhwar Thirumozhi 5-3-7).

A philosophical question is raised at this instance. If it is said that Bhagawan Himself will grant mOksham, then is it not contradictory to believe that saraNAgathi will grant mOksham? Moreover, saraNAgathi is just an act and it does not have consciousness by itself. If such an act has the power to grant mOksham, is it not contradicting the obvious truth that only Bhagawan has the knowledge and the power to grant mOksham? These are some typical questions that may arise at this point. The answers to it are as follows. Whatever action a devotee performs, including saraNAgathi, bhakthi, penance and the like, will only make him “qualified” to get mOksham. It never has the ability to grant mOksham but will just make a person eligible/ready to receive mOksham. Our scriptures term this as “adhikAri vishEshaNam”. Only bhagavan can give mOksham after becoming compassionate seeing this saraNAgathi. There is a beautiful illustration for this. People construct a big lake by digging out a vast area of land and creating a very big space to hold water. The motive behind this is that when it rains, the rain water could be accumulated in a central reservoir. But, just because a large block of lake has been created, there is no guarantee that it would rain. However, if one fine day, it rains, then if there is no space to store the rain water, then all the rain will not be stored and hence the very objective of storing rain water will be defeated. Similarly, even though a soul does saraNAgathi, that will not grant mOksham by itself; rather it will just make him ready to receive the Lord’s untainted compassionate love. The Lord’s compassion is independent; it does not depend on anything to trigger it. There is no reason needed for the Lord to shower His love on us. So, when the Lord’s compassion is all set to flow, we should be qualified and be ready to receive it. This act of preparing oneself and be ready to be a recipient of Lord’s mercy is known as saraNAgathi, bhakti etc. The qualification can never be a reason. This point has been clarified by bhUdhathAzhvAr in “vanathiDarai eri Am vaNNam iyatrum idhuvallAl mAri yAr peygirpAr? matru”. So, we do realize the truth that only the Lord can give mOksham and that our acts can only make us qualify when the Lord actually showers his independent and unconditional mercy. One should know that this body that is made of flesh is a real time prison and hence should quickly develop the desire to escape from it. He should be eager to experience the sweet nectar emanating from the Lord’s feet. This is known as saraNAgathi that is being done when all the connections from the earlier desires and ways have been cut off forever and falling at the Lotus feet of the Lord, just like a fully ripened fruit is cut off from its tree and falls on the ground.

The body is an enemy in getting mOksham. To win over this enemy, saraNAgathi is the weapon available to us. To illustrate this point, we can look at the saraNAgathis that Bharatha and Vibishana did under the Lotus feet of Rama. Bharatha suffered only because of his mother, and Vibishana suffered due to his arrogant brother rAvana. Both of them are not able to suffer anymore.

“thozhudhu uyar kaiyinan, thuvaNda mEniyan,
azhudhu azhi kaNNinan, “avalam eedhu” ena
ezhudhiya padivam oththu eidhuvAn
‘bharathanum thozhudhu thOndrinAn’ malar adi vandhu vIzhndhanan”

— (kamba rAmAyaNam, ayOdhyA kANdam, Thiruvadi choottu padalam – 49)

This is Bharatha’s saraNAgathi. This is known as “Adhikari Visheshanam” or the “qualifications of the surrendered” upon which the Lord shows HIS unfathomable mercy. Now let us take a look at Vibishana’s position:

“karangaL mIchchumandhu sellum kadhir maNi mudiyan, kallum
marangaLum uruga nOkkum kAdhalan, karuNai vaLLal
iranginan nOkkum thOlum, irunilathu irainjugindrAn
varangaLin vAri anna.thAL iNaivandhu vIzhndhAn”

— (Kamba rAmAyaNam, yudhdha kANdam, vIDaNan adaikala padalam – 137)

The above two are about the sufferings of the soul inside a body and its need to quickly get out of it by falling at the Lord’s feet. Hence these two are saraNAgathis. Whether it is Bharatha’s suffering because of his mother or VibishaNa’s suffering from his brother, or soul’s suffering from its body, the only path to salvation is saraNAgathi to Lord’s feet. Both Bharatha and VibishaNa have performed the first type of saraNAgathi described above, which is to yearn for the divine experience of enjoying Bhagawan’s Lotus feet immediately with urgency. In the same way Athma also yearns to leave this body and performs saraNAgathi.

uNdu kol uyir?” ena odunginAn urukkaNdanan, nindranan
kaNNan kaN enum puNdarIkam pozhi punal
avan sadA maNdalam niraindhu pOi vazhindhu sOravE.

We shall now see the compassion that Rama showed on Bharatha and Vibishana. First let us take Bharatha’s case:

“ayAvuyirthu, azhugaNIr aruvi mArbidai
uyarvura, thiruvuLam uruga, pullinAn
niyAyam aththanaikkum Or nilai Ayinan
dhayA mudhal arathinai thazhI iyadhu ennavE”

— (kamba rAmAyaNam, ayOdhyA kANdam, Thiruvadi Chootu Padalam – 55)

Now, let us see the compassion that Rama showed to Vibishana:

“guganOdum aivar AnOm munbu pin kundru sUzhvAn
maganodum aruvar AnOm, em muzhai anbu vandha
agan amar kAdhal ayya! ninnodum ezhuvar AnOm
pugal arungAnam thandhu pudhalvarAl polindhAn – nundhai”

— (kamba rAmAyaNam, yudhdha kANdam , vIDaNan adaikkala padalam – 143)

“thiruvadi mudiyin sUdi, sengadhir uchi sErndha
aruvarai enna, nindra arakar-tham arasai nOkki
iruvarum uvagai kUrndhAr, yAvarum inbam utrAr
poru arum amarar vAzhthi, pUmazhai pozhivadhAnAr”

— (kamba rAmAyaNam, Yudhdha kANdam, vIdaNan adaikkala padalam – 145)

“thEduvAr thEdanindra sEvadi, thAnum thEdi
nAduvAn andru kaNda nAnmugan kazhI iya nalnIr
AduvAr pAvam aindhum nIngi, mEl amarar AvAr
chUduvAr yeidhum thammai solvAr yAvar? sollIr”

— (kamba rAmAyaNam, yudhdha kaNdam, vIdaNan adaikkala padalam – 150)

So with a lot of angst when a soul does saraNAgathi, the Lord would show his mercy and grant mOksham is the meaning. (“upAyam” is the way or means to attain and “upEyam” is the object that is being attained) – Our ancestors call this “irakkam upAyam, inimai upEyam”. That is, His compassion/mercy is the means, and what is attained is the sweetness (of serving Him).

In Bharatha and VibIshana saraNAgathis, we do see that Vibishana saraNAgathi was successful whereas Bharatha saraNAgathi was not. (This is a separate topic by itself as to why Bharatha’ saraNAgathi was not successful whereas Vibishana’s was. The bottom line here is that for Bharatha, Rama did not deem it to be the right time to yield to his requests because He had a plan to be in exile for 14 years, protect the rishis in the forest, meet Vibishanan and get him to HIS troop and accept him and kill Ravana and so on. He had a detailed plan and in came Bharatha. His saraNAgathi was not successful at that point since he had to wait for 14 years. It goes ahead to bolster the point that it is the Lord’s independent nature and it is He who chooses when to fructify the acts of a saranagathan. In the rain example that we saw earlier, Bharatha’s case was like the lake was created but it was not the right time for rain”.) In srIvachanabUshanam, swAmi piLLailOkAchAryar says “Bharathanukku nanmai thAnE thImai Ayitru”. Hence, the acts of saraNAgathas can only be a qualifier (adhikAri visEshaNam) and cannot be a granter of mOksham. So when this pAsuram says that saraNAgathi would give mOksham it is explaining about how saraNAgathi would avoid delays in giving mOksham (if the person wants it immediately), and it does not say that saraNAgathi itself would give mOksham. It should be understood that all these truths about saraNAgathi are being elaborated by swAmi maNavALa mAmunigaL in his explanation of this pAsuram.

gyAna sAram – Introduction

srI:
srImathE satakOpAya nama:
srImathE rAmAnujAya nama:
srImadh varavaramunayE nama:

gyAna sAram

thaniyan (invocation)

srI aruLALa perumAL emperumAnAr was a sishya of emperumAnAr and he surrendered to the divine feet of that Acharyan. He learned and understood all the vEdhas and other sAsthras from his AchAryan. So he had understood very well about the fundamental truth of reaching the Supreme Lord and attaining the ultimate happiness. He always stayed with emperumAnAr, near his divine feet, and doing all kainkaryams for his AchAryan’s happiness. srI aruLALa perumAL emperumAnAr, one with such a guru bhakthi, due to his huge kindness wanted all the people to achieve religious benefit by understanding all the thathva discourses that he had heard from his AchAryan.

So based on emperumAnAr’s instructions, he writes ‘gyAna sAram’ in simple clear thamizh language using veNpA (grammar of a type of thamizh poem) that could be understood by everyone, and gives us all, the essence of what he had heard about the Supreme Lord’s true nature, about the ways to reach Him, and about the ultimate happiness one gets after reaching Him.

gyAna sAram – thaniyan (invocation)

srI:
srImathE satakOpAya nama:
srImathE rAmAnujAya nama:
srImadh varavaramunayE nama:

gyAna sAram

In English, based on the thamizh prose mentioned above, which is based on srI maNavALa mAmunigaL’s vyAkyAnam .

thaniyan of aruLALa perumAL emperumAnAr

“kArthikE bharaNI jAtham yathIndhrAshrayam AshrayE|

gyaAnapramEya sArAbhi vakthAram varadham munim”||

Explanation: The one whose avathAram is in the month of kArthikai and in bharaNi star, onewho surrendered to srI rAmAnujar the head of saints, who in his gyAnasAram pramEyasAramspoke about the greatness of AchAryan, adiyen surrender to that aruLALa mAmuni(aruLALaperumAL emperumAnAr).

“rAmAnuja sachchishyam vEdha sAsthrArtha sampatham| 

chathurthAshrama sampannam dhEvarAja munim bhajE” ||

I bow to aruLALa mAmuni who is – a good sishyA or ramAnujAchariar, who is – an expert in vedhAs and other sAshthras, and the one who took up the fourth Ashramam that is sainthood.

(rAmAnuja sachchishyam) – Recall the incident explained in guruparampara, when with the original name of yagya mUrthy he debated with emperumAnAr for eighteen days about vEdhAntha based on tharkam etc., and made emperumanAr very concerned about saving the sampradhyAm, pEraruLALr athigiri varadharAja perumAL came in emperumAnAr’s dream and said ‘O emperumanAr! Please do not be discouraged. I am giving you a talented sishya that I created. You shall win him over”.

(vEdha sAsthrArtha sampatham) – We can understand well about his deep knowledge in sAsthras when we see how he debated with emperumAnAr for eighteen days, and how he provided us the essence of sAsthrAs through his gyAnasAram pramEyasAram by beautiful and easy to understand pAsurams which are based on thamizh veNpa (a type of poem defined In thamizh grammar).

(dhEvarAja munim) – Based on his greatness of having the blessings of dhEvarAjan, that is pEraruLALan. to became a sishya of emperumAnAr, and based on the greatness of his being equal to emperumAnar in gyAna, bhakthi, and vyrAkyam, we understand that he got an apt thirunAmam of ‘aruLALamuni’.

gyAna sAra thaniyan:

suruLAr karungkuzhal thOgaiyar vEl vizhiyil thuvaLum

 maruLAm vinai kedum mArkkam peRREn marai nAngum – sonna

poruL gyAna sAraththaip pundhiyil thandhavan pongoLisEr

 aruLALa mamuni-am porkazhalgaL adaindha pinnE.

Explanation: adiyEn obtained the way to destroy the ever-accumulated karmas, after surrendering to the beautiful and divine feet of the one who through his gyAnasAram pramEyasAram fed the knowledge of deep meanings of the four vEdhas and true meanings of thirumanthiram, who is a bright light of knowledge, who is named as aruLALamAmuni.

The meaning of the thaniyan is: Because of ever-accumulated karmas, clarity of truth diminishes in us.  Because it diminishes, one’s affinity to be attracted to women increases. Because of this, our mind starts dwelling on their curly dark hair and shapely and sharp eyes. But after surrendering to the divine feet of aruLALamAmuni, I understood the ways in which I could get out of such kAmam and related mistakes.

To explain further, this thaniyan says: After surrendering to my AchAryan aruLALaperumAL emperumAnAr, I got clarity in my mind after learning his gyAnasAram and pramEyasAram. Because of that, I understood the ways in which I could destroy the bad karmas of being disturbed in my heart by looking at women’s beautiful hair, and eyes that are shaped and sharp like a spear.

The destruction of attraction towards women may be extended to destruction of other mistakes like anger, greed, lack of knowledge of truth, ego, jealousy, etc. The thirukuraL also conveys the same meaning in the verse: “kAmam, veguLi, mayakkam immUndran nAmam keda-k kedum nOi”, which implies that those mistakes that destroy human culture would be solved by AchArya kaTAksham.

So AchAryan’s greatness was highlighted by this thaniyan.